
“हे कौन्तेय ! सिद्धि-(अन्तःकरणकी शुद्धि-) को प्राप्त हुआ साधक ब्रह्मको, जो कि ज्ञानकी परा निष्ठा है, जिस प्रकारसे प्राप्त होता है, उस प्रकारको तुम मुझसे संक्षेपमें ही समझो। — VaniSagar”
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அர்ஜுனா, முழுமையை அடைந்த ஒருவர் பிரம்மத்தை எப்படி அடைகிறார் என்பதை சுருக்கமாக என்னிடமிருந்து கற்றுக்கொள்.
হে অর্জুন, আমার কাছ থেকে শিখুন, সংক্ষেপে যিনি পূর্ণতা লাভ করেছেন তিনি কীভাবে ব্রহ্ম-অনন্ত, সেই পরম জ্ঞানের রাজ্যে পৌঁছান।
હે અર્જુન, મારી પાસેથી સંક્ષિપ્તમાં શીખો કે જેણે પૂર્ણતા પ્રાપ્ત કરી છે તે બ્રહ્મ સુધી કેવી રીતે પહોંચે છે - શાશ્વત, જ્ઞાનની તે સર્વોચ્ચ સ્થિતિ.
ಓ ಅರ್ಜುನನೇ, ಪರಿಪೂರ್ಣತೆಯನ್ನು ಪಡೆದವನು ಬ್ರಹ್ಮನನ್ನು-ಶಾಶ್ವತವಾದ, ಜ್ಞಾನದ ಪರಮೋಚ್ಚ ಸ್ಥಿತಿಯನ್ನು ಹೇಗೆ ತಲುಪುತ್ತಾನೆ ಎಂಬುದನ್ನು ಸಂಕ್ಷಿಪ್ತವಾಗಿ ನನ್ನಿಂದ ಕಲಿಯಿರಿ.
हे अर्जुना, माझ्याकडून शिका, ज्याने परिपूर्णता प्राप्त केली आहे तो ब्रह्म- शाश्वत, ज्ञानाच्या त्या सर्वोच्च स्थितीपर्यंत कसा पोहोचतो.
हे अर्जुन, मबाट सिक्नुहोस् कि कसरी पूर्णता प्राप्त गरेको व्यक्ति ब्रह्ममा पुग्छ- शाश्वत, त्यो परम ज्ञानको अवस्था।
ఓ అర్జునా, క్లుప్తంగా నా నుండి నేర్చుకోండి, పరిపూర్ణతను పొందిన వ్యక్తి బ్రహ్మను-శాశ్వతమైన, ఆ అత్యున్నత జ్ఞాన స్థితిని ఎలా చేరుకుంటాడు.
ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਸਿੱਖੋ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਸੰਖੇਪ ਵਿੱਚ, ਜਿਸ ਨੇ ਪੂਰਨਤਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤੀ ਹੈ, ਉਹ ਬ੍ਰਾਹਮਣ-ਅਨਾਦਿ, ਗਿਆਨ ਦੀ ਪਰਮ ਅਵਸਥਾ ਤੱਕ ਕਿਵੇਂ ਪਹੁੰਚਦਾ ਹੈ।
ହେ ଅର୍ଜୁନ, ମୋଠାରୁ ଶିଖ, ସଂକ୍ଷେପରେ ଯିଏ ସିଦ୍ଧତା ହାସଲ କରିଛି, ସେ କିପରି ବ୍ରାହ୍ମଣରେ ପହଞ୍ଚେ - ଅନନ୍ତ, ସେହି ସର୍ବୋଚ୍ଚ ଜ୍ଞାନର ସ୍ଥିତି |
مون کان سکو، اي ارجن، مختصر طور تي، جيڪو ڪمال حاصل ڪري چڪو آهي، اهو ڪيئن برهمڻ تائين پهچي ٿو، جيڪو ابدي، علم جي اعليٰ حالت آهي.
ഹേ അർജ്ജുനാ, പൂർണ്ണത കൈവരിച്ച ഒരാൾ ബ്രഹ്മത്തിൽ എങ്ങനെ എത്തിച്ചേരുന്നുവെന്ന് ചുരുക്കത്തിൽ എന്നിൽ നിന്ന് പഠിക്കുക - ശാശ്വതമായ, ആ പരമമായ ജ്ഞാനാവസ്ഥ.
सिद्धी प्राप्त जाल्लो मनीस ब्रह्माक कशें पावता तें संक्षेपांत शिकून घे, हे अर्जुन, शाश्वत, ती परम ज्ञान अवस्था.
Sacred Commentaries
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Swami Ramsukhdas
व्याख्या -- सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे -- यहाँ सिद्धि नाम अन्तःकरणकी शुद्धिका है? जिसका वर्णन पूर्वश्लोकमें आये असक्तबुद्धिः? जितात्मा और विगतस्पृहः पदोंसे हुआ है। जिसका अन्तःकरण इतना शुद्ध हो गया है कि उसमें किञ्चिन्मात्र भी किसी प्रकारकी कामना? ममता और आसक्ति नहीं रही? उसके लिये कभी किञ्चिन्मात्र भी किसी वस्तु? व्यक्ति? परिस्थिति आदिकी जरूरत नहीं पड़ती अर्थात् उसके लिये कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता। इसलिये इसको सिद्धि कहा है।लोकमें तो ऐसा कहा जाता है कि मनचाही चीज मिल गयी तो सिद्धि हो गयी? अणिमादि सिद्धियाँ मिल गयीं तो सिद्धि हो गयी। पर वास्तवमें यह सिद्धि नहीं है क्योंकि इसमें पराधीनता होती है? किसी बातकी कमी रहती है? और किसी वस्तु? परिस्थिति आदिकी जरूरत पड़ती है। अतः जिस सिद्धिमें किञ्चिन्मात्र भी कामना पैदा न हो? वही वास्तवमें सिद्धि है। जिस सिद्धिके मिलनेपर कामना बढ़ती रहे? वह सिद्धि वास्तवमें सिद्धि नहीं है? प्रत्युत एक बन्धन ही है।अन्तःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त हुआ साधक ही ब्रह्मको प्राप्त होता है। वह जिस क्रमसे ब्रह्मको प्राप्त होता है? उसको मुझसे समझ -- निबोध मे। कारण कि सांख्ययोगकी जो सारसार बातें हैं? वे सांख्ययोगीके लिये अत्यन्त आवश्यक हैं और उन बातोंको समझनेकी बहुत जरूरत है।निबोध पदका तात्पर्य है कि सांख्ययोगमें क्रिया और सामग्रीकी प्रधानता नहीं है। किन्तु उस तत्त्वको समझनेकी प्रधानता है। इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भी सांख्ययोगीके विषयमें निबोध पद आया है।समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा -- सांख्ययोगीकी जो आखिरी स्थिति है? जिससे बढ़कर साधककी कोई स्थिति नहीं हो सकती? वही ज्ञानकी परा निष्ठा कही जाती है। उस परा निष्ठाको अर्थात् ब्रह्मको सांख्ययोगका साधक जिस प्रकारसे प्राप्त होता है? उसको मैं संक्षेपसे कहूँगा अर्थात् उसकी सारसार बातें,कहूँगा। सम्बन्ध -- ज्ञानकी परा निष्ठा प्राप्त करनेके लिये साधनसामग्रीकी आवश्यकता है? उसको आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।
Sri Harikrishnadas Goenka
पूर्वोक्त स्वधर्मानुष्ठानद्वारा ईश्वरार्चनरूप साधनसे उत्पन्न हुई? ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिकी योग्यतारूप सिद्धिको? जो प्राप्त कर चुका है और जिसमें आत्मविषयक विवेकज्ञान उत्पन्न हो गया है? उस पुरुषको? जिस क्रमसे केवल आत्मज्ञाननिष्ठारूप नैष्कर्म्यसिद्धि मिलती है? वह ( क्रम ) बतलाना है? अतः कहते हैं --, सिद्धिको प्राप्त हुआ? अर्थात् अपने कर्मोंद्वारा ईश्वरकी पूजा करके? उसकी कृपासे उत्पन्न हुई शरीर और इन्द्रियोंकी ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिका योग्यतारूप सिद्धिको प्राप्त हुआ पुरुष -- यह पुनरुक्ति आगे कहे जानेवाले वचनोंके साथ सम्बन्ध जो़ड़नेके लिये है। वे आगे कहे जानेवाले वचन कौनसे हैं जिनके लिये पुनरुक्ति है सो बतलाते हैं -- जिस ज्ञाननिष्ठारूप प्रकारसे ( साधक ब्रह्मको) -- परमात्माको पाता है? उस प्रकारको ? यानी ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिके क्रमको? तू मेरे वचनोंसे निश्चयपूर्वक समझ। क्या ( उसका ) विस्तारपूर्वक ( वर्णन करेंगे ) इसपर कहते हैं कि नहीं। हे कौन्तेय समाससे अर्थात् संक्षेपसे ही? जिस क्रमसे ब्रह्मको प्राप्त होता है? उसे समझ। इस वाक्यसे जिस ब्रह्मप्राप्तिके लिये प्रतिज्ञा की थी? उसे इदंरूपसे ( स्पष्ट ) दिखानेके लिये कहते हैं कि ज्ञानकी जो परानिष्ठा है उसको सुन। अन्तिम अवधिपरिसमाप्तिका नाम निष्ठा है। ऐसी जो ब्रह्मज्ञानकी परमावधि है ( उसको सुन )। वह ( ब्रह्मज्ञानकी निष्ठा ) कैसी है जैसा कि आत्मज्ञान है। वह कैसा है जैसा आत्मा है। वह,( आत्मा ) कैसा है जैसा भगवान्ने बतलाया है तथा जैसा उपनिषद्वाक्योंद्वारा कहा गया है और जैसा न्यायसे सिद्ध है। पू0 -- ज्ञान विषयाकार होता है? परंतु आत्मा न तो कहीं भी विषय माना जाता है और न आकारवान् ही। उ0 -- किंतु आदित्यवर्ण प्रकाशस्वरूप स्वयंज्योति इस तरह आत्माका आकारवान् होना तो श्रुतिमें कहा है। पू0 -- यह कहना ठीक नहीं क्योंकि वे वाक्य तमःस्वरूपत्वका निषेध करनेके लिये कहे गये हैं। अर्थात् आत्मामें द्रव्यगुण आदिके आकारका प्रतिषेध करनेपर जो आत्माके अन्धकाररूप माने जानेकी आशङ्का होती है? उसका प्रतिषेध करनेके लिये ही आदित्यवर्णम् इत्यादि वाक्य हैं क्योंकि अरूपम् आदि वाक्योंसे विशेषतः रूपका प्रतिषेध किया गया है और इसका ( आत्माका ) रूप इन्द्रियोंके सामने नहीं ठहरता? इसको ( आत्माको ) कोई भी आंखोंसे नहीं देख सकता यह अशब्द है? अस्पर्श है इत्यादि वचनोंसे भी आत्मा किसीका विषय नहीं है? यह बात कही गयी है। सुतरां जैसा आत्मा है वैसा ही ज्ञान है यह कहना युक्तियुक्त नहीं है। तब फिर आत्माका ज्ञान कैसे होता है क्योंकि सभी ज्ञान? जिसको विषय करते हैं उसीके आकारवाले होते हैं और आत्मा निराकार है ऐसा कहा है। फिर ज्ञान और आत्मा दोनों निराकार होनेसे उसमें भावना और निष्ठा कैसे हो सकती है उ0 -- यह कहना ठीक नहीं क्योंकि आत्माका अत्यन्त निर्मलत्व? स्वच्छत्व और सूक्ष्मत्व सिद्ध है और बुद्धिका भी आत्माके सदृश निर्मलत्व आदि सिद्ध है? इसलिये उसका आत्मचैतन्यके आकारसे आभासित होना बन सकता है। बुद्धिसे आभासित मन? मनसे आभासित इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंसे आभासित स्थूल शरीर है। इसलिये सांसारिक मनुष्य देहमात्रमें ही आत्मदृष्टि करते हैं। देहात्मवादी लोकायतिक? चेतनाविशिष्ट शरीर ही आत्मा है ऐसा कहते हैं? दूसरे? इन्द्रियोंको चेतन कहनेवाले हैं तथा कोई मनको और कोई बुद्धिको चेतन कहनेवाले हैं। कितने ही? उस बुद्धिके भी भीतर व्याप्त? अव्यक्तकोअव्याकृतसंज्ञक अविद्यावस्थ ( चिदाभास ) को आत्मरूपसे समझनेवाले हैं। बुद्धिसे लेकर शरीरपर्यन्त सभी जगह आत्मचैतन्यका आभास ही उनमें आत्माकी भ्रान्तिका कारण है। अतः ( यह सिद्ध हुआ कि ) आत्मविषयक ज्ञान विधेय नहीं है। तो क्या विधेय है नामरूप आदि अनात्मा वस्तुओंका जो आत्मामें अध्यारोप है उसकी निवृत्ति ही कर्तव्य है। आत्मचैतन्यका विज्ञान प्राप्त करना नहीं है क्योंकि ज्ञान? अविद्याद्वारा आरोपित समस्त पदार्थोंके आकारमें ही विशेषरूपसे ग्रहण किया हुआ है। यही कारण है कि विज्ञानवादी बौद्ध विज्ञानसे अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु ही नहीं है इस प्रकार मानते हैं और उस ज्ञानको स्वसंवेद्य माननेके कारण प्रमाणान्तरकी आवश्यकता नहीं मानते। सुतरां ब्रह्ममें जो अविद्याद्वारा अध्यारोप किया गया है? उसका निराकरणमात्र कर्तव्य है। ब्रह्मज्ञानके लिये प्रयत्न कर्तव्य नहीं है क्योंकि ब्रह्म तो अत्यन्त प्रसिद्ध ही है। ब्रह्म यद्यपि अत्यन्त प्रसिद्ध? सुविज्ञेय? अति समीप और आत्मस्वरूप है तो भी वह विवेकरहित मनुष्योंको? अविद्याकल्पित नामरूपके भेदसे उनकी बुद्धि भ्रमित हो जानेके कारण? अप्रसिद्ध? दुर्विज्ञेय? अति दूर और दूसरासा प्रतीत हो रहा है। परंतु जिनकी बाह्याकार बुद्धि निवृत्त हो गयी है? जिन्होंने गुरु और आत्माकी कृपा लाभ कर ली है? उनके लिये इससे अधिक सुप्रसिद्ध? सुविज्ञेय? सुखस्वरूप और अपने समीप कुछ भी नहीं है। प्रत्यक्षउपलब्ध धर्ममय इत्यादि वाक्योंसे भी यही बात कही गयी है। कितने ही अपनेको पण्डित माननेवाले यों कहते हैं कि आत्मतत्त्व निराकार होनेके कारण उसको बुद्धि नहीं पा सकती अतः सम्यक् ज्ञाननिष्ठा दुःसाध्य है। ठीक है? जो गुरुपरम्परासे रहित हैं? जिन्होंने वेदान्तवाक्योंको ( विधिपूर्वक ) नहीं सुना है? जिनकी बुद्धि सांसारिक विषयोंमें अत्यन्त आसक्त हो रही है? जिन्होंने यथार्थ ज्ञान करानेवाले प्रमाणोंमें परिश्रम नहीं किया है? उनके लिये यही बात है। परंतु जो उनसे विपरीत हैं? उनके लिये तो? लौकिक ग्राह्यग्राहक भेदयुक्त,वस्तुओंमें सद्भाव सम्पादन करना ( इनको सत्य समझना ) अत्यन्त कठिन है क्योंकि उनको आत्मचैतन्यसे अतिरिक्त दूसरी वस्तुकी उपलब्धि ही नहीं होती। यह ठीक इसी तरह है? अन्यथा नहीं है। यह बात हम पहले सिद्ध कर आये हैं और भगवान्ने भी कहा है कि जिसमें सब प्राणी जागते हैं? ज्ञानी मुनिकी वही रात्रि है इत्यादि। सुतरां आत्मस्वरूपके अवलम्बनमें? बाह्य नानाकार भेदबुद्धिकी निवृत्ति ही कारण है क्योंकि आत्मा कभी किसीके भी लिये अप्रसिद्ध? प्राप्तव्य? त्याज्य या उपादेय नहीं हो सकता। आत्माको अप्रसिद्ध मान लेनेपर तो सभी प्रवृत्तियोंको निरर्थक मानना सिद्ध होगा। इसके सिवा न तो यह कल्पना की जा सकती है कि अचेतन शरीरादिके लिये ( सब कर्म किये जाते हैं ) और न यही कि सुखके लिये सुख है या दुःखके लिये दुःख है क्योंकि सारे व्यवहारका प्रयोजन अन्तमें आत्माके ज्ञानका विषय बन जाना है। इसलिये? जैसे अपने शरीरको जाननेके लिये अन्य प्रमाणकी अपेक्षा नहीं है? वैसे ही आत्मा उससे भी अधिक अन्तरतम होनेके कारण आत्माको जाननेके लिये प्रमाणान्तरकी आवश्यकता नहीं है अतः यह सिद्ध हुआ कि विवेकियोंके लिये आत्मज्ञाननिष्ठा सुप्रसिद्ध है। जिनके मतमें ज्ञान निराकार और अप्रत्यक्ष है उनको भी? ज्ञेयका बोध ( अनुभव ) ज्ञानके ही अधीन होनेके कारण? सुखादिकी तरह ही ज्ञान अत्यन्त प्रसिद्ध है? यह मान लेना चाहिये। तथा ज्ञानको जाननेके लिये जिज्ञासा नहीं होती इसलिये भी ( यह मान लेना चाहिये कि ज्ञान प्रत्यक्ष है ) यदि ज्ञान अप्रत्यक्ष होता? तो अन्य ज्ञेय वस्तुओंकी तरह उसको भी जाननेके लिये इच्छा की जाती? अर्थात् जैसे ज्ञाता ( पुरुष ) घटादिरूप ज्ञेय पदार्थोंका ज्ञानके द्वारा अनुभव करना चाहता है? उसी तरह उस ज्ञानको भी अन्य ज्ञानके द्वारा जाननेकी इच्छा करता? परंतु यह बात नहीं है। सुतरां ज्ञान अत्यन्त प्रत्यक्ष है और इसीलिये ज्ञाता भी अत्यन्त ही प्रत्यक्ष है। अतः ज्ञानके लिये प्रयत्न कर्तव्य नहीं है? किंतु अनात्मबुद्धिकी निवृत्तिके लिये ही कर्तव्य है इसीलिये ज्ञाननिष्ठा सुसंपाद्य है
Sri Anandgiri
ज्ञानप्राप्तियोग्यतावतो जातसम्यग्धियस्तत्फलप्राप्तौ मुक्तावुक्तायां वक्तव्यशेषो नास्तीत्याशङ्क्याह -- पूर्वोक्तेनेति। क्रमाख्यं वस्तु तदित्युच्यते। सिद्धिं प्राप्त इत्युक्तमेव कस्मादनूद्यते तत्राह -- तदनुवाद इति। उत्तरमेव प्रश्नपूर्वकं स्फोरयति -- किं तदित्यादिना। ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिक्रमस्य विस्तरेणोक्तौ दुर्बोधत्वमाशङ्क्य परिहरति -- किमिति। चतुर्थपादस्य पूर्वेणासङ्गतिमाशङ्क्याह -- यथेति। निष्ठायाः सापेक्षत्वात्प्रतिसंबन्धि प्रतिनिर्देष्टव्यमित्याह -- कस्येति। या ब्रह्मज्ञानस्य परा निष्ठा सा प्रकृतस्य ज्ञानस्य निष्ठेत्याह -- ब्रह्मेति। तस्य परा निष्ठा न प्रसिद्धेति कृत्वा साधनानुष्ठानाधीनतया साध्येति मत्वा पृच्छति -- कीदृशीति। प्रसिद्धमात्मज्ञानमनुरुध्य ब्रह्मज्ञाननिष्ठा सुज्ञानेत्याह -- यादृशमिति। तत्रापि प्रसिद्धिरसिद्धेति शङ्कते -- कीदृगिति। अर्थेनैव विशेषो हीति न्यायेनोत्तरमाह -- यादृश इति। तस्मिन्नपि विप्रतिपत्तेरप्रसिद्धिमभिसंधाय पृच्छति -- कीदृश इति। भगवद्वाक्यान्युपनिषद्वाक्यानि चाश्रित्य परिहरति -- यादृश इति। न जायते म्रियते वेत्यादीनि वाक्यानि। कूटस्थत्वमसङ्गत्वमित्यादिन्यायः। ज्ञानस्य,विषयाकारत्वादात्मनश्चाविषयत्वादनाकारत्वाच्च तदाकारज्ञानायोगादात्मप्रसिद्धावपि नात्मज्ञानप्रसिद्धिरिति शङ्कते -- नन्विति। आकारवत्त्वमात्मनः श्रुतिसिद्धमिति सिद्धान्ती शङ्कते -- नन्वादित्येति। उक्तवाक्यानामन्यार्थत्वदर्शनेन पूर्ववादी परिहरति -- नेत्यादिना। संग्रहवाक्यं प्रपञ्चयति -- द्रव्येति। इतश्चाकारवत्त्वमात्मनो नास्तीत्याह -- अरूपमिति। यदात्मनो विषयत्वाभावात्तद्विषयं ज्ञानं न संभवतीत्युक्तं तदुपपादयति -- अविषयत्वाच्चेति। आत्मनोऽविषयत्वे श्रुतिमुदाहरति -- नेत्यादिना। संदृशे सम्यग्दर्शनविषयत्वायास्यात्मनो रूपं न तिष्ठतीत्यर्थः। तदेव करणागोचरत्वेनोपपादयति -- नेति। शब्दादिशून्यत्वाच्चात्मा विषयो न भवतीत्याह -- अशब्दमिति। आत्मनो विषयत्वाकारवत्त्वयोरभावे फलितमाह -- तस्मादिति। ज्ञानस्यात्माकारत्वाभावे सत्यात्मज्ञानमिति व्यपदेशासिद्धिरित्येकदेशी शङ्कते -- कथं तर्हीति। कात्रानुपपत्तिरित्याशङ्क्याह -- सर्वं हीति। आत्मनोऽपि तर्हि विषयत्वेन ज्ञानस्य तदाकारत्वं स्यादित्याशङ्क्याह -- निराकारश्चेति। आत्मनो विषयत्वराहित्यं चकारार्थः। आत्मवत्तज्ज्ञानस्यापि तर्हि निराकारत्वं भविष्यतीत्यत्राह -- ज्ञानेति। तच्छब्देनात्मज्ञानं गृह्यते। तस्य भावना पौनःपुन्येनानुसन्धानं तस्यानिष्ठा समाप्तिरात्मसाक्षात्कारदार्ढ्यं नचैतत्सर्वमात्मनो ज्ञानस्य वा निराकारत्वे सिध्यतीत्यर्थः। ज्ञानात्मनोः साम्योपन्यासेन सिद्धान्ती समाधत्तेनेत्यादिना। यथोक्तसाम्यानुसारादात्मचैतन्याभासव्याप्ता ज्ञानपरिणामवती बुद्धिः साभासबुद्धिव्याप्तं मनः साभासमनोव्याप्तानीन्द्रियाणि साभासेन्द्रियव्याप्तः स्थूलो देहः। तत्र लौकिकभ्रान्तिं प्रमाणयति -- अत इति। आत्मदृष्टेर्देहमात्रे दृष्टत्वात्तत्र चैतन्याभासव्याप्तिरिन्द्रियद्वारा कल्प्यत इन्द्रियेषु च तद्दृष्टिदर्शनाच्चैतन्याभासवत्त्वं मनोद्वारा सिध्यति मनसि चात्मदृष्टेश्चैतन्याभासवत्त्वं बुद्धिद्वारा लभ्यते बुद्धौ चात्मदृष्टेरज्ञानद्वारा चैतन्याभाससिद्धिरित्यर्थः। देहे लौकिकमात्मत्वदर्शनं न्यायाभावादुपेक्षितमित्याशङ्क्याह -- देहेति। तथापि कथमिन्द्रियाणां न्यायहीनमात्मत्वमिष्टमित्याशङ्क्याह -- तथेति। तथापि मनसो यदात्मत्वं तन्न्यायशून्यमित्याशङ्क्याह -- अन्य इति। बुद्धेरात्मत्वमपि न्यायोपेतमिति सूचयति -- अन्ये बुद्धीति। देहादौ बुध्यन्ते परमात्मत्वबुद्धिर्नान्यत्रेति नियमं वारयति -- ततोऽपीति। तत्र हि साभासेऽन्तर्यामिणि कारणोपासकानामात्मत्वधीरस्तीत्यर्थः। बुद्ध्यादौ देहान्ते लौकिकपरीक्षकाणामात्मत्वभ्रान्तौ साघारणं कारणमाह -- सर्वत्रेति। आत्मज्ञानस्य लौकिकपरीक्षकप्रसिद्धत्वादेव विधिविषयत्वमपि परेष्टं परास्तमित्याह -- इत्यत इति। ज्ञानस्य विधेयत्वाभावे किं कर्तव्यं द्रष्टव्यादिवाक्यैरित्याशङ्क्याह -- किंतर्हीति। आत्मज्ञानस्याविधेयत्वे प्रागुक्तमतःशब्दितं हेतुं विवृणोति -- अविद्येति। देहेन्द्रियमनोबुद्ध्यव्यक्तैरुपलभ्यमानैः सहोपलभ्यते चैतन्यं नान्यथा तेषामुपलम्भो जडत्वादित्यत्र विज्ञानवादिभ्रान्तिं प्रमाणयति -- अतएवेति। सर्वं ज्ञेयं ज्ञानव्याप्तमेव ज्ञायते तेन ज्ञानातिरिक्तं नास्त्येव वस्तु? संमतं हि स्वप्नदृष्टं वस्तु ज्ञानातिरिक्तं नास्तीति ते भ्राम्यन्तीत्यर्थः। ज्ञानस्यापि ज्ञेयत्वाज्ज्ञातृ वस्त्वन्तरमेष्टव्यमित्याशङ्क्याह -- प्रमाणान्तरेति। ज्ञानस्य स्वेनैव ज्ञेयत्वोपगमनेनातिरिक्तप्रमाणनिरपेक्षतां च प्रतिपन्ना इति संबन्धः। ब्रह्मात्मनि ज्ञानस्य सिद्धत्वेनाविधेयत्वे फलितमाह -- तस्मादिति। यत्नोऽत्र भावना। ब्रह्मणस्तज्ज्ञानस्य चात्यन्तप्रसिद्धत्वे कथं ब्रह्मण्यन्यथा प्रथा लौकिकानामित्यत्राह -- अविद्येति। यथाप्रतिभासं दुर्विज्ञेयत्वादिरूपमेव ब्रह्म किं न स्यात्तत्राह -- बाह्येति। गुरुप्रसादः शुश्रूषया तोषितबुद्धेराचार्यस्य करुणातिरेकादेव तत्त्वं बुध्यतामिति निरवग्रहोऽनुग्रहः? आत्मप्रसादस्त्वधिगतपदशक्तिवाक्यतात्पर्यस्य श्रौतयुक्त्यनुसंधानादात्मनो मनसो विषयव्यावृत्तस्य प्रत्यगेकाग्रतया तत्प्रावण्यमिति विवेकः। आत्मज्ञानस्यात्मद्वारा प्रसिद्धत्वे वाक्योपक्रमं प्रमाणयति -- तथाचेति। आत्मनो निराकारत्वात्तस्मिन्बुद्धेरप्रवृत्तेः सम्यग्ज्ञाननिष्ठा न सुसंपाद्येति मतमुत्थापयति -- केचित्त्विति। बहिर्मुखानामन्तर्मुखानां वा ब्रह्मणि सम्यग्ज्ञाननिष्ठा दुःसाध्येति विकल्प्याद्यमनूद्याङ्गीकरोति -- सत्यमिति। पूर्वपूर्वविशेषणमुत्तरोत्तरविशेषणे हेतुत्वेन योजनीयम्। द्वितीयं दूषयति -- तद्विपरीतानामिति। अद्वैतनिष्ठानां द्वैतविषये सम्यग्बुद्धेरतिशयेन दुःसंपाद्यत्वे हेतुमाह -- आत्मेति। तद्व्यतिरेकेण वस्त्वन्तरस्यासत्त्वं कथमित्याशङ्क्याह -- तथाचेति। अद्वैतमेव वस्तु द्वैतं त्वाविद्यकं नान्यथा तात्त्विकमित्येतदेवमेव यथा स्यात्तथोक्तवन्तो वयं तत्र तत्राध्यायेष्विति योजना। अन्तर्निष्ठानामद्वैतदर्शिनां द्वैते नास्ति सद्बुद्धिरित्यत्र भगवतोऽपि संमतिमाह -- उक्तंचेति। परमतं निराकृत्य प्रकृतमुपसंहरन्नात्मनो निराकारत्वे ज्ञानस्य तदालम्बनत्वे किं कारणमित्याशङ्क्याह -- तस्मादिति। नन्वात्मा कथंचित्सम्यग्ज्ञानक्रियासाध्यश्चेत्तस्य हेयोपादेयान्यतरकोटिनिवेशात्प्राप्तं स्वर्गादिवत्िक्रयासाध्यत्वेनाप्रसिद्धत्वं नेत्याह -- नहीति। आत्मत्वादेव प्रसिद्धत्वेन प्राप्तत्वादनात्मवत्तस्य हेयोपादेयत्वयोरयोगान्न क्रियासाध्यतेत्यर्थः। आत्मनश्चेदृते क्रियामसिद्धत्वं,तदा सर्वप्रवृत्तीनामभ्युदयनिःश्रेयसार्थानामात्मार्थत्वायोगादर्थिनोऽभावे स्वार्थत्वमप्रामाणिकं स्यादित्याह -- अप्रसिद्धे हीति। ननु प्रवृत्तीनां स्वार्थत्वं देहादीनामन्यतमस्यार्थित्वेन तादर्थ्यादित्याशङ्क्य घटादिवदचेतनस्यार्थित्वायोगान्नैवमित्याह -- न चेति। ननु प्रवृत्तीनां फलावसायितया सुखदुःखयोरन्यतरार्थत्वान्न स्वार्थत्वं तत्राह -- न चेति। प्रवृत्तीनां सुखदुःखार्थत्त्वेऽपि तयोः स्वार्थत्वासिद्धेरर्थित्वेनात्मा सिध्यतीत्यर्थः। किञ्च सर्वापेक्षान्यायादात्मावगत्यवसानः सर्वो व्यवहारः? नचात्मन्यप्रसिद्धे यज्ञादिव्यवहारस्य तज्ज्ञानार्थत्वं तेनात्मप्रसिद्धिरेष्टव्येत्याह -- आत्मेति। नन्वात्माप्रसिद्धोऽपि प्रमाणद्वारा प्रसिध्यति यत्सिध्यति तत्प्रमाणादेवेति न्यायात्तत्राह -- तस्मादिति। मानमेयादिसर्वव्यवहारस्यात्मावगत्यन्तत्वोपगमात्प्रागेव प्रमाणप्रवृत्तेरात्मप्रसिद्धेरेष्टव्यत्वादित्यर्थः। आत्मावगतेरेवं स्वाभाविकत्वे विवेकवतामारोपनिवृत्त्या ज्ञाननिष्ठा सुप्रसिद्धेत्युपसंहरति -- इत्यात्मेति। नन्वनाकारामेवानुमिमीमहे बुद्धिमिति वदतामनाकारमप्रत्यक्षमिच्छतां प्रागर्थावगतेरप्रसिद्धमेव ज्ञानं नेत्याह -- येषामिति। सुखादिवन्नित्यानुभवगम्यं ज्ञानं नानुमेयं विषयावगत्या तदनुमितावितरेतराश्रयादिति भावः। इतश्च ज्ञानं प्रसिद्धमन्यथा तत्र जिज्ञासाप्रसङ्गान्नच ज्ञाने जिज्ञासा प्रसिद्धा प्रसिद्धे च तदयोगादित्याह -- जिज्ञासेति। तदेव प्रपञ्चयति -- अप्रसिद्धं चेदिति। दृष्टान्तमेव व्याचष्टे -- यथेति। दार्ष्टान्तिकं विवृणोति -- तथेति। इष्टापत्तिं निराचष्टे -- नचेति। ज्ञानस्य ज्ञानान्तरेण ज्ञेयत्वमेतच्छब्दार्थः। अनवस्थापत्तेरित्यर्थः। ज्ञाने जिज्ञासानुपपत्तौ फलितमाह -- अत इति। प्रसिद्धेऽपि ज्ञाने ज्ञातर्यात्मनि किमायातं तदाह -- ज्ञातापीति। ज्ञानस्य विना ज्ञातारमपर्यवसानादित्यर्थः। ज्ञानस्य प्रसिद्धत्वे तत्र भावनापर्यायो विधिर्नास्तीत्याह -- तस्मादिति। कुत्र तर्हि प्रयत्नाख्या भावनेत्याशङ्क्याह -- किंत्विति। अविषये निराकारे चात्मनि ज्ञाननिष्ठाया दुःसंपाद्यत्वाभावे फलितं निगमयति -- तस्मादिति।
Sri Dhanpati
पूर्वोक्तेन स्वकर्मानुष्ठानेनेश्वराभ्यर्जनरुपेण जनितां केवलज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणां सिद्धिं प्राप्तस्योत्पन्नात्मविवेकविज्ञानस्य केवलात्मज्ञाननिष्ठा नैष्कर्म्यलक्षणा प्रकृष्टा सिद्धिर्येन क्रमेण भवति तं श्रावयितुमाह। सिद्धिं स्वकर्मणेश्वरमभ्यर्च्य तत्प्रसादजां कायादीनां ज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणां सिद्धिं प्राप्तः यथा येन प्रकारेण ज्ञाननिष्ठारुपेण ब्रह्म परमात्मानं प्राप्नोति तथा तं प्रकारं ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिक्रमं मे मम वचनान्निबोध त्वं निश्चयेनावधारय। किं विस्तरेण? नेत्याह -- समासेनैव संक्षेपेणैव। यं प्रकारमाश्रित्य मातृगर्भेण न संबध्यते तन्निबोधेति द्योतनार्थ कौन्तेयेति संबोधनम्। प्रतिज्ञातां ब्रह्मप्राप्तिमिदन्तया दर्शयितुमाह -- निष्ठेति। या ब्रह्माप्राप्तिर्ज्ञानस्यात्मज्ञानस्य परा निष्ठा परा परिसमाप्तिः।अव्यक्तोयमचिन्त्योयमविकार्योयमुच्यते।क्षेत्रज्ञं तापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।न जायते म्रियते वासदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयंसत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मतत्त्वमसि इत्यादिभगद्वाक्यैरुपनिषद्वाक्यैश्चोक्तः कुटस्थत्वमसङ्गत्वमित्यादिन्यायाच्च प्रदर्शितो य आत्मा तस्य ज्ञानं तु न साकारवस्तुविषयकज्ञानवद्भवितुमर्हति। आत्मन आकारवत्त्वस्यानिष्टत्वात्।न संदृशे तिष्ठति रुपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनम्अशब्दमस्पर्शमरुपं इत्यादिश्रुतेः।आदित्यवर्णो भारुपः स्वयंज्योतिः इत्यादिवाक्यानि तु द्रव्यगुणाद्याकारप्रतिषेधे आत्मनस्तमोरुपत्वे प्राप्ते तत्प्रतिषेधार्थानि। नन्वेवं तर्हि कथं निराकारस्यात्मनो ज्ञानं यतो यद्विषयं भवति यज्ज्ञानं तत्तदाकारं ज्ञानात्मनोश्चोभयोर्निराकारत्वेन कथमात्मज्ञानस्य पौनःपुन्येनानुसंधानात्मिका भावना निष्ठेतिचेदुच्यते। आत्मज्ञानमित्यात्मविषयं ज्ञानं न विधीयते?,चैतन्यस्वरुपस्यात्मनः सुप्रसिद्धत्वेनाज्ञातत्वाभावात्। नहि यस्य चैतन्याभासता बुद्य्धादिदेहान्ते आत्मत्वभ्रान्तिकारणं तस्याज्ञातत्वं शक्यं वक्तुम्। तस्मान्नामरुपाद्यनात्माध्यारोपणनिवृत्तिरेव प्रयत्नेन कार्या। बाह्याकारभेदनिवृत्तेरेवात्मस्वरुपावलम्बने कारणत्वात्। नात्मचैतन्यविज्ञानं तस्यात्यन्तप्रसिद्धत्वात्। नन्वत्यन्तप्रसिद्धं सुविज्ञेयमासन्नतममात्मभूतमप्यप्रसिद्धं दुर्विज्ञेयमतिदूरमन्यदिव ब्रह्म सर्वेषां कथं प्रतिभातीतिचेत्। अविद्याकल्पितनामरुपविशेषाकारापहृतबुद्धित्वेनाविवेकित्वात्तेषामिति गृहाण। बाह्याकारनिवृत्तबुद्धीनां विवेकिनां तु लब्धगुर्वात्मप्रसादानां नातःपरं सुप्रसिद्धं सुविज्ञेयं स्वासन्नमस्ति। तथाचोक्तं -- प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययं इति। एतेन निराकारत्वादत्मवस्तुनो बुद्धिरुपैत्यतो दुःसाध्या सभ्यग्ज्ञाननिष्ठेति केषांचित्पण्डितंमन्यानामुक्तरपास्ता। गुरुसंप्रदायवतां श्रुतवेदान्तानां बहिर्विषयेष्वनासक्तबुद्धीनां सभ्यक्प्रमाणेषु कृतश्रमाणां चैतन्यात्मव्यतिरेकेण वस्त्वन्तरस्यानुपलब्धेर्लौकिकग्राह्यग्राहकद्वैतवस्तुनि सद्धुरत्यन्तदुःसंपाद्यत्वात्। तदुक्तंयस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः इत ज्ञानमप्यत्यन्तं प्रसिद्धमेव सुखादिवदभ्युपगन्तव्यम्। येषां? निराकारं ज्ञानमप्रत्यक्षं तेषामपि ज्ञानवशेनैव ज्ञेयावगतेर्दर्शनात्। ज्ञेयवज्ज्ञानस्य जिज्ञासानुपपत्तेश्च। तथाच ज्ञानस्य ज्ञातुश्चात्यन्तप्रसिद्धत्वादात्मज्ञाने यत्नो न कर्तव्यः किं त्वनात्मन्यात्मबुद्धिनिवृत्तावेवेति संक्षेपः।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| siddhim | perfection |
| prāptaḥ | attained |
| yathā | how |
| brahma | Brahman |
| tathā | also |
| āpnoti | attain |
| nibodha | hear |
| me | from me |
| samāsena | briefly |
| eva | indeed |
| kaunteya | Arjun, the son of Kunti |
| niṣhṭhā | firmly fixed |
| jñānasya | of knowledge |
| yā | which |
| parā | transcendental |
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जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीरको वशमें कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा नैष्कर्म्य-सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar
जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है। — VaniSagar
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“हे कौन्तेय ! सिद्धि-(अन्तःकरणकी शुद्धि-) को प्राप्त हुआ साधक ब्रह्मको, जो कि ज्ञानकी परा निष्ठा है, जिस प्रकारसे प्राप्त होता है, उस प्रकारको तुम मुझसे संक्षेपमें ही समझो। — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 50 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 50 का हिंदी अर्थ: "हे कौन्तेय ! सिद्धि-(अन्तःकरणकी शुद्धि-) को प्राप्त हुआ साधक ब्रह्मको, जो कि ज्ञानकी परा निष्ठा है, जिस प्रकारसे प्राप्त होता है, उस प्रकारको तुम मुझसे संक्षेपमें ही समझो। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 50?
Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 50 translates to: "Learn from Me, O Arjuna, in brief how one who has attained perfection reaches Brahman—the Eternal, that supreme state of knowledge. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य " — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 50 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। हे कौन्तेय ! सिद्धि-(अन्तःकरणकी शुद्धि-) को प्राप्त हुआ साधक ब्रह्मको, जो कि ज्ञानकी परा निष्ठा है, जिस प्रकारसे प्राप्त होता है, उस प्रकारको तुम मुझसे संक्षेपमें ही समझो। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "siddhiṁ prāpto yathā brahma tathāpnoti nibodha me" mean in English?
"siddhiṁ prāpto yathā brahma tathāpnoti nibodha me" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 50. Learn from Me, O Arjuna, in brief how one who has attained perfection reaches Brahman—the Eternal, that supreme state of knowledge. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.