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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 49
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति

जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीरको वशमें कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा नैष्कर्म्य-सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

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TamilIND

எவனுடைய புத்தி எங்கும் பற்றாமல் இருக்கிறதோ, எவனுடைய சுயத்தை அடக்கிக்கொண்டானோ, யாரிடமிருந்து ஆசை ஓடிவிட்டதோ, அவன் துறவின் மூலம் செயலில் இருந்து விடுபடும் உன்னத நிலையை அடைகிறான்.

GujaratiIND

જેની બુદ્ધિ સર્વત્ર નિઃસ્પૃહ છે, જેણે પોતાની જાતને વશ કરી લીધી છે, જેની પાસેથી ઈચ્છા પલાયન થઈ ગઈ છે, તે ત્યાગ દ્વારા ક્રિયામાંથી મુક્તિની પરમ સ્થિતિને પ્રાપ્ત કરે છે.

PunjabiIND

ਜਿਸ ਦੀ ਬੁੱਧੀ ਹਰ ਥਾਂ ਨਿਰਲੇਪ ਹੈ, ਜਿਸ ਨੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਕਾਬੂ ਕਰ ਲਿਆ ਹੈ, ਜਿਸ ਤੋਂ ਇੱਛਾ ਭੱਜ ਗਈ ਹੈ, ਉਹ ਤਿਆਗ ਦੁਆਰਾ ਕਰਮ ਤੋਂ ਮੁਕਤੀ ਦੀ ਪਰਮ ਅਵਸਥਾ ਨੂੰ ਪਾ ਲੈਂਦਾ ਹੈ।

SindhiIND

جنهن جي عقل هر جاءِ تي بي نياز آهي، جنهن پنهنجي نفس کي ماتحت ڪيو آهي، جنهن کان خواهشون ڀڄي ويون آهن، اهو عمل کان آزاديءَ جي اعليٰ حالت کي ورتاءُ جي ذريعي حاصل ڪري ٿو.

BengaliIND

যাঁর বুদ্ধি সর্বত্র অনুরক্ত, যে নিজের আত্মাকে বশীভূত করেছে, যার থেকে কামনা পলায়ন করেছে, সে ত্যাগের মাধ্যমে কর্ম থেকে মুক্তির পরম অবস্থা লাভ করে।

TeluguIND

ఎవరి బుద్ధి ప్రతిచోటా అతుక్కొని ఉంటుందో, తనను తాను నిగ్రహించుకున్నాడో, ఎవరి నుండి కోరిక పారిపోయిందో, అతను త్యజించడం ద్వారా చర్య నుండి విముక్తి పొందే అత్యున్నత స్థితిని పొందుతాడు.

MalayalamIND

ആരുടെ ബുദ്ധി എല്ലായിടത്തും ബന്ധമില്ലാത്തവനും സ്വയം കീഴ്പെടുത്തിയവനും ആഗ്രഹം ഓടിപ്പോകുന്നവനുമായവൻ ത്യാഗത്തിലൂടെ കർമ്മത്തിൽ നിന്നുള്ള മോചനത്തിൻ്റെ പരമമായ അവസ്ഥയെ പ്രാപിക്കുന്നു.

KannadaIND

ಯಾರ ಬುದ್ಧಿಯು ಎಲ್ಲೆಲ್ಲೂ ಅಂಟಿಕೊಂಡಿಲ್ಲವೋ, ತನ್ನನ್ನು ತಾನು ನಿಗ್ರಹಿಸಿಕೊಂಡನೋ, ಯಾರಿಂದ ಆಸೆಯು ಪಲಾಯನವಾಗಿದೆಯೋ, ಅವನು ತ್ಯಜಿಸುವಿಕೆಯ ಮೂಲಕ ಕ್ರಿಯೆಯಿಂದ ಮುಕ್ತಿ ಎಂಬ ಪರಮ ಸ್ಥಿತಿಯನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆ.

NepaliIND

जसको बुद्धि सर्वत्र निष्कपट छ, जसले स्वार्थलाई वशमा राखेको छ, जसबाट इच्छा भागेको छ, उसले त्यागद्वारा कर्मबाट मुक्तिको परम अवस्था प्राप्त गर्दछ।

MarathiIND

ज्याची बुद्धी सर्वत्र निरागस आहे, ज्याने स्वत:ला वश केले आहे, ज्याच्यापासून इच्छा पळून गेली आहे, तो संन्यासाने कर्ममुक्तीची परम अवस्था प्राप्त करतो.

MizoIND

Khawi hmunah pawh a finna inzawm lo, mahni inthunun tawh, duhna a tlanchhiatsan tawh chuan thiltih atanga zalenna dinhmun sang ber chu inhnukdawkna hmangin a thleng thin.

DogriIND

जिसदी बुद्धि हर जगह असक्त ऐ, जिसने अपने आप गी वश च कीता ऐ, जिस थमां इच्छा पलायन होई गेई ऐ, ओह् त्याग दे जरिए कर्म थमां मुक्ति दी परम अवस्था गी हासल करदा ऐ।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- संन्यास(सांख्य) योगका अधिकारी होनेसे ही सिद्धि होती है। अतः उसका अधिकारी कैसा होना चाहिये -- यह बतानेके लिये श्लोकके पूर्वार्द्धमें तीन बातें बतायी हैं --,(1) असक्तबुद्धिः सर्वत्र -- जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है अर्थात् देश? काल? घटना? परिस्थिति? वस्तु? व्यक्ति? क्रिया? पदार्थ आदि किसीमें भी जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती।(2) जितात्मा -- जिसने शरीरपर अधिकार कर लिया है अर्थात् जो आलस्य? प्रमाद आदिसे शरीरके वशीभूत नहीं होता? प्रत्युत इसको अपने वशीभूत रखता है। तात्पर्य है कि वह किसी कार्यको अपने सिद्धान्तपूर्वक करना चाहता है तो उस कार्यमें शरीर तत्परतासे लग जाता है और किसी क्रिया? घटना? आदिसे हटना,चाहता है तो वह वहाँसे हट जाता है। इस प्रकार जिसने शरीरपर विजय कर ली है? वह जितात्मा कहलाता है।(3) विगतस्पृहः -- जीवनधारणमात्रके लिये जिनकी विशेष जरूरत होती है? उन चीजोंकी सूक्ष्म इच्छाका नाम स्पृहा है जैसे -- सागपत्ती कुछ मिल जाय? रूखीसूखी रोटी ही मिल जाय? कुछनकुछ खाये बिना हम कैसे जी सकते हैं जल पीये बिना हम कैसे रह सकते हैं ठण्डीके दिनोंमें कपड़े बिलकुल न हों तो हम कैसे जी सकते हैं सांख्ययोगका साधक इन जीवननिर्वाहसम्बन्धी आवश्यकताओंकी भी परवाह नहीं करता।तात्पर्य यह हुआ कि सांख्ययोगमें चलनेवालेको जडताका त्याग करना पड़ता है। उस जडताका त्याग करनेमें उपर्युक्त तीन बातें आयी हैं। असक्तबुद्धि होनेसे वह जितात्मा हो जाता है? और जितात्मा होनेसे वह विगतस्पृह हो जाता है? तब वह सांख्ययोगका अधिकारी हो जाता है।नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति -- ऐसा असक्तबुद्धि? जितात्मा और विगतस्पृह पुरुष सांख्ययोगके द्वारा परम नैष्कर्म्यसिद्धिको अर्थात् नैष्कर्म्यरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। कारण कि क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है और जब स्वयंका उस क्रियाके साथ लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता? तब कोई भी क्रिया और उसका फल उसपर किञ्चिन्मात्र भी लागू नहीं होता। अतः उसमें जो स्वाभाविक? स्वतःसिद्ध निष्कर्मता -- निर्लिप्तता है? वह प्रकट हो जाती है। सम्बन्ध -- अब उस परम सिद्धिको प्राप्त करनेकी विधि बतानेकी प्रतिज्ञा करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

ज्ञाननिष्ठाकी योग्यताप्राप्तिरूप जो कर्मजनित सिद्धि कही गयी है? उसकी फलभूत ज्ञाननिष्ठारूप नैष्कर्म्यसिद्धि भी कही जानी चाहिये। इसलिये अगला श्लोक आरम्भ किया जाता है --, जो सर्वत्र असक्तबुद्धि है -- पुत्र? स्त्री आदि जो आसक्तिके स्थान हैं? उन सबमें जिसका अन्तःकरण आसक्तिसे -- प्रीतिसे रहित हो चुका है। जो जितात्मा है -- जिसका आत्मा यानी अन्तःकरण जीता हुआ है अर्थात् वशमें किया हुआ है। जो स्पृहारहित है -- शरीर? जीवन और भोगोंमें भी जिसकी स्पृहा -- तृष्णा नष्ट हो गयी है। जो ऐसा आत्मज्ञानी है? वह परम नैष्कर्म्यसिद्धिको ( प्राप्त करता है )। निष्क्रिय ब्रह्म ही आत्मा है यह ज्ञान होनेके कारण जिसके सर्वकर्म निवृत्त हो गये हैं वह निष्कर्मा है। उसके भावका नाम नैष्कर्म्य है और निष्कर्मतारूप सिद्धिका नाम नैष्कर्म्यसिद्धि है। अथवा निष्क्रिय आत्मस्वरूपसे स्थित होनारूप निष्कर्मताका सिद्ध होना ही नैष्कर्म्यसिद्धि है। ऐसी जो कर्मजनित सिद्धिसे विलक्षण और सद्योमुक्तिमें स्थित होनारूप उत्तम सिद्धि है? उसको संन्यासके द्वारा? यानी यथार्थ ज्ञानसे अथवा ज्ञानपूर्वक सर्वकर्मसंन्यासके द्वारा? लाभ करता है ऐसा ही कहा भी है कि सब कर्मोंको मनसे छोड़कर न करता हुआ और न करवाता हुआ रहता है।

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Sri Anandgiri

विदुषः सर्वकर्मत्यागेऽपि नाविदुषस्तथेत्युक्तम्? इदानीमुक्तमनूद्यानन्तरश्लोकतात्पर्यमाह -- या च कर्मजेति। चोऽवधारणार्थो भिन्नक्रमो वक्तव्य इत्यत्र संबध्यते। साधनान्युपदिशन्नैष्कर्म्यसिद्धिं व्यपदिशति -- असक्तेति। पुत्रादिविषये चेतसः सङ्गाभावेऽपि तस्यास्वाधीनत्वमाशङ्क्याह -- जितात्मेति। असक्तिमुक्त्वा स्पृहाभावं वदता पुनरुक्तिरिष्टेत्याशङ्क्याह -- देहेति। उक्तमनूद्य तत्फलं लम्भयति -- य एवमिति। कर्मणां निर्गतौ हेतुमाह -- निष्क्रियेति। सम्यग्ज्ञानार्थत्वेन नैष्कर्म्यसिद्धिशब्दं व्याख्यायार्थान्तरमाह -- नैष्कर्म्यस्येति। प्रकर्षमेव प्रकटयति -- कर्मजेति। संन्यासस्य श्रुतिस्मृत्योः सम्यग्दर्शनत्वाप्रसिद्धेरयुक्तं तादात्म्यमित्याशङ्क्य पक्षान्तरमाह -- तत्पूर्वकेणेति। संन्यासान्नैष्कर्म्यप्राप्तिरित्यत्र वाक्योपक्रमानुकूल्यमाह -- तथाचेति।

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Sri Dhanpati

ज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणायाः कर्मजायाः सिद्धेः फलभूतां ज्ञाननिष्ठालक्षणां नैष्कर्म्यसिद्धिमाह -- असक्तेति। सर्वत्र सक्तिनिमित्तेषु पुत्रदारादिष्वसक्तबुद्धिरसक्ता सङ्गरहिता बुद्धिरन्तःकरणं यस्य स यतो जितो वशीकृत आत्मान्तःकरणं यस्य स जितात्मा। अतएव विगता स्पृहा देहजीवभोगेषु तृष्णा यस्मात्स य एवंभूत आत्मज्ञः स नैष्कर्म्यसिद्धिं निर्गतानि कर्माणि यस्मात् निष्क्रयात्मसंबोधात् स निष्कर्मा तस्य भावो नैष्कर्म्यं तच्च तत्सिद्धिश्च सा नैष्कर्म्यस्य निष्क्रियात्मस्वरुपावस्थानलक्षणस्य सिद्धिर्निवृत्तिरिति वा तां परमां कर्मजायाः सिद्धेः प्रकृष्टां सद्योमुक्त्यवस्थानरुपां संन्यासंन सभ्यग्दर्शनेन तत्पूर्वकेण वा सर्वकर्मसंन्यासंनाधिगच्छति प्राप्नोति। तदुक्तंसर्वकर्माणि मनसा सन्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् इति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
asaktabuddhiḥ
sarvatraeverywhere
jitaātmā
vigataspṛihaḥ
naiṣhkarmyasiddhim
paramāmhighest
sanyāsenaby the practice of renunciation
adhigachchhatiattain
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Bhagavad Gita · 18.48
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः

हे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.50
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा

हे कौन्तेय ! सिद्धि-(अन्तःकरणकी शुद्धि-) को प्राप्त हुआ साधक ब्रह्मको, जो कि ज्ञानकी परा निष्ठा है, जिस प्रकारसे प्राप्त होता है, उस प्रकारको तुम मुझसे संक्षेपमें ही समझो। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 49
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 49
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति

जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीरको वशमें कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा नैष्कर्म्य-सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 49 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 49 का हिंदी अर्थ: "जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीरको वशमें कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा नैष्कर्म्य-सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 49?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 49 translates to: "He whose intellect is unattached everywhere, who has subdued his self, from whom desire has fled, he attains the supreme state of freedom from action through renunciation. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 49 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीरको वशमें कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा नैष्कर्म्य-सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "asakta-buddhiḥ sarvatra jitātmā vigata-spṛihaḥ" mean in English?

"asakta-buddhiḥ sarvatra jitātmā vigata-spṛihaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 49. He whose intellect is unattached everywhere, who has subdued his self, from whom desire has fled, he attains the supreme state of freedom from action through renunciation. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.