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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 48
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः

हे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

அர்ஜுனா, தான் பிறக்கும் கடமை தவறாயினும் அதைக் கைவிடக் கூடாது; ஏனெனில், புகையால் நெருப்பு இருப்பது போல, எல்லா முயற்சிகளும் தீமையால் சூழப்பட்டுள்ளன.

ManipuriIND

ꯀꯅꯥꯒꯨꯝꯕꯥ ꯑꯃꯅꯥ, ꯍꯦ ꯑꯔꯖꯨꯟ, ꯄꯣꯀꯄꯥ ꯊꯧꯗꯥꯡ ꯑꯗꯨ ꯑꯁꯣꯏꯕꯥ ꯑꯣꯏꯔꯕꯁꯨ ꯊꯥꯗꯣꯛꯂꯣꯏꯗꯕꯅꯤ; ꯃꯔꯃꯗꯤ, ꯃꯩꯅꯥ ꯃꯩꯅꯥ ꯆꯥꯀꯄꯒꯨꯝ, ꯊꯕꯛ ꯈꯨꯗꯤꯡꯃꯛ ꯐꯠꯇꯕꯅꯥ ꯊꯜꯂꯕꯥ ꯌꯥꯏ꯫

MizoIND

Mi pakhat chuan, Aw Arjuna, a pianpui tih tur chu a dik lo thei a, mahse a kalsan tur a ni lo; mei chu meikhuin a khuh ang bawkin, hnathawh zawng zawng chu sualin a khuh vek si a.

MaithiliIND

हे अर्जुन, जे कर्तव्यक जन्म होइत अछि, तकरा नहि छोड़बाक चाही, यद्यपि ओ दोषपूर्ण हो; कारण, सभ उपक्रम बुराई सँ लपेटल रहैत अछि, ठीक ओहिना जेना आगि धुँआ सँ आच्छादित होइत अछि |

BengaliIND

হে অর্জুন, যে কর্তব্যের প্রতি জন্মগ্রহণ করে তা পরিত্যাগ করা উচিত নয়, যদিও তা ত্রুটিপূর্ণ হতে পারে; কারণ, সমস্ত উদ্যোগ মন্দ দ্বারা আবৃত, ঠিক যেমন আগুন ধোঁয়া দ্বারা আবৃত।

PunjabiIND

ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਜਿਸ ਫ਼ਰਜ਼ ਲਈ ਮਨੁੱਖ ਪੈਦਾ ਹੋਇਆ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਛੱਡਣਾ ਚਾਹੀਦਾ, ਭਾਵੇਂ ਇਹ ਨੁਕਸ ਵਾਲਾ ਹੋਵੇ; ਕਿਉਂਕਿ, ਸਾਰੇ ਉੱਦਮ ਬੁਰਾਈ ਦੁਆਰਾ ਘੇਰੇ ਹੋਏ ਹਨ, ਜਿਵੇਂ ਅੱਗ ਧੂੰਏਂ ਦੁਆਰਾ ਹੈ।

BhojpuriIND

हे अर्जुन, जवना कर्तव्य खातिर जनमल बा, ओकरा के ना छोड़े के चाहीं, भले ऊ दोषपूर्ण होखे; काहे कि, सभ उपक्रम बुराई से लिपटल रहेला, ठीक ओसही जइसे आग धुँआ से लिपटल रहेला।

KonkaniIND

ज्या कर्तव्याक जल्मता, तें कर्तव्य दोशपूर्ण आसलें तरी सोडून दिवंक फावना, हे अर्जुन; कारण, सगळे उपक्रम वायटान आच्छादीत आसतात, जशें उजो धुंवरान आवरून आसता.

AssameseIND

হে অৰ্জুন, যি কৰ্তব্যত জন্ম হয়, সেই কৰ্তব্য ত্ৰুটিপূৰ্ণ হ’লেও পৰিত্যাগ কৰা উচিত নহয়; কাৰণ, জুই ধোঁৱাৰ দ্বাৰা যেনেকৈ সকলো কাম বেয়াৰ দ্বাৰা আবৃত।

MarathiIND

हे अर्जुना, ज्या कर्तुत्वासाठी मनुष्य जन्माला आला आहे, त्या कर्तव्याचा त्याग करू नये, जरी ते दोषपूर्ण असले तरी; कारण, सर्व उपक्रम वाईटाने व्यापलेले असतात, जसे आग धुराने व्यापलेली असते.

SindhiIND

اي ارجن، جنهن فرض لاءِ پيدا ٿيو آهي، تنهن کي نه ڇڏڻ گهرجي، جيتوڻيڪ اهو غلط هجي. ڇاڪاڻ ته، سڀئي ڪم برائي سان ڍڪيل آهن، جيئن باهه دونھون سان آهي.

MalayalamIND

ഹേ അർജ്ജുനാ, ഒരുവൻ ജനിച്ച കർത്തവ്യം തെറ്റാണെങ്കിലും ഉപേക്ഷിക്കരുത്; കാരണം, തീ പുകയാൽ ആകുന്നതുപോലെ എല്ലാ സംരംഭങ്ങളും തിന്മയാൽ പൊതിഞ്ഞിരിക്കുന്നു.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- [पूर्वश्लोकमें यह कहा गया कि स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने जो कर्म नियत किये हैं? उन कर्मोंको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। इससे सिद्ध होता है कि स्वभावनियत कर्मोंमें भी पापक्रिया होती है। अगर पापक्रिया न होती तो पापको प्राप्त नहीं होता यह कहना नहीं बनता। अतः यहाँ भगवान् कहते हैं कि जो सहज कर्म हैं? उनमें कोई दोष भी आ जाय तो भी उनका त्याग नहीं करना चाहिये क्योंकि सबकेसब कर्म धुएँसे अग्निकी तरह दोषसे आवृत हैं। ]सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् -- स्वभावनियतकर्म सहजकर्म कहलाते हैं जैसे -- ब्राह्मणके शम? दम आदि क्षत्रियके शौर्य? तेज आदि वैश्यके कृषि? गौरक्ष्य आदि और शूद्रके सेवाकर्म -- ये सभी सहजकर्म हैं। जन्मके बाद शास्त्रोंने पूर्वके गुण और कर्मोंके अनुसार जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंकी आज्ञा दी है? वे शास्त्रनियत कर्म भी सहजकर्म कहलाते हैं जैसे ब्राह्मणके लिये यज्ञ करना और कराना? पढ़ना और पढ़ाना आदि क्षत्रियके लिये यज्ञ करना? दान करना आदि वैश्यके लिये यज्ञ करना आदि और शूद्रके लिये सेवा।सहज कर्ममें ये दोष हैं --,(1) परमात्मा और परमात्माका अंश -- ये दोनों ही स्व हैं तथा प्रकृति और प्रकृतिका कार्य शरीर आदि -- ये दोनों ही पर हैं। परन्तु परमात्माका अंश स्वयं प्रकृतिके वश होकर परतन्त्र हो जाता है अर्थात् क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है और उस क्रियाको यह अपनेमें मान लेता है तो परतन्त्र हो जाता है। यह प्रकृतिके परतन्त्र होना ही महान् दोष है।(2) प्रत्येक कर्ममें कुछनकुछ आनुषङ्गिक अनिवार्य हिंसा आदि दोष होते ही हैं।(3) कोई भी कर्म किया जाय? वह कर्म किसीके अनुकूल और किसीके प्रतिकूल होता ही है। किसीके प्रतिकूल होना भी दोष है।(4) प्रमाद आदि दोषोंके कारण कर्मके करनेमें कमी रह जाना अथवा करनेकी विधिमें भूल हो जाना भी दोष है।अपने सहजकर्ममें दोष भी हो? तो भी उसको नहीं छोड़ना चाहिये। इसका तात्पर्य है कि जैसे ब्राह्मणके कर्म जितने सौम्य हैं? उतने ब्राह्मणेतर वर्णोंके कर्म सौम्य नहीं हैं। परन्तु सौम्य न होनेपर भी वे कर्म दोषी नहीं,माने जाते अर्थात् ब्राह्मणके सहज कर्मोंकी अपेक्षा क्षत्रिय? वैश्य आदिके सहज कर्मोंमें गुणोंकी कमी होनेपर भी उस कमीका दोष नहीं लगता और अनिवार्य हिंसा आदि भी नहीं लगते? प्रत्युत उनका पालन करनेसे लाभ होता है। कारण कि वे कर्म उनके स्वभावके अनुकूल होनेसे करनेमें सुगम हैं और शास्त्रविहित हैं।ब्राह्मणके लिये भिक्षा बतायी गयी है। देखनेमें भिक्षा निर्दोष दीखती है? पर उसमें भी दोष आ जाते हैं। जैसे किसी गृहस्थके घरपर कोई भिक्षुक खड़ा है और उसी समय दूसरा भिक्षुक वहाँ आ जाता है तो गृहस्थको भार लगता है। भिक्षुकोंमें परस्पर ईर्ष्या होनेकी सम्भावना रहती है। भिक्षा देनेवालेके घरमें पूरी तैयारी नहीं है तो उसको भी दुःख होता है। यदि कोई गृहस्थ भिक्षा देना नहीं चाहता और उसके घरपर भिक्षुक चला जाय तो उसको बड़ा कष्ट होता है। अगर वह भिक्षा देता है तो खर्चा होता है और नहीं देता है तो भिक्षुक निराश होकर चला जाता है। इससे उस गृहस्थको पाप लगता है और बेचारा उसमें फँस जाता है। इस प्रकार यद्यपि भिक्षामें भी दोष होते हैं? तथापि ब्राह्मणको उसे छोड़ना नहीं चाहिये।क्षत्रियके लिये न्याययुक्त युद्ध प्राप्त हो जाय तो उसको करनेसे क्षत्रियको पाप नहीं लगता। यद्यपि युद्धरूप कर्ममें दोष हैं क्योंकि उसमें मनुष्योंको मारना पड़ता है? तथापि क्षत्रियके लिये सहज और शास्त्रविहित होनेसे दोष नहीं लगता। ऐसे ही वैश्यके लिये खेती करना बताया गया है। खेती करनेमें बहुतसे जन्तुओंकी हिंसा होती है। परन्तु वैश्यके लिये सहज और शास्त्रविहित होनेसे हिंसाका इतना दोष नहीं लगता। इसलिये सहज कर्मोंको छोड़ना नहीं चाहिये।सहज कर्मोंको करनेमें दोष (पाप) नहीं लगता -- यह बात ठीक है परन्तु इन साधारण सहज कर्मोंसे मुक्ति कैसे हो जायगी वास्तवमें मुक्ति होनेमें सहज कर्म बाधक नहीं हैं। कामना? आसक्ति? स्वार्थ? अभिमान आदिसे ही बन्धन होता है और पाप भी इन कामना आदिके कारणसे ही होते हैं। इसलिये मनुष्यको निष्कामभावपूर्वक भगवत्प्रीत्यर्थ सहज कर्मोंको करना चाहिये? तभी बन्धन छूटेगा।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः -- जितने भी कर्म हैं? वे सबकेसब सदोष ही हैं जैसे -- आग सुलगायी जाय तो आरम्भमें धुआँ होता ही है। कर्म करनेमें देश? काल? घटना? परिस्थिति आदिकी परतन्त्रता और दूसरोंकी प्रतिकूलता भी दोष है? परन्तु स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने आज्ञा दी है। उस आज्ञाके अनुसार निष्कामभावपूर्वक कर्म करता हुआ मनुष्य पापका भागी नहीं होता। इसीसे भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि भैया तू जिस युद्धरूप क्रियाको घोर कर्म मान रहा है? वह तेरा धर्म है क्योंकि न्यायसे प्राप्त हुए युद्धको करना क्षत्रियोंका धर्म है? इसके सिवाय क्षत्रियके लिये दूसरा कोई श्रेयका साधन नहीं है (गीता 2। 31)। सम्बन्ध -- अब भगवान् सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करते हुए पहले सांख्ययोगके अधिकारीका वर्णन करते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

उपर्युक्त श्लोकमें यह बात कही कि स्वभावनियत कर्मोंको करनेवाला मनुष्य? विषमें जन्मे हुए कीड़ेकी भाँति पापको प्राप्त नहीं होता? तथा ( तीसरे अध्यायमें ) यह भी कहा है कि दूसरेका धर्म भयावह है और कोई भी अज्ञानी बिना कर्म किये क्षणभर भी नहीं रह सकता। इसलिये --, जो जन्मके साथ उत्पन्न हो उसका नाम सहज है। वह क्या है कर्म। हे कौन्तेय त्रिगुणमय होनेके कारण जो दोषयुक्त है? ऐसे दोषयुक्त भी अपने सहजकर्मको नहीं छोड़ना चाहिये। क्योंकि सभी आरम्भजो आरम्भ किये जाते हैं उनका नाम आरम्भ है? अतः यहाँ प्रकरणके अनुसार सर्वारम्भका तात्पर्य समस्त कर्म है। सा स्वधर्म या परधर्मरूप जो कुछ भी कर्म है? वे सभी तीनों गुणोंके कार्य हैं। अतः त्रिगुणात्मक होनेके कारण? साथ जन्मे हुए धुएँसे अग्निकी भाँति दोषसे आवृत हैं। अभिप्राय यह है कि स्वधर्म नामक सहजकर्मका परित्याग करनेसे और परधर्मका ग्रहण करनेसे भी? दोषसे छुटकारा नहीं हो सकता और परधर्म भयावह भी है तथा अज्ञानीद्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका पूर्णतया त्याग होना सम्भव भी नहीं है सुतरां सहजकर्मको नहीं छोड़ना चाहिये। ( यहाँ यह विचार करना चाहिये कि ) क्या कर्मोंका अशेषतः त्याग होना असम्भव है? इसलिये उनका त्याग नहीं करना चाहिये? अथवा सहज कर्मका त्याग करनेमें दोष है इसलिये पू0 -- इसमें क्या सिद्ध होगा उ0 -- यदि यह बात हो कि अशेषतः त्याग होना अशक्य है? इसलिये सहजकर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये? तब तो यही सिद्ध होगा कि कर्मोंका अशेषतः त्याग करनेमें गुण ही है। पू0 -- यह ठीक है? परंतु यदि कर्मोंका पूर्णतया त्याग हो ही नहीं सकता ( तो फिर गुणदोषकी बात ही क्या है ) उ0 -- तो क्या सांख्यवादियोंके गुणोंकी भाँति आत्मा सदा चलनस्वभाववाला है अथवा बौद्धमतावलम्बियोंके प्रतिक्षणमें नष्ट होनेवाले ( रूप? वेदना? विज्ञान? संज्ञा और संस्काररूप ) पञ्च स्कन्धोंकी भाँति क्रिया ही कारक है इन दोनों ही प्रकारोंसे कर्मोंका अशेषतः त्याग नहीं हो सकता। हाँ? तीसरा एक पक्ष और भी है कि जब आत्मा कर्म करता है तब तो वह सक्रिय होता है और जब कर्म नहीं करता? तब वही निष्क्रिय होता है? ऐसा मान लेनेसे कर्मोंका अशेषतः त्याग भी हो सकता है। इस तीसरे पक्षमें यह विशेषता है? कि न तो आत्मा नित्य चलनस्वभाववाला माना गया है? और न क्रियाको ही कारक माना गया है? तो फिर क्या है? कि अपने स्वरूपमें स्थित द्रव्यमें ही अविद्यमान क्रिया उत्पन्न हो जाती है और विद्यमान क्रियाका नाश हो जाता है शुद्ध द्रव्य? क्रियाकी शक्तिसे युक्त होकर स्थित रहता है और वही कारक है। इस प्रकार वैशेषिकमतावलम्बी कहते हैं। पू0 -- इस पक्षमें क्या दोष है उ0 -- इसमें प्रधान दोष तो यही है कि यह मत भगवान्को मान्य नहीं है। पू0 -- यह कैसे जाना जाता है। उ0 -- इसीलिये कि भगवान् तो असत् वस्तुका कभी भाव नहीं होता इत्यादि वचन कहते हैं और वैशेषिकमतवादी असत्का भाव और सत्का अभाव मानते हैं। पू0 -- भगवान्का मत न होनेपर भी यदि न्याययुक्त हो तो इसमें क्या दोष है उ0 -- बतलाते हैं ( सुनो ) सब प्रमाणोंसे इस मतका विरोध होनेके कारण भी यह मत दोषयुक्त है। पू0 -- किस प्रकार उ0 -- यदि यह माना जाय कि द्व्यणुक आदि द्रव्य उत्पत्तिसे पहले अत्यन्त असत् हुए ही उत्पन्न हो जाते हैं और किञ्चित् काल स्थित रहकर फिर अत्यन्त ही असत् भावको प्राप्त हो जाते हैं? तब तो यही मानना हुआ कि असत् ही सत् हो जाता है अर्थात् अभाव भाव हो जाता है और भाव अभाव हो जाता है। अर्थात् ( यह मानना हुआ कि ) उत्पन्न होनेवाला अभाव? उत्पत्तिसे पहले शश -- श्रृङ्गकी भाँति सर्वथा असत् होता हुआ ही? समवायि? असमवायि और निमित्त नामक तीन कारणोंकी सहायतासे उत्पन्न होता है। परंतु अभाव इस प्रकार उत्पन्न होता है अथवा कारणकी अपेक्षा रखता है -- यह कहना नहीं बनता क्योंकि खरगोशके सींग आदि असत् वस्तुओंमें ऐसा नहीं देखा जाता। हाँ? यदि यह माना जाय कि उत्पन्न होनेवाले घटादि भावरूप हैं और वे अभिव्यक्तिके किसी कारणकी सहायतासे उत्पन्न होते हैं? तो यह माना जा सकता है। तथा असत्का सत् और सत्का असत् होना मान लेनेपर तो किसीका प्रमाणप्रमेयव्यवहारमें कहीं विश्वास ही नहीं रहेगा क्योंकि ऐसा मान लेनेसे फिर यह निश्चय नहीं होगा कि सत् सत् ही है और असत् असत् ही है। इसके सिवा वे उत्पन्न होता है इस वाक्यसे द्व्यणुक आदि द्रव्यका अपने कारण और सत्तासे सम्बन्ध होना बतलाते हैं अर्थात् उत्पत्तिसे पहले कार्य असत् होता है? फिर अपने कारणके व्यापारकी अपेक्षासे,( सहायतासे ) अपने कारणरूप परमाणुओंसे और सत्तासे समवायरूप सम्बन्धके द्वारा संगठित हो जाता है और संगठित होकर कारणसे मिलकर सत् हो जाता है। इसपर उनको बतलाना चाहिये कि असत्का कारण सत् कैसे हो सकता है और असत्का किसीके साथ सम्बन्ध भी कैसे हो सकता है क्योंकि वन्ध्यापुत्रकी सत्ता? उसका किसी सत् पदार्थके साथ सम्बन्ध अथवा उसका कारण? किसीके भी द्वारा प्रमाणपूर्वक सिद्ध नहीं किया जा सकता। पू0 -- वैशेषिकमतवादी अभावका सम्बन्ध नहीं मानते। वे तो भावरूप द्व्यणुक आदि द्रव्योंका ही अपने कारणके साथ समवायरूप सम्बन्ध बतलाते हैं। उ0 -- यह बात नहीं है क्योंकि ( उनके मतमें ) कार्यकारणका सम्बन्ध होनेसे पहले कार्यकी सत्ता नहीं मानी गयी। अर्थात् वैशेषिकमतावलम्बी कुम्हार और दण्डचक्र आदिकी क्रिया आरम्भ होनेसे पहले घट आदिका अस्तित्व नहीं मानते और यह भी नहीं मानते कि मिट्टीको ही घटादिके आकारकी प्राप्ति हुई है। इसलिये अन्तमें असत्का ही सम्बन्ध मानना सिद्ध होता है। पू0 -- असत्का भी समवायरूप सम्बन्ध होना विरुद्ध नहीं है। उ0 -- यह कहना ठीक नहीं क्योंकि वन्ध्यापुत्र आदिका किसीके साथ सम्बन्ध नहीं देखा जाता। अभावकी समानता होनेपर भी यदि कहो कि घटादिके प्रागभावका ही अपने कारणके साथ सम्बन्ध होता है? वन्ध्यापुत्रादिके अभावका नहीं? तो इनके अभावोंका भेद बतलाना चाहिये। एकका अभाव? दोका अभाव? सबका अभाव? प्रागभाव? प्रध्वंसाभाव? अन्योन्याभाव? अत्यन्ताभाव इन लक्षणोंसे कोई भी अभावकी विशेषता नहीं दिखला सकता। फिर किसी प्रकारकी विशेषता न होते हुए भी यह कहना कि घटका प्रागभाव ही कुम्हार आदिके द्वारा घटभावको प्राप्त होता है तथा उसका कपालनामक अपने कारणरूप भावसे सम्बन्ध होता है और वह सब व्यवहारके योग्य भी होता है। परंतु उसी घटका जो प्रध्वंसाभाव है? वह अभावत्वमें समान होनेपर भी सम्बन्धित नहीं होता। इस तरह प्रध्वंसादि अभावोंको किसी भी अवस्थामें व्यवहारके योग्य न मानना और केवल द्व्यणुक आदि द्रव्यनामक प्रागभावको ही उत्पत्ति आदि व्यवहारके योग्य मानना? असमञ्जसरूप ही है क्योंकि अत्यन्ताभाव और प्रध्वंसाभावके समान ही प्रागभावका भी अभावत्व है? उसमें कोई विशेषता नहीं है। पू0 -- हमने प्रागभावका भावरूप होना नहीं बतलाया है। उ0 -- तब तो तुमने भावका ही भावरूप हो जाना कहा है? जैसे घटका घटरूप हो जाना वस्त्रका वस्त्ररूप हो जाना परंतु यह भी अभावके भावरूप होनेकी भाँति ही प्रमाणविरुद्ध है। सांख्यमतावलम्बियोंका जो परिणामवाद है? उसमें अपूर्व धर्मकी उत्पत्ति और विनाश स्वीकार किया जानेके कारण? वह भी ( इस विषयमें ) वैशेषिकमतसे कुछ विशेषता नहीं रखता। अभिव्यक्ति ( प्रकट होना ) और तिरोभाव ( छिप जाना ) स्वीकार करनेसे भी? अभिव्यक्ति और तिरोभावकी विद्यमानता और अविद्यमानताका निरूपण करनेमें? पहलेकी भाँति ही प्रमाणसे विरोध होगा। इस विवेचनसे कारणका कार्यरूपमें स्थित होना ही उत्पत्ति आदि हैं ऐसा निरूपण करनेवाले मतका भी खण्डन हो जाता है। इन सब मतोंका खण्डन हो जानेपर अन्तमें यही सिद्ध होता है कि एक ही सत्य तत्त्व ( आत्मा ) अविद्याद्वारा नटकी भाँति उत्पत्ति? विनाश आदि धर्मोंसे अनेक रूपमें कल्पित होता है। यही भगवान्का अभिप्राय नासतो विद्यते भावः इस श्लोकमें बतलाया गया है क्योंकि सत्प्रत्ययका व्यभिचार नहीं होता और अन्य ( असत् ) प्रत्ययोंका व्यभिचार होता है ( अतः सत् ही एकमात्र तत्त्व है )। पू0 -- यदि ( भगवान्के मतमें ) आत्मा निर्विकार है तो ( वे ) यह कैसे कहते हैं कि अशेषतः कर्मोंका त्याग नहीं हो सकता उ0 -- शरीरइन्द्रियादिरूप गुण चाहे सत्य वस्तु हों? चाहे अविद्याकल्पित हों? जब कर्म उन्हींका धर्म है? तब आत्मामें तो वह अविद्याध्यारोपित ही है। इस कारण कोई भी अज्ञानी अशेषतः कर्मोंका त्याग क्षणभर भी नहीं कर सकता यह कहा गया है। परंतु विद्याद्वारा अविद्या निवृत्त हो जानेपर ज्ञानी तो कर्मोंका अशेषतः त्याग कर ही सकता है क्योंकि अविद्या नष्ट होनेके उपरान्त? अविद्यासे अध्यारोपित वस्तुका अंश बाकी नहीं रह सकता। ( यह प्रत्यक्ष ही है कि ) तिमिररोगसे विकृत हुई दृष्टिद्वारा अध्यारोपित दो चन्द्रमा आदिका कुछ भी अंश? तिमिररोग नष्ट हो जानेपर? शेष नहीं रहता। सुतरां सब कर्मोंको मनसे छोड़कर इत्यादि कथन ठीक ही हैं। तथा अपनेअपने कर्मोंमें लगे हुए मनुष्य संसिद्धिको प्राप्त होते हैं मनुष्य अपने कर्मोंसे उसकी पूजा करके सिद्धि प्राप्त करता है -- ये कथन भी ठीक हैं।

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Sri Anandgiri

इतश्च विहितं कर्म दोषवदपि कर्तव्यं प्रकारान्तरासंभवादित्युक्तानुवादपूर्वकं कथयति -- स्वभावेत्यादिना। नहि कृमिर्विषजो विषनिमित्तं मरणं प्रतिपद्यते तथायऽमधिकृतः पुरुषो दोषवदपि विहितं कर्म कुर्वन्पापं नाप्नोतीत्युक्तमित्यर्थः। तर्हि दोषरहितमेव भिक्षाटनादि सर्वैरनुष्ठीयतामतो न पापप्राप्त्याशङ्केत्याशङ्क्याह -- परेति। उक्तमित्यनुवर्तते। तर्हि पापप्राप्तिशङ्कां परिहर्तुमकर्मनिष्ठत्वमेव सर्वेषां स्यादित्याशङ्क्य ज्ञानाभावान्नैवमित्याह -- अनात्मज्ञ इति। पूर्ववदत्रापि संबन्धः। प्रकारान्तरासंभवकृतं फलमाह -- अतइति। सह जायत इति सहजं स्वभावनियतं नित्यं कर्म तद्विहितत्वान्निर्दोषमपि हिंसात्मकतया सदोषमित्यत्र हेतुमाह -- त्रिगुणेति। सत्त्वादिगुणत्रयारब्धतया हिंसादिदोषवदपि कर्म विहितमत्याज्यमित्यर्थः। कर्मणां दोषवत्त्वं प्रपञ्चयति -- सर्वेति। आरम्भशब्दस्य कर्मव्युत्पत्त्या स्वपरसर्वकर्मार्थत्वे कर्मणां प्रकृतत्वं हेतुमाह -- प्रकरणादिति। दोषेणेत्यादि व्याचष्टे -- ये केचिदिति। ते सर्वे दोषेणावृता इति संबन्धः। सर्वकर्मणां दोषावृतत्वे हिशब्दोपात्तं यस्मादित्युक्तं हेतुमेवाभिनयति -- त्रिगुणात्मकत्वमिति। स्वभावनियतस्य कर्मणो दोषवत्त्वात्तत्त्यागद्वारा परधर्ममातिष्ठमानस्यापि नैव दोषाद्विमोकः संभवति। न च परधर्मोऽनुष्ठातुं शक्यते भयावहत्वान्नच तर्हि कर्मणोऽशेषतोऽननुष्ठानमेवाज्ञस्याशेषकर्मत्यागायोगादतः सहजं कर्म सदोषमपि न त्याज्यमिति वाक्यार्थमाह -- सहजस्येति। सहजं कर्म सदोषमपि न त्यजेदित्यत्र विचारमवतारयति -- किमिति। नहि कश्चिदिति न्यायादिति शेषः। दोषो विहितनित्यत्यागे प्रत्यवायः। संदिग्धस्य प्रयोजनस्य विचार्यत्वादुक्ते संदेहे प्रयोजनं पृच्छति -- किञ्चात इति। तत्राद्यमनूद्य फलं दर्शयति -- यदीति। अशक्यार्थानुष्ठानस्य गुणत्वेन प्रसिद्धत्वात्प्रसिद्धं हि महोदधिमगस्त्यस्य चुलुकीकृत्य पिबतो गुणवत्त्वं तदाह -- एवं तर्हीति। अशेषकर्मत्यागस्य गुणवत्त्वेऽपि प्रागुक्तन्यायेन तदयोगात्तस्याशक्यानुष्ठानतेति शङ्कते -- सत्यमिति। चोद्यमेव विवृण्वन्नाद्यं,विभजते -- किमिति। सत्त्वादिगुणवदात्मनो नित्यप्रचलितत्वेनाशेषतस्तेन न कर्म त्यक्तुं शक्यं नापि रूपविज्ञानवेदनासंज्ञासंस्कारसंज्ञानां क्षणध्वंसिनां स्कन्धानामिव क्रियाकारकभेदाभावात्कारकस्यैवात्मनः क्रियात्वमित्युक्ते कर्माशेषतस्त्यक्तुं शक्यमुभयत्रापि स्वभावभङ्गादित्याह -- उभयथेति। पक्षद्वयानुरोधेनाशेषकर्मत्यागायोगे वैशेषिकश्चोदयति -- अथेति। कदाचिदात्मा सक्रियो निष्क्रियश्च कदाचिदिति स्थिते फलितमाह -- तत्रेति। उक्तमेव पक्षं पूर्वोक्तपक्षद्वयाद्विशेषदर्शनेन विशदयति -- अयं त्विति। आगमापायित्वे क्रियायास्तद्वतो द्रव्यस्य कथं स्थायितेत्याशङ्क्याह -- शुद्धमिति। क्रियाशक्तिमत्त्वेऽपि क्रियावत्त्वाभावे कथं कारकत्वं क्रियां कुर्वत् कारणं कारकमित्यभ्युपगमादित्याशङ्क्याह -- तदेवेति। क्रियाशक्तिमदेव कारकं न क्रियाधिकरणं परस्पराश्रयादित्यर्थः। वैशेषिकपक्षे दोषाभावादस्ति सर्वैः स्वीकार्यतेत्युपसंहरति -- इत्यस्मिन्निति। भगवन्मतानुसारित्वाभावादस्य पक्षस्य त्याज्यतेति दूषयति -- अयमेवेति। भगवन्मताननुसारित्वमस्याप्रामाणिकमिति शङ्कते -- कथमिति। भगवद्वचनमुदाहरन् परपक्षस्य तदनुगुणत्वाभावमाह -- यत इति। परेषामपि मतमेतदनुगुणमेव किं न स्यादित्याशङ्क्याह -- काणादानां हीति। भगवन्मतानुगुणत्वाभावेऽपि न्यायानुगुणत्वेन दोषरहितं काणादानां मतमुपादेयमेव तर्हि काणादमतविरोधादुपेक्ष्यते भगवन्मतमिति शङ्कते -- अभागवतत्वेऽपीति। न्यायवत्त्वमसिद्धमिति दूषयति -- उच्यत इति। सर्वप्रमाणानुसारिणो मतस्य न तद्विरोधितेत्याक्षिपति -- कथमिति। वैशेषिकमतस्य सर्वप्रमाणविरोधं प्रकटयन्नादौ तन्मतमनुवदति -- यदीति। असतो जन्म सतश्च नाश इति स्थिते फलितमाह -- तथाचेति। उक्तमेव वाक्यं व्याकरोति -- अभाव इति। सदेवासत्त्वमापद्यत इत्युक्तं व्याचष्टे -- भावश्चेति। इति मतमिति शेषः। तत्रैवाभ्युपगमान्तरमाह -- तत्रेति। प्रकृतं मतं सप्तम्यर्थः। इत्यभ्युपगम्यत इति शेषः। परकीयमभ्युपगमं दूषयति -- नचेति। एवमिति परपरिभाषानुसारेणेत्यर्थः। अदर्शनादुत्पत्तेरपेक्षायाश्चेति शेषः। कथं तर्हि त्वन्मतेऽपि घटादीनां कारणापेक्षाणामुत्पत्तिर्न हि भावानां कारणापेक्षोत्पत्तिर्वा युक्तेति तत्राह -- भावेति। घटादीनामस्मत्पक्षे प्रागपि कारणात्मना सतामेवाव्यक्तनामरूपाणामभिव्यक्तिसामग्रीमपेक्ष्य पृथगभिव्यक्तिसंभवान्न किंचिदनवद्यमित्यर्थः। असत्कार्यवादे दोषान्तरमाह -- किञ्चेति। परमते मानमेयव्यवहारे क्वचिदपि विश्वासो न कस्यचिदित्यत्र हेतुमाह -- सत्सदेवेति। नहि सत्तथैवेति निश्चितं तस्यैव पुनरसत्त्वप्राप्तेरिष्टत्वान्न चासत्तथैवेति निश्चयस्तस्यैव सत्त्वप्राप्तेरुपगमादतो यन्मानेन सदसद्वा निर्णीतं तत्तथेति विश्वासाभावान्मानवैफल्यमित्यर्थः। इतश्चासत्कार्यवादो न युक्तिमानित्याह -- किञ्चेति। तदेव हेत्वन्तरं स्फोरयितुं परमतमनुवदति -- उत्पद्यत इतीति। परकीयं वचनमेव व्याचष्टे -- प्रागिति। संबद्धं सदित्यनेन कारणसंबन्धे सति कार्यस्य सत्तासंबन्धो भवतीत्युक्तं तदेव स्फुटयति -- कारणेति। परमतमेवमनुभाष्य दूषयति -- तत्रेति। कार्यस्यासतोऽपि कारणं संभवति तस्य च कार्येण संबन्धः सिध्यतीत्याशङ्क्याह -- नहीति। असत्त्वादेवासतः संबन्धाभावे कारणस्य सतोऽपि न तेन संबन्धोऽनुमातुं शक्यते सदसतोः संबन्धासंभवादित्यर्थः। कार्यस्यात्यन्तासत्त्वानभ्युपगमात्कारणसंबन्धः स्यादिति शङ्कते -- नन्विति। सतामेव द्व्यणुकादीनां कारणसंबन्धं शङ्कितं दूषयति -- न संबन्धादिति। अनभ्युपगममेव विशदयति -- नहीति। सदेव कारणं कार्याकारमापद्य कार्यव्यवहारं निर्वहतीत्यभ्युपगमान्नास्ति संबन्धानुपपत्तिरित्याशङ्क्यापराद्धान्तान्मैवमित्याह -- नचेति। कार्यस्य कारणसंबन्धात्पूर्वं सत्त्वाभावे परिशेषसिद्धमर्थं दर्शयति -- ततश्चेति। तत्र चानुपपत्तिरुक्तेति शेषः। संबन्धिनोः सदसतोरेवासंयोगेऽपि समवायः सदसतोः संभवेदिति तस्य नित्यत्वादन्यतरसंबन्धाभावेऽपि स्थितेरावश्यकत्वादिति शङ्कते -- नन्विति। सदसतोर्मिथः संबन्धस्यादृष्टत्वान्नेति निराचष्टे -- न वन्ध्येति। घटादिप्रागभावस्यात्यन्ताभावत्वाभावाद्वन्ध्यापुत्रादिविलक्षणतया स्वकारणसंबन्धः सिध्यतीत्याशङ्क्याह -- घटादेरिति। उभयत्राभावस्वभावाविशेषेऽपि कस्यचित्कारणसंबन्धो नेतरस्येति विशेषे हेत्वभावान्न प्रागभावस्य कारणसंबन्धः संभवतीत्यर्थः। घटादिप्रागभावस्य सप्रतियोगिकत्वं वन्ध्यापुत्रादेर्नैवमिति विशेषमाशङ्क्य दूषयति -- एकस्येति। प्रागभावस्यैवप्रध्वंसाभावादेरपि सप्रतियोगिकत्वाविशेषे स्वकारणेन संबन्धाविशेषः स्यादित्यर्थः। प्रागभावप्रध्वंसाभावयोर्विशेषाभावे फलितमाह -- असति चेति। कपालशब्दो घटकारणीभूतमृदवयवविषयः? सर्वो व्यवहारो घटाश्रितो जन्मनाशादिव्यवहारः। प्रध्वंसाभावस्तु घटस्यैवाभावत्वे सत्यपि न घटत्वमापद्यते नापि कारणेन संबध्यते न चोत्पत्त्यादिव्यवहारयोग्यो भवतीत्येतदयुक्तं प्रागभावेनास्य विशेषाभावादित्याह -- नत्विति। असमञ्जसमित्यनेनेतिशब्दः संबध्यते। असमञ्जसान्तरमाह -- प्रध्वंसादीति। अन्योन्याभावात्यन्ताभावावादिपदार्थौ। क्वचिदिति देशकालयोर्ग्रहणं? व्यवहारो जन्मादिरेव? प्रागभावो,नोत्पत्त्यादिव्यवहारयोग्योऽभावत्वात्प्रध्वंसादिवदित्यर्थः। प्रागभावस्य घटाभावानभ्युपगमादनुमानं सिद्धसाधनमिति शङ्कते -- नन्विति। अभावस्य भावापत्त्यनभ्युपगमे भावस्यैव भावापत्तिरित्यनिष्टं स्यादिति दूषयति -- भावस्यैवेति। तस्य तदापत्तेरयोग्यत्वे दृष्टान्तमाह -- यथेति। अभावस्य भावापत्तिरनिष्टेति दार्ष्टान्तिकं स्पष्टयति -- एतदपीति। आरम्भवादोक्तं दोषं परिणामवादेऽपि संचारयति -- सांख्यस्येति। धर्मः परिणामः। असतोऽपूर्वपरिणामस्योत्पत्तेः सतश्च पूर्वपरिणामस्य नाशादसदसदेव सच्च सदेवेति व्यवस्थात्रापि दुर्घटेत्यर्थः। ननु कार्यं कारणात्मना प्रागपि सदेवाव्यक्तं कारकव्यापाराद्व्यज्यते तेन व्यक्त्यव्यक्त्योर्जन्मनाशव्यवहारान्मतान्तराद्विशेषसिद्धिस्तत्राह -- अभिव्यक्तीति। कारकव्यापारात्प्रागनभिव्यक्तिवदभिव्यक्तेः सत्त्वमसत्त्वं वा सत्त्वे कारकव्यापारवैयर्थ्यात्तद्विषयप्रमाणविरोधो द्वितीये पक्षान्तरवदत्यन्तासतस्तन्निर्वर्त्यत्वायोगे स एव दोषः कारकव्यापारादूर्ध्वं व्यक्तिवदव्यक्तेरपि सत्त्वे स एव दोषोऽसत्त्वेपि सतोऽसत्त्वानङ्गीकारान्मानमेयव्यवहारे न क्वापि विश्वासः सत्सदेवासदसदेवेत्यनिर्धारणादित्यर्थः। सांख्यपक्षप्रतिक्षेपन्यायेन पक्षान्तरमपि प्रतिक्षिप्तमित्याह -- एतेनेति। कारणस्यैव कार्यरूपापत्तिरुत्पत्तिस्तस्यैव तद्रूपत्यागेन स्वरूपापत्तिर्नाश इत्येतदपि न पूर्वरूपे स्थिते नष्टे च परस्य पररूपापत्तेरनुपपत्तेः? न च प्राप्तं रूपं स्थितेन नष्टेन वा त्यक्तुं शक्यमित्यर्थः। आरम्भवादे परिणामवादेषु चोत्पत्त्यादिव्यवहारानुपपत्तौ परिशेषायातं दर्शयति -- पारिशैष्यादिति। एकस्यानेकविधविकल्पानुपपत्तिमाशङ्क्याह -- अविद्ययेति। अस्यापि मतस्य भगवन्मतानुरोधित्वाभावादविशिष्टा त्याज्यतेत्याशङ्क्याह -- इतीदमिति। उक्तमेव भगवन्मतं विशदयति -- सत्प्रत्ययस्येति। सदेकमेव वस्तु स्यादिति शेषः। इतरेषां विकारप्रत्ययानां रजतादिधीवदर्थव्यभिचारादविद्यया तदेव सद्वस्त्वनेकधा विकल्प्यत इत्याह -- व्यभिचाराच्चेति। इति मतं श्लोके दर्शितमिति संबन्धः। आत्मनश्चेदविक्रियत्वं भगवतेष्टं तर्हि सर्वकर्मपरित्यागोपपत्तेः सहजस्यापि कर्मणस्त्यागसिद्धिरिति शङ्कते -- कथमिति। किं कार्यकारणात्मनां गुणानामकल्पितानां कल्पितानां वा कर्म धर्मत्वेनेष्टं द्विधापि निःशेषकर्मत्यागो विदुषोऽविदुषो वा नाद्य इत्याह -- यदीत्यादिना। अविद्यारोपितमेव गुणशब्दितकार्यकारणारोपद्वारा कर्मेति शेषः। द्वितीयं प्रत्याह -- विद्वांस्त्विति। आरोपशेषवशाद्विदुषोऽपि नाशेषकर्मत्यागसिद्धिरित्याशङ्क्याह -- अविद्येति। तामेवानुपपत्तिं दृष्टान्तेन स्पष्टयति -- नहीति। विदुषोऽशेषकर्मत्यागे पाञ्चमिकमपि वचोऽनुकूलमित्याह -- एवंचेति। अविदुषः सर्वकर्मत्यागायोगे च प्रकृताध्यायस्थमेव वाक्यमनुगुणमित्याह -- स्वे स्व इति। वाक्यान्तरमपि तत्रैवार्थे युक्तार्थमित्याह -- स्वकर्मणेति।

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Sri Dhanpati

अतः सहजं जन्मनैवोत्पन्नं स्वभावजं कर्म न त्यजेत्। कुन्तीपुत्रेण क्षत्रियवरेण त्वया युद्धे अपलायनादि सहजं कर्म न त्याज्यमिति संबोधनाशयः। दोषवत्सहजमपि कर्म परित्यज्य निर्दोषमन्यदीयं कर्म कुतो नाश्रयणीयमित्याशङ्क्य दोषरहितस्य कर्मणएवाभावदित्याह -- सर्वारम्भा हि यस्मादारभ्यन्त इत्यारम्भाः सर्वकर्माणि त्रिगुणात्मकत्वात्सहजेन धूमेनाग्निरिवावृताः व्याप्ताः सदोषा इत्यर्थः। तथाच सहजस्य स्वधर्माख्यस्य कर्मणः परित्यागेन परधर्मानुष्ठानेऽपि सर्वकर्मणां दोषवत्त्वाद्दोषान्नैवमुच्यते। भयावहश्च परधर्मः। नच शक्यतेऽज्ञेनाशेषतः कर्म त्युक्तं यतस्तस्मान्न त्यजेदित्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sahajam
karmaduty
kaunteyaArjun, the son of Kunti
sadoṣham
apieven if
na tyajetone should not abandon
sarvaārambhāḥ
hiindeed
doṣheṇawith evil
dhūmenawith smoke
agniḥfire
ivaas
āvṛitāḥveiled
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Bhagavad Gita · 18.47
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्

अच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.49
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति

जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है, जिसने शरीरको वशमें कर रखा है, जो स्पृहारहित है, वह मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा नैष्कर्म्य-सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 48
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 48
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः

हे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 48 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 48 का हिंदी अर्थ: "हे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 48?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 48 translates to: "One should not, O Arjuna, abandon the duty to which one is born, though it may be faulty; for, all undertakings are enveloped by evil, just as fire is by smoke. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 48 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। हे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "saha-jaṁ karma kaunteya sa-doṣham api na tyajet" mean in English?

"saha-jaṁ karma kaunteya sa-doṣham api na tyajet" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 48. One should not, O Arjuna, abandon the duty to which one is born, though it may be faulty; for, all undertakings are enveloped by evil, just as fire is by smoke. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.