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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 51
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च।शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च

जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

தூய்மையான புத்தியைக் கொண்டவர், உறுதியின் மூலம் சுயத்தைக் கட்டுப்படுத்துதல், ஒலி மற்றும் பிற பொருட்களைத் துறந்து, ஈர்ப்பு மற்றும் வெறுப்பைக் கைவிடுதல்.

BengaliIND

বিশুদ্ধ বুদ্ধি দ্বারা সমৃদ্ধ, দৃঢ়তার মাধ্যমে আত্মকে নিয়ন্ত্রণ করা, শব্দ এবং অন্যান্য বস্তু ত্যাগ করা এবং আকর্ষণ ও ঘৃণা পরিত্যাগ করা।

MarathiIND

शुद्ध बुद्धीने संपन्न, खंबीरतेने स्वतःवर नियंत्रण ठेवणे, आवाज आणि इतर वस्तूंचा त्याग करणे आणि आकर्षण आणि द्वेषाचा त्याग करणे.

TeluguIND

స్వచ్ఛమైన బుద్ధి, దృఢత్వం ద్వారా స్వీయ నియంత్రణ, ధ్వని మరియు ఇతర వస్తువులను విడిచిపెట్టడం మరియు ఆకర్షణ మరియు ద్వేషాన్ని విడిచిపెట్టడం.

NepaliIND

शुद्ध बुद्धिले सम्पन्न, दृढताद्वारा आत्मलाई नियन्त्रण गर्ने, ध्वनि र अन्य वस्तुहरू त्याग्ने र आकर्षण र घृणा त्याग्ने।

GujaratiIND

શુદ્ધ બુદ્ધિથી સંપન્ન, મક્કમતા દ્વારા સ્વને નિયંત્રિત કરવું, અવાજ અને અન્ય વસ્તુઓનો ત્યાગ કરવો અને આકર્ષણ અને દ્વેષનો ત્યાગ કરવો.

MalayalamIND

നിർമലമായ ബുദ്ധി, ദൃഢതയിലൂടെ സ്വയം നിയന്ത്രിക്കുക, ശബ്ദവും മറ്റ് വസ്തുക്കളും ഉപേക്ഷിക്കുക, ആകർഷണവും വിദ്വേഷവും ഉപേക്ഷിക്കുക.

SindhiIND

خالص عقل سان نوازيو، مضبوطيءَ سان نفس کي قابو ڪرڻ، آواز ۽ ٻين شين کي ڇڏي ڏيڻ ۽ ڪشش ۽ نفرت کي ڇڏي ڏيڻ.

KannadaIND

ಶುದ್ಧ ಬುದ್ಧಿಶಕ್ತಿಯನ್ನು ಹೊಂದಿದ್ದು, ದೃಢತೆಯ ಮೂಲಕ ತನ್ನನ್ನು ನಿಯಂತ್ರಿಸಿಕೊಳ್ಳುವುದು, ಧ್ವನಿ ಮತ್ತು ಇತರ ವಸ್ತುಗಳನ್ನು ತ್ಯಜಿಸುವುದು ಮತ್ತು ಆಕರ್ಷಣೆ ಮತ್ತು ದ್ವೇಷವನ್ನು ತ್ಯಜಿಸುವುದು.

PunjabiIND

ਸ਼ੁੱਧ ਬੁੱਧੀ ਨਾਲ ਸੰਪੰਨ, ਦ੍ਰਿੜਤਾ ਦੁਆਰਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਕਾਬੂ ਕਰਨਾ, ਆਵਾਜ਼ ਅਤੇ ਹੋਰ ਵਸਤੂਆਂ ਨੂੰ ਤਿਆਗਣਾ ਅਤੇ ਖਿੱਚ ਅਤੇ ਨਫ਼ਰਤ ਨੂੰ ਤਿਆਗਣਾ।

ManipuriIND

ꯑꯁꯦꯡꯕꯥ ꯋꯥꯈꯂꯅꯥ ꯊꯜꯂꯕꯥ, ꯑꯆꯦꯠꯄꯥ ꯋꯥꯈꯜꯂꯣꯅꯒꯤ ꯈꯨꯠꯊꯥꯡꯗꯥ ꯃꯁꯥꯕꯨ ꯀꯟꯠꯔꯣꯜ ꯇꯧꯕꯥ, ꯈꯣꯟꯖꯦꯜ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯇꯩ ꯄꯣꯠꯁꯀꯁꯤꯡ ꯊꯥꯗꯣꯀꯄꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯄꯨꯛꯅꯤꯡ ꯆꯤꯡꯁꯤꯅꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯌꯦꯛꯅꯕꯥ ꯊꯥꯗꯣꯀꯄꯥ꯫

BhojpuriIND

शुद्ध बुद्धि से संपन्न, दृढ़ता के माध्यम से आत्म के नियंत्रित करे वाला, ध्वनि आ अन्य वस्तु के त्याग करे वाला आ आकर्षण आ नफरत के त्याग करे वाला।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- बुद्ध्या विशुद्धया युक्तः -- जो सांख्ययोगी साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहता है? उसकी बुद्धि विशुद्ध अर्थात् सात्त्विकी (गीता 18। 30) हो। उसकी बुद्धिका विवेक साफसाफ हो? उसमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह न हो।इस सांख्ययोगके प्रकरणमें सबसे पहले बुद्धिका नाम आया है। इसका तात्पर्य है कि सांख्ययोगीके लिये जिस विवेककी आवश्यकता है? वह विवेक बुद्धिमें ही प्रकट होता है। उस विवेकसे वह जडताका त्याग करता है।वैराग्यं समुपाश्रितः -- जैसे संसारी लोग रागपूर्वक वस्तु? व्यक्ति आदिके आश्रित रहते हैं? उनको अपना आश्रय? सहारा मानते हैं? ऐसे ही सांख्ययोगका साधक वैराग्यके आश्रित रहता है अर्थात् जनसमुदाय? स्थान आदिसे उसकी स्वाभाविक ही निर्लिप्तता बनी रहती है। लौकिक और पारलौकिक सम्पूर्ण भोगोंसे उसका दृढ़ वैराग्य होता है।विविक्तसेवी -- सांख्ययोगके साधकका स्वभाव? उसकी रुचि स्वतःस्वाभाविक एकान्तमें रहनेकी होती है। एकान्तसेवनकी रुचि होनी तो बढ़िया है? पर उसका आग्रह नहीं होना चाहिये अर्थात् एकान्त न मिलनेपर मनमें विक्षेप? हलचल नहीं होनी चाहिये। आग्रह न होनेसे रुचि होनेपर भी एकान्त न मिले? प्रत्युत समुदाय मिले? खूब हल्लागुल्ला हो? तो भी साधक उकतायेगा नहीं अर्थात् सिद्धिअसिद्धिमें सम रहेगा। परन्तु आग्रह होगा तो वह उकता जायगा? उससे समुदाय सहा नहीं जायगा। अतः साधकका स्वभाव तो एकान्तमें रहनेका ही होना चाहिये? पर एकान्त न मिले तो उसके अन्तःकरणमें हलचल नहीं होनी चाहिये। कारण कि हलचल होनेसे अन्तःकरणमें संसारकी महत्ता आती है और संसारकी महत्ता आनेपर हलचल होती है? जो कि ध्यानयोगमें बाधक है।एकान्तमें रहनेसे साधन अधिक होगा? मन भगवान्में अच्छी तरह लगेगा अन्तःकरण निर्मल बनेगा -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें सहायक होती है। परन्तु एकान्तमें हल्लागुल्ला करनेवाला कोई नहीं होगा अतः वहाँ नींद अच्छी आयेगी? वहाँ किसी भी प्रकारसे बैठ जायँ तो कोई देखनेवाला नहीं होगा? वहाँ सब प्रकारसे आराम रहेगा? एकान्तमें रहनेसे लोग भी ज्यादा मानबड़ाई? आदर करेंगे -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें बाधक होती है क्योंकि यह सब भोग है। साधकको इन सुखसुविधाओंमें फँसना नहीं चाहिये? प्रत्युत इनसे सदा सावधान रहना चाहिये।लघ्वाशी -- साधकका स्वभाव स्वल्प अर्थात् नियमित और सात्त्विक भोजन करनेका हो। भोजनके विषयमें हित? मित और मेध्य -- ये तीन बातें बतायी गयी हैं। हित का तात्पर्य है -- भोजन शरीरके अनुकूल हो। मितका तात्पर्य है -- भोजन न तो अधिक करे और न कम करे? प्रत्युत जितने भोजनसे शरीरनिर्वाह की जाय? उतना भोजन करे (गीता 6। 16)। भोजनसे शरीर पुष्ट हो जायगा -- ऐसे भावसे भोजन न करे? प्रत्युत केवल औषधकी तरह क्षुधानिवृत्तिके लिये ही भोजन करे? जिससे साधनमें विघ्न न पड़े। मेध्यका तात्पर्य है -- भोजन पवित्र हो।धृत्यात्मानं नियम्य च -- सांसारिक कितने ही प्रलोभन सामने आनेपर भी बुद्धिको अपने ध्येय परमात्मतत्त्वसे विचलित न होने देना -- ऐसी दृढ़ सात्त्विकी धृति (गीता 18। 33) के द्वारा इन्द्रियोंका नियमन करे अर्थात् उनको मर्यादामें रखे। आठों पहर यह जागृति रहे कि इन्द्रियोंके द्वारा साधनके विरुद्ध कोई भी चेष्टा न हो।यतवाक्कायमानसः -- शरीर? वाणी और मनको संयत (वशमें) करना भी साधकके लिये बहुत जरूरी है (गीता 17। 14 -- 16)। अतः वह शरीरसे वृथा न घूमे? देखनेसुननेके शौकसे कोई यात्रा न करे। वाणीसे वृथा बातचीत न करे? आवश्यक होनेपर ही बोले? असत्य न बोले? निन्दाचुगली न करे। मनसे रागपूर्वक संसारका चिन्तन न करे? प्रत्युत परमात्माका चिन्तन करे।शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा -- ध्यानके समय बाहरके जितने सम्बन्ध हैं? जो कि विषयरूपसे आते हैं और जिनसे संयोगजन्य सुख होता है? उन शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- पाँचों विषयोंका स्वरूपसे ही त्याग कर देना चाहिये। कारण कि विषयोंका रागपूर्वक सेवन करनेवाला ध्यानयोगका साधन नहीं कर सकता। अगर विषयोंका रागपूर्वक सेवन करेगा तो ध्यानमें वृत्तियाँ (बहिर्मुख होनेसे) नहीं लगेंगी और विषयोंका चिन्तन होगा।रागद्वेषौ व्युदस्य च -- सांसारिक वस्तु महत्त्वशाली है? अपने काममें आनेवाली है? उपयोगी है -- ऐसा जो भाव है? उसका नाम राग है। तात्पर्य है कि अन्तःकरणमें असत् वस्तुका जो रंग चढ़ा हुआ है? वह राग है। असत् वस्तु आदिमें राग रहते हुए कोई उनकी प्राप्तिमें बाधा डालता है? उसके प्रति द्वेष हो जाता है।असत् संसारके किसी अंशमें राग हो जाय तो दूसरे अंशमें द्वेष हो जाता है -- यह नियम है। जैसे? शरीरमें राग हो जाय तो शरीरके अनुकूल वस्तुमात्रमें राग हो जाता है और प्रतिकूल वस्तुमात्रमें द्वेष हो जाता है।संसारके साथ रागसे भी सम्बन्ध जुड़ता है और द्वेषसे भी सम्बन्ध जुड़ता है। रागवाली बातका भी चिन्तन होता है और द्वेषवाली बातका भी चिन्तन होता है। इसलिये साधक न राग करे और न द्वेष करे।ध्यानयोगपरो नित्यम् -- साधक नित्य ही ध्यानयोगके परायण रहे अर्थात् ध्यानके सिवाय दूसरा कोई साधन न करे। ध्यानके समय तो ध्यान करे ही? व्यवहारके समय अर्थात् चलतेफिरते? खातेपीते? कामधंधा करते समय भी यह ध्यान (भाव) सदा बना रहे कि वास्तवमें एक परमात्माके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं (गीता 18। 20)।अहंकारं बलं दर्पं ৷৷. विमुच्य -- गुणोंको लेकर अपनेमें जो एक विशेषता दीखती है? उसे अहंकार कहते हैं। जबर्दस्ती करके? विशेषतासे मनमानी करनेका जो आग्रह (हठ) होता है? उसे बल कहते हैं। जमीनजायदाद आदि बाह्य चीजोंकी विशेषताको लेकर जो घमंड होता है? उसे दर्प कहते हैं। भोग? पदार्थ तथा अनुकूल परिस्थिति मिल जाय? इस इच्छाका नाम काम है। अपने स्वार्थ और अभिमानमें ठेस लगनेपर दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है? उसको क्रोध कहते हैं। भोगबुद्धिसे? सुखआरामबुद्धिसे चीजोंका जो संग्रह किया जाता है? उसे परिग्रह कहते हैं।साधक उपर्युक्त अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रह -- इन सबका त्याग कर देता है।निर्ममः -- अपने पास निर्वाहमात्रकी जो वस्तुएँ हैं और कर्म करनेके शरीर? इन्द्रियाँ आदि जो साधन हैं? उनमें ममता अर्थात् अपनापन न हो । अपना शरीर? वस्तु आदि जो हमें प्रिय लगते हैं? उनके बने रहनेकी इच्छा न होना निर्मम होना है।जिन व्यक्तियों और वस्तुओंको हम अपनी मानते हैं? वे आजसे सौ वर्ष पहले भी अपनी नहीं थीं और सौ वर्षके बाद भी अपनी नहीं रहेंगी। अतः जो अपनी नहीं रहेंगी? उनका उपयोग या सेवा तो कर सकते हैं? पर उनको,अपनी मानकर अपने पास नहीं रख सकते। अगर उनको अपने पास नहीं रख सकते तो वे अपने नहीं हैं ऐसा माननेमें क्या बाधा है उनको अपनी न माननेसे अधिक निर्मम हो जाता है।शान्तः -- असत् संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति? हलचल आदि पैदा होते हैं। जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर अशान्ति कभी पासमें आती ही नहीं। फिर रागद्वेष न रहनेसे साधक हरदम शान्त रहता है।ब्रह्मभूयाय कल्पते -- ममतारहित और शान्त मनुष्य (सांख्ययोगका साधक) परमात्मप्राप्तिका अधिकारी बन जाता है अर्थात् असत्का सर्वथा सम्बन्ध छूटते ही उसमें ब्रह्मप्राप्तिकी योग्यता? सामर्थ्य आ जाती है। कारण कि जबतक असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य नहीं आती। सम्बन्ध -- उपर्युक्त साधनसामग्रीसे निष्ठा प्राप्त हो जानेपर क्या होता है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

वह ज्ञानकी परा निष्ठा किस प्रकार करनी चाहिये सो कहते हैं --, विशुद्ध -- कपटरहित निश्चयात्मिका बुद्धिसे संपन्न पुरुष? धैर्यसे कार्यकरणके संघातरूप आत्माको,( शरीरको ) संयम करके -- वशमें करके शब्दादि विषयोंको? अर्थात् शब्द जिनका आदि है ऐसे सभी विषयोंको छोड़कर? प्रकरणके अनुसार यहाँ यह अभिप्राय है कि केवल शरीरस्थितिमात्रके लिये जिन विषयोंकी आवश्यकता है? उनसे अतिरिक्त सुखभोगके लिये जो अधिक विषय हैं? उन सबको छोड़कर तथा शरीरस्थितिके निमित्त प्राप्त हुए विषयोंमें भी? रागद्वेषका अभाव करकेत्याग करके।

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Sri Anandgiri

ब्रह्मज्ञानस्य परां निष्ठां प्रतिष्ठापितामनूद्य श्लोकान्तरमवतारयितुं पृच्छति -- सेयमिति। येयं ब्रह्मज्ञानस्य परा निष्ठा समारोपिता तद्धर्मनिवृत्तिद्वारा ब्रह्मणि परिसमाप्तिर्ज्ञानसंतानरूपोच्यते सा कार्या सुसंपाद्येति यदुक्तं तत्कथं केनोपायेनेति प्रश्नार्थः। पृष्टमुपायभेदमुदाहरति -- बुद्ध्येति। अध्यवसायो ब्रह्मात्मत्वनिश्चयः? मायारहितत्वं संशयविपर्ययशून्यत्वम्। शब्दादिसमस्तविषयत्यागे देहस्थितिरपि दुःस्था स्यादित्याशङ्क्याह -- सामर्थ्यादिति। विषयमात्रत्यागे देहस्थित्यनुपपत्तेर्ज्ञाननिष्ठासिद्धिप्रसङ्गादित्यर्थः। देहस्थित्यर्थत्वेनानुज्ञातेष्वर्थेषु प्राप्तं रागादि ज्ञाननिष्ठाप्रतिबन्धकं व्युदस्यति -- शरीरेति। परित्यज्य विविक्तसेवी स्यादिति संबन्धः। बुद्धेर्वैशारद्यं यत्नेन कार्यं करणनियमनम्।

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Sri Dhanpati

ब्रह्मप्राप्तेः ब्रह्मज्ञानस्य परस्याः निष्ठायाः समापोपिताऽतद्धर्मनिवृत्तिद्वारा ब्रह्मणि परिसमाप्तेः सुसंपाद्यायाः प्रतिज्ञातं क्रमं दर्शयति। बुद्य्धा व्यवसायात्मिकया व्यवसायश्च ब्रह्मात्मज्ञानादेव मोक्षः सचावश्यं संपादनीय इति निश्चयः। विशुद्धया मायारहितया युक्तः संपन्नः धृत्या धैर्यणात्मानं कार्यकरणसंघातं नियम्य वशीकृत्य षष्ठाध्यायादावुक्तानामनुक्तानां ततोऽधिकान्सुखार्थास्त्यक्त्वेत्यर्थः। विषयमात्रेत्यागे देहस्थित्यनुपपत्त्या ज्ञाननिष्ठाया असिद्धिप्रसङ्गात्। स्यादित्यध्याहृतेन ब्रह्मभूयाय कल्पत इत्यनेन वा संबन्धः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
buddhyāintellect
viśhuddhayāpurified
yuktaḥendowed with
dhṛityāby determination
ātmānamthe intellect
niyamyarestraining
chaand
śhabdaādīn viṣhayān
tyaktvāabandoning
rāgadveṣhau
vyudasyacasting aside
chaand
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.50
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा

हे कौन्तेय ! सिद्धि-(अन्तःकरणकी शुद्धि-) को प्राप्त हुआ साधक ब्रह्मको, जो कि ज्ञानकी परा निष्ठा है, जिस प्रकारसे प्राप्त होता है, उस प्रकारको तुम मुझसे संक्षेपमें ही समझो। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.52
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः

जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 51
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 51
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च।शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च

जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 51 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 51 का हिंदी अर्थ: "जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 51?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 51 translates to: "Endowed with a pure intellect, controlling the self through firmness, relinquishing sound and other objects and abandoning attraction and hatred. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च।शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रा" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 51 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "buddhyā viśhuddhayā yukto dhṛityātmānaṁ niyamya cha" mean in English?

"buddhyā viśhuddhayā yukto dhṛityātmānaṁ niyamya cha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 51. Endowed with a pure intellect, controlling the self through firmness, relinquishing sound and other objects and abandoning attraction and hatred. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.