
“श्रीभगवान् बोले -- कई विद्वान् काम्य-कर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप-रूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये। — VaniSagar”
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சில தத்துவவாதிகள் செயல்கள் தீயவையாக கைவிடப்பட வேண்டும் என்று அறிவிக்கின்றனர்; மற்றவர்கள் தியாகம், பரிசு மற்றும் சிக்கன செயல்களை விட்டுவிடக்கூடாது என்று அறிவிக்கிறார்கள்.
काही तत्वज्ञानी असे घोषित करतात की कृती वाईट म्हणून सोडली पाहिजे; तर इतर घोषित करतात की त्याग, भेट आणि तपस्या या कृत्यांचा त्याग केला जाऊ नये.
কিছু দার্শনিক ঘোষণা করেন যে কর্মকে মন্দ বলে পরিত্যাগ করা উচিত; যখন অন্যরা ঘোষণা করে যে ত্যাগ, দান এবং তপস্যা ত্যাগ করা উচিত নয়।
కొంతమంది తత్వవేత్తలు చర్యలు చెడుగా వదిలివేయబడాలని ప్రకటించారు; మరికొందరు త్యాగం, బహుమతి మరియు కాఠిన్యం వంటి చర్యలను విడిచిపెట్టరాదని ప్రకటించారు.
ڪي فلاسفر چون ٿا ته عمل کي برائي سمجهي ڇڏڻ گهرجي. جڏهن ته ٻيا اعلان ڪن ٿا ته قرباني، تحفا ۽ سادگي جي عملن کي نه ڇڏڻ گهرجي.
ਕੁਝ ਦਾਰਸ਼ਨਿਕ ਘੋਸ਼ਣਾ ਕਰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਕੰਮਾਂ ਨੂੰ ਬੁਰਾਈ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਛੱਡ ਦੇਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ; ਜਦੋਂ ਕਿ ਦੂਸਰੇ ਘੋਸ਼ਣਾ ਕਰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਕੁਰਬਾਨੀ, ਤੋਹਫ਼ੇ ਅਤੇ ਤਪੱਸਿਆ ਦੇ ਕੰਮਾਂ ਨੂੰ ਤਿਆਗਿਆ ਨਹੀਂ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।
केही दार्शनिकहरूले कर्मलाई खराबको रूपमा त्यागिनुपर्छ भनी घोषणा गर्छन्; जबकि अरूले बलिदान, उपहार र तपस्याका कार्यहरू त्याग्नु हुँदैन भनेर घोषणा गर्छन्।
કેટલાક ફિલસૂફો જાહેર કરે છે કે ક્રિયાઓને અનિષ્ટ તરીકે છોડી દેવી જોઈએ; જ્યારે અન્યો જાહેર કરે છે કે બલિદાન, ભેટ અને સંયમના કાર્યોને છોડી દેવા જોઈએ નહીં.
ಕೆಲವು ದಾರ್ಶನಿಕರು ಕ್ರಿಯೆಗಳನ್ನು ಕೆಟ್ಟದಾಗಿ ತ್ಯಜಿಸಬೇಕು ಎಂದು ಘೋಷಿಸುತ್ತಾರೆ; ಇತರರು ತ್ಯಾಗ, ಉಡುಗೊರೆ ಮತ್ತು ಸಂಯಮವನ್ನು ತ್ಯಜಿಸಬಾರದು ಎಂದು ಘೋಷಿಸುತ್ತಾರೆ.
ചില തത്ത്വചിന്തകർ പ്രവൃത്തികൾ തിന്മയായി ഉപേക്ഷിക്കണമെന്ന് പ്രഖ്യാപിക്കുന്നു; മറ്റുള്ളവർ ത്യാഗത്തിൻ്റെയും ദാനത്തിൻ്റെയും തപസ്സിൻ്റെയും പ്രവൃത്തികൾ ഉപേക്ഷിക്കരുതെന്ന് പ്രഖ്യാപിക്കുന്നു.
किश दार्शनिक घोशणा करदे न जे कम्में गी बुराई दे रूप च त्यागना चाहिदा; जदके दूए घोशणा करदे न जे बलिदान, दान ते तपस्या दे कम्में दा त्याग नेईं कीता जाना चाहिदा।
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Sacred Commentaries
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Swami Ramsukhdas
व्याख्या -- दार्शनिक विद्वानोंके चार मत हैं --,1 -- काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः -- कई विद्वान् कहते हैं कि काम्यकर्मोंके त्यागका नाम संन्यास है अर्थात् इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो कर्म किये जाते हैं? उनका त्याग करनेका नाम संन्यास है। 2 -- सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः -- कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंके फलकी इच्छाका त्याग करनेका नाम त्याग है अर्थात् फल न चाहकर कर्तव्यकर्मोंको करते रहनेका नाम त्याग है। 3 -- त्याज्यं दोष वदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः -- कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये। 4 -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे -- अन्य विद्वान् कहते हैं कि दूसरे सब कर्मोंका भले ही त्याग कर दें? पर यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।उपर्युक्त चारों मतोंमें दो विभाग दिखायी देते हैं -- पहला और तीसरा मत संन्यास(सांख्ययोग) का है तथा दूसरा और चौथा मत त्याग(कर्मयोग) का है। इन दो विभागोंमें भी थोड़ाथोड़ा अन्तर है। पहले मतमें केवल काम्यकर्मोंका त्याग है और तीसरे मतमें कर्ममात्रका त्याग है। ऐसे ही दूसरे मतमें कर्मोंके फलका त्याग है और चौथे मतमें यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंके त्यागका निषेध है।दार्शनिकोंके उपर्युक्त चार मतोंमें क्याक्या कमियाँ हैं और उनकी अपेक्षा भगवान्के मतमें क्याक्या विलक्षणताएँ हैं? इसका विवेचन इस प्रकार है --,1 -- काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासम् -- संन्यासके इस पहले मतमें केवल काम्यकर्मोंका त्याग बताया गया है परन्तु इसके अलावा भी नित्य? नैमित्तिक आदि आवश्यक कर्तव्यकर्म बाकी रह जाते हैं । अतः यह मत पूर्ण नहीं है क्योंकि इसमें न तो कर्तृत्वका त्याग बताया है और न स्वरूपमें स्थिति ही बतायी है। परन्तु भगवान्के मतमें कर्मोंमें कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता और स्वरूपमें स्थिति हो जाती है जैसे -- इसी अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्मफलमें लिप्त नहीं होती -- ऐसा कहकर कर्तृत्वाभिमानका त्याग बताया है और अगर वह सम्पूर्ण प्राणियोंको मार दे? तो भी न मारता है? न बँधता है -- ऐसा कहकर स्वरूपमें स्थिति बतायी है। 2 -- त्याज्यं दोषवदित्येके -- संन्यासके इस दूसरे मतमें सब कर्मोंको दोषकी तरह छोड़नेकी बात है। परन्तु सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग कोई कर ही नहीं सकता (गीता 3। 5) और कर्ममात्रका त्याग करनेसे जीवननिर्वाह भी नहीं हो सकता (गीता 3। 8)। इसलिये भगवान्ने नित्य कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेको राजसतामस त्याग बताया है (18। 78)। 3 -- सर्वकर्मफलत्यागम् -- त्यागके इस पहले मतमें केवल फलका त्याग बताया है। यहाँ फलत्यागके अन्तर्गत केवल कामनाके त्यागकी ही बात आयी है । ममताआसक्तिके त्यागकी बात इसके अन्तर्गत नहीं ले सकते क्योंकि ऐसा लेनेपर दार्शनिकों और भगवान्के मतोंमें कोई अन्तर नहीं रहेगा। भगवान्के मतमें कर्मकी आसक्ति और फलकी आसक्ति -- दोनोंके ही त्यागकी बात आयी है -- सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च (गीता 18। 6)। 4 -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम् -- त्याग अर्थात् कर्मयोगके इस दूसरे मतमें यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग न करनेकी बात है। परन्तु इन तीनोंके अलावा वर्ण? आश्रम? परिस्थिति आदिको लेकर जितने कर्म आते हैं? उनको करने अथवा न करनेके विषयमें कुछ नहीं कहा गया है -- यह इसमें अधूरापन है। भगवान्के मतमें इन कर्मोंका केवल त्याग ही नहीं करना चाहिये? प्रत्युत इनको न करते हों? तो जरूर करना चाहिये और इनके अतिरिक्त तीर्थ? व्रत आदि कर्मोंको भी फल एवं आसक्तिका त्याग करके करना चाहिये (18। 56)। सम्बन्ध -- पीछेके दो श्लोकोंमें दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बतानेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें पहले त्यागके विषयमें अपना मत बताते हैं।
Sri Harikrishnadas Goenka
कितने ही सांख्यादि मतावलम्बी पण्डितजन कहते हैं कि जिसमें दोष हो वह दोषवत् है। वह क्या है कि बन्धनके हेतु होनेके कारण सभी कर्म दोषयुक्त हैं? इसलिये कर्म करनेवाले कर्माधिकारी मनुष्योंके लिये भी वे त्याज्य हैं? अथवा जैसे रागद्वेष आदि दोष त्यागे जाते हैं? वैसे ही समस्त कर्म भी त्याज्य हैं। इसी विषयमें दूसरे विद्वान कहते हैं कि यज्ञ? दान और तपरूप कर्म त्याग करनेयोग्य नहीं हैं। ये सब विकल्प? कर्म करनेवाले कर्माधिकारियोंको लक्ष्य करके ही किये गये हैं। समस्त भोगोंसे विरक्त ज्ञाननिष्ट? संन्यासियोंको लक्ष्य करके नहीं। ( अभिप्राय यह कि ) सांख्ययोगियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगके द्वारा मैं पहले कह चुका हूँ इस प्रकार जो,( संन्यासी ) कर्माधिकारसे अलग कर दिये गये हैं उनके विषयमें यहाँ कोई विचार नहीं करना है। पू0 -- कर्मयोगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे कही गयी है इस कथनसे जिनकी निष्ठाका विभाग पहले किया जा चुका है? उन कर्माधिकारियोंके सम्बन्धमें जिस प्रकार यहाँ गीताशास्त्रके उपसंहारप्रकरणमें फिर विचार किया जाता है? वैसे ही? सांख्यनिष्ठावाले संन्यासियोंके विषयमें भी तो किया जाना उचित ही है। उ0 -- नहीं? क्योंकि उनका त्याग मोह या दुःखके निमित्तसे होनेवाला नहीं हो सकता। ( भगवान्ने क्षेत्राध्यायमें ) इच्छा और द्वेष आदिको शरीरके ही धर्म बतलाया है इसलिये सांख्यनिष्ठ संन्यासी शारीरिक पीड़ाके निमित्तसे होनेवाले दुःखोंको आत्मामें नहीं देखते। अतः वे शारीरिक क्लेशजन्य दुःखके भयसे कर्म नहीं छोड़ते। तथा वे आत्मामें कर्मोंका अस्तित्त्व भी नहीं देखते? जिससे कि उनके द्वारा मोहसे नियत कर्मोंका परित्याग किया जा सकता हो। सारे कर्म गुणोंके हैं? मैं कुछ भी नहीं करता ऐसा समझकर ही वे कर्मसंन्यास करते हैं? क्योंकि सब कर्मोंको मनसे त्यागकर इत्यादि वाक्योंद्वारा तत्त्वज्ञानियोंके संन्यासका प्रकार ( ऐसा ही ) बतलाया गया है। अतः जो अन्य आत्मज्ञानरहित कर्माधिकारी मनुष्य हैं जिनके द्वारा मोहपूर्वक या शारीरिक क्लेशके भयसे कर्मोंका त्याग किया जाना सम्भव है? वे ही तामस और राजस त्यागी हैं। ऐसा कहकर? आत्मज्ञानरहित कर्माधिकारियोंके कर्मफलत्यागकी स्तुति करनेके लिये? उन राजसतामस त्यागियोंकी निन्दा की जाती है। क्योंकि सर्वारम्भपरित्यागी मौनी संतुष्टो येन केनचित् अनिकेतः स्थिरमतिः इत्यादि विशेषणोंसे ( बारहवें अध्यायमें ) और गुणातीतके लक्षणोंमें भी यथार्थ संन्यासीको पृथक् करके कहा गया है? तथा,ज्ञानकी जो परानिष्ठा है इस प्रकरणमें भी यही बात कहेंगे? इसलिये यहाँ यह विवेचन ज्ञाननिष्ठ संन्यासियोंके विषयमें नहीं है। कर्मफलत्याग ( रूपसंन्यास ) ही सात्त्विकतारूप गुणसे युक्त होनेके कारण यहाँ तामसराजस त्यागकी अपेक्षा गौणरूपसे संन्यास कहा जाता है। यह ( सात्त्विक त्याग ) सर्वकर्मसंन्यासरूप मुख्य संन्यास नहीं,है। पू0 -- न हि देहभृता इत्यादि हेतुयुक्त कथनसे यह पाया जाता है कि स्वरूपसे सर्वकर्मोंका संन्यास असम्भव है? अतः कर्मफलत्याग ही मुख्य संन्यास है। उ0 -- यह कहना ठीक नहीं? क्योंकि यह हेतुयुक्त कथन कर्मफलत्यागकी स्तुतिके लिये है। जिस प्रकार पूर्वोक्त अनेक साधनोंका अनुष्ठान करनेमें असमर्थ और आत्मज्ञानरहित अर्जुनके लिये विहित होनेके कारण,त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् यह कहना कर्मफलत्यागकी स्तुतिमात्र है। वैसे ही न हि देहभृता शक्यम् यह कहना भी कर्मफलत्यागकी स्तुतिके लिये ही है। क्योंकि सब कर्मोंको मनसे छो़ड़कर न करता हुआ और न कराता हुआ रहता है इस पक्षका अपवाद? किसीके द्वारा भी दिखलाया जाना सम्भव नहीं है। सुतरां यह संन्यास और त्यागसम्बन्धी विकल्प? कर्माधिकारियोंके विषयमें ही है। जो यथार्थ ज्ञानी सांख्ययोगी हैं? उनका केवल सर्वकर्मसंन्यासरूप ज्ञाननिष्ठामें ही अधिकार है? अन्यत्र नहीं? अतः वे विकल्पके पात्र नहीं हैं। यही सिद्धान्त हमने वेदाविनाशिनम् इस श्लोककी व्याख्यामें और तीसरे अध्यायके आरम्भमें सिद्ध किया है।
Sri Anandgiri
काम्यानि वर्जयित्वा नित्यनैमित्तिकानि फलाभिलाषादृते कर्तव्यानीत्युक्तं पक्षं प्रतिपक्षनिराशेन द्रढयितुं विप्रतिपत्तिमाह -- त्याज्यमिति। कर्मणः सर्वस्य दोषवत्त्वे हेतुमाह -- बन्धेति। दोषवदित्येतद्दृष्टान्तत्वेन व्याचष्टे -- अथवेति। कर्मण्यनधिकृतानामकर्मिणामेव कर्म त्याज्यं कर्मिणां तत्त्यागे प्रत्यवायादित्याशङ्क्याह -- अधिकृतानामिति। नहि तेषामपि कर्म त्यजतां प्रत्यवायो हिंसादियुक्तस्य कर्मणोऽनुष्ठाने परं प्रत्यवायादिति भावः। सांख्यादिपक्षसमाप्तावितिशब्दः। मीमांसकपक्षमाह -- तत्रैवेति। कर्माधिकृतेष्वेवेति यावत्। कर्म नित्यं नैमित्तिकं च। काम्यानां कर्मणामित्यारभ्य श्लोकाभ्यां कर्मिणोऽकर्मिणोऽधिकृताननधिकृतांश्चापेक्ष्य दर्शितविकल्पानां प्रवृत्तिरित्याशङ्क्याह -- कर्मिण इति। एवकारव्यवच्छेद्यमाह -- नत्विति। तदेव स्फुटयति -- ज्ञानेति। कर्माधिकृतानां ज्ञाननिष्ठातो विभक्तनिष्ठावत्त्वेन पूर्वोक्तानामपि शास्त्रार्थोपसंहारे पुनर्विचार्यत्ववज्ज्ञाननिष्ठानामपि विचार्यत्वमत्राविरुद्धमिति शङ्कते -- नन्विति। सांख्यानां परमार्थज्ञाननिष्ठानां नात्र विचार्यतेत्युत्तरमाह -- न तेषामिति। ननु तेषामपि स्वात्मनि क्लेशदुःखादि पश्यतां तदनुरोधेन राजसकर्मत्यागसिद्धेर्विचार्यत्वं नेत्याह -- न कायेति। तत्र क्षेत्राध्यायोक्तं हेतूकरोति -- इच्छादीनामिति। स्वात्मनि सांख्यादीनां क्लेशाद्यप्रतीतौ फलितमाह -- अत इति। ननु तेषां क्लेशाद्यदर्शनेऽपि स्वात्मनि कर्माणि पश्यतां तत्त्यागो युक्तस्तेषां कायक्लेशादिकरत्वान्नेत्याह -- नापीति। अज्ञानां मोहमाहात्म्यान्नियतमपि कर्म त्यक्तुं न तत्त्वविदां स्वात्मनि कर्मादर्शनेन तत्त्यागे हेत्वभावादिति मत्वाह -- मोहादिति। कथं तर्हि तेषामात्मनि कर्माण्यपश्यतां प्राप्त्यभावे तत्त्यागः संन्यासस्तत्राह -- गुणानामिति। अविवेकप्राप्तानां कर्मणां त्यागस्तत्त्वविदामित्युक्तं स्मारयन्नप्राप्तप्रतिषेधं प्रत्यादिशति -- सर्वेति। तत्त्वविदामत्राविचार्यत्वे फलितमाह -- तस्मादिति। येऽनात्मविदस्त एवेत्युत्तरत्र संबन्धः। कर्मण्यधिकृतानामनात्मविदां कर्मत्यागसंभावनां दर्शयति -- येषां चेति। तन्निन्दा कुत्रोपयुक्तेत्याशङ्क्याह -- कर्मिणामिति। किञ्च परमार्थसंन्यासिनां प्रशस्यत्वोपलम्भान्न निन्दाविषयत्वमित्याह -- सर्वेति। किंचात्रापि सिद्धिं प्राप्तो यथेत्यादिना ज्ञाननिष्ठाया वक्ष्यमाणत्वात्तद्वतां नेह,विचार्यतेत्याह -- वक्ष्यतीति। कर्माधिकृतानामेवात्र विवक्षितत्वं न ज्ञाननिष्ठानामित्युपसंहरति -- तस्मादिति। ननु संन्यासशब्देन सर्वकर्मसंन्यासस्य ग्राह्यत्वात्तथाविधसंन्यासिनामिह विवक्षितत्वं प्रतिभाति तत्राह -- कर्मेति। संन्यासशब्देन मुख्यस्यैव संन्यासस्य ग्रहणं गौणमुख्ययोर्मुख्ये कार्यसंप्रत्ययादन्यथा तदसंभवे हेतूक्तिवैयर्थ्यादप्राप्तप्रतिषेधादिति शङ्कते -- सर्वेति। नेदं हेतुवचनं सर्वकर्मसंन्याससंभवसाधकं कर्मफलत्यागस्तुतिपरत्वादिति परिहरति -- नेत्यादिना। एतदेव दृष्टान्तेन स्पष्टयति -- यथेति। दृष्टान्तेऽपि यथाश्रुतार्थत्वं किं न स्यादित्याशङ्क्याह -- यथोक्तेति। नहि फलत्यागादेव ज्ञानं विना मुक्तिर्युक्ता मुक्तेर्ज्ञानैकाधीनत्वसाधकश्रुतिस्मृतिविरोधादद्वेष्टेत्यादिना चानन्तरमेव ज्ञानसाधनविधानानर्थक्यादतस्त्यागस्तुतिरेवात्र ग्राह्येत्यर्थः। दृष्टान्तगतमर्थं दार्ष्टान्तिके योजयति -- तथेति। प्रागुक्तपक्षापवादविवक्षया हेतूक्तेर्मुख्यार्थत्वमेव किं न स्यादित्याशङ्क्य तदपवादे हेत्वभावान्मैवमित्याह -- न सर्वेति। न चेयमेव हेतूक्तिस्तदपवादिकान्यथासिद्धेरुक्तत्वादिति भावः। मुख्यसंन्यासापवादासंभवे संन्यासत्यागविकल्पस्य कथं सावकाशतेत्याशङ्क्याह -- तस्मादिति। ज्ञाननिष्ठान्प्रत्युक्तविकल्पानुपपत्तौ कुत्र तेषामधिकारस्तत्राह -- ये त्विति। संन्यासिनां विकल्पानर्हत्वेन ज्ञाननिष्ठायामेवाधिकारस्य भूयःसु प्रदेशेषु साधितत्वान्न साधनीयत्वापेक्षेत्याह -- तथेति।
Sri Dhanpati
काम्यानि वर्जयित्वा नित्यनैमित्तिकानि फलाभिसंधि विना कर्तव्यानीत्युक्तं पक्षं प्रतिक्षनिरासेन द्रढयितुं विप्रतिपत्तिमाह -- स्याज्यमिति। दोषाऽस्यास्तीति दोषवत् बन्धहेतुतत्वात्। सर्वमेव कर्म त्याज्यं त्यक्तव्यं दोषो रागादिर्यथा त्यज्यते तद्वत्त्याज्यमिति वा। एके मनीषिणो बुद्धमन्तः पण्डिताः सांख्यदृष्टिमाश्रिता अधिकृतैः कर्मिभिरपि सर्वं कर्मं त्याज्यमिति प्राहुः कथयन्ति। ननु अधिकृतानां कर्मिणां कर्मत्यागं प्रत्यवायजनकं कथं प्राहुरितिचेत् हिंसादियुक्तकर्मत्यागे तेषामपि प्रत्यवायाभावं तदनुष्ठानं परं प्रत्यवायं चाभिप्रेत्येति गृहाण। परे मीमांसकदृष्टिमाश्रिता यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम्अग्नीषोमीयं पशुमालमेत इत्यादिविधिबोधितहिंसातिरिक्तहिंसानिषेषेन हिंस्यात्सर्वाभूतानि इति वाक्यस्य सार्थक्याद्विधिबोधितं कर्म न प्रत्यवायावहं प्रत्युत विहितत्यागएव प्रत्यवायावह इत्यतः सर्वं कर्म न त्यक्तव्यमिति प्राहुः। अधिकृतान्कर्मिण एवापेक्ष्यैते विकल्पाः नतु ज्ञाननिष्ठान् त्यक्तसर्वपरिग्रहान्। ज्ञानयोगेन सांख्यानां निष्ठा मया प्रोक्तेति कर्मधिकारविनिर्मुक्तान् संन्याससिनोपेक्ष्य। ननु कर्मयोगेन योगनामित्यधिकृताः कर्म कुर्वन्तः पूर्वं विभक्तनिष्ठा अपि इह शास्त्रोसंहारप्रकरणं यथा विचार्यन्ते तथा सांख्या अपि ज्ञाननिष्ठा विचार्यन्ताम्। एवंच संन्यासिनोपेक्ष्य नत्वेते विकल्पा इत्युक्तमनुपपन्नमितिचेन्न गुणानां कर्म।नैव किंचित्करोमीतिकर्माण्यत्मन्यपश्यन्त इत्यादिनि च क्षेत्रधर्मत्वेनैव पश्यन्तो नियतं कर्म मोहात्परित्यजन्ति कायक्लेशदुःखभयाद्वा कर्म परित्यजन्तीति वक्तुमशक्यत्वेन तेषां मोहदुःखनिमित्तत्यागानुपपत्तेः।सर्वकर्माणि मनसा सन्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् इत्यादिभिस्तत्त्विदां संन्यासप्रकारस्योक्तत्वाच्च। ननूदाहृतवचने मनसेत्युक्तत्वात् न कायिकादीनां संन्यासः? सर्वकर्माणीति विशेषितत्वात्सर्वेषामिति चेन्न। मानसानामेव सर्वेषामिति तदर्थात्। कायादिव्यापाराणां कारणानि वर्जयित्वाऽन्यानि सर्वाणि कर्माणि मनसा संन्यस्येति भगवतोक्तो न जीवत इतिचेन्न। नवद्वारे पुरे देही आस्त इति विशेषाणानुपपत्तेस्तस्मादुदाहृतवचनादिभिस्तत्त्वविदः संन्यासप्रकारस्योक्तत्वात्। तेषां मोहादिनिमित्तित्यागानुपपत्तेश्च कर्मिणामनात्मज्ञानां कर्मफलत्यागस्तुत्यर्थं ये कर्मण्यधिकृता,अनात्मविदो येषां च मोहात्कायक्लेशभयाच्च त्यागः संभवति तमसास्त्यागिनो राजसाश्चेति निन्द्यन्ते।मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः। सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते।।तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येनकेनचित्। अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः इत्यादिना चतुर्दशद्वादशादौ परमार्तसंन्यासिनो विशेषित्वात्। ज्ञानस्य या परा निष्ठेति वक्ष्यमाणत्वाच्च। ज्ञाननिष्ठाः संन्यासिनो नेह विवक्षिताः किंत्वतत्त्वविदः संन्यासिनस्तामसत्वाद्यपेक्षया सात्त्विकत्वेन गुणेन स्तूयन्ते। नचनहि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः िति हेतुवजनेन मुख्या एवायं संन्यास इति भ्रमितव्यम्। त्यागाच्छान्तिरनन्तरमितिवद्धेतुवजनस्तुत्यर्थत्वादिति संक्षेपः।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| tyājyam | should be given up |
| doṣha | vat |
| iti | thus |
| eke | some |
| karma | actions |
| prāhuḥ | declare |
| manīṣhiṇaḥ | the learned |
| yajña | sacrifice |
| dāna | charity |
| tapaḥ | penance |
| karma | acts |
| na | never |
| tyājyam | should be abandoned |
| iti | thus |
| cha | and |
| apare | others |
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Hindi Translation By Swami Ramsukhdas — VaniSagar
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! तू संन्यास और त्याग -- इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें मेरा निश्चय सुन; क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ ! त्याग तीन प्रकारका कहा गया है। — VaniSagar
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“श्रीभगवान् बोले -- कई विद्वान् काम्य-कर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप-रूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये। — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 3 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 3 का हिंदी अर्थ: "श्रीभगवान् बोले -- कई विद्वान् काम्य-कर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप-रूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 3?
Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 3 translates to: "Some philosophers declare that actions should be abandoned as evil; while others declare that acts of sacrifice, gift, and austerity should not be relinquished. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 3 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। श्रीभगवान् बोले -- कई विद्वान् काम्य-कर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप-रूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "tyājyaṁ doṣha-vad ity eke karma prāhur manīṣhiṇaḥ" mean in English?
"tyājyaṁ doṣha-vad ity eke karma prāhur manīṣhiṇaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 3. Some philosophers declare that actions should be abandoned as evil; while others declare that acts of sacrifice, gift, and austerity should not be relinquished. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.