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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 22
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्

किंतु जो (ज्ञान) एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित, वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है। — VaniSagar

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TamilIND

ஆனால், எந்த காரணமும் இல்லாமல், சத்தியத்தில் எந்த அடிப்படையும் இல்லாமல், முழுதாக இருப்பது போல் ஒரே ஒரு விளைவைப் பற்றிக்கொண்டு, அற்பமானது - அது தாமசி என்று அறிவிக்கப்படுகிறது.

MarathiIND

पण जे एकच परिणामाला चिकटून राहते जणू ते संपूर्ण, कारण नसताना, सत्याचा कोणताही पाया नसलेले आणि क्षुल्लक आहे - ते तामसिक असल्याचे घोषित केले जाते.

SindhiIND

پر اهو جيڪو هڪ واحد اثر سان جڙيل آهي ڄڻ ته اهو سڄو آهي، بغير ڪنهن سبب جي، سچ ۾ ڪنهن به بنياد کان سواء، ۽ ننڍڙو آهي- جنهن کي تامسڪ قرار ڏنو ويو آهي.

GujaratiIND

પરંતુ જે એક જ અસરને વળગી રહે છે જાણે કે તે સંપૂર્ણ છે, કારણ વિના, સત્યમાં કોઈ પાયા વિના, અને તુચ્છ છે-જેને તામસિક તરીકે જાહેર કરવામાં આવે છે.

BengaliIND

কিন্তু যা একক প্রভাবে আঁকড়ে থাকে যেন তা সমগ্র, কারণ ছাড়াই, সত্যের কোনো ভিত্তি ছাড়াই এবং তুচ্ছ-তাকে তামসিক বলে ঘোষণা করা হয়।

TeluguIND

కానీ ఏ ఒక్క ప్రభావానికి అతుక్కుని, కారణం లేకుండా, సత్యంలో ఎటువంటి ఆధారం లేకుండా, మరియు అల్పమైనది-అది తామసికం అని ప్రకటించబడింది.

MalayalamIND

എന്നാൽ സത്യത്തിൽ യാതൊരു അടിസ്ഥാനവുമില്ലാതെ, അകാരണമായി, സമ്പൂർണ്ണമെന്നപോലെ ഒരൊറ്റ ഫലത്തിൽ മുറുകെ പിടിക്കുന്നത്, നിസ്സാരമാണ് - അത് തമസികമാണെന്ന് പ്രഖ്യാപിക്കപ്പെടുന്നു.

KannadaIND

ಆದರೆ ಅದು ಒಂದೇ ಒಂದು ಪರಿಣಾಮಕ್ಕೆ ಅಂಟಿಕೊಂಡಿರುವುದು, ಕಾರಣವಿಲ್ಲದೆ, ಸತ್ಯದಲ್ಲಿ ಯಾವುದೇ ಆಧಾರವಿಲ್ಲದೆ ಮತ್ತು ಕ್ಷುಲ್ಲಕವಾಗಿದೆ - ಅದು ತಾಮಸಿಕವೆಂದು ಘೋಷಿಸಲ್ಪಟ್ಟಿದೆ.

MizoIND

Mahse, a pum pui ang maia nghawng pakhata innghat, chhan awm lo, Thutakah lungphum nei lo, thil tenawm tak—chu chu Tamasic anga puan a ni.

DogriIND

पर जेह्ड़ा इक गै असर कन्नै चिपकदा ऐ जि'यां एह् समग्र ऐ, बिना कुसै कारण दे, सच्चाई च कुसै बी बुनियाद दे बगैर, ते तुच्छ ऐ-जिस गी तामस घोशित कीता जंदा ऐ।

BhojpuriIND

बाकिर जवन एके गो प्रभाव से अइसे चिपकल बा जइसे ऊ समग्र होखे, बिना कारण के, बिना सत्य में कवनो आधार के, आ तुच्छ बा-जवना के तामस घोषित कइल जाला।

ManipuriIND

ꯑꯗꯨꯕꯨ ꯃꯄꯨꯡ ꯑꯣꯏꯕꯥ, ꯃꯔꯝ ꯌꯥꯑꯣꯗꯅꯥ, ꯑꯆꯨꯝꯕꯗꯥ ꯌꯨꯝꯐꯝ ꯑꯃꯠꯇꯥ ꯂꯩꯇꯕꯥ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯇ꯭ꯔꯤꯕꯤꯌꯥꯜ ꯑꯣꯏꯕꯥ ꯃꯑꯣꯡꯗꯥ ꯏꯐꯦꯛꯇ ꯑꯃꯈꯛꯇꯗꯥ ꯂꯦꯞꯂꯤꯕꯥ ꯑꯗꯨꯗꯤ—ꯃꯗꯨ ꯇꯥꯃꯥꯁꯤꯛ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯂꯥꯑꯣꯊꯣꯀꯏ꯫

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तम् -- तामस मनुष्य एक ही शरीरमें सम्पूर्णकी तरह आसक्त रहता है अर्थात् उत्पन्न और नष्ट होनेवाले इस पाञ्चभौतिक शरीरको ही अपना स्वरूप मानता है। वह मानता है कि मैं ही छोटा बच्चा था? मैं ही जवान हूँ और मैं ही बूढ़ा हो जाऊँगा मैं भोगी? बलवान् और सुखी हूँ मैं धनी और बड़े कुटुम्बवाला हूँ मेरे समान दूसरा कौन है इत्यादि। ऐसी मान्यता मूढ़ताके कारण ही होती है -- इत्यज्ञानविमोहिताः (16। 15)।अहैतुकम् -- तामस मनुष्यकी मान्यता युक्ति और शास्त्रप्रमाणसे विरुद्ध होती है। यह शरीर हरदम बदल रहा है? शरीरादि वस्तुमात्र अभावमें परिवर्तित हो रही है? दृश्यमात्र अदृश्य हो रहा है और इनमें तू सदा ज्योंकात्यों रहता है अतः यह शरीर और तू एक कैसे हो सकते हैं -- इस प्रकारकी युक्तियोंको वह स्वीकार नहीं करता।अतत्त्वार्थवदल्पं च -- यह शरीर और मैं दोनों अलगअलग हैं -- इस वास्तविक ज्ञान(विवेक) से वह रहित है। उसकी समझ अत्यन्त तुच्छ है अर्थात् तुच्छताकी प्राप्ति करानेवाली है। इसलिये इसको ज्ञान कहनेमें भगवान्को संकोच हुआ है। कारण कि तामस पुरुषमें मूढ़ताकी प्रधानता होती है। मूढ़ता और ज्ञानका आपसमें विरोध है. अतः भगवान्ने ज्ञान पद न देकर यत् और तत् पदसे ही काम चलाया है।तत्तामसमुदाहृतम् -- युक्तिरहित? अल्प और अत्यन्त तुच्छ समझको ही महत्त्व देना तामस कहा गया है।जब तामस समझ ज्ञान है ही नहीं और भगवान्को भी इसको ज्ञान कहनेमें संकोच हुआ है? तो फिर इसका वर्णन ही क्यों किया गया कारण कि भगवान्ने उन्नीसवें श्लोकमें ज्ञानके त्रिविध भेद कहनेका उपक्रम किया है? इसलिये सात्त्विक और राजसज्ञानका वर्णन करनेके बाद तामस समझको भी कहनेकी आवश्यकता थी। सम्बन्ध -- अब भगवान् सात्त्विक कर्मका वर्णन करते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

जो ज्ञान? किसी एक कार्यमें? शरीरमें या शरीरसे बाहर प्रतिमादिमें? सर्ववस्तुविषयक सम्पूर्ण ज्ञानकी भाँति आसक्त है? अर्थात् ( यह समझता है कि ) यह आत्मा या ईश्वर इतना ही है इससे परे और कुछ भी नहीं है? जैसे दिगम्बर जैनियोंका ( माना हुआ ) आत्मा शरीरमें रहनेवाला और शरीरके बराबर है और पत्थर या काष्ठ ( की प्रतिमा ) मात्र ही ईश्वर है? इसी प्रकार जो ज्ञान किसी एक कार्यमें ही आसक्त है। तता जो हेतुरहित -- युक्तिरहित और तत्त्वार्थसे भी रहित है। यथार्थ अर्थका नाम तत्त्वार्थ है? ऐसा तत्त्वार्थ जिस ज्ञानका ज्ञेय हो? वह ज्ञान तत्त्वार्थयुक्त होता है और जो तत्त्वार्थयुक्त न हो वह अतत्त्वार्थवत् अर्थात् तत्त्वार्थसे रहित होता है। एवं जो हेतुरहित होनेके कारण ही अल्प है अथवा अल्पविषयक होनेसे या अल्प फलवाला होनेसे अल्प है? वह ज्ञान तामस कहा गया है क्योंकि अविवेकी तामसी प्राणियोंमें ही ऐसा ज्ञान देखा जाता है।।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

सक्तत्वमेव व्यनक्ति -- एतावानिति। एकस्मिन्कार्ये ज्ञानस्य सक्तत्वमेव दृष्टान्तेन साधयति -- यथेत्यादिना। यन्निर्युक्तिकत्वं तदेव ज्ञानस्याभासत्वे कारणमित्याह -- अहैतुकत्वादिति। स्वरूपतो विषयतश्चाभासत्वं फलतो वेत्याह -- अल्पेमिति। तामसं ज्ञानमुक्तलक्षणमित्यत्रानुभवं प्रमाणयति -- तामसानां हीति।

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Scripture Scholar

Sri Dhanpati

राजसं ज्ञानमुदाहृत्य तामसं तदाह -- यत्त्विति। तुशब्दो राजसाद्वैलक्षण्यद्योतानार्थः। यत्तु ज्ञानमेकस्मिन्कार्ये देहे बहिर्वा प्रतिमादौ कृत्स्त्रवत्समस्तवत्परिपूर्णवत् एतावानेवात्मा ईश्वरो नातः परमस्तीति यथा चार्वाकादीनां शरीरानुर्तिदेहतपरिमाणो जीव ईश्वरो वा पाषाणदार्वादिमात्र इत्येवमभिनिवेशयुक्तं यतोऽहेतुकमुपपत्तिशून्यमहेतुकत्वादतत्त्वादतत्त्वार्थवत् यथाभूतोऽर्थस्तत्त्वार्थः सोऽस्य ज्ञेयभूतोऽस्तीति तत्त्वार्थवत् न तत्त्वार्थवदतत्त्वार्थवत्। तत एवाल्पं चाल्पविषयत्वादल्पफलत्वाद्वा तत्तामसानां प्राणिनां अविवेकिनां परिदृश्यमानमीदृशं ज्ञां हेयं तत्तामसमुदाहृतम्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yatwhich
tubut
kṛitsnavat
ekasminin single
kāryeaction
saktamengrossed
ahaitukamwithout a reason
atattvaartha
alpamfragmental
chaand
tatthat
tāmasamin the mode of ignorance
udāhṛitamis said to be
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.21
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्

परन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंमें अलग-अलग अनेक भावोंको अलग-अलग रूपसे जानता है, उस ज्ञानको तुम राजस समझो। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.23
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते

जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना राग-द्वेषके किया हुआ हो, वह सात्त्विक कहा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 22
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 22
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्

किंतु जो (ज्ञान) एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित, वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 22 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 22 का हिंदी अर्थ: "किंतु जो (ज्ञान) एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित, वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 22?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 22 translates to: "But that which clings to one single effect as if it were the whole, without reason, without any foundation in Truth, and is trivial—that is declared to be Tamasic. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 22 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। किंतु जो (ज्ञान) एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित, वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yat tu kṛitsna-vad ekasmin kārye saktam ahaitukam" mean in English?

"yat tu kṛitsna-vad ekasmin kārye saktam ahaitukam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 22. But that which clings to one single effect as if it were the whole, without reason, without any foundation in Truth, and is trivial—that is declared to be Tamasic. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.