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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 23
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते

जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना राग-द्वेषके किया हुआ हो, वह सात्त्विक कहा जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

விதிக்கப்பட்ட, பற்றற்ற, அன்போ வெறுப்போ இல்லாமல், வெகுமதிக்கு ஆசைப்படாமல் செய்யப்படும் ஒரு செயல் சாத்வீகமாக அறிவிக்கப்படுகிறது.

MalayalamIND

ആസക്തിയില്ലാത്തതും സ്നേഹമോ വിദ്വേഷമോ കൂടാതെയും പ്രതിഫലം ആഗ്രഹിക്കാതെയും ചെയ്യുന്ന ഒരു കർമ്മം സാത്വികമായി പ്രഖ്യാപിക്കപ്പെടുന്നു.

BengaliIND

যে ক্রিয়া নির্ধারিত, আসক্তিমুক্ত, প্রেম বা ঘৃণা ছাড়া এবং পুরস্কারের আকাঙ্ক্ষা ছাড়াই করা হয় তাকে সাত্ত্বিক বলে ঘোষণা করা হয়।

TeluguIND

నిర్దేశించబడిన, అనుబంధం లేని, ప్రేమ లేదా ద్వేషం లేకుండా మరియు ప్రతిఫలం కోసం కోరిక లేకుండా చేసే చర్య సాత్వికమైనదిగా ప్రకటించబడుతుంది.

GujaratiIND

જે ક્રિયા નિયુક્ત, આસક્તિથી મુક્ત, પ્રેમ કે દ્વેષ વિના અને ઈનામની ઈચ્છા વિના કરવામાં આવે છે તેને સાત્વિક જાહેર કરવામાં આવે છે.

NepaliIND

आसक्तिरहित, प्रेम वा द्वेषरहित र इनामको इच्छाविना गरिएको कर्मलाई सात्त्विक भनिन्छ।

KannadaIND

ವಿಧಿಬದ್ಧವಾದ, ಮೋಹದಿಂದ ಮುಕ್ತವಾದ, ಪ್ರೀತಿ ಅಥವಾ ದ್ವೇಷವಿಲ್ಲದೆ ಮತ್ತು ಪ್ರತಿಫಲದ ಅಪೇಕ್ಷೆಯಿಲ್ಲದ ಕ್ರಿಯೆಯನ್ನು ಸಾತ್ವಿಕವೆಂದು ಘೋಷಿಸಲಾಗುತ್ತದೆ.

PunjabiIND

ਇੱਕ ਅਜਿਹਾ ਕਰਮ ਜੋ ਨਿਸ਼ਚਿਤ, ਮੋਹ ਤੋਂ ਮੁਕਤ, ਪ੍ਰੇਮ ਜਾਂ ਨਫ਼ਰਤ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ, ਅਤੇ ਇਨਾਮ ਦੀ ਇੱਛਾ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ, ਨੂੰ ਸਾਤਵਿਕ ਘੋਸ਼ਿਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ।

MarathiIND

नियोजित, आसक्तीपासून मुक्त, प्रेम किंवा द्वेष न करता आणि पुरस्काराच्या इच्छेशिवाय केलेली क्रिया सात्त्विक असल्याचे घोषित केले जाते.

SindhiIND

اهڙو عمل جيڪو مقرر ڪيل هجي، وابستگي کان پاڪ هجي، محبت ۽ نفرت کان سواءِ ڪيو ويو هجي، ۽ ثواب جي خواهش کان سواءِ، ساٿڪ قرار ڏنو وڃي ٿو.

OdiaIND

ଏକ କାର୍ଯ୍ୟ, ଯାହା ସଂଲଗ୍ନରୁ ମୁକ୍ତ, ପ୍ରେମ କିମ୍ବା ଘୃଣା ବିନା, ଏବଂ ପୁରସ୍କାର ପାଇବାକୁ ଇଚ୍ଛା ନକରି ସଟ୍ଟଭିକ୍ ଘୋଷିତ |

MizoIND

Thiltih ruat, inzawmna nei lo, hmangaihna leh huatna tel lova tih, lawmman duhna nei lo chu Sattvic-ah puan a ni.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- नियतं सङ्गरहितम् ৷৷. सात्त्विकमुच्यते -- जिस व्यक्तिके लिये वर्ण और आश्रमके अनुसार जिस परिस्थितिमें और जिस समय शास्त्रोंने जैसा करनेके लिये कहा है? उसके लिये वह कर्म नियत हो जाता है।यहाँ नियतम् पदसे एक तो कर्मोंका स्वरूप बताया है और दूसरे? शास्त्रनिषिद्ध कर्मका निषेध किया है।सङ्गरहितम् पदका तात्पर्य है कि वह नियतकर्म कर्तृत्वाभिमानसे रहित होकर किया जाय। कर्तृत्वाभिमानसे रहित कहनेका भाव है कि जैसे वृक्ष आदिमें मूढ़ता होनेके कारण उनको कर्तृत्वका भान नहीं होता? पर उनकी भी ऋतु आनेपर पत्तोंका झड़ना? नये पत्तोंका निकलना? शाखा कटनेपर घावका मिल जाना? शाखाओंका बढ़ना? फलफूलका लगना आदि सभी क्रियाएँ समष्टि शक्तिके द्वारा अपनेआप ही होती हैं ऐसे ही इन सभी शरीरोंका बढ़नाघटना? खानापीना? चलनाफिरना आदि सभी क्रियाएँ भी समष्टि शक्तिके द्वारा अपनेआप हो रही हैं। इन क्रियाओँके साथ न अभी कोई सम्बन्ध है? न पहले कोई सम्बन्ध था और न आगे ही कोई सम्बन्ध होगा। इस प्रकार जब साधकको प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है? तो फिर उसमें कर्तृत्व नहीं रहता। कर्तृत्व न रहनेपर उसके द्वारा जो कर्म होता है? वह सङ्गरहित अर्थात् कर्तृत्वाभिमानरहित ही होता है। ,यहाँ सांख्यप्रकरणमें कर्तृत्वका त्याग मुख्य होनेसे और आगे अरागद्वेषतः कृतम् पदोंमें भी आसक्तिके त्यागकी बात आनेसे यहाँ सङ्गरहितम् पदका अर्थ कर्तृत्वअभिमानरहित लिया गया है ।अरागद्वेषतः कृतम् पदोंका तात्पर्य है कि रागद्वेषसे रहित हो करके कर्म किया जाय अर्थात् कर्मका ग्रहण रागपूर्वक न हो और कर्मका त्याग द्वेषपूर्वक न हो तथा कर्म करनेके जितने साधन (शरीर? इन्द्रियाँ? अन्तःकरण आदि) हैं? उनमें भी रागद्वेष न हो।अरागद्वेषतः पदसे वर्तमानमें रागका अभाव बताया है और अफलप्रेप्सुना पदसे भविष्यमें रागका अभाव बताया है। तात्पर्य यह है कि भविष्यमें मिलनेवाले फलकी इच्छासे रहित मनुष्यके द्वारा कर्म किया जाय अर्थात् क्रिया और पदार्थोंसे निर्लिप्त रहते हुए असङ्गतापूर्वक कर्म किया जाय तो वह सात्त्विक कहा जाता है।इस सात्त्विक कर्ममें सात्त्विकता तभीतक है? जबतक अत्यन्त सूक्ष्मरूपसे भी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है। जब प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है? तब यह कर्म अकर्म हो जाता है। सम्बन्ध -- अब राजस कर्मका वर्णन करते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

अब कर्मके तीन भेद कहे जाते हैं --, जो कर्म नियत -- नित्य है तथा सङ्ग -- आसक्तिसे रहित है और फल न चाहनेवाले पुरुषद्वारा बिना रागद्वेषके किया गया है? वह सात्त्विक कहा जाता है। जो कर्म रागसे या द्वेषसे प्रेरित होकर किया जाता है? वह रागद्वेषसे किया हुआ कहलाता है और जो उससे विपरीत है वह बिना रागद्वेषके किया हुआ है। जो कर्ता कर्मफलको चाहता है? वह कर्मफलप्रेप्सु अर्थात् कर्मफलकी तृष्णावाला होता है और जो उससे विपरीत है वह कर्मफलको न चाहनेवाला है।

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Sri Anandgiri

त्रिविधं कर्म वक्तुमनन्तरश्लोकत्रयमित्याह -- अथेति। तत्र सात्त्विकं कर्म निरूपयति -- नियतमिति।

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Sri Dhanpati

एवं ज्ञानत्रैविध्यं विभज्य कर्मत्रैविध्यं विभजन्नादौ सात्त्विक कर्मोदाहरति। नियतं नित्यमवश्यकर्तव्यतया विहितं सङ्गरहितमासक्तिवर्जितमभिनिवेशशून्यमरागद्वेषतः कृतं रागो विषयप्रेप्साकारणभूता रञ्जनात्मिका चित्तवृत्तिः तत्प्रयुक्तेन द्वेषप्रयुक्तेन च कृतं रागद्वेषतः कृतं तद्विपरीतमरागद्वेषतः कृतं फलं प्रेपसतीति फलप्रेप्सुः फलतृष्णः तद्विपरीतेनाऽफलप्रेप्सुना कर्त्रा यत्कर्म कृतं तत्सात्त्विकमुच्यते। फल्गु च लीयते चेति फलं क्रियया प्राप्यं अनात्मवस्तु तंदन्यदफलमनागन्तुकं परिपूर्णमविनाशि आत्मतत्त्वं तत्प्रेप्सुना कृतंविविदिषन्ति यज्ञेन इति श्रुत्या आत्मलाभार्थं यज्ञादेर्विनियोगादित्यन्ये। आचार्यैस्तु कामेप्सुनेत्युत्तराननुरोधक्लिष्टकल्पनाग्रस्तोऽयं पक्ष इत्यभिप्रेत्योपेक्षितः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
niyatamin accordance with scriptures
saṅgarahitam
arāgadveṣhataḥ
kṛitamdone
aphalaprepsunā
karmaaction
yatwhich
tatthat
sāttvikamin the mode of goodness
uchyateis called
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.22
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्

किंतु जो (ज्ञान) एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित, वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.24
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्

परन्तु जो कर्म भोगोंको चाहनेवाले मनुष्यके द्वारा अहंकार अथवा परिश्रमपूर्वक किया जाता है, वह राजस कहा गया है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 23
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 23
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते

जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना राग-द्वेषके किया हुआ हो, वह सात्त्विक कहा जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 23 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 23 का हिंदी अर्थ: "जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना राग-द्वेषके किया हुआ हो, वह सात्त्विक कहा जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 23?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 23 translates to: "An action that is ordained, free from attachment, done without love or hatred, and without desire for reward is declared to be Sattvic. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 23 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना राग-द्वेषके किया हुआ हो, वह सात्त्विक कहा जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "niyataṁ saṅga-rahitam arāga-dveṣhataḥ kṛitam" mean in English?

"niyataṁ saṅga-rahitam arāga-dveṣhataḥ kṛitam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 23. An action that is ordained, free from attachment, done without love or hatred, and without desire for reward is declared to be Sattvic. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.