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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 20
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्

जिस ज्ञानके द्वारा साधक सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक अविनाशी भाव-(सत्ता-) को देखता है, उस ज्ञानको तुम सात्त्विक समझो। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

எந்த ஒருவன் எல்லா உயிர்களிடத்திலும் அழியாத மெய்ப்பொருளைக் காண்கிறான், அவை எதிலும் தனித்தனியாக இல்லை - அந்த அறிவை சாத்விகமாக அறிந்துகொள்.

TeluguIND

అన్ని జీవులలో నాశనము కాని వాస్తవికతను చూడటం ద్వారా, వాటిలో దేనిలోనూ వేరుగా ఉండకూడదు - ఆ జ్ఞానాన్ని సాత్వికమని తెలుసుకోండి.

MalayalamIND

എല്ലാ ജീവികളിലും അവിനാശിയായ യാഥാർത്ഥ്യത്തെ, അവയിലൊന്നിലും വേർപെടുത്താതെ കാണുമ്പോൾ - ആ അറിവ് സാത്വികമാണെന്ന് അറിയുക.

OdiaIND

ଯାହା ଦ୍ one ାରା ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀରେ ଅବିସ୍ମରଣୀୟ ବାସ୍ତବତା ଦେଖାଯାଏ, ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କ separate ଣସିଟିରେ ପୃଥକ ନୁହେଁ - ଜାଣ ଯେ ଜ୍ଞାନ ସତ୍ୟଭିକ୍ ଅଟେ |

DogriIND

जिसदे कन्नै कोई बी सारे प्राणियें च अविनाशी यथार्थ गी दिक्खदा ऐ, उंदे च कुसै च बी बक्ख-बक्ख नेईं-उस ज्ञान गी सात्विक जानना।

BengaliIND

যার দ্বারা কেউ সমস্ত প্রাণীর মধ্যে অবিনাশী বাস্তবতা দেখে, তাদের মধ্যে আলাদা নয় - সেই জ্ঞানকে সাত্ত্বিক বলে জানুন।

BhojpuriIND

जवना से केहू सभ जीव में अविनाशी यथार्थ के देखेला, ओहमें से कवनो में अलग ना-ओह ज्ञान के सात्विक होखे के जान लीं।

MaithiliIND

जेकरा द्वारा सब जीवऽ में अविनाशी यथार्थ के देखलऽ जाय छै, कोनो भी जीव में अलग नै-ओह ज्ञान के सात्विक मानलऽ जाय ।

NepaliIND

जसद्वारा सबै प्राणीहरूमा अविनाशी वास्तविकता देख्छ, तिनीहरूमध्ये कुनैमा अलग हुँदैन- त्यो ज्ञानलाई सात्विक हुन जान्नुहोस्।

KannadaIND

ಯಾವುದರಿಂದ ಎಲ್ಲ ಜೀವಿಗಳಲ್ಲಿ ಅವಿನಾಶಿಯಾದ ಸತ್ಯವನ್ನು ನೋಡುತ್ತಾನೆ, ಅವುಗಳಲ್ಲಿ ಯಾವುದರಲ್ಲಿಯೂ ಪ್ರತ್ಯೇಕವಾಗಿ ಕಾಣುವುದಿಲ್ಲ - ಆ ಜ್ಞಾನವು ಸಾತ್ವಿಕ ಎಂದು ತಿಳಿಯಿರಿ.

MarathiIND

ज्याद्वारे सर्व प्राणिमात्रांमध्ये अविनाशी वास्तव दिसते, त्यांच्यापैकी कोणातही वेगळे नाही - ते ज्ञान सात्त्विक आहे हे जाणून घ्या.

SindhiIND

جنهن جي ذريعي انسان سڀني وجودن ۾ غير تباهي واري حقيقت کي ڏسي ٿو، انهن مان ڪنهن ۾ به الڳ نه آهي- ان علم کي ستوڪ ڄاڻو.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- सर्वभूतेषु येनैकं ৷৷. अविभक्तं विभक्तेषु -- व्यक्ति? वस्तु आदिमें जो है पन दीखता है? वह उन व्यक्ति? वस्तु आदिका नहीं है? प्रत्युत सबमें परिपूर्ण परमात्मका ही है। उन व्यक्ति? वस्तु आदिकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है क्योंकि उनमें प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है। कोई भी व्यक्ति? वस्तु आदि ऐसी नहीं है? जिसमें परिवर्तन न होता हो परन्तु अपनी अज्ञता(बेसमझी)से उनकी सत्ता दीखती है। जब अज्ञता मिट जाती है? ज्ञान हो जाता है? तब साधककी दृष्टि उस अविनाशी तत्त्वकी तरफ ही जाती है? जिसकी सत्तासे यह सब सत्तावान् हो रहा है।ज्ञान होनेपर साधककी दृष्टि परिवर्तनशील वस्तुओंको भेदकर परिवर्तनरहित तत्त्वकी ओर ही जाती है (गीता 13। 27)। फिर वह विभक्त अर्थात् अलगअलग वस्तु? व्यक्ति? परिस्थिति? घटना आदिमें विभागरहित एक ही तत्त्वको देखता है (गीता 13। 16)। तात्पर्य यह है कि अलगअलग वस्तु? व्यक्ति आदिका अलगअलग ज्ञान और यथायोग्य अलगअलग व्यवहार होते हुए भी वह इन विकारी वस्तुओंमें उस स्वतःसिद्ध निर्विकार एक तत्त्वको देखता है। उसके देखनेकी यही पहचान है कि उसके अन्तःकरणमें रागद्वेष नहीं होते।तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् -- उस ज्ञानको तू सात्त्विक जान। परिवर्तनशील वस्तुओं? वृत्तियोंके सम्बन्धसे ही इसे सात्त्विक ज्ञान कहते हैं। सम्बन्धरहित होनेपर यही ज्ञान वास्तविक बोध कहलाता है? जिसको भगवान्ने सब साधनोंसे जाननेयोग्य ज्ञेयतत्त्व बताया है -- ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते (गीता 13। 12)।मार्मिक बातसंसारका ज्ञान इन्द्रियोंसे होता है? इन्द्रियोंका ज्ञान बुद्धिसे होता है और बुद्धिका ज्ञान मैंसे होता है। वह मैं बुद्धि? इन्द्रियाँ और विषय -- इन तीनोंको जानता है। परन्तु उस मैंका भी एक प्रकाशक है? जिसमें मैंका भी भान होता है। वह प्रकाश सर्वदेशीय और असीम है? जब कि मैं एकदेशीय और सीमित है। उस प्रकाशमें जैसे मैंका भान होता है? वैसे ही तू? यह और वह का भी भान होता है। वह प्रकाश किसीका भी विषय नहीं है। वास्तवमें वह प्रकाश निर्गुण ही है परन्तु व्यक्तिविशेषमें रहनेवाला होनेसे (वृत्तियोंके सम्बन्धसे) उसे सात्त्विक ज्ञान कहते हैं।इस सात्त्विक ज्ञानको दूसरे ढंगसे इस प्रकार समझना चाहिये -- मैं? तू? यह और वह -- ये चारों ही किसी प्रकाशमें काम करते हैं। इन चारोंके अन्तर्गत सम्पूर्ण प्राणी आ जाते हैं? जो विभक्त हैं परन्तु इनका जो प्रकाशक है? वह अवभिक्त (विभागरहित) है।बोलनेवाला? मैं? उसके सामने सुननेवाला तू और पासवाला यह तथा दूरवाला वह कहा जाता है अर्थात् बोलनेवाला अपनेको मैं कहता है? सामनेवालेको तू कहता है? पासवालेको यह कहता है और दूरवालेको वह कहता है। जो तू बना हुआ था? वह मैं हो जाय तो मैं बना हुआ तू हो जायगा और यह तथा वह वही रहेंगे। इसी प्रकार यह कहलानेवाला अगर मैं बन जाय तो तू कहलानेवाला यह बन जायगा और मैं कहलानेवाला तू बन जायगा। वह परोक्ष होनेसे अपनी जगह ही रहा। अब वह कहलानेवाला मैं बन जायगा तो उसकी दृष्टिमें मैं? तू और यह कहलानेवाले सब वह हो जायँगे । इस प्रकाशमें मैं? तू? यह और वह का भान हो रहा है। दृष्टिमें चारों ही बन सकते हैं।इससे यह सिद्ध हुआ कि मैं? तू? यह और वह -- ये सब परिवर्तनशील हैं अर्थात् टिकनेवाले नहीं हैं? वास्तविक नहीं हैं। अगर वास्तविक होते तो एक ही रहते। वास्तविक तो इन सबका प्रकाशक और आश्रय है? जिसके प्रकार मैं? तू? यह और वह -- ये यारों ही एकदूसरेकी उस प्रकाशमें मैं? तू? यह और वह -- ये चारों ही नहीं हैं? प्रत्युत उसीसे इन चारोंको सत्ता मिलती है। अपनी मान्यताके कारण मैं? तू? यह? वह का तो भान होता है? पर प्रकाशकका भान नहीं होता। वह प्रकाशक सबको प्रकाशित करता है? स्वयंप्रकाशस्वरूप है और सदा ज्योंकात्यों रहता है। मैं? तू? यह और वह -- यह सब विभक्त प्राणियोंका स्वरूप है और जो वास्तविक प्रकाशक है? वह विभागरहित है। यही वास्तवमें सात्त्विक ज्ञान है।विभागवाली? परिवर्तनशील और नष्ट होनेवाली जितनी वस्तुएँ हैं? यह ज्ञान उन सबका प्रकाशक है और स्वयं भी निर्मल तथा विकाररहित है -- तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् (गीता 14। 6)। इसलिये इस ज्ञानको सात्त्विक कहा जाता है।वास्तवमें यह सात्त्विक ज्ञान प्रकाश्यकी दृष्टि(सम्बन्ध)से प्रकाशक और विभक्तकी दृष्टिसे अविभक्त कहा जाता है। प्रकाश्य और विभक्तसे रहित होनेपर तो यह निर्गुण? निरपेक्ष वास्तविक ज्ञान ही है। सम्बन्ध -- अब राजस ज्ञानका वर्णन करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

पहले ( तीन श्लोकोंद्वारा ) ज्ञानके तीन भेद कहे जाते हैं। जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य? अव्यक्तसे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त भूतोंमें एकभाव -- एक आत्मवस्तु? जो कि अपने स्वरूपसे या धर्मसे कभी क्षय नहीं होता? ऐसा अविनाशी और कूटस्थ नित्यतत्त्व देखता है। यहाँ भाव शब्द वस्तुवाचक है। तथा ( जिस ज्ञानके द्वारा ) उस आत्मतत्त्वको अलगअलग प्रत्येक शरीरमें विभागरहित अर्थात् आकाशके समान समभावसे स्थित देखता है? उस ज्ञानको अर्थात् अद्वैतभावसे आत्मसाक्षात्कार कर लेनेको तू सात्त्विक ज्ञान पूर्ण ज्ञान जान। जो द्वैतदर्शनरूप अयथार्थ ज्ञान है? वे राजसतामस हैं? अतः वे संसारका उच्छेद करनेमें साक्षात् हेतु नहीं हैं।

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Sri Anandgiri

ज्ञानादीनां प्रत्येकं त्रैविध्यं ज्ञातव्यं प्रतिज्ञाय ज्ञानत्रैविध्यार्थं श्लोकत्रयमवतारयति -- ज्ञानस्येति। तत्र सात्त्विकं ज्ञानमुपन्यस्यति -- सर्वेति। भूतानि कार्यकारणात्मकान्युपाधिजातानि? अद्वितीयमखण्डैकरसं प्रत्यगात्मभूतमबाधितं तत्त्वं ज्ञेयत्वेन विवक्षितमित्याह -- एकमिति। विवक्षितमव्ययत्वं संक्षिपति -- कूटस्थेति। प्रतिदेहमविभक्तमित्युक्तं व्यनक्ति -- विभक्तेष्विति। तज्ज्ञानमित्यादिव्याकरोति -- अद्वैतेति।

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Sri Dhanpati

तत्र ज्ञानस्य त्रैविध्यं विभजन्नादौ तस्य सात्त्विकत्वमाह -- सर्वभूतेष्वव्यक्तादिस्थावरान्तेषु विभक्तेषु देहादिभेदेन विभागवत्सु एकमद्वितीयं भावं परमार्थवस्तु सच्चिदानन्दरुपमव्ययं स्वात्मना धर्मेण वा न व्येतीत्यव्ययं कूटस्थं नित्यमविभक्तं प्रतिदेहं विभागशन्यं व्योमवन्निरन्तरं येन ज्ञानेनोपनिषत्सिद्धान्तजन्येनाद्वैतवादी पश्यति तद्द्वैतात्मदर्शनं सम्यग्ज्ञानं सात्त्विकं विद्धि विजानीहि।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sarvabhūteṣhu
yenaby which
ekamone
bhāvamnature
avyayamimperishable
īkṣhateone sees
avibhaktamundivided
vibhakteṣhuin diversity
tatthat
jñānamknowledge
viddhiunderstand
sāttvikamin the mode of goodness
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.19
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि

गुणसंख्यान (गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्न-भिन्न भेदोंकी गणना करनेवाले) शास्त्रमें गुणोंके भेदसे ज्ञान और कर्म तथा कर्ता तीन-तीन प्रकारसे ही कहे जाते हैं, उनको भी तुम यथार्थरूपसे सुनो। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.21
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्

परन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंमें अलग-अलग अनेक भावोंको अलग-अलग रूपसे जानता है, उस ज्ञानको तुम राजस समझो। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 20
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 20
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्

जिस ज्ञानके द्वारा साधक सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक अविनाशी भाव-(सत्ता-) को देखता है, उस ज्ञानको तुम सात्त्विक समझो। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ: "जिस ज्ञानके द्वारा साधक सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक अविनाशी भाव-(सत्ता-) को देखता है, उस ज्ञानको तुम सात्त्विक समझो। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 20?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 20 translates to: "That by which one sees the indestructible Reality in all beings, not separate in any of them—know that knowledge to be Sattvic. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 20 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। जिस ज्ञानके द्वारा साधक सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक अविनाशी भाव-(सत्ता-) को देखता है, उस ज्ञानको तुम सात्त्विक समझो। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sarva-bhūteṣhu yenaikaṁ bhāvam avyayam īkṣhate" mean in English?

"sarva-bhūteṣhu yenaikaṁ bhāvam avyayam īkṣhate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 20. That by which one sees the indestructible Reality in all beings, not separate in any of them—know that knowledge to be Sattvic. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.