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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 19
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि

गुणसंख्यान (गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्न-भिन्न भेदोंकी गणना करनेवाले) शास्त्रमें गुणोंके भेदसे ज्ञान और कर्म तथा कर्ता तीन-तीन प्रकारसे ही कहे जाते हैं, उनको भी तुम यथार्थरूपसे सुनो। — VaniSagar

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Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

அறிவு, செயல் மற்றும் நடிகர் குணங்களின் வேறுபாட்டின் படி, குணங்களின் (சாங்கிய தத்துவம்) மூன்று வகையானதாக மட்டுமே அறிவிக்கப்படுகிறது. இவற்றில், முறையாகக் கேளுங்கள்.

TeluguIND

గుణాల (సాంఖ్య తత్వశాస్త్రం) శాస్త్రంలో జ్ఞానం, క్రియ మరియు నటులు గుణాల భేదం ప్రకారం మూడు రకాలుగా మాత్రమే ప్రకటించబడ్డాయి. వీటిని సక్రమంగా వినండి.

KannadaIND

ಜ್ಞಾನ, ಕ್ರಿಯೆ ಮತ್ತು ನಟನನ್ನು ಗುಣಗಳ ವಿಜ್ಞಾನದಲ್ಲಿ (ಸಾಂಖ್ಯ ತತ್ತ್ವಶಾಸ್ತ್ರ) ಗುಣಗಳ ವ್ಯತ್ಯಾಸದ ಪ್ರಕಾರ ಮೂರು ವಿಧಗಳಾಗಿ ಮಾತ್ರ ಘೋಷಿಸಲಾಗಿದೆ. ಇವುಗಳಲ್ಲಿ, ಸರಿಯಾಗಿ ಕೇಳಿ.

SindhiIND

علم، عمل ۽ عمل، گنان جي سائنس (سنکيا فلسفي) ۾ صرف ٽن قسمن جا قرار ڏنل آهن، گون جي فرق جي مطابق. انهن مان، چڱيء طرح ٻڌو.

PunjabiIND

ਗੁਣਾਂ ਦੇ ਭੇਦ ਅਨੁਸਾਰ ਗਿਆਨ, ਕਿਰਿਆ ਅਤੇ ਅਭਿਨੇਤਾ ਨੂੰ ਗੁਣਾਂ ਦੇ ਵਿਗਿਆਨ (ਸਾਂਖਿਆ ਦਰਸ਼ਨ) ਵਿੱਚ ਤਿੰਨ ਕਿਸਮਾਂ ਦੇ ਹੀ ਘੋਸ਼ਿਤ ਕੀਤੇ ਗਏ ਹਨ। ਇਹਨਾਂ ਵਿੱਚੋਂ, ਵਿਧਿਵਤ ਤੌਰ ਤੇ ਸੁਣੋ.

GujaratiIND

ગુણોના વિજ્ઞાન (સાંખ્ય તત્વજ્ઞાન)માં જ્ઞાન, ક્રિયા અને અભિનય ત્રણ પ્રકારના જ ગણાય છે, ગુણોના ભેદ પ્રમાણે. આમાંથી, યોગ્ય રીતે સાંભળો.

MarathiIND

गुणांच्या शास्त्रानुसार (सांख्य तत्त्वज्ञान) ज्ञान, कृती आणि कर्ता हे गुणांच्या भेदानुसार तीन प्रकारचे असल्याचे घोषित केले आहे. यापैकी, रीतसर ऐका.

BengaliIND

গুণের বিজ্ঞানে (সাংখ্য দর্শন) জ্ঞান, কর্ম এবং অভিনেতাকে গুণের স্বাতন্ত্র্য অনুসারে তিন প্রকার বলে ঘোষণা করা হয়েছে। এর মধ্যে, যথাযথভাবে শুনুন।

NepaliIND

गुण विज्ञान (साङ्ख्य दर्शन) मा ज्ञान, कर्म र कर्म तीन प्रकारका मात्र हुन्, गुणको भेद अनुसार। यी मध्ये, विधिवत सुन्नुहोस्।

MalayalamIND

ഗുണങ്ങളുടെ (സാംഖ്യ തത്വശാസ്ത്രം) അറിവ്, പ്രവർത്തനം, നടൻ എന്നിവ ഗുണങ്ങളുടെ വ്യത്യാസമനുസരിച്ച് മൂന്ന് തരത്തിൽ മാത്രമായി പ്രഖ്യാപിക്കപ്പെടുന്നു. ഇവയിൽ, യഥാവിധി കേൾക്കുക.

AssameseIND

জ্ঞান, কৰ্ম, অভিনেতা গুণ বিজ্ঞানত (সাংখ্য দৰ্শন) গুণৰ পাৰ্থক্য অনুসৰি কেৱল তিনিবিধ বুলি ঘোষণা কৰা হৈছে। এইবোৰৰ বিষয়ে যথাযথভাৱে শুনা।

KonkaniIND

गिन्यान, कर्म, नट हें गुणशास्त्रांत (सांख्य तत्वगिन्यान) गुणांच्या भेदाप्रमाण फकत तीन तरांचें अशें जाहीर केलां. हातूंतलें वेवस्थीत आयकात.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- प्रोच्यते गुणसंख्याने -- जिस शास्त्रमें गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्नभिन्न भेदोंकी गणना की गयी है? उसी शास्त्रके अनुसार मैं तुम्हें ज्ञान? कर्म तथा कर्ताके भेद बता रहा हूँ।ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः -- पीछेके श्लोकमें भगवान्ने कर्मकी प्रेरणा होनेमें तीन हेतु बताये तथा तीन ही हेतु कर्मके बननेमें बताये। इस प्रकार कर्मसंग्रह होनेतकमें कुल छः बातें बतायीं । अब इस श्लोकमें भगवान् ज्ञान? कर्म तथा कर्ता -- इन तीनोंका विवेचन करनेकी ही बात कहते हैं। कर्मप्रेरकविभागमेंसे विवेचन करनेके लिये केवल ज्ञान लिया गया है? क्योंकि किसी भी कर्मकी प्रेरणामें पहले ज्ञान ही होता है। ज्ञानके बाद ही कार्यका आरम्भ होता है। कर्मसंग्रहविभागमेंसे केवल कर्म और कर्ता लिये गये हैं। यद्यपि कर्मके होनेमें कर्ता मुख्य है? तथापि साथमें कर्मको भी लेनेका कारण यह है कि कर्ता जब कर्म करता है? तभी कर्मसंग्रह होता है। अगर कर्ता कर्म न करे तो कर्मसंग्रह होगा ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मप्रेरणामें ज्ञान तथा कर्मसंग्रहमें कर्म और कर्ता मुख्य हैं। इन तीनों -- (ज्ञान? कर्म और कर्ता -- ) के सात्त्विक होनेसे ही मनुष्य निर्लिप्त हो सकता है? राजस और तामस होनेसे नहीं। अतः यहाँ कर्मप्रेरकविभागमें ज्ञाता और ज्ञेय को तथा कर्मसंग्रहविभागमें करण को नहीं लिया गया है।कर्मप्रेरकविभाग के ज्ञाता और ज्ञेय का विवेचन क्यों नहीं किया कारण कि ज्ञाता जब क्रियासे सम्बन्ध जोड़ता है? तब वह कर्ता कहलाता है और उस कर्ताके तीन (सात्त्विक? राजस और तामस) भेदोंके अन्तर्गत ही ज्ञाताके भी तीन भेद हो जाते हैं। परन्तु ज्ञाता जब ज्ञप्तिमात्र रहता है? तब उसके तीन भेद नहीं होते क्योंकि उसमें गुणोंका सङ्ग नहीं है। गुणोंका सङ्ग होनेसे ही उसके तीन भेद होते हैं। इसलिये वृत्तिज्ञान ही सात्त्विक? राजस तथा तामस होता है।जिसे जाना जाय? उस विषयको ज्ञेय कहते हैं। जाननेके विषय अनेक हैं? इसलिये इसके अलग भेद नहीं किये गये। परन्तु जाननेयोग्य सब विषयोंका एकमात्र लक्ष्य सुख प्राप्त करना ही रहता है। जैसे? कोई विद्या पढ़ता है? कोई धन कमाता है? कोई अधिकार पानेकी चेष्टा करता है तो इन सब विषयोंको जानने? पानेकी चेष्टाका लक्ष्य एकमात्र सुख ही रहता है। विद्या पढ़नेमें यही भाव रहता है कि ज्यादा पढ़कर ज्यादा धन कमाऊँगा? मान पाऊँगा और उनसे मैं सुखी होऊँगा। ऐसे ही हरेक कर्मका लक्ष्य परम्परासे सुख ही रहता है। इसलिये भगवान्ने ज्ञेयके तीन भेद सात्त्विक? राजस और तामस सुख के नामसे आगे (18 । 36 -- 39में) किये हैं।ऐसे ही भगवान्ने करणके भी तीन भेद नहीं किये क्योंकि इन्द्रियाँ आदि जितने भी करण हैं? वे सब साधनमात्र हैं। इसलिये उनके तीन भेद नहीं होते। परन्तु इन सभी करणोंमें बुद्धि की ही प्रधानता है क्योंकि मनुष्य करणोंसे जो कुछ भी काम करता है? उसको वह बुद्धिपूर्वक (विचारपूर्वक) ही करता है। इसलिये भगवान्ने करणके तीन भेद सात्त्विक? राजस और तामस बुद्धिके नामसे आगे (18। 30 -- 32 में) किये हैं।बुद्धिको दृढ़तासे रखनेमें धृति बुद्धिकी सहायक बनती है। ज्ञानयोगकी साधनामें भगवान्ने दो जगह (6। 25 में तथा 18। 51में) बुद्धिके साथ धृति पद भी दिया है। इससे यह मालूम देता है कि ज्ञानमार्गमें बुद्धिके साथ धृतिकी विशेष आवश्यकता है। इसलिये भगवान्ने धृतिके भी तीन भेद (18। 33 -- 35 में) बताये हैं।त्रिधैव पदमें यह भाव है कि ये भेद तीन (सात्त्विक? राजस और तामस) ही होते हैं? कम और ज्यादा नहीं होते अर्थात् न दो होते हैं और न चार होते हैं। कारण कि सत्त्व? रज और तम -- ये तीन गुण ही प्रकृतिसे उत्पन्न हैं -- सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः (गीता 14। 5)। इसलिये इन तीनों गुणोंको लेकर तीन ही भेद होते हैं।यथावत् -- गुणसंख्यानशास्त्रमें इस विषयका जैसा वर्णन हुआ है? वैसाकावैसा तुम्हें सुना रहा हूँ अपनी तरफसे कुछ कम या अधिक करके नहीं सुना रहा हूँ।श्रृणु -- इस विषयको ध्यानसे सुनो। कारण कि सात्त्विक? राजस और तामस -- इन तीनोंमेंसे सात्त्विक चीजें तो कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद करके परमात्मतत्त्वका बोध करानेवाली हैं? राजस चीजें जन्ममरण देनेवाली हैं और तामस चीजें पतन करनेवाली अर्थात् नरकों और नीच योनियोंमें ले जानेवाली हैं। इसलिये इनका वर्णन सुनकर सात्त्विक चीजोंको ग्रहण तथा राजसतामस चीजोंका त्याग करना चाहिये।तानि -- इन ज्ञान आदिका तुम्हारे स्वरूपके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम्हारा स्वरूप तो सदा निर्लेप है।अपि -- इनके भेदोंको जाननेकी भी बड़ी भारी आवश्यकता है क्योंकि इनको ठीक तरहसे जाननेपर यस्य नाहंकृतो भावो ৷৷. न हन्ति न निबध्यते (18। 17) -- इस श्लोकका ठीक अनुभव हो जायगा अर्थात् अपने स्वरूपका बोध हो जायगा। सम्बन्ध -- अब भगवान् सात्त्विक ज्ञानका वर्णन करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

क्रिया? कारक और फल सभी त्रिगुणात्मक हैं? अतः सत्त्व? रज और तम इन तीनों गुणोंके भेदसे उन सबका त्रिविध भेद बतलाना है। सो आरम्भ करते हैं --, यहाँ कर्म शब्दका अर्थ क्रिया है? कर्ताका अत्यन्त इष्ट पारिभाषिक शब्द कारकरूप कर्म नहीं। ज्ञान? कर्म और कर्ता अर्थात् क्रिया करनेवाला -- ये तीनों ही? गुणोंकी संख्या करनेवाले शास्त्रोंमें अर्थात् कपिलमुनिप्रणीत शास्त्रमें गुणोंके भेदसे यानी सात्त्विक आदि भेदसे? प्रत्येक तीनतीन प्रकारके बतलाये गये हैं। यहाँ त्रिधाके साथ एव शब्द जोड़कर यह आशय प्रकट किया गया है? कि उक्त तीनों पदार्थ गुणोंसे अतिरिक्त अन्य जातिके नहीं हैं। वह गुणोंकी संख्या करनेवाला कापिलशास्त्र यद्यपि परमार्थब्रह्मकी एकताके विषयमें (भगवान्के सिद्धान्तसे) विरुद्ध है तो भी गुणोंके भोक्ता ( जीव ) के विषयमें तो प्रमाण है ही। वे कापिलसांख्यके अनुयायी? गुण और गुणके व्यापारका निरूपण करनेमें निपुण हैं। इसलिये उनका शास्त्र भी आगे कहे हुए अभिप्रायकी स्तुति करनेके लिये प्रमाणरूपसे ग्रहण किया जाता है? सुतरां कोई विरोध नहीं है। उनको अर्थात् ज्ञान? कर्म और कर्ताको तथा गुणोंके अनुसार किये हुए उनके सात्त्विक आदि समस्त भेदोंको? तू यथावत् -- जैसा शास्त्रमें न्यायानुसार कहा है उसी प्रकार सुन अर्थात् आगे कही जानेवाली बातमें चित्त लगा।

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Sri Anandgiri

अनन्तरश्लोकदशकतात्पर्यमाह -- अथेति। ज्ञानादिप्रस्तावानन्तर्यमथशब्दार्थः। इदानीं प्रस्तुतज्ञानाद्यवान्तरभेदापेक्षायामित्यर्थः। तेषां गुणभेदात्त्रैविध्ये हेतुमाह -- गुणात्मकत्वादिति। वक्तव्यो वक्ष्यमाणश्लोकनवकेनेति शेषः। एवं स्थिते प्रथममवान्तरभेदप्रतिज्ञा क्रियत इत्याह -- इत्यारभ्यत इति। कर्तुरीप्सिततमं कर्मेति यत्तत्परिभाष्यते तन्नात्र कर्मशब्दवाच्यमित्याह -- नेति। गुणातिरेकेण विधान्तरं ज्ञानादिषु नेति निर्धारयितुमवधारणमित्याह -- गुणेति। ज्ञानादीनां प्रत्येकं गुणभेदप्रयुक्ते त्रैविध्ये प्रमाणमाह -- प्रोच्यत इति। नतु कापिलं पातञ्जलमित्यादि शास्त्रं विरुद्धार्थत्वादप्रमाणं कथमिह प्रमाणीक्रियते तत्राह -- तदपीति। विषयविशेषे विरोधेऽपि प्रकृतेऽर्थे प्रामाण्यमविरुद्धमित्यर्थः। यद्यपि कापिलादयो गुणवृत्तिविचारे गौणव्यापारस्य भोगादेर्निरूपणे च निपुणास्तथापि कथं तदीयं शास्त्रमत्र प्रमाणीकृतमित्याशङ्क्याह -- ते हीति। ज्ञानादिषु प्रत्येकमवान्तरभेदो वक्ष्यमाणोऽर्थस्तस्य तन्त्रान्तरेऽपि प्रसिद्धिकथनं स्तुतिस्तादर्थ्येन कापिलादिमतोपादानमिहोपयोगीत्यर्थः। तृतीयपादस्याविरुद्धार्थत्वं निगमयति -- नेति। यथावदित्यादिव्याचष्टे -- यथान्यायमिति।

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Sri Dhanpati

क्रियाकारकफलानामात्मसंबन्धो नास्तीति दर्शयितुं तेषां सर्वेषां त्रिगुणात्मकत्वात् सत्त्वरजस्तमोगुणभेदेन त्रैविध्यप्रतिपादमारभ्यते -- ज्ञानमिति। कर्मशब्देन क्रिया ग्राह्या वक्ष्यमाणानुरोधात्। ननु कर्तुरीप्सिततमं कर्मेति पारिभाषिकं कर्म कारकं कर्ता च क्रियाणां निर्वतर्कः गुणभेदतः सत्त्वादिगुणभेदेन त्रिधैव गुणसंख्याने प्रोच्यते। अवधारणं गुणव्यतिरेकेण विविधान्तरं ज्ञानादिषु नास्तीति निर्धारणार्थम्। गुणाः सत्त्वादयः सभ्यक्कार्यभेदेन ख्यायन्ते प्रतिपाद्यन्तेऽस्मिन्निति गुणसंख्यानं कापिलशास्त्रं यद्यपि परमार्थब्रह्मैकत्वविषये विरुध्यते तथापि तेषां कापिलानां गुणागौणव्यापारनिरुपणेऽभि युक्तात्वात्तच्छास्त्रमपि वक्ष्यमाणस्तुत्यर्थत्वेनोपादीयते। वक्ष्यमाणार्थस्य तन्त्रान्तरेऽपि प्रसिद्धकथनं स्तुतिः। तानि ज्ञानादीनि अपिशब्दात्तद्भेदजातानि च गुणभेदकृतानि श्रृणु। वक्ष्यमाणेऽर्थे मनःसमाधानं कुर्वित्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
jñānamknowledge
karmaaction
chaand
kartādoer
chaalso
tridhāof three kinds
evacertainly
guṇabhedataḥ
prochyateare declared
guṇasaṅkhyāne
yathāvat
śhṛiṇulisten
tānithem
apialso
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.18
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः

ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता -- इन तीनोंसे कर्मप्रेरणा होती है तथा करण, कर्म और कर्ता -- इन तीनोंसे कर्मसंग्रह होता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.20
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्

जिस ज्ञानके द्वारा साधक सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक अविनाशी भाव-(सत्ता-) को देखता है, उस ज्ञानको तुम सात्त्विक समझो। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 19
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 19
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि

गुणसंख्यान (गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्न-भिन्न भेदोंकी गणना करनेवाले) शास्त्रमें गुणोंके भेदसे ज्ञान और कर्म तथा कर्ता तीन-तीन प्रकारसे ही कहे जाते हैं, उनको भी तुम यथार्थरूपसे सुनो। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 19 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 19 का हिंदी अर्थ: "गुणसंख्यान (गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्न-भिन्न भेदोंकी गणना करनेवाले) शास्त्रमें गुणोंके भेदसे ज्ञान और कर्म तथा कर्ता तीन-तीन प्रकारसे ही कहे जाते हैं, उनको भी तुम यथार्थरूपसे सुनो। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 19?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 19 translates to: "Knowledge, action, and actor are declared in the science of the Gunas (Sankhya philosophy) to be of three kinds only, according to the distinction of the Gunas. Of these, hear duly. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 19 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। गुणसंख्यान (गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्न-भिन्न भेदोंकी गणना करनेवाले) शास्त्रमें गुणोंके भेदसे ज्ञान और कर्म तथा कर्ता तीन-तीन प्रकारसे ही कहे जाते हैं, उनको भी तुम यथार्थरूपसे सुनो। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "jñānaṁ karma cha kartā cha tridhaiva guṇa-bhedataḥ" mean in English?

"jñānaṁ karma cha kartā cha tridhaiva guṇa-bhedataḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 19. Knowledge, action, and actor are declared in the science of the Gunas (Sankhya philosophy) to be of three kinds only, according to the distinction of the Gunas. Of these, hear duly. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.