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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 16
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः

परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है। — VaniSagar

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TamilIND

இப்போது, ​​உண்மையாகவே, பயிற்சியில்லாத புரிதலின் காரணமாக, தனிமைப்படுத்தப்பட்ட தன் சுயத்தை முகவராகப் பார்க்கிறவன், வக்கிரமான புத்திசாலித்தனத்தைப் பார்ப்பதில்லை.

SindhiIND

هاڻي، اهڙي صورتحال هئڻ ڪري، حقيقت ۾ جيڪو، اڻ ٽر عقل جي ڪري، پنهنجي نفس کي، جيڪو علحده آهي، ايجنٽ جي حيثيت سان ڏسندو آهي، ته هو بگڙيل عقل وارو نه ڏسندو آهي.

MarathiIND

आता, असे घडत असताना, जो अप्रशिक्षित समजूतदारपणामुळे, स्वतःला, अलिप्तपणे, एजंट म्हणून पाहतो, त्याला विकृत बुद्धिमत्ता दिसत नाही.

BengaliIND

এখন, এমনটি হচ্ছে, প্রকৃতপক্ষে, যিনি একটি অপ্রশিক্ষিত বুদ্ধির কারণে, নিজের আত্মকে, যা বিচ্ছিন্ন, এজেন্ট হিসাবে দেখেন, তিনি বিকৃত বুদ্ধিমত্তা দেখতে পান না।

AssameseIND

এতিয়া, এনেকুৱা হোৱাৰ বাবে, নিশ্চয় যিজনে অপ্ৰশিক্ষিত বুজাবুজিৰ বাবে নিজৰ আত্মাক চায়, যিটো বিচ্ছিন্ন, বিকৃত বুদ্ধিমত্তাৰ এজেণ্ট হিচাপে তেওঁ দেখা নাপায়।

TeluguIND

ఇప్పుడు, అలాంటిదేమిటంటే, నిశ్చయంగా, శిక్షణ లేని అవగాహన కారణంగా, ఏకాకిగా ఉన్న తనని తాను చూసుకుంటాడు, అతను వక్రబుద్ధితో చూడలేడు.

KonkaniIND

आतां अशें आसून, खरेंच जो अप्रशिक्षीत समजुतीक लागून एकांतांत आशिल्ल्या आपल्या आत्म्याक पळयता, तो विकृत बुद्धीचो एजंट म्हणून पळयना.

MizoIND

Tunah chuan chutiang a nih lai chuan, hriatthiamna zirtir loh avanga a Mahni, inhlat tak, agent angin entu chuan a hmu lo tak zet a ni.

GujaratiIND

હવે, આવો કિસ્સો હોવાને કારણે, ખરેખર, જે, અપ્રશિક્ષિત સમજણને લીધે, તેના સ્વયંને જુએ છે, જે એકાંતમાં છે, એજન્ટ તરીકે, તે વિકૃત બુદ્ધિને જોતો નથી.

PunjabiIND

ਹੁਣ, ਅਜਿਹਾ ਹੋਣ ਕਰਕੇ, ਸੱਚਮੁੱਚ, ਜੋ ਇੱਕ ਅਣਸਿੱਖਿਅਤ ਸਮਝ ਦੇ ਕਾਰਨ, ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ, ਜੋ ਕਿ ਅਲੱਗ-ਥਲੱਗ ਹੈ, ਏਜੰਟ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਵੇਖਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਵਿਗੜੀ ਬੁੱਧੀ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਦੇਖਦਾ।

KannadaIND

ಈಗ, ನಿಜವಾಗಿ, ತರಬೇತಿಯಿಲ್ಲದ ತಿಳುವಳಿಕೆಯಿಂದಾಗಿ, ಪ್ರತ್ಯೇಕವಾಗಿರುವ ತನ್ನನ್ನು ತಾನು ಪ್ರತಿನಿಧಿಯಾಗಿ ನೋಡುವವನು, ವಿಕೃತ ಬುದ್ಧಿಮತ್ತೆಯನ್ನು ನೋಡುವುದಿಲ್ಲ.

NepaliIND

अब, यस्तो अवस्थामा, वास्तवमा, जसले, अप्रशिक्षित समझको कारणले, आफ्नो आत्मलाई हेर्छ, जो पृथक छ, एजेन्टको रूपमा, उसले विकृत बुद्धिको देख्दैन।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- तत्रैवं सति ৷৷. पश्यति दुर्मतिः -- जितने भी कर्म होते हैं? वे सब अधिष्ठान? कर्ता? करण? चेष्टा और दैव -- इन पाँच हेतुओंसे ही होते हैं? अपने स्वरूपसे नहीं। परन्तु ऐसा होनेपर भी जो पुरुष अपने स्वरूपको कर्ता मान लेता है? उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है -- अकृतबुद्धित्वात् अर्थात् उसने विवेकविचारको महत्त्व नहीं दिया है। जड और चेतनका? प्रकृति और पुरुषका जो वास्तविक विवेक है? अलगाव है? उसकी तरफ उसने ध्यान नहीं दिया है। इसलिये उसकी बुद्धिमें दोष आ गया है। उस दोषके कारण वह अपनेको कर्ता मान लेता है।यहाँ आये अकृतबुद्धित्वात् और दुर्मतिःपदोंका समान अर्थ दीखते हुए भी इनमें थोड़ा फरक है। अकृतबुद्धित्वात् पद हेतुके रूपमें आया है और दुर्मतिः पद कर्ताके विशेषणके रूपमें आया है अर्थात् कर्ताके दुर्मति होनेमें अकृतबुद्धि ही हेतु है। तात्पर्य है कि बुद्धिको शुद्ध न करनेसे अर्थात् बुद्धिमें विवेक जाग्रत् न करनेसे ही वह दुर्मति है। अगर वह विवेकको जाग्रत् करता? तो वह दुर्मति नहीं रहता।केवल (शुद्ध) आत्मा कुछ नहीं करता -- न करोति न लिप्यते (गीता 13। 31) परन्तु तादात्म्यके कारण मैं नहीं करता हूँ -- ऐसा बोध नहीं होता। बोध न होनेमें अकृतबुद्धि ही कारण है अर्थात् जिसने बुद्धिको शुद्ध नहीं किया है? वह दुर्मति ही अपनेको कर्ता मान लेता है जब कि शुद्ध आत्मामें कर्तृत्व नहीं है।केवलम् पद कर्मयोग और सांख्ययोग -- दोनोंमें ही आया है। प्रकृति और पुरुषके विवेकको लेकर कर्मयोग और सांख्ययोग चलते हैं। कर्मयोगमें सब क्रियाएँ शरीर? मन? बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा ही होती हैं? पर उनके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ता अर्थात् उनमें ममता नहीं होती। ममता न होनेसे शरीर? मन आदिकी संसारके साथ जो एकता है? वह एकता अनुभवमें आ जाती है। एकताका अनुभव होते ही स्वरूपमें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है। इसलिये कर्मयोगमें केवलैः पद शरीर? मन? बुद्धि और इन्द्रियोंके साथ दिया गया है -- कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि (गीता 5। 11)।सांख्ययोगमें विवेकविचारकी प्रधानता है। जितने भी कर्म होते हैं? वे सब पाँच हेतुओंसे ही होते हैं? अपने स्वरूपसे नहीं। परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अपनेको कर्ता मान लेता है। विवेकसे मोह मिट जाता है। मोह मिटनेसे वह अपनेको कर्ता कैसे मान सकता है अर्थात् उसे अपने शुद्ध स्वरूपका अनुभव हो जाता है। इसलिये सांख्ययोगमें केवलम् पद स्वरूपके साथ दिया गया है -- केवलम् आत्मानम्।अब इसमें एक बात विशेष ध्यान देनेकी है कि कर्मयोगमें केवल शब्द शरीर? मन आदिके साथ रहनेसे शरीर? मन? बुद्धि आदिके साथ अहम् भी संसारकी सेवामें लग जायगा तथा स्वरूप ज्योंकात्यों रह जायगा और सांख्ययोगमें स्वरूपके साथ केवल रहनेसे मैं निर्लेप हूँ? मैं शुद्धबुद्धमुक्त हूँ इस प्रकार सूक्ष्मरीतिसे अहम् की गंध रह जायगी। मैं निर्लेप रहूँ मेरेमें कर्तृत्व नहीं है -- ऐसी स्थिति बहुत कालतक रहनेसे यह अहम् भी अपनेआप गल जायगा अर्थात् अपने कारण प्रकृतिमें लीन हो जायगा। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें यह बताया कि शुद्ध स्वरूपको कर्ता देखनेवाला दुर्मति ठीक नहीं देखता। तो ठीक देखनेवाला कौन है -- इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तत्र शब्द प्रकरणसे सम्बन्ध जोड़ता है। ऐसा होनेसे? यानी पहले बतलाये हुए पाँच कारणोंद्वारा ही समस्त कर्म सिद्ध होते हैं? इसलिये? जो अज्ञानी पुरुष? वेदान्त और आचार्यके उपदेशद्वारा तथा तर्कद्वारा संस्कृतबुद्धि न होनेके कारण? उन अधिष्ठानादि पाँचों कारणोंके साथ अविद्यासे आत्माकी एकता मानकर? उनके द्वारा किये हुए कर्मोंका मैं ही कर्ता हूं इस प्रकार केवलशुद्ध आत्माको ( उन कर्मोंका ) कर्ता समझता है? ( वह वास्तवमें कुछ भी नहीं समझता )। तथा आत्माको शरीरादिसे अलग माननेवाला भी? जो शरीरादिसे अलग केवल आत्माको ही कर्ता समझता है? वह भी अकृतबुद्धि ही है। अतः असंस्कृतबुद्धि होनेके कारण वह भी वास्तवमें आत्माका या कर्मका तत्त्व नहीं समझता? यह अभिप्राय है। इसलिये वह दुर्बुद्धि है। जिसकी बुद्धि कुत्सित? विपरीत? दुष्ट और बारम्बार जन्ममरण देनेमें कारणरूप हो उसे दुर्बुद्धि कहते हैं ऐसा मनुष्य देखता हुआ भी वास्तवमें नहीं देखता। जैसे तिमिररोगवाला अनेक चन्द्र देखता है? या जैसे बालक दौड़ते हुए बादलोंमें चन्द्रमाको दौड़ता हुआ देखता है? अथवा जैसे ( पालकी आदि ) किसी सवारीपर चढ़ा हुआ मनुष्य दूसरोंके चलनेमें अपना चलना समझता है ( वैसे ही उसका समझना है )।

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Sri Anandgiri

क्रियाकर्तृत्वमधिष्ठानादीनामापाद्याविदुषस्तेष्वात्मदृष्टिमनुवदति -- तत्रेति। तत्पदपरामर्शयोग्यं प्रकृतं सर्वं कर्म प्रतीकमादाय पूर्वेण सहाक्षरार्थं कथयति -- एवमिति। अधिष्ठानादीनामुक्तरीत्या कर्तृत्वे सत्यन्यगतं कर्तृत्वमात्मनो यतोऽध्यारोप्य पश्यति अतो दुर्मतिरित्यात्मनि कर्तृत्वं पश्यन्नित्याह -- तत्रैवमिति। कर्तारमित्यादि व्याचष्टे -- तत्रेत्यादिना। तेष्वधिष्ठानादिषु तैरधिष्ठानादिभिरारोपितात्मभावैरित्यर्थः। अकर्तारमात्मानं कर्तारं पश्यतीत्यत्र प्रश्नद्वारा हेतुमाह -- कस्मादिति। ननु शास्त्रसंस्कृतबुद्धिरेवातिरिक्तात्मवादी कर्तृत्वं तस्यानुमन्यते नासौ कर्तृत्वमात्मनि पश्यन्नपि भवत्यकृतबुद्धिस्तत्राह -- योऽपीति। तस्यापि शास्त्रपूर्वकमाचार्योपदेशेन तदनुसारिन्यायैश्चानाहितबुद्धित्वादकृतबुद्धित्वं सिद्धमित्यर्थः। कौटस्थ्यमात्मनस्तत्त्वं याथात्म्यं कर्मणोऽपि तत्त्वमविद्याकृताधिष्ठानादिकृतत्वेनात्मास्पर्शित्वमात्मकर्मणोस्तत्त्वदर्शनाभावोऽतःशब्दार्थः। दुष्टत्वं स्पष्टीकर्तुं दुर्मतित्वं विवृणोति -- जननेति। अहं कर्तेत्यात्मदर्शनवतोऽपि नाविदुषस्तद्दर्शनमस्तीत्यत्र दृष्टान्तमाह -- यथेति। तिमिरोपहतचक्षुरनेकं चन्द्रं पश्यन्नपि तत्त्वतो न तं पश्यत्येवमविद्वानात्मानं कर्तारं पश्यन्नपि तत्त्वतो न तं पश्यतीत्यर्थः। अधिष्ठानादिष्वविद्यया संबद्धात्मनः स्वात्मनि तद्गतक्रियारोपे दृष्टान्तमाह -- यथावेति। अन्येषु वाहकेषु पुरुषेषु धावनकर्तृषु वाहने स्थितः स्वात्मानं प्रधावनकर्तारमविवेकादभिमन्यते तथाधिष्ठानादिषु क्रियाकर्तृषु तद्गतं स्वात्मानं कर्तारं मन्यमानो दुर्मतिरित्यर्थः।

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Sri Dhanpati

एवमधिष्ठानादीनां सर्वकर्मणि हेतुत्वमुक्त्वाऽविदुष आत्मन्यकर्तरि कर्तृत्वदृष्टिमनुवदति -- तत्रैवं सतीति। एवं यथोक्तैः पञ्चभिर्हेतुभिः सर्वस्मिन्कर्मणि निर्वर्त्ये सति केवलं शुद्धमसंहतं अकर्तारमात्मानमात्मानोऽनन्यत्वेन,कल्पितैरधिष्ठानादिभिःक्रियमाणस्य कर्मणोऽहमेव कर्तेति कर्तारं योऽकृतबुद्धित्वात् वेदान्तचार्योपदेशन्यायैरसंस्कृतबुद्धित्वात्पश्यति अतः स दुर्मतिः नैव पश्यति। योऽपि देहातिरिक्तात्मवादी तार्किकादिः केवलमकर्तारं शुद्धमात्मानं कर्तारं पश्यत्यसावप्यकृतबुद्धित्वान्न पश्यति आत्मनः। कर्मणो वा तत्त्वम्। अतो दुरमतिः कुत्सिता विपरीता दुष्टाऽस्त्रं जननमरणाप्राप्तिहेतुभूता मतिरस्येति। स पश्यन्नपि न पश्यति। यथा तैमिरिकोऽनेकचन्द्रं यथावान्येषु धावत्स्वेवासनास्थि आत्मनं धावन्तं पश्यति तथाधिष्ठानादिषु क्रियाकर्तुषु तद्गतः स्वात्मानमकर्तारं पश्यति स दुर्मतिरित्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
tatrathere
evam satiin spite of this
kartāramthe doer
ātmānamthe soul
kevalamonly
tubut
yaḥwho
paśhyatisee
akṛitabuddhitvāt
nanot
saḥthey
paśhyatisee
durmatiḥfoolish
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.15
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः

मनुष्य, शरीर वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है, उसके ये (पूर्वोक्त) पाँचों हेतु होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.17
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते

जिसका अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 16
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 16
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः

परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ: "परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 16?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 16 translates to: "Now, such being the case, verily he who, owing to an untrained understanding, looks upon his Self, which is isolated, as the agent, he of perverted intelligence does not see. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 16 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "tatraivaṁ sati kartāram ātmānaṁ kevalaṁ tu yaḥ" mean in English?

"tatraivaṁ sati kartāram ātmānaṁ kevalaṁ tu yaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 16. Now, such being the case, verily he who, owing to an untrained understanding, looks upon his Self, which is isolated, as the agent, he of perverted intelligence does not see. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.