
“जिसका अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है। — VaniSagar”
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அகங்கார எண்ணத்திலிருந்து விடுபட்டவன், எவனுடைய புத்திசாலித்தனம் நன்மை தீமையால் கறைபடவில்லையோ, அவன் இந்த மக்களைக் கொன்றாலும், அவன் கொல்லப்படுவதில்லை, செயலுக்குக் கட்டுப்படுவதில்லை.
जो अहंकारी धारणाबाट मुक्त छ, जसको बुद्धि राम्रो वा नराम्रोले कलंकित छैन, उसले यी मानिसहरूलाई मार्दा पनि उसले बध गर्दैन, न त कर्मबाट बाँधिएको छ।
اُهو جيڪو انا پرستيءَ کان آزاد آهي، جنهن جي عقل ۾ چڱائي ۽ برائيءَ جو ڪو به داغ نه آهي، جيتوڻيڪ هو اهڙن ماڻهن کي قتل ڪري ٿو، پر هو قتل نٿو ڪري ۽ نه ئي عمل جو پابند آهي.
যিনি অহংবোধ থেকে মুক্ত, যার বুদ্ধি ভাল বা মন্দ দ্বারা কলঙ্কিত হয় না, যদিও সে এই লোকদের হত্যা করে, সে বধ করে না, কর্ম দ্বারা আবদ্ধও হয় না।
అహంకార భావన నుండి విముక్తుడు, ఎవరి తెలివితేటలు మంచి చెడులచే కలుషితం కావు, అతను ఈ వ్యక్తులను సంహరించినప్పటికీ, అతను చంపడు, లేదా చర్యతో బంధించబడడు.
ಯಾರು ಅಹಂಕಾರದಿಂದ ಮುಕ್ತನಾಗಿರುತ್ತಾನೋ, ಅವನ ಬುದ್ಧಿಯು ಒಳ್ಳೆಯ ಅಥವಾ ಕೆಟ್ಟದ್ದಲ್ಲದಿದ್ದರೂ, ಅವನು ಈ ಜನರನ್ನು ಕೊಂದರೂ, ಅವನು ಕೊಲ್ಲುವುದಿಲ್ಲ, ಅಥವಾ ಅವನು ಕ್ರಿಯೆಯಿಂದ ಬಂಧಿತನಾಗಿರುವುದಿಲ್ಲ.
അഹംഭാവത്തിൽ നിന്ന് മുക്തനായ, ബുദ്ധിക്ക് നന്മയോ തിന്മയോ കലുഷിതമാകാത്തവൻ, ഈ ആളുകളെ കൊന്നാലും അവൻ കൊല്ലുന്നില്ല, പ്രവൃത്തിയാൽ ബന്ധിക്കപ്പെട്ടവനല്ല.
જે અહંકારી કલ્પનાથી મુક્ત છે, જેની બુદ્ધિ સારા કે અનિષ્ટથી કલંકિત નથી, જો કે તે આ લોકોને મારી નાખે છે, તે મારતો નથી અને તે ક્રિયાથી બંધાયેલો નથી.
जो अहंकारी कल्पनेपासून मुक्त आहे, ज्याची बुद्धी चांगल्या किंवा वाईटाने कलंकित नाही, त्याने या लोकांचा वध केला तरी तो वध करत नाही किंवा त्याला कृतीने बंधन नाही.
ਜੋ ਅਹੰਕਾਰੀ ਧਾਰਣਾ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਹੈ, ਜਿਸ ਦੀ ਬੁੱਧੀ ਚੰਗੇ ਜਾਂ ਮਾੜੇ ਨਾਲ ਗੰਦੀ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਭਾਵੇਂ ਉਹ ਇਨ੍ਹਾਂ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਮਾਰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਕਤਲ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ, ਨਾ ਹੀ ਉਹ ਕਰਮ ਨਾਲ ਬੰਨ੍ਹਦਾ ਹੈ।
ଯିଏ ଅହଂକାରିକ ଧାରଣାରୁ ମୁକ୍ତ, ଯାହାର ବୁଦ୍ଧି ଭଲ କିମ୍ବା ମନ୍ଦ ଦ୍ୱାରା କଳଙ୍କିତ ନୁହେଁ, ଯଦିଓ ସେ ଏହି ଲୋକଙ୍କୁ ହତ୍ୟା କରନ୍ତି, ସେ ହତ୍ୟା କରନ୍ତି ନାହିଁ କିମ୍ବା କାର୍ଯ୍ୟ ଦ୍ୱାରା ବନ୍ଧା ନୁହଁନ୍ତି |
जे अहंकारी धारणा सँ मुक्त अछि, जकर बुद्धि नीक-बेजाय सँ कलंकित नहि अछि, भले ओ एहि लोक केँ मारि दैत अछि, ओ नहि मारैत अछि, आ ने कर्म सँ बान्हल अछि।
Sacred Commentaries
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Swami Ramsukhdas
व्याख्या -- यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते -- जिससे मैं करता हूँ -- ऐसा अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें मेरको फल मिलेगा -- ऐसे स्वार्थभावका लेप नहीं है। इसको ऐसे समझना चाहिये -- जैसे शास्त्रविहित और शास्त्रनिषिद्ध -- ये सभी क्रियाएँ एक प्रकाशमें होती हैं और प्रकाशके ही आश्रित होती हैं परन्तु प्रकाश किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं बनता अर्थात् प्रकाश उन क्रियाओँको न करनेवाला है और न करानेवाला है। ऐसे ही स्वरूपकी सत्ताके बिना विहित और निषिद्ध -- कोई भी क्रिया नहीं होती परन्तु वह सत्ता उन क्रियाओंको न करनेवाली है और न करानेवाली है -- ऐसा जिसको साक्षात् अनुभव हो जाता है? उसमें मैं क्रियाओंको करनेवाला हूँ -- ऐसा अहंकृतभाव नहीं रहता और अमुक चीज चाहिये? अमुक चीज नहीं चाहिये अमुक घटना होनी चाहिये? अमुक घटना नहीं होनी चाहिये -- ऐसा बुद्धिमें लेप (द्वन्द्वमोह) नहीं रहता। अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेसे उसके कर्तृत्व और भोक्तृत्व -- दोनों नष्ट हो जाते हैं अर्थात् अपनेमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व -- ये दोनों ही नहीं हैं? इसका वास्तविक अनुभव हो जाता है।प्रकृतिका कार्य स्वतःस्वाभाविक ही चल रहा है? परिवर्तित हो रहा है और अपना स्वरूप केवल उसका प्रकाशक है -- ऐसा समझकर जो अपने स्वरूपमें स्थित रहता है? उसमें मैं करता हूँ ऐसा अहंकृतभाव नहीं होता क्योंकि अंहकृतभाव प्रकृतिके कार्य शरीरको स्वीकार करनेसे ही होता है। अहंकृतभाव सर्वथा मिटनेपर उसकी बुद्धिमें फल मेरेको मिले ऐसा लेप भी नहीं होता अर्थात् फलकी कामना नहीं होती।अहंकृतभाव एक मनोवृत्ति है। मनोवृत्ति होते हुए भी यह भाव स्वयं(कर्ता)में रहता है क्योंकि कर्तृत्व और अकर्तृत्व भाव स्वयं ही स्वीकार करता है।हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते -- वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको एक साथ मार डाले? तो भी वह मारता नहीं क्योंकि उसमें कर्तृत्व नहीं है और वह बँधता भी नहीं क्योंकि उसमें भोक्तृत्व नहीं है। तात्पर्य यह है कि उसका न क्रियाओंके साथ सम्बन्ध है और न फलके साथ सम्बन्ध है।वास्तवमें प्रकृति ही क्रिया और फलमें परिणत होती है। परन्तु इस वास्तविकताका अनुभव न होनेसे ही पुरुष (चेतन) कर्ता और भोक्ता बनता है। कारण कि जब अहंकारपूर्वक क्रिया होती है? तब कर्ता? करण और कर्म -- तीनों मिलते हैं और तभी कर्मसंग्रह होता है। परन्तु जिसमें अहंकृतभाव नहीं रहा? केवल सबका प्रकाशक? आश्रय? सामान्य चेतन ही रहा? फिर वह कैसे किसको मारे और कैसे किससे बँधे उसका मारना और बँधना सम्भव ही नहीं है (गीता 2। 19)।सम्पूर्ण प्राणियोंको मारना क्या है जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें लेप नहीं है -- ऐसे मनुष्यका शरीर जिस वर्ण और आश्रममें रहता है? उसके अनुसार उसके सामने जो परिस्थिति आ जाती है? उसमें प्रवृत्त होनेपर उसे पाप नहीं लगता। जैसे? किसी जीवन्मुक्त क्षत्रियके लिये स्वतः युद्धकी परिस्थिति प्राप्त हो जाय तो वह उसके अनुसार सबको मारकर भी न तो मारता है और न बँधता है। कारण कि उसमें अभिमान और स्वार्थभाव नहीं है।यहाँ अर्जुनके सामने भी युद्धका प्रसङ्ग है। इसलिये भगवान्ने हत्वापि पदसे अर्जुनको युद्धके लिये प्रेरणा की है। अपि पदका भाव हैं -- कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः (गीता 4। 20) कर्मोंमें अच्छी तरह प्रवृत्त होनेपर भी वह कुछ नहीं करता। सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते (गीता 6। 31) सर्वथा बर्ताव करता हुआ भी वह योगी मेरेमें रहता है। शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते (गीता 13। 31) शरीरमें स्थित होनेपर भी न करता है और न लिप्त होता है। तात्पर्य यह है कि कर्मोंमें साङ्गोपाङ्ग प्रवृत्त होनेके समय और जिस समय कर्मोंमें प्रवृत्त नहीं है? उस समय भी स्वरूपकी निर्विकल्पता ज्योंकीत्यों रहती है अर्थात् क्रिया करनेसे अथाव क्रिया न करनेसे स्वरूपमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता। कारण कि क्रियाविभाग प्रकृतिमें है? स्वरूपमें नहीं।वास्तवमें यह अहंभाव (व्यक्तित्व) ही मनुष्यमें भिन्नता करनेवाला है। अहंभाव न रहनेसे परमात्माके साथ भिन्नताका कोई कारण ही नहीं है। फिर तो केवल सबका आश्रय? प्रकाशक सामान्य चेतन रहता है। वह न तो क्रियाका कर्ता बनता है? और न फलका भोक्ता ही बनता है। क्रियाओंका कर्ता और फलका भोक्ता तो वह पहले भी नहीं था। केवल नाशवान् शरीरके साथ सम्बन्ध मानकर जिस अहंभावको स्वीकार किया है? उसी अहंभावसे उसमें कर्तापन और भोक्तापन आया है।अहम् दो प्रकारका होता है -- अहंस्फूर्ति और अहंकृति। गाढ़ नींदसे उठते ही सबसे पहले मनुष्यको अपने होनेपन(सत्तामात्र) का भान होता है? इसको अहंस्फूर्ति कहते हैं। इसके बाद वह अपनेमें मैं अमुक नाम? वर्ण? आश्रम आदिका हूँ -- ऐसा आरोप करता है? यही असत्का सम्बन्ध है। असत्के सम्बन्धसे अर्थात् शरीरके साथ तादात्म्य माननेसे शरीरकी क्रियाको लेकर मैं करता हूँ -- ऐसा भाव उत्पन्न होता है? इसको अहंकृति कहते हैं।अहम् को लेकर ही अपनेमें परिच्छिन्नता आती है। इसलिये अहंस्फूर्तिमें भी किञ्चित् परिच्छिन्नता (व्यक्तित्व) रह सकती है। परन्तु यह परिच्छिन्नता बन्धनकारक नहीं होती अर्थात् परिच्छिन्नता रहनेपर भी अहंस्फूर्ति दोषी नहीं होती। कारण कि अहंकृति अर्थात् कर्तृत्वके बिना अपनेमें गुणदोषका आरोप नहीं होता।,अहंकृति आनेसे ही अपनेमें गुणदोषका आरोप होता है? जिससे शुभअशुभ कर्म बनते हैं। बोध होनेपर अहंस्फूर्तिमें जो परिच्छिन्नता है? वह जल जाती है और स्फूर्तिमात्र रह जाती है। ऐसी स्थितिमें मनुष्य न मारता है और न बँधता है।न हन्ति न निबध्यते (न मारता है और न बँधता है) का क्या भाव है एक निर्विकल्पअवस्था होती है और एक निर्विकल्पबोध होता है। निर्विकल्पअवस्था साधनसाध्य है और उसका उत्थान भी होता है अर्थात् वह एकरस नहीं रहती। इस निर्विकल्पअवस्थासे भी असङ्गता होनेपर स्वतःसिद्ध निर्विकल्पबोधका अनुभव होता है। निर्विकल्पबोध साधनसाध्य नहीं है और उसमें निर्विकल्पता किसी भी अवस्थामें किञ्चिन्मात्र भी भंग नहीं होती। निर्विकल्पबोधमें कभी परिवर्तन हुआ नहीं? होगा नहीं और होना सम्भव भी नहीं। तात्पर्य है कि उस निर्विकल्पबोधमें कभी हलचल आदि नहीं होते? यही न हन्ति न निबध्यते का भाव है।अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेका उपाय क्या है क्रियारूपसे परिवर्तन केवल प्रकृतिमें ही होता है और उन क्रियाओंका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा उन कर्मोंके फलरूपसे जो पदार्थ मिलते हैं? उनका भी संयोगवियोग होता है। इस प्रकार क्रिया और पदार्थ -- दोनोंके साथ संयोगवियोग होता रहता है। संयोगवियोग होनेपर भी स्वयं तो प्रकाशकरूपसे ज्योंकात्यों ही रहता है। विवेकविचारसे ऐसा अनुभव होनेपर अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप नहीं रहता। सम्बन्ध -- ज्ञान और प्रवृत्ति (क्रिया) दोषी नहीं होते? प्रत्युत कर्तृत्वाभिमान ही दोषी होता है क्योंकि कर्तृत्वाभिमानसे ही कर्मसंग्रह होता है -- यह बात आगेके श्लोकमें बताते हैं।
Sri Harikrishnadas Goenka
तो फिर जो वास्तवमें देखता है ( ऐसा ) सुबुद्धि कौन है इसपर कहते हैं --, शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे तथा न्यायसे जिसका अन्तःकरण भली प्रकार शुद्धसंस्कृत हो गया है? ऐसे जिस पुरुषके अन्तःकरणमें मैं कर्ता हूँ इस प्रकारकी भावनाप्रतीति नहीं होती? जो ऐसा समझता है कि,अविद्यासे आत्मामें अध्यारोपित? ये अधिष्ठानादि पाँच हेतु ही समस्त कर्मोंके कर्ता हैं? मैं नहीं हूँ? मैं तो केवल उनके व्यापारोंका साक्षीमात्र प्राणोंसे रहित? मनसे रहित? शुद्ध श्रेष्ठ? अक्षरसे भी पर केवल और अक्रिय आत्मस्वरूप हूँ। तथा जिसकी बुद्धि यानी आत्माका उपाधिस्वरूप अन्तःकरण? लिप्त नहीं होता -- अनुताप नहीं करता? यानी,मैंने अमुक कार्य किया है उससे मुझे नरकमें जाना पड़ेगा इस प्रकार जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती वह सुबुद्धि है वही वास्तवमें देखता है। ऐसा ज्ञानी इन समस्त लोकोंको अर्थात् सब प्राणियोंको मारकर भी ( वास्तवमें ) नहीं मारता अर्थात् हननक्रिया नहीं करता और उसके परिणामसे अर्थात् पापके फलसे भी नहीं बँधता। पू0 -- यद्यपि यह ( ज्ञानकी ) स्तुति है? तो भी यह कहना सर्वथा विपरीत है कि मारकर भी नहीं मारता,। उ0 -- यह दोष नहीं है? क्योंकि लौकिक और पारमार्थिक इन दो दृष्टियोंकी अपेक्षासे ऐसा कहना बन सकता है। शरीर आदिमें आत्मबुद्धि करके मैं मारनेवाला हूँ ऐसा माननेवाले लौकिक मनुष्योंकी दृष्टिका आश्रय लेकर मारकर भी यह कहा है और पूर्वोक्त पारमार्थिक दृष्टिका आश्रय लेकर न मारता है और न बँधता है यह कहा है। इस प्रकार ये दोनों कथन बन सकते हैं। पू0 -- कर्तारमात्मानं केवलं तु इस कथनमें केवलशब्दका प्रयोग होनेसे यह पाया जाता है कि आत्मा,( अकेला कर्म नहीं करता? पर ) अधिष्ठान आदि अन्य हेतुओंके साथ सम्मिलित होकर निःसंदेह कर्म करता है। उ0 -- यह दोष नहीं है? क्योंकि अविक्रियस्वभाववाला होनेके कारण? आत्माका अधिष्ठानादिसे संयुक्त होना नहीं बन सकता। विकारवान् वस्तुका ही अन्य पदार्थोंके साथ संघात हो सकता है और विकारी पदार्थ ही संहत होकर कर्ता बन सकता है। निर्विकार आत्माका? न तो किसीके साथ संयोग हो सकता है और न संयुक्त होकर उसका कर्तृत्व ही बन सकता है। इसलिये ( यह समझना चाहिये कि ) आत्माका केवलत्व स्वाभाविक है? अतः यहाँ केवल शब्दका अनुवादमात्र किया गया है। आत्माका अविक्रियत्व श्रुतिस्मृति और न्यायसे प्रसिद्ध है। गीतामें भी यह विकाररहित कहलाता है,सब कर्म गुणोंसे ही किये जाते हैं आत्मा शरीरमें स्थित हुआ भी नहीं करता इत्यादि वाक्योंद्वारा अनेक बार प्रतिपादित है और मानो ध्यान करता है? मानो चेष्टा करता है इस प्रकारकी श्रुतियोंमें भी प्रतिपादित है। तथा न्यायसे भी यही सिद्ध होता है? क्योंकि आत्मतत्त्व अवयवरहित? स्वतन्त्र और विकाररहित है। ऐसा मानना ही राजमार्ग है। यदि आत्माको विकारवान् मानें तो भी इसका स्वकीय विकार ही अपना हो सकता है। अधिष्ठानादिके किये हुए कर्म आत्मकर्तृक नहीं हो सकते क्योंकि अन्यके कर्मोंको बिना किये ही अन्यके पल्ले बाँध देना उचित नहीं है। जो अविद्यासे आरोपित किये जाते हैं? वे वास्तवमें उसके नहीं होते। जैसे सीपमें आरोपित चाँदीपन सीपका नहीं होता एवं जैसे मूर्खोंद्वारा आकाशमें आरोपित की हुई तलमलीनता आकाशकी नहीं हो सकती? वैसे ही अधिष्ठानादि पाँच हेतुओंके विकार भी उनके ही हैं? आत्माके नहीं। सुतरां यह ठीक ही कहा है कि मैं कर्ता हूँ ऐसी भावनाका और बुद्धिके लेपका अभाव होनेके कारण? पूर्ण ज्ञानी न मारता है और न बँधता है। दूसरे अध्यायमें यह आत्मा न मारता है और न मारा जाता है इस प्रकार प्रतिज्ञा करके? न जायते इत्यादि हेतुयुक्त वचनोंसे आत्माका अविक्रियत्व बतलाकर? फिर वेदाविनाशिनम् इस श्लोकसे उपदेशके आदिमें विद्वान्के लिये संक्षेपमें कर्माधिकारकी निवृत्ति कहकर? जगहजगह? प्रसङ्ग लाकर बीचबीचमें जिसका विस्तार किया गया है? ऐसी कर्माधिकारकी निवृत्तिका? अब शास्त्रके अर्थका संग्रह करनेके लिये विद्वान् न मारता है और न बँधता है इस कथनसे उपसंहार करते हैं। सुतरां यह सिद्ध हुआ कि विद्वान्में देहधारीपनका अभिमान न होनेके कारण उसके अविद्याकर्तृक समस्त कर्मोंका संन्यास हो सकता है? इसलिये संन्यासियोंको अनिष्ट आदि तीन प्रकारके कर्मफल नहीं मिलते। साथ ही यह भी अनिवार्य है कि दूसरे ( कर्माधिकारी ) इससे विपरीत होते हैं। इस कारण उनको तीन प्रकारके कर्मफल ( अवश्य ) मिलते हैं। इस प्रकार यह गीताशास्त्रके अर्थका उपसंहार किया गया। ऐसा यह समस्त वेदोंके अर्थका सार? निपुणबुद्धिवाले पण्डितोंद्वारा विचारपूर्वक धारण किया जाने योग्य है। इस विचारसे हमने जगहजगह प्रकरणोंका विभाग करके? शास्त्रन्यायानुसार इस तत्त्वको दिखलाया है
Sri Anandgiri
विपरीतदृष्टेर्दुर्मतित्वं शिष्ट्वा सम्यग्दृष्टेः सुमतित्वं प्रश्नपूर्वकमाह -- कः पुनरित्यादिना। अहं कर्तेत्यात्मनि कर्तृत्वप्रत्ययाभावे कुत्र कर्तृत्वधीरित्याशङ्क्याह -- एत इति। कथं तर्हि कर्तृत्वधीरात्मनीत्याशङ्क्याधिष्ठानादीनां तद्व्यापाराणां च साक्षित्वादित्याह -- अहं त्विति। आत्मनो न स्वतोऽस्ति क्रियाशक्तिमत्त्वमित्यत्र प्रमाणमाह -- अप्राणो हीति। नापि तस्य स्वतो ज्ञानशक्तिमत्त्वमित्याह -- अमना इति। उपाधिद्वयासंबन्धे शुद्धत्वं फलितमाह -- शुभ्र इति। कारणसंबन्धादशुद्धिमाशङ्क्योक्तं -- अक्षरादिति। कार्यकारणयोरात्मास्पर्शित्वेन पार्थक्ये सद्वितीयत्वमाशङ्क्य तयोरवस्तुत्वान्मैवमित्याह -- केवल इति। जन्मादिसर्वविक्रियारहितत्वेन कौटस्थ्यमाह -- अविक्रिय इति। बुद्धिर्यस्येत्यादि व्याचष्टे -- बुद्धिरिति। नानुशायिनी नानुशयवती। न क्लेशशालिनीत्यर्थः। द्वितीयपादस्याक्षरार्थमुक्त्वा वाक्यार्थमाह -- इदमिति। पापं कर्मेदमा परामृश्यते। लोकानां प्राणसंबन्धाभावे कुतो हिंसेत्याशङ्क्याह -- प्राणिन इति। विरुद्धार्थोक्त्या स्तुतिरपि न युक्तेति शङ्कते -- नन्विति। विरोधं परिहरति -- नैष दोष इति। लौकिकदृष्टिमवष्टभ्य हत्वापीति निर्देशं विशदयति -- देहादीति। तात्त्विकीं दृष्टिमास्थाय न हन्तीत्यादि निर्देशमुपपादयति -- यथेति। नाहं कर्ता किंतु कर्तृतद्व्यापारयोः साक्षी क्रियाज्ञानशक्तिमदुपाधिद्वयविनिर्मुक्तः शुद्धः सन् कार्यकारणासंबन्धोऽद्वितीयोऽविक्रिय इत्येवं पारमार्थिकदृष्टेर्यथादर्शितत्वं द्रष्टव्यम्। हत्वापीत्येतन्न हन्तीत्यादि चोभयं दृष्टिद्वयावष्टम्भादुपपन्नमित्युपसंहरति -- तदुभयमिति। केवलमेवात्मानं कर्तारं पश्यन्दुर्मतिरित्यत्रात्मविशेषणसमर्पककेवलशब्दसामर्थ्यादात्मनो विशिष्टस्य कर्तृत्वमिति शङ्कते -- नन्विति। आत्मनो वैशिष्ट्यायोगान्न विशिष्टस्यापि कर्तृत्वमिति दूषयति -- नैष दोष इति। अविक्रियस्वाभाव्येऽपि कथमात्मनोऽसंहतत्वमित्याशङ्क्याह -- विक्रियेति। अधिष्ठानादिभिरात्मनः संहननेऽपि न कर्तृत्वमविक्रियस्य क्रियान्वयव्याघातादित्याह -- संहत्येति। संहतत्वानुपपत्तिं व्यक्तीकरोति -- नत्विति। असंहतत्वे फलितमाह -- इति नेति। कथं तर्हि केवलत्वमात्मनि केवलशब्दादुक्तं तदाह -- अत इति। अकर्तृत्वमात्मनोऽभ्युपपन्नं नास्याविक्रियत्वमुपैतीत्याशङ्क्याह -- अविक्रियत्वं चेति। तत्र स्मृतिवाक्यान्युदाहरति -- अविकार्योऽयमिति। नायं हन्ति न हन्यत इत्यादिवाक्यमादिशब्दार्थः। उक्तवाक्यानामात्माविक्रियत्वे तात्पर्यं सूचयति -- असकृदिति। निष्कलं निष्क्रियं शान्तमित्यादि वाक्यं श्रुतावादिशब्दार्थः? यानि वाक्यानि तैरात्मनोऽविक्रियत्वं दर्शितमिति योजना? न्यायतश्च तद्दर्शितमिति पूर्वेण संबन्धः। न्यायमेव दर्शयति -- निरवयवमिति। न तावेदात्मा स्वतो विक्रियते निरवयवत्वादाकाशवन्नापि परतोऽसङ्गस्याकार्यस्य पराधीनत्वायोगादित्यर्थः। किंचात्मनः स्वनिष्ठा वा,विक्रियाधिष्ठानादिनिष्ठा वा? नाद्यः स्वनिष्ठविक्रियानुपपत्तेरात्मनो दर्शितत्वादित्याशयेनाह -- विक्रियावत्त्वेति। सा चायुक्तेत्युक्तमिति शेषः। द्वितीयं दूषयति -- नेत्यादिना। अधिष्ठानादिकृतमपि कर्म तद्योगादात्मन्यागच्छतीत्याशङ्क्य तदागमनं वास्तवमाविद्यं वेति विकल्प्याद्यं दूषयति -- नहीति। द्वितीयं निरस्यति -- यत्त्विति। आत्मन्यविद्याप्रापितं कर्म नात्मीयमित्येतद्दृष्टान्ताभ्यामुपपादयति -- यथेत्यादिना। आत्मनोऽविक्रियत्वेन कर्तृत्वाभावे फलितमाह -- तस्मादिति। ननु प्रागेवात्मनोऽविक्रियत्वं प्रतिपादितं तदिह कस्मादुच्यते तत्राह -- नायमिति। शास्त्रादौ प्रतिज्ञातं हेतुपूर्वकं संक्षिप्योक्त्वा मध्ये तत्र तत्र प्रसङ्गं कृत्वा प्रसारितां कर्माधिकारनिवृत्तिमिहोपसंहरतीति संबन्धः। प्रतिज्ञातस्य हेतुनोपपादितस्यान्ते निगमनं किमर्थमित्याशङ्क्याह -- शास्त्रार्थेति। कर्माधिकारो विदुषो नेति स्थिते तस्य देहाभिमानाभावे सत्यविद्योत्थसर्वकर्मत्यागसिद्धेरनिष्टमिष्टं मिश्रं चेति त्रिविधं कर्मफलं संन्यासिनां नेति प्रागुक्तं युक्तमेवेति परमप्रकृतमुपसंहरति -- एवंचेति। ये पुनरविद्वांसो देहाभिमानिनस्तेषां त्रिविधं कर्मफलं संभवत्येवेति हेतुवचनसिद्धमर्थं निगमयति -- तद्विपर्ययाच्चेति। अधिष्ठानादिकृतं कर्म नात्मकृतमविदुषामेव कर्माधिकारो देहाभिमानित्वेन तत्त्यागायोगाद्देहाभिमानाभावात्तु विदुषां कर्माधिकारनिवृत्तिरित्युपसंहृतमर्थं संक्षिप्याह -- इत्येष इति। उक्तश्च गीतार्थो वेदार्थत्वादुपादेय इत्याह -- स एष इति। कथमयमर्थो वेदार्थोऽपि प्रतिपत्तुं शक्यते तत्राह -- निपुणेति। भाष्यकृता मानयुक्तिभ्यां विभज्यानुक्तत्वान्नास्यार्थस्योपादेयत्वमित्याशङ्क्याह -- तत्रेति।
Sri Dhanpati
कः पुनः सुमतिः यः सम्यक्पश्यतीत्यपेक्षायामाह -- यस्येति। यस्य शास्त्राचार्योपदेशन्यासंस्कृतबुद्धित्वादहंकृतोऽहंकर्तेत्येवंलक्षणो भावो भावनाप्रत्ययः एते एव पञ्चाधिष्ठानदयोऽविद्ययात्मनि कल्पिताः सर्वकर्मणां कर्तारो नाहमहं तु तद्य्वापराणां साक्षिभूतोअप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः?केवलोऽविक्रियश्चे त्येवं पश्यतोऽहंकृतो भावो नास्तीत्यर्थः। बुद्धिर्यस्य न लिप्यते बुद्धिरन्तःकरणं यस्यात्मन उफाधिभूता न लिप्यतेऽहमकार्ष तेनाहं नरकं गमिष्टामिति क्लेशशालिनी न भवतीत्यर्थः। स सुमतिः कृतबुद्धिः सम्यक् द्रष्टा इमान्प्रत्यक्षादिनानुभूयमानान् लोकान्प्राणिनो हत्वापि न हन्ति हननक्रियां न करोति कर्तृत्वाभिमानरहितत्वात्। न निंबध्यते नापि तत्कार्येण हननक्रियाफलेन संबध्यते निर्लिप्तबुद्धित्वात्। भावः सद्भावः अहंकृतोऽहमिति व्यपदेशार्हो न? अहंकारबाधेन शुद्धस्वरुपमात्रपरिशेषादिति वाहंकृतोऽहंकारस्य भावस्तत्तादात्म्यं यस्य न विवेकेन बाधितत्वादितिवेति केचित्। यस्य नाहंकृत इति समानाधिकरणे षष्ठ्यौ। ततश्च यस्य लिङ्गलक्षणस्योपाधेरहंकारात्मिकां वृत्तिमनुत्पादयतोऽहमध्यसशून्यस्वभावः सत्ता। यद्वाहमहंकृतिं करोतीत्यहंकृदन्तःकरणं यस्य संबन्धिनोऽहंकृतोऽन्तःकरणस्य न भावः न स्थितिः। अहंकृतिशून्यं यस्यान्तःकरणमित्यर्थः। तथाहमा कृतोऽहमध्यासमूलक इतियावत्। एवंविधो भावः पदार्थो ममेत्यध्यासरुपो यस्य लिङ्गात्मनो नास्तीत्युभयविधाध्यासशून्यत्वमुक्तं भवति। यस्य प्रमातुर्भावः प्रत्ययमात्रस्वरुप आत्मा नाहंकृतः अहमिव कृतोऽहंकारतादात्म्यप्रापितोऽहंकृतस्तथा न यस्य बुद्धिर्लिप्यते आत्मभावेन रञ्जिता न भवति यस्य बुद्धेर्व्यतिरिक्तमात्मानं पश्यतो बुद्धिधर्माः कर्तृत्वादयो नात्मनि प्रतीयन्ते इति कर्त्रात्मवादितार्किकनिरासः। यस्यच आत्मधर्माश्यैतन्यादयो बुद्धौ न संसृज्यन्ते इति बुद्धमेव चेतनां वदतो बौद्धस्य निरासः। चिदचितोरन्योन्यस्मिन्नन्योन्यधर्माध्यासो यस्य नास्तीत्यर्थ इत्यन्ते। यस्य बुद्धिः शास्त्राचार्यसमाहिता तैलधारेवाविच्छिन्ना न लिप्यते विजातीयप्रत्ययलेपं न प्राप्नोति स पश्यतीति स विद्वानिति पूर्वश्लोकस्य पश्यतिपदानुषङ्गेण योज्यम्। कथंपुनरयमेवंविध इति ज्ञेयमित्याशङ्क्य चेष्टालिङ्गकमनुमानमाह -- हत्वापीति। हन्धातुनात्र तदुपाया लक्ष्यन्ते अवस्थितानिति चाध्याह्नियन्ते। ततश्च हिंसोपायभूतान्पाषाणप्रहरणादीनुपायान्कृत्वावस्थितनिमाँल्लोकान्स्वयं न हन्ति अहंममाभिमानशून्यत्वादित्यर्थः। अतश्च न निबध्यते नास्य बन्धो जीवन्मुक्तत्वादिरितीतरे। हत्वापि न हन्ति न निबध्यत इतिवाक्यशेषे हेतुत्वेन प्रतीयमानस्य यस्येत्यादेः? एतत्फलभूतेन प्रतीयमानस्य हत्वापीत्यादे श्च पूर्वपरानुगुण्येन व्याख्यानं कृतवतां सर्वज्ञानां मार्गप्रदर्शकानां भाष्यकृतामुदाहृतयत्किंत्कल्पनाकरणेन न्यूनता नापादनीया। ननु यद्यपि स्तुरिरियं तथापि हत्वापि न हन्तीति विप्रतिषिद्धमुच्यामानं कथमुपद्यत इतिचेत् देहाद्यात्मबुद्य्धा हन्ताहमिति हि लोकैर्द़्दश्यते। नाहं कर्ता किंतु तद्य्वापारसाक्षी क्रियाज्ञानशक्तिमदुपाधिद्वयविनिर्मुक्तः शुद्धःसन् कार्यकारणासंबद्धोऽद्वितीयोऽविक्रिय इत्येवं हि विद्वान्पश्यति लौकिकीं पारमार्थिकीं च दृष्टिमाश्रित्य तदुभयमुपपद्यत एवेति गृहाण। तथाच यः केवलमात्मानं अकर्तारं कर्तारं पश्यति स दुर्मतिः। यस्तु यथाभूतं आत्मानमकर्तारं पश्यति स सुमतिरिति द्वयोः संपिण्डितार्थः। ननुआत्मानं केवलं तु यः इति केवलपदप्रयोगादधिष्ठानादिविशिष्टः करोत्येव आत्मा। एवंविशिष्टस्य कर्तत्वे सति केवलमात्मानं यः कर्तारं पश्यति स दर्मतिरितिचेन्न। श्रुतिदधिष्ठानादिविशिष्टः करोत्येव आत्मा। एवंविशिष्टस्य कर्तृत्वे सति केवलमात्मानं यः कर्तारं पश्यति स दुर्मतिरितिचेन्न। श्रुतिस्मृत्यादिभिरात्मनोऽविक्रियस्वभावत्वप्रतिपादनात्। तथाच श्रुतिःअसङ्गो ह्ययं पुरुषःसाक्षी चेता केवलो निर्गुणश्चअप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परःअज आत्मा महान्ध्रुवःनिष्फलं निष्क्रियंध्यायतीव लेलायतीव इत्येवमाद्या। स्मृतयश्चकथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कंअविकार्योऽयमुच्यतेप्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यतेशरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते इत्येवमाद्याः। न्यायाश्च न तावदात्मास्वतो विक्रियते निरवयवत्वादाकाशवत्। नापि परतोऽसङ्गस्याविकार्यस्य स्वतन्त्रस्य परतो विक्रियावत्त्वायोगात्। किंचात्मनो विक्रियावत्त्वाभ्युपगमे तस्य स्वनिष्ठाविक्रिया अधिष्ठानादिनिष्ठा वा। नाद्यः। श्रुत्यादिभिरात्मनोऽविक्रियत्वप्रतिपादनात्। न द्वितीयः। अन्यनिष्ठाविक्रियाऽन्यस्मिन्निति विप्रतिषिद्धत्वात्। अविद्यया गमितमपि नान्यनिष्ठत्वमन्यस्य यथा रजतत्वं न शुक्तिकायां यथा तलमलिनत्वं बाहैर्गमितमविद्यया नाकाशस्य तथाधिष्ठानादिविक्रियापि तेषामेव नात्मनस्तस्मादविक्रियस्यात्मनः केनचित्संहननं संहत्य वा कर्तत्वं संभवतीति केवलत्वामात्मनः स्वाभाविकं केवलशब्दोऽनुवदति। नायं हन्ति न हन्यत इति प्रतिज्ञाय न जायत इत्यादिना हेतुवचनेनाविक्रियत्वमुक्त्वा वेदाविनाशिनमिति विदुषः कर्माधिकारनिवृत्तिं शास्त्रादौ संक्षेपत उक्त्वा तत्रतत्र प्रसङ्गं कृत्वा प्रसारितं न हन्ति न निबध्यत इत्युपसंहरति।,एवंसति देहभृत्त्वाभिमानानुपपत्त्वाविद्याकृताशेषकर्मसंन्यासेपपत्तेः परमार्थसंन्यासिनामनिष्टादित्रिविधं कर्मणः फलं न भवतीत्युपपन्नं तद्विपर्ययश्चेतरेषां भवतीत्येतच्चापरिहार्यमित्येष गीताशास्त्रस्यार्थ उपसंहृतः। स एष वेदार्थसारो निपुणमतिभिः पण्डितैर्विचार्ये प्रतिपत्तव्य इति।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| yasya | whose |
| na ahankṛitaḥ | free from the ego of being the doer |
| bhāvaḥ | nature |
| buddhiḥ | intellect |
| yasya | whose |
| na lipyate | unattached |
| hatvā | slay |
| api | even |
| saḥ | they |
| imān | this |
| lokān | living beings |
| na | neither |
| hanti | kill |
| na | nor |
| nibadhyate | get bound |
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परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है। — VaniSagar
ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता -- इन तीनोंसे कर्मप्रेरणा होती है तथा करण, कर्म और कर्ता -- इन तीनोंसे कर्मसंग्रह होता है। — VaniSagar
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“जिसका अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है। — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 17 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 17 का हिंदी अर्थ: "जिसका अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 17?
Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 17 translates to: "He who is free from the egoistic notion, whose intelligence is not tainted by good or evil, though he slays these people, he does not slay, nor is he bound by the action. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्य" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 17 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। जिसका अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "yasya nāhankṛito bhāvo buddhir yasya na lipyate" mean in English?
"yasya nāhankṛito bhāvo buddhir yasya na lipyate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 17. He who is free from the egoistic notion, whose intelligence is not tainted by good or evil, though he slays these people, he does not slay, nor is he bound by the action. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.