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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 15
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः

मनुष्य, शरीर वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है, उसके ये (पूर्वोक्त) पाँचों हेतु होते हैं। — VaniSagar

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TamilIND

ஒருவன் தன் உடலாலும், பேச்சாலும், மனதாலும் எந்தச் செயலைச் செய்தாலும் சரியோ தவறோ, இந்த ஐந்தும்தான் அதற்குக் காரணம்.

BengaliIND

একজন ব্যক্তি তার শরীর, বাচন এবং মন দিয়ে যে কাজই করুক না কেন, সঠিক বা ভুল, এই পাঁচটি তার কারণ।

TeluguIND

ఒక వ్యక్తి తన శరీరం, వాక్కు మరియు మనస్సుతో ఏ పని చేసినా, సరైనది లేదా తప్పు అయినా, ఈ ఐదు దానికి కారణాలు.

MalayalamIND

ഒരു വ്യക്തി തൻ്റെ ശരീരം, സംസാരം, മനസ്സ് എന്നിവ ഉപയോഗിച്ച് ഏത് പ്രവൃത്തി ചെയ്താലും ശരിയോ തെറ്റോ ആകട്ടെ, ഈ അഞ്ച് കാരണങ്ങളാണ്.

OdiaIND

ଜଣେ ବ୍ୟକ୍ତି ନିଜ ଶରୀର, ବକ୍ତବ୍ୟ, ଏବଂ ମନ ସହିତ ଯାହା ବି କରେ, ଠିକ୍ କିମ୍ବା ଭୁଲ୍, ଏହି ପାଞ୍ଚଟି ଏହାର କାରଣ |

MaithiliIND

मनुष्य अपन शरीर, वाणी, मन सँ जे किछु कर्म करैत अछि, चाहे ओ सही हो वा गलत, ई पाँचटा ओकर कारण थिक |

KannadaIND

ಒಬ್ಬ ವ್ಯಕ್ತಿಯು ತನ್ನ ದೇಹ, ಮಾತು ಮತ್ತು ಮನಸ್ಸಿನಿಂದ ಯಾವುದೇ ಕ್ರಿಯೆಯನ್ನು ಮಾಡಿದರೂ ಸರಿ ಅಥವಾ ತಪ್ಪಾಗಿರಲಿ, ಈ ಐದು ಅದಕ್ಕೆ ಕಾರಣಗಳು.

PunjabiIND

ਮਨੁੱਖ ਆਪਣੇ ਤਨ, ਬਾਣੀ ਅਤੇ ਮਨ ਨਾਲ ਜੋ ਵੀ ਕਰਮ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਭਾਵੇਂ ਸਹੀ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਗਲਤ, ਇਹ ਪੰਜ ਉਸ ਦੇ ਕਾਰਨ ਹਨ।

NepaliIND

मानिसले शरीर, वाणी र मनले जुनसुकै कर्म गर्छ, चाहे सहि होस् वा गलत, यी पाँच कारण हुन्।

GujaratiIND

વ્યક્તિ પોતાના શરીર, વાણી અને મનથી જે પણ ક્રિયા કરે છે, પછી ભલે તે યોગ્ય હોય કે અયોગ્ય, આ પાંચ કારણ તેના છે.

SindhiIND

جيڪو به عمل انسان پنهنجي جسم، گفتار ۽ دماغ سان ڪندو آهي، چاهي صحيح هجي يا غلط، اهي پنج ئي سبب آهن.

MarathiIND

एखादी व्यक्ती शरीराने, वाणीने आणि मनाने कोणतीही कृती करते, मग ती योग्य असो वा अयोग्य, हे पाच कारणे असतात.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म ৷৷. पञ्चैते तस्य हेतवः -- पीछेके (चौदहवें) श्लोकमें कर्मोंके होनेमें जो अधिष्ठान आदि पाँच हेतु बताये गये हैं? वे पाँचों हेतु इन पदोंमें आ जाते हैं जैसे -- शरीर पदमें अधिष्ठान आ गया? वाक् पदमें बहिःकरण और मन पदमें अन्तःकरण आ गया? नरः पदमें कर्ता आ गया? और प्रारभते पदमें सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी चेष्टा आ गयी। अब रही दैव की बात। यह दैव अर्थात् संस्कार अन्तःकरणमें ही रहता है परन्तु उसका स्पष्ट रीतिसे पता नहीं लगता। उसका पता तो उससे उत्पन्न हुई वृत्तियोंसे और उसके अनुसार किये हुए कर्मोंसे ही लगता है।मनुष्य शरीर? वाणी और मनसे जो कर्म आरम्भ करता है अर्थात् कहीं शरीरकी प्रधानतासे? कहीं वाणीकी प्रधानतासे और कहीं मनकी प्रधानतासे जो कर्म करता है? वह चाहे न्याय्य -- शास्त्रविहित हो? चाहे विपरीत, -- शास्त्रविरुद्ध हो? उसमें ये (पूर्वश्लोकमें आये) पाँच हेतु होते हैं।शरीर? वाणी और मन -- इन तीनोंके द्वारा ही सम्पूर्ण कर्म होते हैं। इनके द्वारा किये गये कर्मोंको ही कायिक? वाचिक और मानसिक कर्मकी संज्ञा दी जाती है। इन तीनोंमें अशुद्धि आनेसे ही बन्धन होता है। इसीलिये इन तीनों(शरीर? वाणी और मन) की शुद्धिके लिये सत्रहवें अध्यायके चौदहवें? पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें क्रमशः कायिक? वाचिक और मानसिक तपका वर्णन किया गया है। तात्पर्य यह है कि शरीर? वाणी और मनसे कोई भी शास्त्रनिषिद्ध कर्म न किया जाय? केवल शास्त्रविहित कर्म ही किये जायँ? तो वह तप हो जाता है। सत्रहवें अध्यायके ही सत्रहवें श्लोकमें अफलाकाङ्क्षिभिः पद देकर यह बताया है कि निष्कामभावसे किया हुआ तप सात्त्विक होता है। सात्त्विक तप बाँधनेवाला नहीं होता? प्रत्युत मुक्ति देनेवाला होता है। परन्तु राजसतामस तप बाँधनेवाले होते हैं।इन शरीर? वाणी आदिको अपना समझकर अपने लिये कर्म करनेसे ही इनमें अशुद्धि आती है? इसलिये इनको शुद्ध किये बिना केवल विचारसे बुद्धिके द्वारा सांख्यसिद्धान्तकी बातें तो समझमें आ सकती हैं परन्तु कर्मोंके साथ मेरा किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है -- ऐसा स्पष्ट बोध नहीं हो सकता। ऐसी हालतमें साधक शरीर आदिको अपना न समझे और अपने लिये कोई कर्म न करे तो वे शरीरादि बहुत जल्दी शुद्ध हो जायँगे अतः चाहे कर्मयोगकी दृष्टिसे इनको शुद्ध करके इनसे सम्बन्ध तोड़ ले? चाहे सांख्ययोगकी दृष्टिसे प्रबल विवेकके द्वारा इनसे सम्बन्ध तोड़ ले। दोनों ही साधनोंसे प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ अपने माने हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और वास्तविक तत्त्वका अनुभव हो जाता है।जिस समष्टिशक्तिसे संसारमात्रकी क्रियाएँ होती हैं? उसी समष्टिशक्तिसे व्यष्टि शरीरकी क्रियाएँ भी स्वाभाविक होती हैं। विवेकको महत्त्व न देनेके कारण स्वयं उन क्रियाओंमेंसे खानापीना? उठनाबैठना? सोनाजगना आदि जिन क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है? वहाँ कर्मसंग्रह होता है अर्थात् वे क्रियाएँ बाँधनेवाली हो जाती हैं। परन्तु जहाँ स्वयं अपनेको कर्ता नहीं मानता? वहाँ कर्मसंग्रह नहीं होता। वहाँ तो केवल क्रियामात्र होती है। इसलिये वे क्रियाएँ फलोत्पादक अर्थात् बाँधनेवाली नहीं होतीं। जैसे? बचपनसे जवान होना? श्वासका आनाजाना? भोजनका पाचन होना तथा रस आदि बन जाना आदि क्रियाएँ बिना कर्तृत्वाभिमानके प्रकृतिके द्वारा स्वतःस्वाभाविक होती हैं और उनका कोई कर्मसंग्रह अर्थात् पापपुण्य नहीं होता। ऐसे ही कर्तृत्वाभिमान न रहनेपर सभी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं -- ऐसा स्पष्ट अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध -- भगवान्ने सांख्यसिद्धान्त बतानेके लिये जो उपक्रम किया है? उनमें कर्मोंके होनेमें पाँच हेतु बतानेका क्या आशय है -- इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

मन? वाणी और शरीरसे अर्थात् इन तीनोंके द्वारा मनुष्य जो कुछ न्याययुक्त -- धर्ममयशास्त्रीय अथवा धर्मविरुद्ध -- अशास्त्रीय कर्म करता है? उन सबके ये उपर्युक्त पाँच हेतु यानी कारण हैं। जीवनके लिये जो कुछ आँख खोलनेमूँदने आदिकी भी चेष्टाएँ की जाती हैं? वे भी? पहले किये हुए पुण्य और पापका ही परिणाम हैं। अतः न्याय और विपरीत ( अन्याय ) के ग्रहणसे ऐसी समस्त चेष्टाओंका भी ग्रहण हो जाता,है। पू0 -- जब कि अधिष्ठानादि ही समस्त कर्मोंके कारण हैं? तब यह कैसे कहा जाता है कि मन? वाणी और शरीरसे कर्म करता है उ0 -- यह दोष नहीं है। विहित और निषेधरूप सारे कर्म शरीर? वाणी और मन इन्हीं तीनोंकी प्रधानतासे होनेवाले हैं? तथा देखनासुनना आदि जीवननिमित्तक चेष्टाएँ भी उन्हीं कर्मोंकी अङ्गभूत हैं? इसलिये समस्त कर्मोंको तीन भागोंमें बाँटकर ऐसा कहते हैं कि जो कुछ भी शरीर आदिद्वारा कर्म करता है ( क्योंकि ) फलभोगके समय भी शरीर आदि प्रधान कारणोंद्वारा ही फल भोगा जाता है। सुतरां उपर्युक्त अधिष्ठानादि पाँच कारणोंकी हेतुता ठीक है? इसमें विरोध नहीं है।

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Sri Anandgiri

पञ्चानामधिष्ठानादीनामुक्तानां सर्वकर्मसिद्ध्यर्थत्वं स्फुटयति -- शरीरेति। ननु जीवनकृतं निमेषोन्मेषादिकर्मान्तरं साधारणमस्ति तत्कथं राशिद्वयकरणमिति तत्राह -- यच्चेति। अधिष्ठानादीनां कर्ममात्रहेतुत्वं प्रतिज्ञाय शारीरादित्रिविधकर्महेतुत्वोक्तिरयुक्तेति शङ्कते -- नन्विति। पूर्वापरविरोधं परिहरति -- नैष दोष इति। ननु जीवनकृतानि स्वाभाविकानि कर्माणि दर्शनादीनि विधिनिषेधबाह्यत्वान्न देहादिनिर्वर्त्यानीत्याशङ्क्याह -- तदङ्गतयेति। तस्य देहादित्रयस्य प्रधानस्याङ्गं चक्षुरादि तन्निष्पाद्यत्वेन,जीवनकृतं दर्शनादि प्रधानकर्मण्यन्तर्भूतमिति त्रैविध्यमविरुद्धमित्यर्थः। देहाद्यारम्भे त्रिविधे कर्मणि सर्वकर्मान्तर्भावेऽपि कथं पञ्चानामेवाधिष्ठानादीनां तत्र हेतुत्वं फलोपभोगकाले कारणान्तरापेक्षासंभवादित्याशङ्क्य जन्मकालभाविनो भोगकालभाविनश्च सर्वस्य कारणस्य तेष्वेवान्तर्भावान्मैवमित्याह -- फलेति।

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Sri Dhanpati

पञ्चानां स्वरुपमुक्त्वा कर्महेतुत्वमाह -- शरीरेति। यत्कर्म न्याय्यं वा धर्म्यं शास्त्रीयं विपरीतं वाऽधर्म्यमशास्त्रीयं य़च्चापि। निमिषितचेष्टादिजीवनहेतुः तदपि पर्वकृतधर्मादेरेव कार्यमिति न्याय्यविपरीतयोर्ग्रहणेन ग्राह्यं यज्ञ्याय्यादि कर्म शरीरवाङ्ग्नोभिस्त्रिर्भिर्नरः प्रारभ्ते निर्वर्तयति यस्य सर्वसस्यैव कर्मणः पञ्चैते यथोक्ता अधिष्ठानादयो हेतवः कारणानि। ननु पञ्चैतानीत्यादिनाधिष्ठानादीनि सर्वकर्मणां निवर्तकान्युक्तानि अत्रतु शरीरवाङ्गनोभिः कर्म प्रारभत इत्युक्तमतः पूर्वापरविरोध इतिचेत्। नैष दोषः। शरीराद्यारभ्ये त्रिविधे कर्मणि पञ्चानामधिष्ठानादीनां हेतुत्वस्तय विवक्षणात् दर्शनश्रवणादि च जीवनलक्षणत्रिविधकर्मण्येवान्तर्भवतीति त्रिधैव राशीकृतमुच्यते। ननु फलोपभोगकाले कारणान्तरापेक्षासंभवात्कथं पञ्चानामेवाधिष्ठानादीनां तत्र हेतुत्वमितिचेत् अपेक्षितस्य सर्वस्यापि कारणस्यैतेष्वेवान्तर्भावात्पञ्चानां हेतुत्वं न विरुध्यते।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śharīravāk
yatwhich
karmaaction
prārabhateperforms
naraḥa person
nyāyyamproper
or
viparītamimproper
or
pañchafive
etethese
tasyatheir
hetavaḥfactors
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.14
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्

इसमें (कर्मोंकी सिद्धिमें) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकारके करण एवं विविध प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.16
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः

परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 15
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 15
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः

मनुष्य, शरीर वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है, उसके ये (पूर्वोक्त) पाँचों हेतु होते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ: "मनुष्य, शरीर वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है, उसके ये (पूर्वोक्त) पाँचों हेतु होते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 15?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 15 translates to: "Whatever action a person performs with their body, speech, and mind, whether right or wrong, these five are its causes. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 15 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। मनुष्य, शरीर वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है, उसके ये (पूर्वोक्त) पाँचों हेतु होते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śharīra-vāṅ-manobhir yat karma prārabhate naraḥ" mean in English?

"śharīra-vāṅ-manobhir yat karma prārabhate naraḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 15. Whatever action a person performs with their body, speech, and mind, whether right or wrong, these five are its causes. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.