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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 14
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्

इसमें (कर्मोंकी सिद्धिमें) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकारके करण एवं विविध प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है। — VaniSagar

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TamilIND

உடல், செய்பவர், பல்வேறு புலன்கள், பல்வேறு வகையான பல்வேறு செயல்பாடுகள் மற்றும் தலைமை தெய்வம்-ஐந்தாவது.

PunjabiIND

ਸਰੀਰ, ਕਰਤਾ, ਵੱਖ-ਵੱਖ ਇੰਦਰੀਆਂ, ਵੱਖ-ਵੱਖ ਕਿਸਮਾਂ ਦੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਕਾਰਜ, ਅਤੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਦੇਵਤਾ-ਪੰਜਵਾਂ।

MarathiIND

शरीर, कर्ता, विविध इंद्रिये, विविध प्रकारची विविध कार्ये, आणि प्रमुख देवता - पाचवा.

DogriIND

शरीर, कर्ता, बक्ख-बक्ख इंद्रियां, बक्ख-बक्ख किस्म दे बक्ख-बक्ख कम्म, ते अध्यक्ष देवता—पंजवां।

MizoIND

Taksa, titu, hriatna chi hrang hrang, hnathawh chi hrang hrang, leh kaihhruai pathian—a pangana.

NepaliIND

शरीर, कर्ता, विभिन्न इन्द्रिय, विभिन्न प्रकारका विभिन्न कार्यहरू, र अध्यक्ष देवता - पाँचौं।

KannadaIND

ದೇಹ, ಮಾಡುವವನು, ವಿವಿಧ ಇಂದ್ರಿಯಗಳು, ವಿವಿಧ ರೀತಿಯ ವಿವಿಧ ಕಾರ್ಯಗಳು ಮತ್ತು ಪ್ರಧಾನ ದೇವತೆ-ಐದನೆಯದು.

MalayalamIND

ശരീരം, ചെയ്യുന്നവൻ, വിവിധ ഇന്ദ്രിയങ്ങൾ, വിവിധ തരത്തിലുള്ള വിവിധ പ്രവർത്തനങ്ങൾ, അധിപനായ ദേവൻ - അഞ്ചാമത്തേത്.

BengaliIND

দেহ, কর্তা, বিভিন্ন ইন্দ্রিয়, বিভিন্ন প্রকারের বিভিন্ন কাজ, এবং প্রধান দেবতা - পঞ্চম।

TeluguIND

శరీరం, కర్త, వివిధ ఇంద్రియాలు, వివిధ రకాలైన వివిధ విధులు మరియు అధిష్టానం-ఐదవది.

GujaratiIND

શરીર, કર્તા, વિવિધ ઇન્દ્રિયો, વિવિધ પ્રકારનાં કાર્યો, અને પ્રમુખ દેવતા - પાંચમો.

SindhiIND

جسم، ڪم ڪندڙ، مختلف حواس، مختلف قسمن جا مختلف ڪم، ۽ صدارتي ديوتا - پنجون.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- अधिष्ठानम् -- शरीर और जिस देशमें यह शरीर स्थित है? वह देश -- ये दोनों अधिष्ठान हैं।कर्ता -- सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृति और प्रकृतिके कार्योंके द्वारा ही होती हैं। वे क्रियाएँ चाहे समष्टि हों? चाहे व्यष्टि हों परन्तु उन क्रियाओँका कर्ता स्वयं नहीं है। केवल अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अर्थात् जिसको चेतन और जडका ज्ञान नहीं है -- ऐसा अविवेककी पुरुष ही जब प्रकृतिसे होनेवाली क्रियाओंको अपनी मान लेता है? तब वह कर्ता बन जाता है । ऐसा कर्ता ही कर्मोंकी सिद्धिमें हेतु बनता है।करणं च पृथग्विधम् -- कुल तेरह करण हैं। पाणि? पाद? वाक्? उपस्थ और पायु -- ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ और श्रोत्र? चक्षु? त्वक्? रसना और घ्राण -- ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ -- ये दस बहिःकरण हैं तथा मन? बुद्धि और अहंकार -- ये तीन अन्तःकरण हैं।विविधाश्च पृथक्चेष्टाः -- उपर्युक्त तेरह करणोंकी अलगअलग चेष्टाएँ होती हैं जैसे -- पाणि (हाथ) -- आदानप्रदान करना? पाद (पैर) -- आनाजाना? चलनाफिरना? वाक् -- बोलना? उपस्थ -- मूत्रका त्याग करना? पायु (गुदा) -- मलका त्याग करना? श्रोत्र -- सुनना? चक्षु -- देखना? त्वक् -- स्पर्श करना? रसना -- चखना? घ्राण -- सूँघना? मन -- मनन करना? बुद्धि -- निश्चय करना और अहंकार -- मैं ऐसा हूँआदि अभिमान करना।दैवं चैवात्र पञ्चमम् -- कर्मोंकी सिद्धिमें पाँचवें हेतुका नाम दैव है। यहाँ दैव नाम संस्कारोंका है। मनुष्य जैसा कर्म करता है? वैसा ही संस्कार उसके अन्तःकरणपर पड़ता है। शुभकर्मका शुभ संस्कार पड़ता है और अशुभकर्मका अशुभ संस्कार पड़ता है। वे ही संस्कार आगे कर्म करनेकी स्फुरणा पैदा करते हैं। जिसमें जिस कर्मका संस्कार जितना अधिक होता है? उस कर्ममें वह उतनी ही सुगमतासे लग सकता है और जिस कर्मका विशेष संस्कार नहीं है? उसको करनेमें उसे कुछ परिश्रम पड़ सकता है। इसी प्रकार मनुष्य सुनता है? पुस्तकें पढ़ता है और विचार भी करता है तो वे भी अपनेअपने संस्कारोंके अनुसार ही करता है। तात्पर्य है कि मनुष्यके अन्तःकरणमें शुभ और अशुभ -- जैसे संस्कार होते हैं? उन्हींके अनुसार कर्म करनेकी स्फुरणा होती है।इस श्लोकमें कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु बताये गये हैं -- अधिष्ठान? कर्ता? करण? चेष्टा और दैव। इसका कारण यह है कि आधारके बिना कोई भी काम कहाँ किया जायगा इसलिये अधिष्ठान पद आया है। कर्ताके बिना क्रिया कौन करेगा इसलिये कर्ता पद आया है। क्रिया करनेके साधन (करण) होनेसे ही तो कर्ता क्रिया करेगा? इसलिये करण पद आया है। करनेके साधन होनेपर भी क्रिया नहीं की जायगी तो कर्मसिद्धि कैसे होगी इसलिये चेष्टा पद आया है। कर्ता अपनेअपने संस्कारोंके अनुसार ही क्रिया करेगा? संस्कारोंके विरुद्ध अथवा संस्कारोंके बिना क्रिया नहीं कर सकेगा? इसलिये दैव पद आया है। इस प्रकार इन पाँचोंके होनेसे ही कर्मसिद्धि होती है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

वे ( पाँच कारण ) कौनसे हैं सो बतलाते हैं --, अधिष्ठान -- इच्छाद्वेष? सुखदुःख और ज्ञान आदिकी अभिव्यक्तिका आश्रय शरीर? कर्ता -- उपाधिस्वरूप भोक्ता जीव? भिन्नभिन्न प्रकारके कारण -- शब्दादि विषयोंको ग्रहण करनेवाले श्रोत्रादि अलगअलग बारह करण? नाना प्रकारकी चेष्टाएँ -- श्वासप्रश्वास आदि अलगअलग वायुसम्बन्धी क्रियाएँ और इन चारोंके साथ पाँचवाँ -- पाँचकी संख्याको पूर्ण करनेवाला कारण दैव है। अर्थात् चक्षु आदि इन्द्रियोंके अनुग्राहक सूर्यादि देव हैं।

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Sri Anandgiri

कर्मार्थान्यधिष्ठानादीनि मानमूलत्वाज्ज्ञेयानीत्युक्तमिदानीं प्रश्नपूर्वकं विशेषतस्तानि निर्दिशति -- कानीत्यादिना। प्रतीकमादाय -- व्याकरोति -- अधिष्ठानमिति। उपाधिलक्षणो बुद्ध्यादिरुपाधिस्तल्लक्षणस्तत्स्वभावो बुद्ध्याद्यनुविधायी तद्धर्मानात्मनि पश्यन्नुपहितस्तत्प्रधान इत्यर्थः। तत्र कार्यलिङ्गकमनुमानं सूचयति -- शब्दादीति। ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्च? पञ्च कर्मेन्द्रियाणि मनोबुद्धिश्चेति द्वादशसंख्यत्वम्। चेष्टाया विविधत्वान्नानाप्रकारत्वं तदेव स्पष्टयति -- वायवीया इति। पृथक्त्वमसंकीर्णत्वम्। नहि प्राणापानादिचेष्टानां मिथः संकरोस्ति। दैवमेवेति विशदयति -- आदित्यादीति।

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Sri Dhanpati

कानि तानीत्यपेक्षायामाह -- अधिष्ठानं इच्छोद्वेषसुखदुःखज्ञानादीनामभिव्यक्तेराश्रयो देहः। तथा कर्ता उपाधिलक्षणो बुद्य्धाद्युपाध्यनुविधायी तद्धर्मानात्मनि पश्यन्नुपहित उपाधिप्रधानो भोक्ता। करकणं च श्रोत्रादिशब्दाद्युपलब्धये पृथग्विधं नानाप्रकारं ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि पञ्च मनोबुद्धिश्चेति द्वादशसंख्यं। विविधाश्च पृथक् चेष्टाः वायवीयाः प्राणपानाद्याः। अत्र चतुर्षु दैवमेव पञ्चमं चक्षुराद्यनुग्राहकमादित्यादिदैवं सर्वप्रेरकोऽन्तर्यामीति त्वात्मनः कर्तृत्वव्यावृत्तये परमात्मनः कर्तृत्वप्रतिपादनमयुक्तमित्यभिफ्रेत्याचार्यैर्न प्रदर्शितम्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
adhiṣhṭhānamthe body
tathāalso
kartāthe doer (soul)
karaṇamsenses
chaand
pṛithakvidham
vividhāḥmany
chaand
pṛithakdistinct
cheṣhṭāḥefforts
daivamDivine Providence
cha eva atrathese certainly are (causes)
pañchamamthe fifth
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.13
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्

हे महाबाहो ! कर्मोंका अन्त करनेवाले सांख्यसिद्धान्तमें सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके लिये ये पाँच कारण बताये गये हैं, इनको तू मेरेसे समझ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.15
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः

मनुष्य, शरीर वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है, उसके ये (पूर्वोक्त) पाँचों हेतु होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 14
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 14
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्

इसमें (कर्मोंकी सिद्धिमें) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकारके करण एवं विविध प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 14 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 14 का हिंदी अर्थ: "इसमें (कर्मोंकी सिद्धिमें) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकारके करण एवं विविध प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 14?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 14 translates to: "The body, the doer, the various senses, the different functions of various kinds, and the presiding deity—the fifth. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 14 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। इसमें (कर्मोंकी सिद्धिमें) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकारके करण एवं विविध प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "adhiṣhṭhānaṁ tathā kartā karaṇaṁ cha pṛithag-vidham" mean in English?

"adhiṣhṭhānaṁ tathā kartā karaṇaṁ cha pṛithag-vidham" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 14. The body, the doer, the various senses, the different functions of various kinds, and the presiding deity—the fifth. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.