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Sudarshana Chakra
Adhyay 16, Shlok 8
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्

वे कहा करते हैं कि संसार असत्य, अप्रतिष्ठित और बिना ईश्वरके अपने-आप केवल स्त्री-पुरुषके संयोगसे पैदा हुआ है। इसलिये काम ही इसका कारण है, और कोई कारण नहीं है। — VaniSagar

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PunjabiIND

ਉਹ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ, "ਇਹ ਬ੍ਰਹਿਮੰਡ ਸੱਚ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ, ਨੈਤਿਕ ਆਧਾਰ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ, ਪਰਮਾਤਮਾ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ, ਆਪਸੀ ਮਿਲਾਪ ਦੁਆਰਾ ਪੈਦਾ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ, ਇਸ ਦੇ ਕਾਰਨ ਵਾਸਨਾ ਨਾਲ ਹੈ, ਹੋਰ ਕੀ ਹੈ?

TeluguIND

వారు ఇలా అంటారు, "ఈ విశ్వం సత్యం లేనిది, నైతిక ఆధారం లేనిది, భగవంతుడు లేనిది, పరస్పర కలయికతో, కామం కారణంగా ఏర్పడింది; ఇంకేముంది?

KannadaIND

ಅವರು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ, "ಈ ಬ್ರಹ್ಮಾಂಡವು ಸತ್ಯವಿಲ್ಲದೆ, ನೈತಿಕ ಆಧಾರವಿಲ್ಲದೆ, ದೇವರಿಲ್ಲದೆ, ಪರಸ್ಪರ ಸಮ್ಮಿಲನದಿಂದ ಉಂಟಾಗುತ್ತದೆ, ಅದರ ಕಾರಣ ಕಾಮವಾಗಿದೆ; ಇನ್ನೇನು?

GujaratiIND

તેઓ કહે છે, “આ બ્રહ્માંડ સત્ય વિનાનું છે, નૈતિક આધાર વિનાનું છે, ઈશ્વર વિનાનું છે, પરસ્પર મિલનથી ઉત્પન્ન થયેલું છે, વાસનાથી તેનું કારણ છે; બીજું શું?

MalayalamIND

അവർ പറയുന്നു, "ഈ പ്രപഞ്ചം സത്യവും ധാർമ്മിക അടിസ്ഥാനവുമില്ലാത്തതും ദൈവവുമില്ലാത്തതും പരസ്പര ഐക്യത്താൽ ഉളവാക്കിയതും കാമത്തെ അതിൻ്റെ കാരണമാക്കുന്നതും ആണ്; മറ്റെന്താണ്?

TamilIND

அவர்கள் கூறுகிறார்கள், "இந்தப் பிரபஞ்சம் உண்மையற்றது, தார்மீக அடிப்படையின்றி, கடவுள் இல்லாதது, பரஸ்பர ஒற்றுமையால், காமத்தை அதன் காரணமாகக் கொண்டது; வேறு என்ன?

NepaliIND

तिनीहरू भन्छन्, "यो ब्रह्माण्ड सत्यविहीन छ, नैतिक आधारविहीन छ, ईश्वरविहीन छ, आपसी मिलनबाट ल्याइएको छ, वासनाले यसको कारण छ, अरू के छ?

SindhiIND

چوندا آهن ته ”هي ڪائنات سچائي کان سواءِ آهي، ڪنهن اخلاقي بنياد کان سواءِ، ڪنهن خدا کان سواءِ، هڪ ٻئي جي اتحاد سان، خواهشن سان ان جو سبب بڻيل آهي، ٻيو ڇا آهي؟

BengaliIND

তারা বলে, "এই মহাবিশ্ব সত্যহীন, নৈতিক ভিত্তিহীন, ঈশ্বর ছাড়া, পারস্পরিক মিলনের দ্বারা সৃষ্ট, তার কারণ হিসাবে লালসা, আর কি?

MarathiIND

ते म्हणतात, "हे विश्व सत्याशिवाय, नैतिक आधार नसलेले, ईश्वराशिवाय, परस्पर मिलनातून निर्माण झालेले, वासनेने त्याचे कारण आहे, दुसरे काय?

OdiaIND

ସେମାନେ କୁହନ୍ତି, "ଏହି ବ୍ରହ୍ମାଣ୍ଡ ସତ୍ୟ ବିନା, ନ moral ତିକ ଭିତ୍ତି ବିନା, ଭଗବାନଙ୍କ ବିନା, ପାରସ୍ପରିକ ଏକତା ଦ୍ brought ାରା ଆଣିଛି, ଲୋଭ ସହିତ ଏହାର କାରଣ ଅଟେ; ଆଉ କ’ଣ?

MizoIND

Anni chuan, "He khawvel hi thutak nei lo, nungchang lama innghahna nei lo, Pathian nei lo, inpumkhatna avanga lo awm, duhâmna chu a chhan nia dah a ni a; eng nge ni?

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- असत्यम् -- आसुर स्वभाववाले पुरुष कहा करते हैं कि यह जगत् असत्य है अर्थात् इसमें कोई भी बात सत्य नहीं है। जितने भी यज्ञ? दान? तप? ध्यान? स्वाध्याय? तीर्थ? व्रत आदि शुभकर्म किये जाते हैं? उनको वे सत्य नहीं मानते। उनको तो वे एक बहकावा मानते हैं।अप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् -- संसारमें आस्तिक पुरुषोंकी धर्म? ईश्वर? परलोक । (पुनर्जन्म) आदिमें श्रद्धा होती है। परन्तु वे आसुर मनुष्य धर्म? ईश्वर आदिमें श्रद्धा नहीं रखते अतः वे ऐसा मानते हैं कि इस संसारमें धर्मअधर्म? पुण्यपाप आदिकी कोई प्रतिष्ठा -- मर्यादा नहीं है। इस जगत्को वे बिना मालिकका कहते हैं अर्थात् इस जगत्को रचनेवाला? इसका शासन करनेवाला? यहाँपर किये हुए पापपुण्योंका फल भुगतानेवाला कोई (ईश्वर) नहीं है । अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम् -- वे कहते हैं कि स्त्रीको पुरुषकी और पुरुषको स्त्रीकी कामना हो गयी। अतः उन दोनोंके परस्पर संयोगसे यह संसार पैदा हो गया। इसलिये काम ही इस संसारका हेतु है। इसके लिये ईश्वर? प्रारब्ध आदि किसीकी क्या जरूरत है ईश्वर आदिको इसमें कारण मानना ढकोसला है? केवल दुनियाको बहकाना है। सम्बन्ध -- जहाँ सद्भाव लुप्त हो जाते हैं? वहाँ सद्विचार काम नहीं करते अर्थात् सद्विचार प्रकट ही नहीं होते -- इसको अब आगेके श्लोकमें बताते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तथा --, वे आसुर स्वभाववाले मनुष्य कहा करते हैं कि जैसे हम झूठसे भरे हुए हैं? वैसे ही यह सारा संसार भी झूठा और प्रतिष्ठारहित है? अर्थात् धर्मअधर्म आदि इसका कोई आधार नहीं है? अतः निराधार है तथा अनीश्वर है? अर्थात् पुण्यपापकी अपेक्षासे इसका शासन करनेवाला कोई स्वामी नहीं है? अतः यह जगत् बिना ईश्वरका है। तथा कामसे प्रेरित हुए स्त्रीपुरुषोंका आपसमें संयोग हो जानेसे ही सारा जगत् उत्पन्न हुआ है? अतः इस जगत्का कारण काम ही है? दूसरा और क्या हो सकता है अर्थात् ( इसका ) धर्मअधर्मादि कोई दूसरा अदृष्ट कारण नहीं है? केवल काम ही प्राणियोंका कारण है। यह लोकायतिकों की दृष्टि है।

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Sri Anandgiri

असुराणां जनानां विशेषणान्तराण्यपि सन्तीत्याह -- किञ्चेति। विद्यत इत्याहुरिति पूर्वेण संबन्धः। शास्त्रैकगम्यमदृष्टं निमित्तीकृत्य प्रकृत्यधिष्ठात्रात्मकेन ब्रह्मणा रहितं जगदिष्यते चेत्कथं तदुत्पत्तिरित्याशङ्क्याह -- किञ्चेति। किमन्यदित्यादेराक्षेपस्य तात्पर्यमाह -- न किंचिदिति।

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Sri Dhanpati

किंच असत्यं यथा वयमनृतप्रायास्तथेदं जगदप्यसत्यमबाधितप्रमाणशून्यत्वादनृतप्रायम्। अप्रतिष्ठं न विद्यते धर्माधर्मौ प्रतिष्ठा व्यवस्थाहेतुर्यस्य तत्तथा धर्माधर्मसापेक्षोऽस्य शासितेश्वरो न विद्यते इत्यनीश्वरमाहुः। ननु धर्माधर्मतदध्याक्षाभावे जगदुत्पत्तिं कथमाहुरीति तत्राह। अपरस्परसंभूतं परापरशब्दावन्यशब्दपर्यायौ। कामप्रयुक्तयोः स्त्रीपुरुषोरन्योन्यसङ्गज्जातं काम एव हेतुर्यस्य तत्काममहेतुकं किमन्यत्कामादन्यत् किंचिददृष्टं धर्मादिकारणान्तरं जगतो न विद्यते किंतु काम एवस्त्रीपुरुषयोः सङ्गहेतुः सर्वस्य जगतः कारणमिति लौकायतिकदृष्टिरियम्। यत्तुअपरस्पराः क्रियासातत्ये इति सुट्। बीजाङ्कुरवत्परस्परकारणीभूतानां धर्माधर्मवासनानां धर्माधर्मवासनानां यत्सातत्यं तस्मात्संभूतं किमन्यल्लोकेऽस्ति। न किंचिदपि धर्माद्येपेक्षया उत्पद्यते किंतु सर्वं कामहेतुकं स्त्रीपुरुषयोर्मिथुनीभावः कामस्तदुत्थस्वभावादेव जन्तुर्जायते न त्वदृष्टादित्यन्ये तदुपेक्ष्यम्। अप्रतिष्ठमित्यनेन पौनरुक्त्यापादकस्य क्लिष्टल्पनस्यान्याय्यत्वात्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
asatyamwithout absolute truth
apratiṣhṭhamwithout any basis
tethey
jagatthe world
āhuḥsay
anīśhvaramwithout a God
aparasparawithout cause
sambhūtamcreated
kimwhat
anyatother
kāmahaitukam
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 16.7
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते

आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानते और उनमें न बाह्यशुद्धि, न श्रेष्ठ आचरण तथा न सत्य-पालन ही होता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 16.9
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः

उपर्युक्त (नास्तिक) दृष्टिका आश्रय लेनेवाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूपको नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्रकर्मा और संसारके शत्रु हैं, उन मनुष्योंकी सामर्थ्यका उपयोग जगत्का नाश करनेके लिये ही होता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 16Shlok 8
Bhagavad Gita · Adhyay 16, Shlok 8
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्

वे कहा करते हैं कि संसार असत्य, अप्रतिष्ठित और बिना ईश्वरके अपने-आप केवल स्त्री-पुरुषके संयोगसे पैदा हुआ है। इसलिये काम ही इसका कारण है, और कोई कारण नहीं है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 16 श्लोक 8 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 16 श्लोक 8 का हिंदी अर्थ: "वे कहा करते हैं कि संसार असत्य, अप्रतिष्ठित और बिना ईश्वरके अपने-आप केवल स्त्री-पुरुषके संयोगसे पैदा हुआ है। इसलिये काम ही इसका कारण है, और कोई कारण नहीं है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Daivaasura-Sampad-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 8?

Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 8 translates to: "They say, "This universe is without truth, without a moral basis, without a God, brought about by mutual union, with lust as its cause; what else? — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 16, श्लोक 8 है जो Bhagavad Gita के Daivaasura-Sampad-Vibhaga Yoga में संकलित है। वे कहा करते हैं कि संसार असत्य, अप्रतिष्ठित और बिना ईश्वरके अपने-आप केवल स्त्री-पुरुषके संयोगसे पैदा हुआ है। इसलिये काम ही इसका कारण है, और कोई कारण नहीं है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "asatyam apratiṣhṭhaṁ te jagad āhur anīśhvaram" mean in English?

"asatyam apratiṣhṭhaṁ te jagad āhur anīśhvaram" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 8. They say, "This universe is without truth, without a moral basis, without a God, brought about by mutual union, with lust as its cause; what else? — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.