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Sudarshana Chakra
Adhyay 16, Shlok 7
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते

आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानते और उनमें न बाह्यशुद्धि, न श्रेष्ठ आचरण तथा न सत्य-पालन ही होता है। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

পৈশাচিকরা জানে না কী করতে হবে এবং কী থেকে বিরত থাকতে হবে; তাদের না পবিত্রতা, না সঠিক আচরণ, না সত্য।

MarathiIND

आसुरी लोकांना काय करावे आणि काय टाळावे हे माहित नसते; त्यांच्यात शुद्धता नाही, योग्य आचरण किंवा सत्य नाही.

PunjabiIND

ਭੂਤਵਾਦੀ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦੇ ਕਿ ਕੀ ਕਰਨਾ ਹੈ ਅਤੇ ਕਿਸ ਤੋਂ ਬਚਣਾ ਹੈ; ਉਨ੍ਹਾਂ ਕੋਲ ਨਾ ਤਾਂ ਸ਼ੁੱਧਤਾ ਹੈ, ਨਾ ਸਹੀ ਆਚਰਣ, ਨਾ ਹੀ ਸੱਚ।

NepaliIND

राक्षसीहरूलाई थाहा छैन के गर्ने र केबाट टाढा रहने; तिनीहरूसँग न शुद्धता छ, न सही आचरण, न सत्य।

SindhiIND

شيطان کي خبر ناهي ته ڇا ڪرڻ گهرجي ۽ ڇا کان بچڻ؛ انهن ۾ نه پاڪائي آهي، نه صحيح اخلاق، نه سچ.

TeluguIND

రాక్షసుడు ఏమి చేయాలో మరియు దేనికి దూరంగా ఉండాలో తెలియదు; వారికి స్వచ్ఛత, సరైన ప్రవర్తన లేదా సత్యం లేవు.

TamilIND

பேய் பிடித்தவனுக்கு என்ன செய்வது, எதைத் தவிர்ப்பது என்று தெரியவில்லை; அவர்களிடம் தூய்மையோ, சரியான நடத்தையோ, உண்மையோ இல்லை.

OdiaIND

ଭୂତାତ୍ମା କ’ଣ କରିବେ ଏବଂ କ’ଣ ଏଥିରୁ ନିବୃତ୍ତ ହେବେ ଜାଣନ୍ତି ନାହିଁ; ସେମାନଙ୍କର ଶୁଦ୍ଧତା, କିମ୍ବା ସଠିକ୍ ଆଚରଣ, କିମ୍ବା ସତ୍ୟ ନାହିଁ |

GujaratiIND

રાક્ષસી જાણતા નથી કે શું કરવું અને શું ટાળવું; તેમની પાસે ન તો શુદ્ધતા છે, ન યોગ્ય આચરણ, ન સત્ય.

MalayalamIND

പൈശാചികവാദിക്ക് എന്ത് ചെയ്യണമെന്നും എന്തിൽ നിന്ന് വിട്ടുനിൽക്കണമെന്നും അറിയില്ല; അവർക്ക് ശുദ്ധിയോ ശരിയായ പെരുമാറ്റമോ സത്യമോ ഇല്ല.

KannadaIND

ರಾಕ್ಷಸನಿಗೆ ಏನು ಮಾಡಬೇಕು ಮತ್ತು ಯಾವುದರಿಂದ ದೂರವಿರಬೇಕು ಎಂದು ತಿಳಿದಿಲ್ಲ; ಅವರಿಗೆ ಶುದ್ಧತೆ ಇಲ್ಲ, ಸರಿಯಾದ ನಡವಳಿಕೆ ಇಲ್ಲ, ಸತ್ಯವೂ ಇಲ್ಲ.

BhojpuriIND

राक्षसी लोग के ई ना मालूम होला कि का कइल जाव आ का से परहेज कइल जाव; ना त ओह लोग में पवित्रता बा, ना सही आचरण बा, ना सच्चाई बा.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः -- आजकलके उच्छृङ्खल वातावरण? खानपान? शिक्षा आदिके प्रभावसे प्रायः मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्तिको अर्थात् किसमें प्रवृत्त होना चाहिये और किससे निवृत्त होना चाहिये -- इसको नहीं जानते और जानना चाहते भी नहीं। कोई इसको बताना चाहे? तो उसकी मानते नहीं? प्रत्युत उसकी हँसी उड़ाते हैं? उसे मूर्ख समझते हैं और अभिमानके कारण अपनेको बड़ा बुद्धिमान् समझते हैं। कुछ लोग (प्रवृत्ति और निवृत्तिको) जानते भी हैं? पर उनपर आसुरीसम्पदाका विशेष प्रभाव होनेसे उनकी विहित कार्योंमें प्रवृत्ति और निषिद्ध कार्योंसे निवृत्ति नहीं होती। इस कारण सबसे पहले आसुरीसम्पत्ति आती है -- प्रवृत्ति और निवृत्तिको न जाननेसे।प्रवृत्ति और निवृत्तिको कैसे जाना जाय इसे गुरुके द्वारा? ग्रन्थके द्वारा? विचारके द्वारा जाना जा सकता है इसके अलावा उस मनुष्यपर कोई आफत आ जाय? वह मुसीबतमें फँस जाय? कोई विचित्र घटना घट जाय? तो विवेकशक्ति जाग्रत् हो जाती है। किसी महापुरुषके दर्शन हो जानेसे पूर्वसंस्कारवश मनुष्यकी वृत्ति बदल जाती है अथवा जिन स्थानोंपर बड़ेबड़े प्रभावशाली सन्त हुए हैं? उन स्थलोंमें? तीर्थोंमें जानेसे भी विवेकशक्ति जाग्रत् हो जाती है।विवेकशक्ति प्राणिमात्रमें रहती है। परन्तु पशुपक्षी आदि योनियोंमें इसको विकसित करनेका अवसर? स्थान और योग्यता नहीं है एवं मनुष्यमें उसको विकसित करनेका अवसर? स्थान और योग्यता भी है। पशुपक्षी आदिमें वह विवेकशक्ति केवल अपने शरीरनिर्वाहतक ही सीमित रहती है? पर मनुष्य उस विवेकशक्तिसे अपना और अपने परिवारका तथा अन्य प्राणियोंका भी पालनपोषण कर सकता है? और दुर्गुणदुराचारोंका त्याग करके सद्गुणसदाचारोंको भी ला सकता है। मनुष्य इसमें सर्वथा स्वतन्त्र है क्योंकि वह साधनयोनि है। परन्तु पक्षुपक्षी इसमें स्वतन्त्र नहीं हैं क्योंकि वह भोगयोनि है।जब मनुष्योंकी खानेपीने आदिमें ही विशेष वृत्ति रहती है? तब उनमें कर्तव्यअकर्तव्यका होश नहीं रहता। ऐसे मनुष्योंमें पशुओंकी तरह दैवीसम्पत्ति छिपी हुई रहती है? सामने नहीं आती। ऐसे मनुष्योंके लिये भी भगवान्ने जनाः पद दिया है अर्थात् वे भी मनुष्य कहलानेके लायक हैं क्योंकि उनमें दैवीसम्पत्ति प्रकट हो सकती है।विशेष बातजनाः (16। 7) से लेकर नराधमान् (16। 19) पदतक बीचमें आये हुए श्लोकोंमें कहीं भी भगवान्ने मनुष्यवाचक शब्द नहीं दिया है। इसका तात्पर्य यह है कि यद्यपि मनुष्यमें आसुरीसम्पत्तिका त्याग करनेकी तथा दैवीसम्पत्तिको धारण करनेकी योग्यता है? तथापि जो मनुष्य होकर भी दैवीसम्पत्तिको धारण न करके आसुरीसम्पत्तिको बनाये रखते हैं? वे मनुष्य कहलानेलायक नहीं हैं। वे पशुओंसे और नारकीय प्राणियोंसे भी गयेबीते हैं क्योंकि पशु और नारकीय प्राणी तो पापोंका फल भोगकर पवित्रताकी तरफ जा रहे हैं और ये आसुर स्वभाववाले मनुष्य जिस पुण्यसे मनुष्यशरीर मिला है? उसको नष्ट करके और यहाँ नयेनये पाप बटोरकर पशुपक्षी आदि योनियों तथा नरकोंकी तरफ जा रहे हैं। अतः उनकी दुर्गतिका वर्णन इसी अध्यायके सोलहवें और उन्नीसवें श्लोकोंमें किया गया है।भगवान्ने आसुर मनुष्योंके जितने लक्षण बताये हैं? उनमें उनको पशु आदिका विशेषण न देकर अशुभान्?,नराधमान् विशेषण दिये हैं। कारण यह कि पशु आदि इतने पापी नहीं हैं और उनके दर्शनसे पाप भी नहीं लगता? पर आसुर मनुष्योंमें विशेष पाप होते हैं और उनके दर्शनसे पाप लगता है? अपवित्रता आती है। इसी अध्यायके बाईसवें श्लोकमें नरः पद देकर यह बताते हैं कि जो कामक्रोधलोभरूप नरकके द्वारोंसे छूटकर,अपने कल्याणका आचरण करता है? वही मनुष्य कहलानेलायक है। पाँचवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें भी नरः पदसे इसी बातको पुष्ट किया गया है।न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते -- प्रवृत्ति और निवृत्तिको न जाननेसे उन आसुर स्वभाववालोंमें शुद्धिअशुद्धिका खयाल नहीं रहता। उनको सांसारिक बर्तावका? व्यवहारका भी खयाल नहीं होता अर्थात् मातापिता आदि बड़ेबूढ़ोंके साथ तथा अन्य मनुष्योंके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये और कैसे नहीं करना चाहिये -- इस बातको वे जानते ही नहीं। उनमें सत्य नहीं होता अर्थात् वे असत्य बोलते हैं और आचरण भी असत्य ही करते हैं। इन सबका तात्पर्य यह है कि वे पुरुष असुर हैं। खानापीना? आरामसे रहना तथा मैं जीता रहूँ? संसारका सुख भोगता रहूँ और संग्रह करता रहूँ आदि उद्देश्य होनेसे उनकी शौचाचार और सदाचारकी तरफ दृष्टि ही नहीं जाती।भगवान्ने दूसरे अध्यायके चौवालीसवें श्लोकमें बताया है कि वैदिक प्रक्रियाके अनुसार सांसारिक भोग और संग्रहमें लगे हुए पुरुषोंमें भी परमात्माकी प्राप्तिका एक निश्चय नहीं होता। भाव यह है कि आसुरीसम्पदाका अंश रहनेके कारण जब ऐसे शास्त्रविधिसे यज्ञादि कर्मोंमें लगे हुए पुरुष भी परमात्माका एक निश्चय नहीं कर पाते? तब जिन पुरुषोंमें आसुरीसम्पदा विशेष बढ़ी हुई है अर्थात् जो अन्यायपूर्वक भोग और संग्रहमें लगे हुए हैं? उनकी बुद्धिमें परमात्माका एक निश्चय होना कितना कठिन है सम्बन्ध -- जहाँ सत्कर्मोंमें प्रवृत्ति नहीं होती? वहाँ सद्भावोंका भी निरादर होता है अर्थात् सद्भाव दबते चले जाते हैं -- अब इसको बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

इस अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त प्राणियोंके विशेषणोंद्वारा आसुरी सम्पत्ति दिखलायी जाती है? क्योंकि प्रत्यक्ष कर लेनेसे ही उसका त्याग करना बन सकता है --, आसुरी स्वभाववाले मनुष्य? प्रवृत्तिको अर्थात् जिस किसी पुरुषार्थके साधनरूप कर्तव्यकार्यमें प्रवृत्त होना उचित है? उसमें प्रवृत्त होनेको? और निवृत्तिको? अर्थात् उससे विपरीत जिस किसी अनर्थकारक कर्मसे निवृत्त होना उचित है? उससे निवृत्त होनेको भी? नहीं जानते। केवल प्रवृत्तिनिवृत्तिको नहीं जानते? इतना ही नहीं? उनमें न शुद्धि होती है? न सदाचार होता है? और न सत्य ही होता है। यानी आसुरी प्रकृतिके मनुष्य अशुद्ध? दुराचारी? कपटी और मिथ्यावादी ही होते हैं।

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Sri Anandgiri

नन्वध्यायशेषेणासुरसंपद्दर्शनमयुक्तं तस्यास्त्याज्यत्वेन पङ्कप्रक्षालनन्यायावतारादित्याशङ्क्याह -- प्रत्यक्षीकरणेनेति। वर्जनीयामासुरीं संपदं विवृणोति -- प्रवृत्तिं चेति। तां विहितां प्रवृत्तिं न जानन्तीत्यर्थः। तां च निषिद्धां क्रियां न जानन्तीति संबन्धः। न शौचमित्यादेस्तात्पर्यमाह -- अनाचारा इति। शौचसत्ययोराचारान्तर्भावेऽपि ब्राह्मणपरिव्राजकन्यायेन पृथगुपादानम्।

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Sri Dhanpati

ज्ञानं बिना परिवर्जनासंभवादासुरीं संपदं प्राणिविशेषणविषयत्वेन प्रदर्शयति -- प्रवृत्तिं चेति। आसुरा जनाः प्रवृत्तिं प्रवत्तिविषयं पुरुषार्थसाधनं चकारात्तद्वाधकं शास्त्रं च। निवृत्तिं निवृत्तिविषयमनर्थसाधनं तद्वोधकं शास्त्रं च न विदुः। न केवलमेतावदेव किंतु न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु आसुरेषु विद्यते। अशौचाः अनाचारा मायाविनोऽनृतवादिनो यत आसुरा अत इत्यर्थः। शौचसत्ययोः मन्वाद्युक्ताचारान्तरर्भावेऽपि ब्राह्मणपरिव्राजकन्यायेन पृथगुपादानम्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
pravṛittimproper actions
chaand
nivṛittimimproper actions
chaand
janāḥpersons
nanot
viduḥcomprehend
āsurāḥthose possessing demoniac nature
naneither
śhauchampurity
nanor
apieven
chaand
āchāraḥconduct
nanor
satyamtruthfulness
teṣhuin them
vidyateexist
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Bhagavad Gita · 16.6
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च।दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श्रृणु

इस लोकमें दो तरहके प्राणियोंकी सृष्टि है -- दैवी और आसुरी। दैवीका तो मैंने विस्तारसे वर्णन कर दिया, अब हे पार्थ ! तुम मेरेसे आसुरीका विस्तार सुनो। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 16.8
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्

वे कहा करते हैं कि संसार असत्य, अप्रतिष्ठित और बिना ईश्वरके अपने-आप केवल स्त्री-पुरुषके संयोगसे पैदा हुआ है। इसलिये काम ही इसका कारण है, और कोई कारण नहीं है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 16Shlok 7
Bhagavad Gita · Adhyay 16, Shlok 7
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते

आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानते और उनमें न बाह्यशुद्धि, न श्रेष्ठ आचरण तथा न सत्य-पालन ही होता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 16 श्लोक 7 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 16 श्लोक 7 का हिंदी अर्थ: "आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानते और उनमें न बाह्यशुद्धि, न श्रेष्ठ आचरण तथा न सत्य-पालन ही होता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Daivaasura-Sampad-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 7?

Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 7 translates to: "The demoniacal do not know what to do and what to refrain from; they have neither purity, nor right conduct, nor truth. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्य" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 16, श्लोक 7 है जो Bhagavad Gita के Daivaasura-Sampad-Vibhaga Yoga में संकलित है। आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानते और उनमें न बाह्यशुद्धि, न श्रेष्ठ आचरण तथा न सत्य-पालन ही होता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "pravṛittiṁ cha nivṛittiṁ cha janā na vidur āsurāḥ" mean in English?

"pravṛittiṁ cha nivṛittiṁ cha janā na vidur āsurāḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 7. The demoniacal do not know what to do and what to refrain from; they have neither purity, nor right conduct, nor truth. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.