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Sudarshana Chakra
Adhyay 16, Shlok 9
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः

उपर्युक्त (नास्तिक) दृष्टिका आश्रय लेनेवाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूपको नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्रकर्मा और संसारके शत्रु हैं, उन मनुष्योंकी सामर्थ्यका उपयोग जगत्का नाश करनेके लिये ही होता है। — VaniSagar

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MarathiIND

हे मत धारण करून, लहान बुद्धी आणि भयंकर कृत्यांचे हे उध्वस्त आत्मे जगाचे शत्रू म्हणून पुढे येतात, त्याचा नाश करण्याच्या हेतूने.

TeluguIND

ఈ దృక్కోణాన్ని పట్టుకొని, చిన్న తెలివితేటలు మరియు క్రూరమైన పనులు చేసే ఈ నాశనమైన ఆత్మలు ప్రపంచానికి శత్రువులుగా, దానిని నాశనం చేయాలనే ఉద్దేశంతో ముందుకు వస్తాయి.

PunjabiIND

ਇਸ ਦ੍ਰਿਸ਼ਟੀਕੋਣ ਨੂੰ ਧਾਰਨ ਕਰਕੇ, ਛੋਟੀ ਬੁੱਧੀ ਅਤੇ ਕਰੂਰ ਕਰਮਾਂ ਦੀਆਂ ਇਹ ਵਿਨਾਸ਼ਕਾਰੀ ਰੂਹਾਂ ਸੰਸਾਰ ਦੇ ਦੁਸ਼ਮਣ ਬਣ ਕੇ ਸਾਹਮਣੇ ਆਉਂਦੀਆਂ ਹਨ, ਇਸ ਦੇ ਵਿਨਾਸ਼ ਦੇ ਇਰਾਦੇ ਨਾਲ।

GujaratiIND

આ દૃષ્ટિકોણને ધારણ કરીને, નાની બુદ્ધિ અને ઉગ્ર કાર્યોના આ વિનાશ પામેલા આત્માઓ વિશ્વના દુશ્મન તરીકે બહાર આવે છે, તેના વિનાશના ઇરાદાથી.

BengaliIND

এই দৃষ্টিভঙ্গি ধারণ করে, ক্ষুদ্র বুদ্ধি এবং হিংস্র কর্মের এই ধ্বংসপ্রাপ্ত আত্মারা পৃথিবীর শত্রু হয়ে তার ধ্বংসের অভিপ্রায়ে আবির্ভূত হয়।

TamilIND

இந்தக் கண்ணோட்டத்தை வைத்துக்கொண்டு, இந்த அழிந்த ஆன்மாக்கள் சிறிய புத்தி மற்றும் கடுமையான செயல்கள் உலகத்தின் எதிரிகளாக, அதை அழிக்கும் நோக்கத்துடன் வெளிவருகின்றன.

MalayalamIND

ഈ വീക്ഷണം മുറുകെപ്പിടിച്ചുകൊണ്ട്, ഈ നശിപ്പിച്ച ആത്മാക്കൾ ചെറിയ ബുദ്ധിയും ക്രൂരമായ പ്രവൃത്തികളും ലോകത്തിൻ്റെ ശത്രുക്കളായി, അതിൻ്റെ നാശം ലക്ഷ്യമാക്കി പുറത്തുവരുന്നു.

NepaliIND

यही धारणा राखेर सानातिना बुद्धि र उग्र कर्मका क्षतविक्षत आत्माहरू संसारका शत्रु बनेर त्यसको विनाशको मनसायमा निस्कन्छन्।

SindhiIND

انهيءَ نظريي کي هٿي وٺرائڻ سان هي تباهه ٿيل روح ننڍيون عقلون ۽ وحشي عمل دنيا جا دشمن بڻجي ان جي تباهيءَ جو ارادو رکن ٿا.

KannadaIND

ಈ ದೃಷ್ಟಿಕೋನವನ್ನು ಹಿಡಿದಿಟ್ಟುಕೊಂಡು, ಈ ಹಾಳಾದ ಆತ್ಮಗಳು ಸಣ್ಣ ಬುದ್ಧಿಮತ್ತೆ ಮತ್ತು ಉಗ್ರ ಕಾರ್ಯಗಳು ಪ್ರಪಂಚದ ಶತ್ರುಗಳಾಗಿ ಹೊರಹೊಮ್ಮುತ್ತವೆ, ಅದರ ನಾಶದ ಉದ್ದೇಶವನ್ನು ಹೊಂದಿವೆ.

MaithiliIND

एहि मत केँ धारण करैत छोट-छोट बुद्धि आ उग्र कर्म केर ई बर्बाद आत्मा सब संसारक दुश्मन बनि ओकर विनाशक इरादा सँ सोझाँ अबैत अछि |

KonkaniIND

ही नदर दवरून ल्हान बुद्धीचे आनी उग्र कर्तुबाचे हे उध्वस्त जीव संवसाराचे दुस्मान म्हणून भायर सरतात, ताचो नाश करपाचो हेतू दवरून.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- एतां दृष्टिमवष्टभ्य -- न कोई कर्तव्यअकर्तव्य है? न शौचाचारसदाचार है? न ईश्वर है? न प्रारब्ध है? न पापपुण्य है? न परलोक है? न किये हुए कर्मोंका कोई दण्डविधान है -- ऐसी नास्तिक दृष्टिका आश्रय लेकर वे चलते हैं।नष्टात्मानः -- आत्मा कोई चेतन तत्त्व है? आत्माकी कोई सत्ता है -- इस बातको वे मानते ही नहीं। वे तो,इस बातको मानते हैं कि जैसे कत्था और चूना मिलनेसे एक लाली पैदा हो जाती है? ऐसी ही भौतिक तत्त्वोंके मिलनेसे एक चेतना पैदा हो जाती है। वह चेतन कोई अलग चीज है -- यह बात नहीं है। उनकी दृष्टिमें जड ही मुख्य होता है। इसलिये वे चेतनतत्त्वसे बिलकुल ही विमुख रहते हैं। चेतनतत्त्व(आत्मा) से विमुख होनेसे उनका पतन हो चुका होता है।अल्पबुद्धयः -- उनमें जो विवेकविचार होता है? वह अत्यन्त ही अल्प? तुच्छ होता है। उनकी दृष्टि केवल दृश्य पदार्थोंपर अवलम्बित रहती है कि कमाओ? खाओ? पीओ और मौज करो। आगे भविष्यमें क्या होगा परलोकमें क्या होगा ये बातें उनकी बुद्धिमें नहीं आतीं।यहाँ अल्पबुद्धिका यह अर्थ नहीं है कि हरेक काममें उनकी बुद्धि काम नहीं करती। सत्यतत्त्व क्या है धर्म क्या है अधर्म क्या है सदाचारदुराचार क्या है और उनका परिणाम क्या होता है इस विषयमें उनकी बुद्धि काम नहीं करती। परन्तु धनादि वस्तुओंके संग्रहमें उनकी बुद्धि बड़ी तेज होती है। तात्पर्य यह है कि पारमार्थिक उन्नतिके विषयमें उनकी बुद्धि तुच्छ होती है और सांसारिक भोगोंमें फँसनेके लिये उनकी बुद्धि बड़ी तेज होती है।उग्रकर्माणः -- वे किसीसे डरते ही नहीं। यदि डरेंगे तो चोर? डाकू या राजकीय आदमीसे डरेंगे। ईश्वरसे? परलोकसे? मर्यादासे वे नहीं डरते। ईश्वर और परलोकका भय न होनेसे उनके द्वारा दूसरोंकी हत्या आदि बड़े भयानक कर्म होते हैं।अहिताः -- उनका स्वभाव खराब होनेसे वे दूसरोंका अहित (नुकसान) करनेमें ही लगे रहते हैं और दूसरोंका नुकसान करनेमें ही उनको सुख होता है।जगतः क्षयाय प्रभवन्ति -- उनके पास जो शक्ति है? ऐश्वर्य है? सामर्थ्य है? पद है? अधिकार है? वह सबकासब दूसरोंका नाश करनेमें ही लगता है। दूसरोंका नाश ही उनका उद्देश्य होता है। अपना स्वार्थ पूरा सिद्ध हो या थोड़ा सिद्ध हो अथवा बिलकुल सिद्ध न हो? पर वे दूसरोंकी उन्नतिको सह नहीं सकते। दूसरोंका नाश करनेमें ही उनको सुख होता है अर्थात् पराया हक छीनना? किसीको जानसे मार देना -- इसीमें उनको प्रसन्नता होती है। सिंह जैसे दूसरे पशुओंको मारकर खा जाता है? दूसरोंके दुःखकी परवाह नहीं करता और राजकीय स्वार्थी अफसर जैसे दस? पचास? सौ रुपयोंके लिये हजारों रुपयोंका सरकारी नुकसान कर देते हैं? ऐसे ही अपना स्वार्थ पूरा करनेके लिये दूसरोंका चाहे कितना ही नुकसान हो जाय? उसकी वे परवाह नहीं करते। वे आसुर स्वभाववाले पशुपक्षियोंको मारकर खा जाते हैं और अपने थोड़ेसे सुखके लिये दूसरोंको कितना दुःख हुआ -- इसको वे सोच ही नहीं सकते। सम्बन्ध -- जहाँ सत्कर्म? सद्भाव और सद्विचारका निरादर हो जाता है? वहाँ मनुष्य कामनाओंका आश्रय लेकर क्या करता है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

इस दृष्टिका अवलम्बन -- आश्रय लेकर जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है? जो परलोकसाधनसे भ्रष्ट हो गये हैं? जो अल्पबुद्धि हैं -- जिनकी बुद्धि केवल भोगोंको ही विषय करनेवाली है? ऐसे वे अल्पबुद्धि? उग्रकर्मा -- क्रूर कर्म करनेवाले? हिंसापरायण संसारके शत्रु? संसारका नाश करनेके लिये ही उत्पन्न होते हैं।

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Sri Anandgiri

यथोक्ता दृष्टिर्ब्रह्मदृष्टिवदिष्टैवेत्याशङ्क्याह -- एतामिति। प्रागुपदिष्टामेतां लोकायतिकदृष्टिमवलम्ब्येति यावत्। नष्टस्वभावत्वमेव स्पष्टयति -- विभ्रष्टेति। विषयबुद्धेरल्पत्वं दृष्टमात्रोद्देशेन प्रवृत्तत्वं? जगतः प्राणिजातस्येति यावत्।

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Sri Dhanpati

एतामुदाहृतां लोकायतिकदृष्टिमवष्टभ्याश्रित्य नष्टात्मानो नष्टस्वभावा भ्रष्टपरलोकसाधना अल्पबुद्धयोऽल्पविषयविषयाल्पैव बुद्धिरेयषां ते दृष्टमात्रोद्देशप्रवृत्तमतय उग्रकर्माणः क्रूरकर्माणो हिंसात्मकाः जगतोऽहिताः शत्रवो जगतः क्षयाय प्रभवन्ति उद्भवन्ति। तथाचैतादृशदोषैर्दुष्टेयं दृष्टिः श्रेयोर्थिभिः सर्वथा नाश्रयणीयेति भावः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
etāmsuch
dṛiṣhṭimviews
avaṣhṭabhyaholding
naṣhṭamisdirected
ātmānaḥsouls
alpabuddhayaḥ
prabhavantiarise
ugracruel
karmāṇaḥactions
kṣhayāyadestruction
jagataḥof the world
ahitāḥenemies
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 16.8
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्

वे कहा करते हैं कि संसार असत्य, अप्रतिष्ठित और बिना ईश्वरके अपने-आप केवल स्त्री-पुरुषके संयोगसे पैदा हुआ है। इसलिये काम ही इसका कारण है, और कोई कारण नहीं है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 16.10
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः

कभी पूरी न होनेवाली कामनाओंका आश्रय लेकर दम्भ, अभिमान और मदमें चूर रहनेवाले तथा अपवित्र व्रत धारण करनेवाले मनुष्य मोहके कारण दुराग्रहोंको धारण करके संसारमें विचरते रहते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 16Shlok 9
Bhagavad Gita · Adhyay 16, Shlok 9
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः

उपर्युक्त (नास्तिक) दृष्टिका आश्रय लेनेवाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूपको नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्रकर्मा और संसारके शत्रु हैं, उन मनुष्योंकी सामर्थ्यका उपयोग जगत्का नाश करनेके लिये ही होता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 16 श्लोक 9 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 16 श्लोक 9 का हिंदी अर्थ: "उपर्युक्त (नास्तिक) दृष्टिका आश्रय लेनेवाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूपको नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्रकर्मा और संसारके शत्रु हैं, उन मनुष्योंकी सामर्थ्यका उपयोग जगत्का नाश करनेके लिये ही होता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Daivaasura-Sampad-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 9?

Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 9 translates to: "Holding this view, these ruined souls of small intellect and fierce deeds come forth as enemies of the world, intent on its destruction. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहित" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 16, श्लोक 9 है जो Bhagavad Gita के Daivaasura-Sampad-Vibhaga Yoga में संकलित है। उपर्युक्त (नास्तिक) दृष्टिका आश्रय लेनेवाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूपको नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्रकर्मा और संसारके शत्रु हैं, उन मनुष्योंकी सामर्थ्यका उपयोग जगत्का नाश करनेके लिये ही होता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "etāṁ dṛiṣhṭim avaṣhṭabhya naṣhṭātmāno ’lpa-buddhayaḥ" mean in English?

"etāṁ dṛiṣhṭim avaṣhṭabhya naṣhṭātmāno ’lpa-buddhayaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 16 Verse 9. Holding this view, these ruined souls of small intellect and fierce deeds come forth as enemies of the world, intent on its destruction. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.