
“इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है; परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)। — VaniSagar”
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پاڻ جو هڪ ابدي حصو زندگي جي دنيا ۾ هڪ زنده روح بڻجي ويو آهي، پاڻ ڏانهن ڇڪي ٿو پنجن حواس، ذهن سان گڏ ڇهين، فطرت ۾ رهي.
என் நித்தியப் பகுதி, ஜீவ உலகில் ஜீவாத்மாவாகி, இயற்கையில் நிலைத்திருக்கும் மனதை ஆறாவதாகக் கொண்டு ஐந்து புலன்களை தன்னிடம் இழுத்துக் கொள்கிறது.
ਆਪਣੇ ਆਪ ਦਾ ਇੱਕ ਸਦੀਵੀ ਹਿੱਸਾ ਜੀਵਨ ਦੇ ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਜੀਵਤ ਆਤਮਾ ਬਣ ਕੇ, ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਪੰਜ ਇੰਦਰੀਆਂ, ਮਨ ਨੂੰ ਛੇਵੇਂ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ, ਕੁਦਰਤ ਵਿੱਚ ਰਹਿਣ ਦੇ ਨਾਲ ਆਪਣੇ ਵੱਲ ਖਿੱਚਦਾ ਹੈ।
ꯄꯨꯟꯁꯤꯒꯤ ꯃꯥꯂꯦꯃꯗꯥ ꯍꯤꯡꯂꯤꯕꯥ ꯊꯋꯥꯏ ꯑꯃꯥ ꯑꯣꯏꯔꯀꯄꯒꯤ ꯑꯩꯒꯤ ꯂꯣꯝꯕꯥ ꯅꯥꯏꯗꯕꯥ ꯁꯔꯨꯛ ꯑꯃꯅꯥ, ꯃꯍꯧꯁꯥꯗꯥ ꯂꯩꯔꯤꯕꯥ ꯋꯥꯈꯂꯕꯨ ꯶ꯁꯨꯕꯥ ꯑꯣꯏꯅꯥ ꯂꯧꯗꯨꯅꯥ, ꯏꯟꯗ꯭ꯔꯤ ꯃꯉꯥꯕꯨ ꯃꯁꯥꯗꯥ ꯄꯨꯁꯤꯜꯂꯀꯏ꯫
जिविताच्या संवसारांत जिवो जीव जावन म्हजो एक शाश्वत भाग, सैमांत रावपी मन सवो जावन पांच इंद्रियां स्वता कडेन ओडटा.
जीवनको संसारमा एक जीवित आत्मा बनेर म आफैंको एक शाश्वत अंश, मन छैटौं रूपमा प्रकृतिमा रहँदै, पाँच इन्द्रियहरू आफैंमा तान्दछ।
জীৱন জগতত জীৱন্ত আত্মা হৈ পৰা মোৰ নিজৰ এটা চিৰন্তন অংশই পঞ্চ ইন্দ্ৰিয়ক নিজৰ ওচৰলৈ আকৰ্ষণ কৰে, মনক ষষ্ঠ হিচাপে লৈ, প্ৰকৃতিত বাস কৰে।
माझ्या स्वतःचा एक शाश्वत भाग जीवनाच्या जगात एक जिवंत आत्मा बनून, स्वतःकडे पाच इंद्रियांकडे आकर्षित करतो, मन सहाव्या म्हणून, निसर्गात राहून.
ମୋର ଏକ ଅନନ୍ତ ଅଂଶ ଜୀବନ ଦୁନିଆରେ ଜୀବନ୍ତ ପ୍ରାଣ ପାଲଟିଛି, ନିଜକୁ ପାଞ୍ଚ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ଆଡକୁ ଆକର୍ଷିତ କରେ, ମନ ଷଷ୍ଠ ଭାବରେ ପ୍ରକୃତିରେ ରହିଥାଏ |
મારી જાતનો એક શાશ્વત ભાગ જીવનની દુનિયામાં જીવંત આત્મા બનીને, પાંચ ઇન્દ્રિયોને પોતાની તરફ ખેંચે છે, મનને છઠ્ઠા તરીકે, પ્રકૃતિમાં રહે છે.
ನನ್ನ ಶಾಶ್ವತ ಭಾಗವು ಜೀವನ ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಜೀವಂತ ಆತ್ಮವಾಗಿ ಮಾರ್ಪಟ್ಟಿದೆ, ಐದು ಇಂದ್ರಿಯಗಳನ್ನು ತನ್ನತ್ತ ಸೆಳೆಯುತ್ತದೆ, ಮನಸ್ಸನ್ನು ಆರನೆಯದಾಗಿ, ಪ್ರಕೃತಿಯಲ್ಲಿ ನೆಲೆಸಿದೆ.
ജീവലോകത്തിൽ ജീവാത്മാവായിത്തീർന്ന എൻ്റെ ശാശ്വതമായ ഒരു അംശം, പ്രകൃതിയിൽ വസിക്കുന്ന മനസ്സിനെ ആറാമതായി, പഞ്ചേന്ദ്രിയങ്ങളെ തന്നിലേക്ക് ആകർഷിക്കുന്നു.
Sacred Commentaries
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Swami Ramsukhdas
व्याख्या -- ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः -- जिनके साथ जीवकी तात्त्विक अथवा स्वरूपकी एकता नहीं है? ऐसे प्रकृति और प्रकृतिके कार्यमात्रका नाम लोक है। तीन लोक? चौदह भुवनोंमें जीव जितनी योनियोंमें शरीर धारण करता है? उन सम्पूर्ण लोकों तथा योनियोंको जीवलोकेपदके अन्तर्गत समझना चाहिये।आत्मा परमात्माका अंश है परन्तु प्रकृतिके कार्य शरीर? इन्द्रियाँ? प्राण? मन आदिके साथ अपनी एकता मानकर वह जीव हो गया है -- जीवभूतः। उसका यह जीवपना बनावटी है? वास्तविक नहीं। नाटकमें कोई पात्र बननेकी तरह ही यह आत्मा जीवलोकमें जीव बनता है।सातवें अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि इस सम्पूर्ण जगत्को मेरी जीवभूता परा प्रकृतिने धारण कर रखा है (7। 5) अर्थात् अपरा प्रकृति(संसार) से वास्तविक सम्बन्ध न होनेपर भी जीवने उससे अपना सम्बन्ध मान रखा है।भगवान् जीवके प्रति कितनी आत्मीयता रखते हैं कि उसको अपना ही मानते हैं -- ममैवांशः। मानते ही नहीं? प्रत्युत जानते भी हैं। उनकी यह आत्मीयता महान् हितकारी? अखण्ड रहनेवाली और स्वतःसिद्ध है।यहाँ भगवान् यह वास्तविकता प्रकट करते हैं कि जीव केवल मेरा ही अंश है इसमें प्रकृतिका किञ्चिन्मात्र भी अंश नहीं है। जैसे सिंहका बच्चा भेड़ोंमें मिलकर अपनेको भेड़ मान ले? ऐसे ही जीव शरीरादि जड,पदार्थोंके साथ मिलकर अपने असली चेतनस्वरूपको भूल जाता है। अतः इस भूलको मिटाकर उसे अपनेको सदा सर्वथा चेतनस्वरूप ही अनुभव करना चाहिये। सिंहका बच्चा भेड़ोंके साथ मिलकर भी भेड़ नहीं हो जाता। जैसे कोई दूसरा सिंह आकर उसे बोध करा दे कि देख तेरी और मेरी आकृति? स्वभाव? जाति? गर्जना आदि सब एक समान हैं अतः निश्चितरूपसे तू भेड़ नहीं? प्रत्युत मेरेजैसा ही सिंह है। ऐसे ही भगवान् यहाँ मम एव पदोंसे जीवको बोध कराते हैं कि हे जीव तू मेरा ही अंश है। प्रकृतिके साथ तेरा सम्बन्ध कभी हुआ नहीं? है नहीं? होगा नहीं और हो सकता भी नहीं।भगवत्प्राप्तिके सभी साधनोंमें अहंता (मैंपन) और ममता(मेरापन) का परिवर्तनरूप साधन बहुत सुगम और श्रेष्ठ है। अहंता और ममता -- दोनोंमें साधककी जैसी मान्यता होती है? उसके अनुसार? उसका भाव तथा क्रिया भी स्वतः होती है। साधककी अहंता यह होनी चाहिये कि मैं भगवान्का ही हूँ और,ममता यह होनी चाहिये कि भगवान् ही मेरे हैं। यह सबका अनुभव है कि हम अपनेको जिस वर्ण? आश्रम? सम्प्रदाय आदिका मानते हैं? उसीके अनुसार हमारा जीवन बनता है। पर यह मान्यता (जैसे -- मैं ब्राह्मण हूँ मैं साधु हूँ आदि) केवल (नाटकके स्वाँगकी तरह) कर्तव्यपालनके लिये है क्योंकि यह सदा रहनेवाली नहीं है। परन्तु मैं भगवान्का हूँ यह वास्तविकता सदा रहनेवाली है। मैं ब्राह्मण हूँ मैं साधु हूँ आदि भाव कभी हमसे ऐसा नहीं कहते कि तुम ब्राह्मण हो या तुम साधु हो। इसी प्रकार मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर? धन? जमीन? मकान आदि जिन पदार्थोंको हम भूलसे अपना मान रहे हैं? वे हमें कभी भी ऐसा नहीं कहते कि तुम हमारे हो? पर सम्पूर्ण सृष्टिके रचयिता परमात्मा स्पष्ट घोषणा करते हैं कि जीव मेरा ही हैविचार करना चाहिये कि शरीरादि पदार्थोंको हम अपने साथ लाये नहीं? इच्छानुसार उसमें परिवर्तन कर सकते नहीं? इच्छानुसार उनको अपने पास स्थिर रख सकते नहीं? हम भी उनके साथ सदा रह सकते नहीं? उनको अपने साथ ले जा सकते नहीं? फिर भी उनको अपना मानते हैं -- यह हमारी कितनी बड़ी भूल हैबचपनमें हमारे मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर जैसे थे? वैसे अब नहीं हैं? सबकेसब बदल गये हैं? फिर भी हम,मैं जो बचपनमें था? वही अब हूँ ऐसा मानते हैं। कारण यही है कि शरीरादिमें परिवर्तन होनेपर भी हमारेमें परिवर्तन नहीं हुआ। इस प्रकार शरीरादिमें हमें स्पष्ट परिवर्तन दीखता है। जिसको परिवर्तन दीखता है? वह स्वयं परिवर्तनरहित होता ही है। अतः संसारके पदार्थ? व्यक्ति हमारे साथी नहीं हैं।मैं भगवान्का हूँ -- ऐसा भाव रखना अपनेआपको भगवान्में लगाना है। साधकोंसे भूल यही होती है कि वे अपनेआपको भगवान्में न लगाकर मनबुद्धिको भगवान्में लगानेकी कोशिश करते हैं। मैं भगवान्का हूँ -- इस वास्तविकताको भूलकर मैं ब्राह्मण हूँ मैं साधु हूँ आदि भी मानते रहें और मनबुद्धिको भगवान्में लगाते रहें तो यह दुविधा कभी मिटेगी नहीं? और बहुत प्रयत्न करनेपर भी मनबुद्धि जैसे भगवान्में लगने चाहिये? वैसे लगेंगे नहीं। भगवान्ने भी इस अध्यायके चौथे श्लोकमें मैं उस परमात्माके शरण हूँ पदोंसे अपनेआपको परमात्मामें लगानेकी बात ही कही है। गोस्वामी तुलसीदासजी भी कहते हैं कि पहले भगवान्का होकर फिर नामजप आदि साधन करें तो अनेक जन्मोंकी बिगड़ी हुई स्थिति आज अभी सुधर सकती है -- बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु। होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु।।(दोहावली 22) तात्पर्य यह है कि भगवान्में केवल मनबुद्धि लगानेकी अपेक्षा अपनेआपको भगवान्में लगाना श्रेष्ठ है।,अपनेआपको भगवान्में लगानेसे मनबुद्धि स्वतः सुगमतापूर्वक भगवान्में लग जाते हैं। नाटकका पात्र हजारों दर्शकोंके सामने यह कहता है कि मैं रावणका बेटा मेघनाद हूँ और मेघनादकी तरह ही वह बाहरी सब क्रियाएँ करता है। परन्तु उसके भीतर यह भाव हरदम रहता है कि यह तो स्वाँग है वास्तवमें मैं मेघनाद हूँ ही नहीं। इसी तरह साधकोंको भी नाटकके स्वाँगकी तरह इस संसाररूपी नाट्यशालामें अपनेअपने कर्तव्यका पालन करते हुए भीतरसे मैं तो भगवान्का हूँ ऐसा भाव हरदम जाग्रत् रखना चाहिये।जीव सदासे ही भगवान्का है -- सनातनः। भगवान्ने न तो कभी जीवका त्याग ही किया? न कभी उससे विमुख ही हुए। जीव भी भगवान्का त्याग नहीं कर सकता। भगवान्के द्वारा मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके वह भगवान्से विमुख हुआ है। जिस प्रकार सोनेका गहना तत्त्वतः सोनेसे अलग नहीं हो सकता? उसी प्रकार जीव भी तत्त्वतः परमात्मासे कभी अलग नहीं हो सकता।बुद्धिमान् कहलानेवाले मनुष्यकी यह बहुत बड़ी भूल है कि वह अपने अंशी भगवान्से विमुख हो रहा है। वह इधर खयाल ही नहीं करता कि भगवान् इतने सुहृद् (दयालु और प्रेमी) हैं कि हमारे न चाहनेपर भी हमें चाहते हैं? न जाननेपर भी हमें जानते हैं। वे कितने उदार? दयालु और प्रेमी हैं -- इसका वर्णन भाषा? भाव? बुद्धि आदिके द्वारा हो ही नहीं सकता। ऐसे सुहृद् भगवान्को छोड़कर अन्य नाशवान् जड पदार्थोंको अपना मानना बुद्धिमानी नहीं? प्रत्युत महान् मूर्खता है।जब मनुष्य भगवान्के आज्ञानुसार अपने कर्तव्यका पालन करता है? तब वे उसकी इतनी उन्नति कर देते हैं कि जीवन सफल हो जाता है और जन्ममरणरूप बन्धन सदाके लिये मिट जाता है। जब मनुष्य भूलसे कोई निषिद्ध आचरण (पाप) कर बैठता है? तब वे दुःखोंको भेजकर उसको चेताते हैं? पुराने पापोंको भुगताकर उसको शुद्ध करते हैं और नये पापोंमें प्रवृत्तिसे रोकते हैं।जीव कहीं भी क्यों न हो? नरकमें हो अथवा स्वर्गमें? मनुष्ययोनिमें हो अथवा पशुयोनिमें? भगवान् उसको अपना ही अंश मानते हैं। यह उनकी कितनी अहैतुकी कृपा? उदारता और महत्ता है जीवके पतनको देखकर भगवान् दुःखी होकर कहते हैं कि मेरे पास आनेका उसका पूरा अधिकार था? पर वह मेरेको प्राप्त किये बिना (माम् अप्राप्य) नरकोंमें जा रहा है (गीता 16। 20)।मनुष्य चाहे किसी भी स्थितिमें क्यों न हो? भगवान् उसे वहाँ स्थिर नहीं रहने देते उसे अपनी ओर खींचते ही रहते हैं। जब हमारी सामान्य स्थितिमें कुछ भी परिवर्तन (सुखदुःख? आदरनिरादर आदि) हो? तब यह मानना चाहिये कि भगवान् हमें विशेषरूपसे याद करके नयी परिस्थिति पैदा कर रहे हैं हमें अपनी ओर खींच रहे हैं। ऐसा मानकर साधक प्रत्येक परिस्थितिमें विशेष भगवत्कृपाको देखकर मस्त रहे और भगवान्को कभी भूले नहीं।अंशीको प्राप्त करनेमें अंशको कठिनाई और देरी नहीं लगती। कठिनाई और देरी इसलिये लगती है कि अंशने अपने अंशीसे विमुखता मानकर उन शरीरादिको अपना मान रखा है? जो अपने नहीं हैं। अतः भगवान्के सम्मुख होते ही उनकी प्राप्ति स्वतःसिद्ध है। सम्मुख होना जीवका काम है क्योंकि जीव ही भगवान्से विमुख हुआ है। भगवान् तो जीवको अपना मानते ही हैं जीव भगवान्को अपना मान ले -- यही सम्मुखता है।मनुष्यसे यह ब़ड़ी भूल हो रही है कि जो व्यक्ति? वस्तु? परिस्थिति अभी नहीं है अथवा जिसका मिलना निश्चित भी नहीं है और जो मिलनेपर भी सदा नहीं रहेगी -- उसकी प्राप्तिमें वह अपना पूर्ण पुरुषार्थ और उन्नति मानता है। यह मनुष्यका अपने साथ बड़ा भारी धोखा है वास्तवमें जो नित्यप्राप्त और अपना है? उस परमात्माको प्राप्त करना ही मनुष्यका परम पुरुषार्थ है? शूरवीरता है। हम धन? सम्पत्ति आदि सांसारिक पदार्थ,कितने ही क्यों न प्राप्त कर लें? पर अन्तमें या तो वे नहीं रहेंगे अथवा हम नहीं रहेंगे। अन्तमें नहीं ही शेष रहेगा। वास्तवमें जो सदा है? उस(अविनाशी परमात्मा)को प्राप्त कर लेनेमें ही शूरवीरता है। जो नहीं है? उसको प्राप्त करनेमें कोई शूरवीरता नहीं है।जीव जितना ही नाशवान् पदार्थोंको महत्त्व देता है? उतना ही वह पतनकी तरफ जाता है और जितना ही अविनाशी परमात्माको महत्त्व देता है? उतना ही वह ऊँचा उठता है। कारण कि जीव परमात्माका ही अंश है।नाशवान् सांसारिक पदार्थोंको प्राप्त करके मनुष्य कभी भी बड़ा नहीं हो सकता। केवल बड़े होनेका वहम या धोखा हो जाता है और वास्तवमें असली बड़प्पन(परमात्मप्राप्ति) से वञ्चित हो जाता है। नाशवान् पदार्थोंके कारण माना गया बड़प्पन कभी टिकता नहीं और परमात्माके कारण होनेवाला बड़प्पन कभी मिटता नहीं इसलिये जीव जिसका अंश है? उस सर्वोपरि परमात्माको प्राप्त करनेसे ही वह बड़ा होता है। इतना बड़ा होता है कि देवतालोग भी उसका आदर करते हैं और कामना करते हैं कि वह हमारे लोकमें आये। इतना ही नहीं? स्वयं भगवान् भी उसके अधीन हो जाते हैं मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति -- भगवान्ने जिस प्रकार इसी श्लोकके पूर्वार्धमें जीवको अपनेमें स्थित न कहकर उसको अपना अंश बताया है? उसी प्रकार श्लोकके उत्तरार्धमें मन तथा इन्द्रियोंको प्रकृतिका अंश न कहकर उनको प्रकृतिमें स्थित बताया है। तात्पर्य है कि भगवान्का अंश जीव सदा भगवान्में ही स्थित है और प्रकृतिमें स्थित मन तथा इन्द्रियाँ प्रकृतिके ही अंश हैं। मन और इन्द्रियोंको अपना मानना? उनसे अपना सम्बन्ध मानना ही उनको आकर्षित करना है।यहाँ बुद्धिका अन्तर्भाव मन शब्दमें (जो अन्तःकरणका उपलक्षण है) और पाँच कर्मेन्द्रियों तथा पाँच प्राणोंका अन्तर्भाव इन्द्रिय शब्दमें मान लेना चाहिये। उपर्युक्त पदोंमें भगवान् कहते हैं कि मेरा अंश जीव मेरेमें स्थित रहता हुआ भी भूलसे अपनी स्थिति शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धिमें मान लेता है। जैसे शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि प्रकृतिका अंश होनेसे कभी प्रकृतिसे पृथक् नहीं होते? ऐसे ही जीव भी मेरा अंश होनेसे कभी मेरेसे पृथक् होता नहीं? हो सकता नहीं। परन्तु यह जीव मेरेसे विमुख होकर मुझे भूल गया है।यहाँ मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियोंका नाम लेनेका तात्पर्य यह है कि इन छहोंसे सम्बन्ध जोड़कर ही जीव बँधता है। अतः साधकको चाहिये कि वह शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धिको संसारके अर्पण कर दे अर्थात् संसारकी सेवामें लगा दे और अपनेआपको भगवान्के अर्पण कर दे।विशेष बात(1) मनुष्य भूलसे शरीर? स्त्री? पुत्र? धन? मकान? मान? बड़ाई आदि नाशवान् वस्तुओंको अपनी और अपने लिये मानकर दुःखी होता है। इससे भी नीची बात यह है कि इस सामग्रीके भोग और संग्रहको लेकर वह अपनेको बड़ा मानने लगता है जबकि वास्तवमें इनको अपना मानते ही इनका गुलाम हो जाता है। हमें पता लगे या न लगे? हम जिन पदार्थोंकी आवश्यकता समझते हैं? जिनमें कोई विशेषता या महत्त्व देखते हैं या जिनकी हम गरज रखते हैं? वे (धन? विद्या आदि) पदार्थ हमसे बड़े और हम उनसे तुच्छ हो ही गये। पदार्थोंके मिलनेमें जो अपना महत्त्व समझता है? वह वास्तवमें तुच्छ ही है? चाहे उसे पदार्थ मिलें या न मिलें।भगवान्का दास होनेपर भगवान् कहते हैं -- मैं तो हूँ भगतनका दास? भगत मेरे मुकुटमणि परंतु जिनके हम दास बने हुए हैं? वे धनादि जड पदार्थ कभी नहीं कहते -- लोभी मेरे मुकुटमणि वे तो केवल हमें अपना दास ही बनाते हैं। वास्तवमें भगवान्को अपना जानकर उनके शरण हो जानेसे ही मनुष्य बड़ा बनता,है? ऊँचा उठता है। इतना ही नहीं भगवान् ऐसे भक्तको अपनेसे भी बड़ा मान लेते हैं और कहते हैं -- अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः।।(श्रीमद्भा0 9। 4। 63)हे द्विज मैं भक्तोंके पराधीन हूँ? स्वतन्त्र नहीं। भक्तजन मेरेको अत्यन्त प्यारे हैं। मेरे हृदयपर उनका पूर्ण अधिकार है। कोई भी सांसारिक व्यक्ति? पदार्थ क्या हमें इतनी बड़ाई दे सकता हैयह जीव परमात्माका अंश होते हुए भी प्रकृतिके अंश शरीरादिको अपना मानकर स्वयं अपना अपमान करता है और अपनेको नीचे गिराता है। अगर मनुष्य इन शरीर? इन्द्रियाँ? मन आदि सांसारिक पदार्थोंका दास न बने? तो वह भगवान्का भी इष्ट हो जाय -- इष्टोऽसि मे दृढमिति (गीता 18। 64)। जिन्होंने भगवान्को प्राप्त कर लिया है? उनको भगवान् अपना प्रिय कहते हैं (गीता 12। 13 -- 19)। परंतु जिन्होंने भगवान्को प्राप्त नहीं किया है किंतु जो भगवान्को प्राप्त करना चाहते हैं? उन साधकोंको तो वे अपना अत्यन्त प्रिय कहते हैं -- भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः (गीता 12। 20)। ऐसे परम दयालु भगवान्को? जो साधकोंको अत्यन्त प्रिय और सिद्ध भक्तोंको केवल प्रिय कहते हैं? मनुष्य अपना नहीं मानता -- यह उसका कितना प्रमाद है(2) संसारका एक छोटासा अंश शरीर है और परमात्माका अंश स्वयं (जीवात्मा) है। भूल यह होती है कि परमात्माका अंश संसारके अंशके साथ मिलकर संसार और परमात्मा -- दोनोंको अपने अनुकूल बनाना चाहता है साधकका काम है -- इस भूलको मिटाना। इसके लिये वह शरीरको तो संसारके अनुकूल बना दे और स्वयं परमात्माके अनुकूल बन जाय। तात्पर्य है कि शरीरको संसारपर छोड़ दे कि जैसी संसारकी मरजी हो? वैसे रखे और अपनेको परमात्मापर छोड़ दे कि जैसी परमात्माकी मरजी हो? वैसे रखे।संसारकी चीज संसारको दे दे और परमात्माकी चीज परमात्माको दे दे -- यह ईमानदारी है। इस ईमानदारीका नाम ही मुक्ति है। जिसकी चीज है? उसको न दे संसारकी चीज भी ले ले और परमात्माकी चीज भी ले ले -- यह बेईमानी है। इस बेईमानीका नाम ही बन्धन है।संसारकी चीज संसारपर और परमात्माकी चीज परमात्मापर छोड़कर निश्चिन्त हो जाय। अपनी कोई कामना न रखे। न जीनेकी कामना रखे? न मरनेकी। भगवान् ऐसा कर देते तो ठीक रहता भगवान् वर्षा कर देते तो ठीक रहता गरमी ज्यादा पड़ रही है? थोड़ी कम कर देते तो अच्छा था बाढ़ आ गयी? वर्षा कम करते तो ठीक रहता -- इस तरह मनुष्य परमात्माको भी अपने अनुकूल बनाना चाहता है और संसारको भी। इस बातको छोड़कर अपनेआपको सर्वथा भगवान्के अर्पित कर दे और भगवान्से कह दे कि हे नाथ आप मेरेको पृथ्वीपर रखें या स्वर्गमें रखें अथवा नरकोंमें रखें बालक रखें या जवान रखें अथवा बूढ़ा रखें अपमानित रखें या सम्मानित रखें सुखी रखें या दुःखी रखें जैसी परिस्थितिमें रखना चाहें? वैसे रखें? पर मैं आपको भूलूँ नहीं।मनुष्य जिस घरको अपना मानता है? जिस कुटुम्बको अपना मानता है? जिन रुपयोंको अपना मानता है? उनकी ही चिन्ता उसको होती है। संसारमें लाखोंकरोड़ों घर हैं? अरबों आदमी हैं? अनगिनत रुपये हैं? पर उनकी चिन्ता नहीं होती क्योंकि उनको वह अपना नहीं मानता। जिनको अपना नहीं मानता? उनसे तो मुक्त है ही। अतः ज्यादा मुक्ति तो हो चुकी है? थोड़ीसी ही मुक्ति बाकी हैविचार करना चाहिये कि जिन थोड़ीसी चीजोंको हम अपनी मानते हैं? वे कौनसी सदा साथ रहनेवाली हैं चीजें तो रहेंगी नहीं? पर बन्धन (उनका सम्बन्ध) रह जायगा? जो जन्मजन्मान्तरतक साथ रहेगा। इसलिये साधकको चाहिये कि वह या तो शरीरको संसारके अर्पण कर दे? जो कर्मयोग है चाहे अपनेको शरीरसंसारसे सर्वथा अलग कर ले? जो ज्ञानयोग है और चाहे अपनेको भगवान्के अर्पण कर दे? जो भक्तियोग है। इन तीनोंमेंसे कोई भी साधन अपना ले? तीनोंका फल एक ही होगा। सम्बन्ध -- मनसहित इन्द्रियोंको अपना माननेके कारण जीव किस प्रकार उनको साथ लेकर अनेक योनियोंमें घूमता है -- इसका भगवान् दृष्टान्तसहित वर्णन करते हैं।
Sri Harikrishnadas Goenka
उ0 -- उसमें जो कारण है वह सुन --, जीवलोकमें अर्थात् संसारमें? जो जीवरूप शक्ति? भोक्ता? कर्ता इत्यादि नामोंसे प्रसिद्ध है? वह मुझ परमात्माका ही सनातन अंश है? अर्थात् अंग? भाग? एकदेश जो भी कुछ कहो? एक ही अभिप्राय है। जैसे जलमें प्रतीत होनेवाला सूर्यका अंश -- प्रतिबिम्ब? जलरूप निमित्तका नाश होनेपर? सूर्यको ही प्राप्त होकर फिर नहीं लौटता? वैसे ही उस परमात्माका यह अंश भी? उस परमात्मासे ही संयुक्त हो जाता है। फिर नहीं लौटता। अथवा जैसे घट आदि उपाधिसे परिच्छिन्न घटादिका आकाश? आकाशका ही अंश है और वह घट आदि निमित्तके नाश होनेपर? आकाशको ही प्राप्त होकर फिर नहीं लौटता? वैसे ही इसके विषयमें भी समझना चाहिये। सुतरां जहाँ जाकर नहीं लौटते यह कहना उचित ही है। पू0 -- अवयवरहित परमात्माका अवयव? एकदेश अथवा अंश? कैसे हो सकता है और यदि उसे अवयवयुक्त मानें? तो उन अवयवोंका विभाग होनेसे परमात्माके नाशका प्रसङ्ग आ जायगा। उ0 -- यह दोष नहीं है क्योंकि अविद्याकृत उपाधिसे परिच्छिन्न? एकदेश ही अंशकी भाँति माना गया है। यह बात क्षेत्राध्यायमें विस्तारपूर्वकर दिखलायी गयी है। वह मेरा अंशरूप माना हुआ जीव? संसारमें कैसे आता है और कैसे शरीर छोड़कर जाता है? सो बतलाते हैं -- ( यह जीवात्मा ) मन जिनमें छठा है? ऐसी कर्णछिद्रादि अपनेअपने गोलकरूप प्रकृतियोंमें स्थित हुई? श्रोत्रादि इन्द्रियोंको आकर्षित करता है।,
Sri Anandgiri
उक्तमनूद्याक्षिपति -- यद्गत्वेति। तत्र प्रसिद्धिं प्रमाणयति -- संयोगा इति। गमनस्यागमनान्तत्वप्रसिद्धेरयुक्तं यद्गत्वेत्याद्युपसंहरति -- कथमिति। आक्षेपं परिहरति -- शृण्विति। भगवत्प्राप्तेर्निवृत्त्यन्तत्वाभावः सप्तम्यर्थः। जीवस्य परांशत्वेऽपि कथमुक्तदोषसमाधिरित्याशङ्क्य प्रतिबिम्बपक्षमादाय दृष्टान्तेन प्रत्याचष्टे -- यथेति। अवच्छेदपक्षमाश्रित्य दृष्टान्तान्तरेणोक्तदोषसमाधिं दर्शयति -- यथा वेति। आक्षेपसमाधिमुपसंहरति -- अत इति। परस्य निरवयवत्वात्तदंशत्वं जीवस्यायुक्तमिति शङ्कते -- नन्विति। तस्य निरवयवत्वं साधयति -- सावयवत्वे चेति। वस्तुतो निरंशस्यापि परस्य कल्पनया जीवोंऽशो भविष्यतीति परिहरति -- नैष दोष इति। वस्तुतस्तु जीवस्य नांशत्वं परमात्मना तावन्मात्रताया दर्शितत्वादित्याह -- दर्शितश्चेति। यदि परस्यांशत्वेन कल्पितो जीवो वस्तुतस्तदात्मैव न तर्हि तस्य संसारित्वमुत्क्रान्तिर्वेति शङ्कते -- कथमिति। जीवस्य संसरणमुत्क्रमणं चोपपादयितुमुपक्रमते -- उच्यत इति।
Sri Dhanpati
ननु यद्गत्वा न निवर्तन्त इति नोपपद्यते कतेरागत्यन्तत्वात्। तदुक्तंसर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः। संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम् इत्याशङ्क्याह -- ममैवेति। जीवलोके संसारे जीवभूतो भोक्ता कर्तेति प्रसिद्धः। मम परमात्मन एवांशोऽवयवो नान्यस्य। अतएव सनातनः पुरातनः। एवंच यथा जलसूर्यकः सूर्यांशको जलनिमित्तापाये सूर्यं प्राप्य न निवर्तते? यथावा घटाद्युपाधिपरिच्छिन्नो घटाद्याकाश आकाशांशः सन् घटादिनिमित्तापाये आकांश प्राप्य नावर्तते तद्वज्जीवोऽपि मदंशः मां गत्वा पुनरावृत्तिशून्य एवेत्यतो युक्तमेव यद्गत्वा न निवर्तन्त इति। तथा चाविद्याकृतोपाधिपरिच्छिन्न एकदेशोंश इव कल्पिस्तत्त्वज्ञानेनाविद्यापागम उपाधेर्निमित्तभूतस्यापगमात् स्वरुपेणावतिष्ठते नतु निवयवस्य मुख्योऽवयवः संभवति सावयवत्वे च विनाशप्रसङ्गोऽनिष्टः स्यात्। यदि परस्यांशत्वेन कल्पितो जीवो वस्तुतः परमात्वैव तर्हि कथं संसरत्युत्क्रामति वेत्यपेक्षायामाह -- मन इति। मनःषष्ठानि श्रोत्रादीनिन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि स्वस्वप्रकृतौ कर्णशष्कुल्यातौ स्थाने स्थितानि कर्षति आकर्षति यदा पूर्वशरीराच्छारीरान्तरं प्राप्नोतीत्युत्तरेण संबन्धः। यत्त्वेवंभूतोऽपि सुषुप्ताकथमावर्तत इत्यत आह। मनः षष्ठं येषां तानि श्रोत्रादीनि पञ्चेन्द्रियाणि। इन्द्रस्यात्मो विषयोपलब्धिकरणताय लिङ्गानि जाग्रत्स्वप्नभोगजनककर्मक्षये प्रकृतिस्थानि प्रकृतावज्ञाने सूक्ष्मरुपेण स्थितानि पुनर्जाग्रद्भोगजनककर्मोदये भोगार्थ कर्षति। कूर्मोऽङ्गनीव प्रकृतेरज्ञानदाकर्षति। विषयग्रहणयोग्यतयाविर्भावयतीत्यर्थः। अतो ज्ञानादनावृत्तावज्ञानादनावृत्तिर्नोपपन्नेति भाव इतिव्याख्यानं तत्तु बह्वध्याहारसापेक्षमुत्तरश्लोकाननुबद्धम्। कस्मिन्काले कर्षतीत्यच्यत इति स्वग्रन्थाननुगुणं चात उपेक्ष्यमेवमन्येषामपि कुकल्पना भाष्यविरुद्धा नोपादेया।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| mama | my |
| eva | only |
| anśhaḥ | fragmental part |
| jīva | loke |
| jīva | bhūtaḥ |
| sanātanaḥ | eternal |
| manaḥ | with the mind |
| ṣhaṣhṭhāni | the six |
| indriyāṇi | senses |
| prakṛiti | sthāni |
| karṣhati | struggling |
Related Shloks
उस-(परमपद-) को न सूर्य, न चन्द्र और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है; और जिसको प्राप्त होकर जीव लौटकर (संसारमें) नहीं आते, वही मेरा परमधाम है। — VaniSagar
जैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको ग्रहण करके ले जाती है, ऐसे ही शरीरादिका स्वामी बना हुआ जीवात्मा भी जिस शरीरको छोड़ता है, वहाँसे मनसहित इन्द्रियोंको ग्रहण करके फिर जिस शरीरको प्राप्त होता है, उसमें चला जाता है। — VaniSagar
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“इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है; परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)। — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 7 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 7 का हिंदी अर्थ: "इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है; परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Purushottama Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 7?
Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 7 translates to: "An eternal portion of Myself having become a living soul in the world of life, draws to itself the five senses, with the mind as the sixth, abiding in Nature. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 15, श्लोक 7 है जो Bhagavad Gita के Purushottama Yoga में संकलित है। इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है; परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "mamaivānśho jīva-loke jīva-bhūtaḥ sanātanaḥ" mean in English?
"mamaivānśho jīva-loke jīva-bhūtaḥ sanātanaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 7. An eternal portion of Myself having become a living soul in the world of life, draws to itself the five senses, with the mind as the sixth, abiding in Nature. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.