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Sudarshana Chakra
Adhyay 15, Shlok 6
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम

उस-(परमपद-) को न सूर्य, न चन्द्र और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है; और जिसको प्राप्त होकर जीव लौटकर (संसारमें) नहीं आते, वही मेरा परमधाम है। — VaniSagar

Global Translations

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PunjabiIND

ਨਾ ਉੱਥੇ ਸੂਰਜ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਨਾ ਚੰਦਰਮਾ, ਨਾ ਅੱਗ; ਉੱਥੇ ਜਾਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਉਹ ਵਾਪਸ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦੇ; ਉਹ ਮੇਰਾ ਪਰਮ ਨਿਵਾਸ ਹੈ।

TamilIND

சூரியனும், சந்திரனும், நெருப்பும் அங்கே ஒளிர்வதில்லை; அங்கு சென்ற அவர்கள் திரும்பி வருவதில்லை; அதுவே எனது உன்னத இருப்பிடம்.

OdiaIND

ନା ସୂର୍ଯ୍ୟ ସେଠାରେ ଆଲୋକିତ ହୁଏ, ନା ଚନ୍ଦ୍ର, ନା ଅଗ୍ନି; ସେଠାକୁ ଯାଇ ସେମାନେ ଆଉ ଫେରି ନାହାଁନ୍ତି; ତାହା ହେଉଛି ମୋର ସର୍ବୋଚ୍ଚ ବାସସ୍ଥାନ।

BhojpuriIND

ना त ओहिजा सूरज रोशन होला, ना चंद्रमा, ना आग; उहाँ गईला के बाद उ लोग वापस ना आवेले। उहे हमार परम धाम ह।

KonkaniIND

थंय सूर्य उजवाडना, चंद्र, उजो; थंय वचून ते परत येना; तें माझें परम धाम.

MalayalamIND

അവിടെ സൂര്യനോ, ചന്ദ്രനോ, അഗ്നിയോ പ്രകാശിക്കുന്നില്ല; അവിടെ പോയിട്ടും അവർ തിരിച്ചു വരുന്നില്ല; അതാണ് എൻ്റെ പരമമായ വാസസ്ഥലം.

SindhiIND

اتي نه سج روشن ٿئي ٿو، نه چنڊ، نه باهه؛ اتي وڃڻ کان پوء، اهي واپس نه ايندا آهن. اهو منهنجو اعليٰ مقام آهي.

MarathiIND

तेथे ना सूर्य प्रकाशतो, ना चंद्र, ना अग्नी; तेथे गेल्यावर ते परत येत नाहीत. ते माझे सर्वोच्च निवासस्थान आहे.

GujaratiIND

ત્યાં ન તો સૂર્ય પ્રકાશે છે, ન ચંદ્ર, ન અગ્નિ; ત્યાં ગયા પછી, તેઓ પાછા આવતા નથી; તે મારું સર્વોચ્ચ ધામ છે.

TeluguIND

అక్కడ సూర్యుడు గానీ, చంద్రుడు గానీ, అగ్ని గానీ ప్రకాశించడు; అక్కడికి వెళ్ళిన తరువాత, వారు తిరిగి రారు; అది నా సర్వోన్నత నివాసం.

NepaliIND

त्यहाँ न सूर्यले उज्यालो दिन्छ, न चन्द्रमा, न आगो; त्यहाँ गएर फर्केर आउँदैनन्। त्यो मेरो सर्वोच्च निवास हो।

BengaliIND

সেখানে না সূর্য আলোকিত করে, না চাঁদ, না আগুন; সেখানে গিয়ে তারা ফিরে আসে না; এটাই আমার সর্বোচ্চ আবাস।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- [छठा श्लोक पाँचवें और सातवें श्लोकोंको जोड़नेवाला है। इन श्लोकोंमें भगवान् यह बताते हैं कि वह अविनाशी पद मेरा ही धाम है? जो मेरेसे अभिन्न है और जीव भी मेरा अंश होनेके कारण मेरेसे अभिन्न है। अतः जीवकी भी उस धाम(अविनाशी पद) से अभिन्नता है अर्थात् वह उस धामको नित्यप्राप्त है।यद्यपि इस छठे श्लोकका बारहवें श्लोकसे घनिष्ठ सम्बन्ध है? तथापि पाँचवें और सातवें श्लोकोंको जोड़नेके लिये इसको यहाँ दिया गया है। इस श्लोकमें भगवान्ने दो खास बातें बतायी हैं -- (1) उस धामको सूर्यादि प्रकाशित नहीं कर सकते (जिसका कारणरूपसे विवेचन भगवान्ने इसी अध्यायके बारहवें श्लोकमें किया है) और (2) उस धामको प्राप्त हुए जीव पुनः लौटकर संसारमें नहीं आते (जिसका कारणरूपसे विवेचन भगवान्ने इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें किया है)।]न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः -- दृश्य जगत्में सूर्यके समान तेजस्वी? प्रकाशस्वरूप कोई चीज नहीं है। वह सूर्य भी उस परमधामको प्रकाशित करनेमें असमर्थ है फिर सूर्यसे प्रकाशित होनेवाले चन्द्र और अग्नि उसे प्रकाशित कर ही कैसे सकते हैं इसी अध्यायके बारहवें श्लोकमें भगवान् स्पष्ट कहेंगे कि सूर्य? चन्द्र और अग्निमें मेरा ही तेज है। मेरेसे ही प्रकाश पाकर ये भौतिक जगत्को प्रकाशित करते हैं। अतः जो उस परमात्मतत्त्वसे प्रकाश पाते हैं? उनके द्वारा परमात्मस्वरूप परमधाम कैसे प्रकाशित हो सकता है तात्पर्य यह है कि परमात्मतत्त्व चेतन है और सूर्य? चन्द्र तथा अग्नि जड (प्राकृत) हैं। ये सूर्य? चन्द्र और अग्नि क्रमशः नेत्र? मन और वाणीको प्रकाशित करते हैं। ये तीनों (नेत्र? मन और वाणी) भी जड ही हैं। इसलिये नेत्रोंसे उस परमात्मतत्त्वको देखा नहीं जा सकता? मनसे उसका चिन्तन नहीं किया जा सकता और वाणीसे उसका वर्णन नहीं किया जा सकता क्योंकि जड तत्त्वसे चेतन परमात्मतत्त्वकी अनुभूति नहीं हो सकती। वह चेतन (प्रकाशक) तत्त्व इन सभी प्रकाशित पदार्थोंमें सदा परिपूर्ण है। उस तत्त्वमें अपनी प्रकाशकताका अभिमान नहीं है।चेतन जीवात्मा भी परमात्माका अंश होनेके कारण स्वयं प्रकाशस्वरूप है अतः उसको भी जड पदार्थ (मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ आदि) प्रकाशित नहीं कर सकते। मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ आदि जडपदार्थोंका उपयोग (भगवान्के नाते दूसरोंकी सेवा करके) केवल जडतासे सम्बन्धविच्छेद करनेमें ही है।एक बात ध्यान देनेकी है कि यहाँ सूर्यको भगवान् या देव की दृष्टिसे न देखकर केवल प्रकाश करनेवाले पदार्थोंकी दृष्टिसे देखा गया है। तात्पर्य है कि सूर्य तैजसतत्त्वोंमें श्रेष्ठ है अतः यहाँ केवल सूर्यकी बात नहीं? प्रत्युत चन्द्र आदि सभी तैजसतत्त्वोंकी बात चल रही है। जैसे? दसवें अध्यायके सैंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि वृष्णिवंशियोंमें मैं वासुदेव हूँ (गीता 10। 37)? तो वहाँ वासुदेवका भगवान्के रूपसे वर्णन नहीं? प्रत्युत वृष्णिवंशके श्रेष्ठ पुरुषके रूपसे ही वर्णन है।यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम -- जीव परमात्माका अंश है। वह जबतक अपने अंशी परमात्माको प्राप्त नहीं कर लेता? तबतक उसका आवागमन नहीं मिट सकता। जैसे नदियोंके जलको अपने अंशी समुद्रसे मिलनेपर ही स्थिरता मिलती है? ऐसे ही जीवको अपने अंशी परमात्मासे मिलनेपर ही वास्तविक? स्थायी शान्ति मिलती है। वास्तवमें जीव परमात्मासे अभिन्न ही है? पर संसारके (माने हुए) सङ्गके कारण उसको ऊँचनीच योनियोंमें जाना पड़ता है।यहाँ परमधाम शब्द परमात्माका धाम और परमात्मा -- दोनोंका ही वाचक है। यह परमधाम प्रकाशस्वरूप है। जैसे सूर्य अपने स्थानविशेषपर भी स्थित है और प्रकाशरूपसे सब जगह भी स्थित है अर्थात् सूर्य और उसका प्रकाश परस्पर अभिन्न हैं? ऐसे ही परमधाम और सर्वव्यापी परमात्मा भी परस्पर अभिन्न हैं।भक्तोंकी भिन्नभिन्न मान्यताओँके कारण ब्रह्मलोक? साकेत धाम? गोलोक धाम? देवीद्वीप? शिवलोक आदि सब एक ही परमाधामके भिन्नभिन्न नाम हैं। यह परमधाम चेतन? ज्ञानस्वरूप? प्रकाशस्वरूप और परमात्मस्वरूप है।यह अविनाशी परमपद आत्मरूपसे सबमें समानरूपसे अनुस्यूत (व्याप्त) है। अतः स्वरूपसे हम उस परमपदमें स्थित हैं ही परन्तु जडता(शरीर आदि) से तादात्म्य? ममता और कामनाके कारण हमें उसकी प्राप्ति अथवा उसमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव नहीं हो रहा है। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अपने परमधामका वर्णन करते हुए यह बताया कि उसको प्राप्त होकर जीव लौटकर संसारमें नहीं आते। उसके विवेचनके रूपमें अपने अंश जीवात्माको भी (परमधामकी ही तरह) अपनेसे अभिन्न बताते हुए? जीवसे क्या भूल हो रही है कि जिससे उसको नित्यप्राप्त परमात्मस्वरूप परमधामका अनुभव नहीं हो रहा है -- इसका हेतुसहित वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

वही पद फिर अन्य विशेषणोंसे बतलाया जाता है --, तत् शब्दका आगेवाले -- व्यवधानयुक्त धाम शब्दके साथ सम्बन्ध है। उस तेजोमय धामको यानी परमपदको? सूर्य -- आदित्य सबको प्रकाशित करनेकी शक्तिवाला होनेपर भी प्रकाशित नहीं कर सकता। वैसे ही शशाङ्क -- चन्द्रमा और पावक -- अग्नि भी प्रकाशित नहीं कर सकता। जिस परमधामको यानी वैष्णवपदको पाकर मनुष्य पीछे नहीं लौटते और जिसको सूर्यादि ज्योतियाँ प्रकाशित नहीं कर सकतीं? वह मुझ विष्णुका परमधाम -- पद है। पू0 -- जहाँ जाकर फिर नहीं लौटते यह बात कही गयी। परंतु सभी गतियाँ? अन्तमें पुनरागमनयुक्त होती हैं और सभी संयोग अन्तमें वियोगवाले होते हैं? यह बात प्रसिद्ध है। फिर यह बात कैसे कही जाती है कि उस धामको प्राप्त हुए पुरुषोंका पुनरागमन नहीं होता

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Sri Anandgiri

तच्चेत्पदं वेद्यं कर्तुरन्यत्कर्मेति द्वैतापातोऽवेद्यं चेदपुमर्थत्वात्प्रेप्सितत्वासिद्धिरित्याशङ्क्याह -- तदेवेति।

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Sri Dhanpati

ननु गच्छन्तीत्यस्यासन्निहितं देशान्तरं गत्वा प्राप्नुवन्तीत्यर्थ उत सन्निकृष्टं तमसावृतघटमिवावरणनिवृत्त्या प्राप्नुवन्तीति। नाद्यः। येन सर्वमिदं ततमित्याद्युक्तिविरोधात् द्वैतापत्तिरवेद्यं चेदपुरुषार्थत्वात् प्रेप्सितत्वासिद्धिरित्याशङ्का,सूर्याद्यभास्यत्वेनावेद्यमपि धाम तेजोरुपं सर्वावभासकत्वादतन्निरासे सति स्वयमेव प्रकाशत इति पुरुषार्थत्वान्नाप्रेप्सितमिति निरसुतुं तदेव पदं पुनर्विशष्टि -- नेति। तद्धाम तेजोरुपं सूर्याद्यवभासकं सूर्यादयो न प्रकाशयन्ति तत्प्रकाश्यानां तत्प्रकाशकत्वायोगात्। शसाङ्कशचन्द्रः। पावकोऽग्निः। तथाच श्रुतिःन तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनु भाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति। यद्वैष्णवं पदं गत्वा प्राप्य न निवर्तन्ते यच्च सूर्यादिभिर्नावभाष्यते तद्धाम स्वप्रकाशरुपं सर्वावभासकं परमं प्रकृष्टं सर्वोत्तमं मम श्रीविष्णोः। षष्ठी तुतद्विष्णो परमं पदंआनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुचश्चन इति श्रुत्यनुरोधेन राहोः शिर इतिवदौपचारिकसंबन्धविवक्षया नतु भेदविवक्षया।एकमेवाद्वितीयंविज्ञानमानन्दं ब्रह्ममृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति इत्यादिश्रुतेः। केचित्तु तत्रावेद्यत्वं सूर्याद्यभाष्यत्वेनात्रोक्तं सर्वभासकत्वेन तु स्वयमपरोक्षत्वंयदादित्यगतं तेज इत्यत्र वक्ष्यति। एवमुभाभ्यां श्लोकाभ्यां श्रुतर्दलद्वयं व्याख्यातमिति द्रष्टव्यमिति वर्णयन्ति। सूर्यो न भासयते इत्यनेन रुपादिहीनत्वेन चक्षुषाद्ययोग्यत्वात्सर्वेषां बाह्येन्द्रियाणां निवृतिः। न शशाङ्क इत्यनेन मनोनुग्राहकचन्द्रनिषेधे मनसः। न पावक इति वाचो निवृत्तिः।न चक्षुषा गृह्यते? यन्मनसा न मनुते? यद्वाचानभ्युदितम् इति श्रुतेरित्यन्येषां व्याख्याने तु लक्षणादोषो द्रष्टव्यः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
naneither
tatthat
bhāsayateillumine
sūryaḥthe sun
nanor
śhaśhāṅkaḥthe moon
nanor
pāvakaḥfire
yatwhere
gatvāhaving gone
nanever
nivartantethey return
tatthat
dhāmaabode
paramamsupreme
mamamine
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 15.5
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्

जो मान और मोहसे रहित हो गये हैं, जिन्होंने आसक्तिसे होनेवाले दोषोंको जीत लिया है, जो नित्य-निरन्तर परमात्मामें ही लगे हुए हैं, जो (अपनी दृष्टिसे) सम्पूर्ण कामनाओंसे रहित हो गये हैं, जो सुख-दुःखरूप द्वन्द्वोंसे मुक्त हो गये हैं, ऐसे (ऊँची स्थितिवाले) मोहरहित साधक भक्त उस अविनाशी परमपद-(परमात्मा-) को प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 15.7
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति

इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है; परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 15Shlok 6
Bhagavad Gita · Adhyay 15, Shlok 6
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम

उस-(परमपद-) को न सूर्य, न चन्द्र और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है; और जिसको प्राप्त होकर जीव लौटकर (संसारमें) नहीं आते, वही मेरा परमधाम है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ: "उस-(परमपद-) को न सूर्य, न चन्द्र और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है; और जिसको प्राप्त होकर जीव लौटकर (संसारमें) नहीं आते, वही मेरा परमधाम है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Purushottama Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 6?

Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 6 translates to: "Neither does the sun illuminate there, nor the moon, nor the fire; having gone there, they do not return; that is My supreme abode. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 15, श्लोक 6 है जो Bhagavad Gita के Purushottama Yoga में संकलित है। उस-(परमपद-) को न सूर्य, न चन्द्र और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है; और जिसको प्राप्त होकर जीव लौटकर (संसारमें) नहीं आते, वही मेरा परमधाम है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "na tad bhāsayate sūryo na śhaśhāṅko na pāvakaḥ" mean in English?

"na tad bhāsayate sūryo na śhaśhāṅko na pāvakaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 6. Neither does the sun illuminate there, nor the moon, nor the fire; having gone there, they do not return; that is My supreme abode. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.