Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 15, Shlok 8
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्

जैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको ग्रहण करके ले जाती है, ऐसे ही शरीरादिका स्वामी बना हुआ जीवात्मा भी जिस शरीरको छोड़ता है, वहाँसे मनसहित इन्द्रियोंको ग्रहण करके फिर जिस शरीरको प्राप्त होता है, उसमें चला जाता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

NepaliIND

जसरी हावाले आफ्नो आसन (फूल, आदि) बाट सुगन्ध लिन्छ, त्यसरी नै भगवानले व्यक्तिगत आत्माको रूपमा शरीर प्राप्त गर्दा र जब उहाँले त्यसलाई छोड्नुहुन्छ, उहाँले तिनीहरूलाई आफूसँगै लैजानुहुन्छ।

SindhiIND

جڏهن رب، انفرادي روح جي حيثيت ۾، هڪ جسم حاصل ڪري ٿو ۽ جڏهن هو ان کي ڇڏي ٿو، هو انهن کي پاڻ سان گڏ وٺي ٿو، جيئن واء انهن جي سيٽن (گلن وغيره) جي خوشبوء کي وٺي ٿو.

BengaliIND

যখন প্রভু, স্বতন্ত্র আত্মা হিসাবে, একটি দেহ লাভ করেন এবং যখন তিনি তা ত্যাগ করেন, তখন তিনি এগুলিকে নিজের সাথে নিয়ে যান, যেমন বাতাস তাদের আসন (ফুল ইত্যাদি) থেকে ঘ্রাণ নেয়।

MalayalamIND

ഭഗവാൻ, ഒരു വ്യക്തി എന്ന നിലയിൽ, ഒരു ശരീരം നേടുമ്പോൾ, അവൻ അത് ഉപേക്ഷിക്കുമ്പോൾ, കാറ്റ് അവരുടെ ഇരിപ്പിടങ്ങളിൽ നിന്ന് (പൂക്കൾ മുതലായവ) സുഗന്ധം എടുക്കുന്നതുപോലെ, അവൻ ഇവയെ തന്നോടൊപ്പം കൊണ്ടുപോകുന്നു.

GujaratiIND

જ્યારે ભગવાન, વ્યક્તિગત આત્મા તરીકે, શરીર મેળવે છે અને જ્યારે તે તેને છોડે છે, ત્યારે તે તેને પોતાની સાથે લઈ જાય છે, જેમ પવન તેમની બેઠકો (ફૂલો વગેરે) માંથી સુગંધ લે છે.

MarathiIND

जेव्हा परमेश्वर, वैयक्तिक आत्मा म्हणून, एक शरीर प्राप्त करतो आणि जेव्हा तो सोडतो तेव्हा तो त्यांना आपल्यासोबत घेतो, ज्याप्रमाणे वारा त्यांच्या आसनांमधून सुगंध घेतो (फुले इ.).

PunjabiIND

ਜਦੋਂ ਪ੍ਰਭੂ, ਵਿਅਕਤੀਗਤ ਆਤਮਾ ਵਜੋਂ, ਸਰੀਰ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਜਦੋਂ ਉਹ ਇਸ ਨੂੰ ਛੱਡਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਉਹ ਇਹਨਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਨਾਲ ਲੈ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਜਿਵੇਂ ਹਵਾ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਆਸਨ (ਫੁੱਲਾਂ ਆਦਿ) ਤੋਂ ਖੁਸ਼ਬੂ ਲੈ ਲੈਂਦੀ ਹੈ।

KannadaIND

ಭಗವಂತನು ಪ್ರತ್ಯೇಕ ಆತ್ಮವಾಗಿ, ದೇಹವನ್ನು ಪಡೆದಾಗ ಮತ್ತು ಅವನು ಅದನ್ನು ತೊರೆದಾಗ, ಗಾಳಿಯು ಅವುಗಳ ಆಸನಗಳಿಂದ (ಹೂವುಗಳು, ಇತ್ಯಾದಿ) ಪರಿಮಳವನ್ನು ತೆಗೆದುಕೊಳ್ಳುವಂತೆ ಅವನು ಇವುಗಳನ್ನು ತನ್ನೊಂದಿಗೆ ತೆಗೆದುಕೊಳ್ಳುತ್ತಾನೆ.

TamilIND

இறைவன், தனி ஆன்மாவாக, ஒரு உடலைப் பெற்று, அதை விட்டு வெளியேறும்போது, ​​காற்று அவற்றின் இடங்களிலிருந்து (மலர்கள், முதலியன) வாசனைகளை எடுத்துச் செல்வது போல, இவற்றையும் தன்னுடன் எடுத்துச் செல்கிறார்.

TeluguIND

భగవంతుడు, వ్యక్తిగత ఆత్మగా, ఒక శరీరాన్ని పొందినప్పుడు మరియు అతను దానిని విడిచిపెట్టినప్పుడు, గాలి వారి సీట్ల నుండి (పువ్వులు మొదలైనవి) సువాసనలను తీసుకువెళుతున్నట్లుగా, అతను వాటిని తనతో తీసుకువెళతాడు.

BhojpuriIND

जब भगवान, व्यक्तिगत आत्मा के रूप में, कवनो शरीर प्राप्त करेला आ जब ऊ ओकरा के छोड़ देला त ऊ एह सब के अपना साथे ले जाला, ठीक ओसहीं जइसे हवा ओह लोग के आसन (फूल आदि) से सुगंध ले जाले।

DogriIND

जदूं प्रभु, व्यक्तिगत आत्मा दे तौर उप्पर, इक शरीर हासल करदा ऐ ते जदूं ओह् उसी छड्डी जंदा ऐ तां ओह् इन्हें गी अपने कन्नै लेई जंदा ऐ, जि'यां हवा उंदे आसनें (फूल बगैरा) थमां खुशबूएं गी लेई जंदी ऐ।

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- वायुर्गन्धानिवाशयात् -- जिस प्रकार वायु इत्रके फोहेसे गन्ध ले जाती है किन्तु वह गन्ध स्थायीरूपसे वायुमें नहीं रहती क्योंकि वायु और गन्धका सम्बन्ध नित्य नहीं है? इसी प्रकार इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि? स्वभाव आदि(सूक्ष्म और कारण -- दोनों शरीरों) को अपना माननेके कारण जीवात्मा उनको साथ लेकर दूसरी योनिमें जाता है।जैसे वायु तत्त्वतः गन्धसे निर्लिप्त है? ऐसे ही जीवात्मा भी तत्त्वतः मन? इन्द्रियाँ? शरीरादिसे निर्लिप्त है परन्तु इन मन? इन्द्रियाँ? शरीरादिमें मैंमेरेपनकी मान्यता होनेके कारण वह (जीवात्मा) इनका आकर्षण करता है।जैसे वायु आकाशका कार्य होते हुए भी पृथ्वीके अंश गन्धको साथ लिये घूमती है? ऐसे ही जीवात्मा परमात्माका सनातन अंश होते हुए भी प्रकृतिके कार्य (प्रतिक्षण बदलनेवाले) शरीरोंको साथ लिये भिन्नभिन्न योनियोंमें घूमता है। जड होनेके कारण वायुमें यह विवेक नहीं है कि वह गन्धको ग्रहण न करे परन्तु जीवात्माको तो यह विवेक और सामर्थ्य मिला हुआ है कि वह जब चाहे? तब शरीरसे सम्बन्ध मिटा सकता है। भगवान्ने मनुष्यमात्रको यह स्वतन्त्रता दे रखी है कि वह चाहे जिससे सम्बन्ध जोड़ सकता है और चाहे जिससे सम्बन्ध तोड़ सकता है। अपनी भूल मिटानेके लिये केवल अपनी मान्यता बदलनेकी आवश्यकता है कि प्रकृतिके अंश इन स्थूल? सूक्ष्म और कारणशरीरोंसे मेरा (जीवात्मका) कोई सम्बन्ध नहीं है। फिर जन्ममरणके बन्धनसे सहज ही मुक्ति है।भगवान्ने यहाँ तीन शब्द दृष्टान्तके रूपमें दिये हैं -- (1) वायु? (2) गन्ध और (3) आशय। आशय कहते हैं स्थानको जैसे -- जलाशय (जलआशय) अर्थात् जलका स्थान। यहाँ आशय नाम स्थूलशरीरका है। जिस प्रकार गन्धके स्थान (आशय) इत्रके फोहेसे वायु गन्ध ले जाती है और फोहा पीछे पड़ा रहता है? इसी प्रकार वायुरूप जीवात्मा गन्धरूप सूक्ष्म और कारणशरीरोंको साथ लेकर जाता है? तब गन्धका आशयरूप स्थूलशरीर पीछे रह जाता है।शरीरं यदवाप्नोति ৷৷. गृहीत्वैतानि संयाति -- यहाँ ईश्वरः पद जीवात्माका वाचक है। इस जीवात्मासे तीन खास भूलें हो रही हैं --,(1) अपनेको मन? बुद्धि? शरीरादि जड पदार्थोंका स्वामी मानता है? पर वास्तवमें बन जाता है स्वयं उनका दास।(2) अपनेको उन जड पदार्थोंका स्वामी मान लेनेके कारण अपने वास्तविक स्वामी परमात्माको भूल जाता है।(3) जड पदार्थोंसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करनेमें स्वाधीन होनेपर भी उनका त्याग नहीं करता।परमात्माने जीवात्माको शरीरादि सामग्रीका सदुपयोग करनेकी स्वाधीनता दी है। उनका सदुपयोग करके अपना उद्धार करनेके लिये ये वस्तुएँ दी हैं? उनका स्वामी बननेके लिये नहीं। परन्तु जीवसे यह बहुत बड़ी भूल होती है कि वह उस सामग्रीका सदुपयोग नहीं करता प्रत्युत अपनेको उनका मालिक मान लेता है? पर वास्तवमें उनका गुलाम बन जाता है।जीवात्मा जड पदार्थोंसे माने हुए सम्बन्धका त्याग तभी कर सकता है? जब उसे यह मालूम हो जाय कि इनका मालिक बननेसे मैं सर्वथा पराधीन हो गया हूँ और मेरा पतन हो गया है। यह जिनका मालिक बनता है? उनकी गुलामी इसमें आ ही जाती है। इसे केवल वहम होता है कि मैं इनका मालिक हूँ। जड पदार्थोंका मालिक बन जानेसे एक तो इसे उन पदार्थोंकी कमी का अनुभव होता है और दूसरा यह अपनेको अनाथ मान लेता है।जिसे मालिकपना या अधिकार प्यारा लगता है? वह परमात्माको प्राप्त नहीं कर सकता क्योंकि जो किसी व्यक्ति? वस्तु? पद आदिका स्वामी बनता है? वह अपने स्वामीको भूल जाता है -- यह नियम है। उदाहरणार्थ? जिस समय बालक केवल माँको अपना मानकर उसे ही चाहता है? उस समय वह माँके बिना रह ही नहीं सकता। किन्तु वही बालक जब बड़ा होकर गृहस्थ बन जाता है और अपनेको स्त्री? पुत्र आदिका स्वामी मानने लगता है? तब उसी माँका पास रहना उसे सुहाता नहीं। यह स्वामी बननेका ही परिणाम है इसी प्रकार यह जीवात्मा भी शरारीदि जड पदार्थोंका स्वामी (ईश्वर) बनकर अपने वास्तविक स्वामी परमात्माको भूल जाता है -- उनसे विमुख हो जाता है। जबतक यह भूल या विमुखता रहेगी? तबतक जीवात्मा दुःख पाता ही रहेगा।ईश्वरः पदके साथ अपि पद एक विशेष अर्थ रखता है कि यह ईश्वर बना जीवात्मा वायुके समान असमर्थ? जड और पराधीन नहीं है। इस जीवात्मामें ऐसी सामर्थ्य और विवेक है कि यह जब चाहे? तब माने हुए सम्बन्धको छोड़ सकता है और परमात्माके साथ नित्य सम्बन्धका अनुभव कर सकता है। परन्तु संयोगजन्य सुखकी लोलुपताके कारण यह संसारसे माने हुए सम्बन्धको छोड़ता नहीं और छोड़ना चाहता भी नहीं। जडता(शरीरादि) से तादात्म्य छूटनेपर जीवात्मा (गन्धकी तरह) शरीरोंको साथ ले जा सकता ही नहीं।जीवको दो शक्तियाँ प्राप्त हैं -- (1) प्राणशक्ति? जिससे श्वासोंका आवागमन होता है और (2) इच्छाशक्ति? जिससे भोगोंको पानेकी इच्छा करता है। प्राणशक्ति हरदम (श्वासोच्छ्वासके द्वारा) क्षीण होती रहती है। प्राणशक्तिका खत्म होना ही मृत्यु कहलाती है। जडका संग करनेसे कुछ करने और पानेकी इच्छा बनी रहती है। प्राणशक्तिके रहते हुए इच्छाशक्ति अर्थात् कुछ करने और पानेकी इच्छा मिट जाय? तो मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। प्राणशक्ति नष्ट हो जाय और इच्छाएँ बनी रहें? तो दूसरा जन्म लेना ही पड़ता है। नया शरीर मिलनेपर इच्छाशक्ति तो वही (पूर्वजन्मकी) रहती है? प्राणशक्ति नयी मिल जाती है।प्राणशक्तिका व्यय इच्छाओंको मिटानेमें होना चाहिये। निःस्वार्थभावसे सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत रहनेसे इच्छाएँ सुगमतापूर्वक मिट जाती हैं।यहाँ गृहीत्वा पदका तात्पर्य है -- जो अपने नहीं हैं? उनसे राग? ममता? प्रियता करना। जिन मन? इन्द्रियोंके साथ अपनापन करके जीवात्मा उनको साथ लिये फिरता है? वे मन? इन्द्रियाँ कभी नहीं कहतीं कि हम तुम्हारी हैं और तुम हमारे हो। इनपर जीवात्माका शासन भी चलता नहीं जैसा चाहे वैसा रख सकता नहीं? परिवर्तन कर सकता नहीं फिर भी इनके साथ अपनापन रखता है? जो कि भूल ही है। वास्तवमें यह अपनेपनका (राग? ममतायुक्त) सम्बन्ध ही बाँधनेवाला होता है।वस्तु हमें प्राप्त हो या न हो? बढ़िया हो या घटिया हो? हमारे काममें आये या न आये? दूर हो या पास हो,यदि उस वस्तुको हम अपनी मानते हैं तो उससे हमारा सम्बन्ध बना हुआ ही है।अपनी तरफसे छोड़े बिना शरीरादिमें ममताका सम्बन्ध मरनेपर भी नहीं छूटता। इसलिये मृत शरीरकी हड्डियोंको गङ्गाजीमें डालनेसे उस जीवकी आगे गति होती है। इस माने हुए सम्बन्धको छोड़नेमें हम सर्वथा स्वतन्त्र तथा सबल हैं। यदि शरीरके रहते हुए ही हम उससे अपनापन हटा दें? तो जीतेजी ही मुक्त हो जायँजो अपना नहीं है? उसको अपना मानना और जो अपना है? उसको अपना न मानना -- यह बहुत ब़ड़ा दोष है? जिसके कारण ही पारमार्थिक मार्गमें उन्नति नहीं होती।इस श्लोकमें आया एतानि पद सातवें श्लोकके मनःषष्ठानीन्द्रियाणि (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन) का वाचक है। यहाँ एतानि पदको सत्रह तत्त्वोंके समुदायरूप सूक्ष्मशरीर एवं कारणशरीर(स्वभाव) का भी द्योतक मानना चाहिये। इस सबको ग्रहण करके जीवात्मा दूसरे शरीरमें जाता है। जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंका त्याग करके नये वस्त्र धारण करता है? ऐसे ही जीवात्मा पुराने शरीरका त्याग करके नये शरीरको प्राप्त होता है (गीता 2। 22)।वास्तवमें शुद्ध चेतन(आत्मा)का किसी शरीरको प्राप्त करना और उसका त्याग करके दूसरे शरीरमें जाना हो नहीं सकता क्योंकि आत्मा अचल और समानरूपसे सर्वत्र व्याप्त है (गीता 2। 17? 24)। शरीरोंका ग्रहण और त्याग परिच्छिन्न (एकदेशीय) तत्त्वके द्वारा ही होना सम्भव है? जबकि आत्मा कभी किसी भी देशकालादिमें परिच्छिन्न नहीं हो सकता। परन्तु जब यह आत्मा प्रकृतिके कार्य शरीरसे तादात्म्य कर लेता है अर्थात् प्रकृतिस्थ हो जाता है? तब (स्थूल? सूक्ष्म और कारण -- तीनों शरीरोंमें अपनेको तथा अपनेमें तीनों शरीरोंको धारण करने अर्थात् उनमें अपनापन करनेसे) वह प्रकृतिके कार्य शरीरोंका ग्रहणत्याग करने लगता है। तात्पर्य यह है कि शरीरको मैं और मेरा मान लेने कारण आत्मा सूक्ष्मशरीरके आनेजानेको अपना आनाजाना मान लेता है। जब प्रकृतिके कार्य शरीरसे तादात्म्य मिट जाता है अर्थात् स्थूल? सूक्ष्म और कारणशरीरसे आत्माका माना हुआ सम्बन्ध नहीं रहता तब ये शरीर अपने कारणभूत समष्टि तत्त्वोंमें लीन हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि पुनर्जन्मका मूल कारण जीवका शरीरसे माना हुआ तादात्म्य ही है। सम्बन्ध -- अब भगवान् सातवें श्लोकमें आये हुए मनःषष्ठानीन्द्रियाणि पदका खुलासा करते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

किस कालमें ( आकर्षित करता है ) जब यह देहादिसंघातका स्वामी जीवात्मा शरीरको छोड़कर जाता है तब ( इनको ) आकर्षित करता है।,पहले और इस श्लोकके अर्थकी संगतिके वशसे श्लोकके दूसरे पादकी व्याख्या पहले की गयी है। तथा जब यह जीवात्मा? पहले शरीरसे ( निकलकर ) दूसरे शरीरको पाता है? तब मनसहित इन छः इन्द्रियोंको साथ लेकर जाता है। कैसे लेकर जाता है सो बतलाते हैं -- जैसे वायु गन्धके स्थानोंसे यानी पुष्पादिसे गन्धको लेकर जाता है? वैसे ही।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

स्वस्थाने स्थितानामिन्द्रियाणां जीवेनाकर्षणस्य कालं पृच्छति -- कस्मिन्निति। जीवस्योत्क्रान्तिर्नेश्वरस्येत्याशङ्क्येश्वरशब्दार्थमाह -- देहादीति। उत्क्रान्त्यनन्तरभाविनी गतिरित्येतदर्थवशादित्युक्तम्। अवशिष्टानि श्लोकाक्षराण्याचष्टे -- यदाचेति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

कस्मिन्काले कर्षतीत्यपेक्षायां स्वस्थाने स्थितानां इन्द्रियाणां जीवेनाकर्षणस्य कालमाह -- शरीरमिति।पाठक्रमादर्थक्रमो बलीयान् इति न्यायेनेश्वरो देहासिसंघातस्वामी जीवो यत् यदाप्युत्क्रामति शरीराद्वहिर्निर्गच्छति तदा मनःषष्ठानीन्द्रियाणि कर्षतीति श्लोकस्य द्वितीयः पातोऽर्थवशात्प्राथम्येन संबध्यते। यदाच पूर्वस्माच्छरीराच्छरीरान्तरं प्राप्नोति तदा एतानि मनःषष्ठेन्द्रियाणि गृहीत्वा संयाति सभ्यग्ग्च्छति। तत्र दृष्टान्तः। आशयात्पुष्पादेः स्थानाद्गन्धान्गृहीत्वा यथा वायुः पवनः संयति तद्वत्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śharīramthe body
yatas
avāpnoticarries
yatas
cha apialso
utkrāmatileaves
īśhvaraḥthe Lord of the material body, the embodied soul
gṛihītvātaking
etānithese
sanyātigoes away
vāyuḥthe air
gandhānfragrance
ivalike
āśhayātfrom seats
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 15.7
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति

इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है; परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 15.9
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते

यह जीवात्मा मनका आश्रय लेकर श्रोत्र, नेत्र, त्वचा, रसना और घ्राण -- इन पाँचों इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 15Shlok 8
Bhagavad Gita · Adhyay 15, Shlok 8
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्

जैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको ग्रहण करके ले जाती है, ऐसे ही शरीरादिका स्वामी बना हुआ जीवात्मा भी जिस शरीरको छोड़ता है, वहाँसे मनसहित इन्द्रियोंको ग्रहण करके फिर जिस शरीरको प्राप्त होता है, उसमें चला जाता है। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 8 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 8 का हिंदी अर्थ: "जैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको ग्रहण करके ले जाती है, ऐसे ही शरीरादिका स्वामी बना हुआ जीवात्मा भी जिस शरीरको छोड़ता है, वहाँसे मनसहित इन्द्रियोंको ग्रहण करके फिर जिस शरीरको प्राप्त होता है, उसमें चला जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Purushottama Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 8?

Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 8 translates to: "When the Lord, as the individual soul, obtains a body and when He leaves it, He takes these with Him, just as the wind takes the scents from their seats (flowers, etc.). — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 15, श्लोक 8 है जो Bhagavad Gita के Purushottama Yoga में संकलित है। जैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको ग्रहण करके ले जाती है, ऐसे ही शरीरादिका स्वामी बना हुआ जीवात्मा भी जिस शरीरको छोड़ता है, वहाँसे मनसहित इन्द्रियोंको ग्रहण करके फिर जिस शरीरको प्राप्त होता है, उसमें चला जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śharīraṁ yad avāpnoti yach chāpy utkrāmatīśhvaraḥ" mean in English?

"śharīraṁ yad avāpnoti yach chāpy utkrāmatīśhvaraḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 8. When the Lord, as the individual soul, obtains a body and when He leaves it, He takes these with Him, just as the wind takes the scents from their seats (flowers, etc.). — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.