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Sudarshana Chakra
Adhyay 15, Shlok 17
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः

उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है। — VaniSagar

Global Translations

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PunjabiIND

ਪਰ ਵੱਖਰਾ ਪਰਮ ਪੁਰਖ ਹੈ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਸਰਵਉੱਚ ਆਤਮ, ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਅਤੇ ਪ੍ਰਭੂ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਜੋ ਤਿੰਨਾਂ ਜਹਾਨਾਂ ਵਿੱਚ ਵਿਆਪਕ ਹੈ ਅਤੇ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਸੰਭਾਲਦਾ ਹੈ।

GujaratiIND

પરંતુ સર્વોચ્ચ સ્વ, અવિનાશી અને ભગવાન તરીકે ઓળખાતા પરમ પુરૂષ અલગ છે, જે ત્રણેય લોકમાં વ્યાપેલા છે અને તેમને ટકાવી રાખે છે.

SindhiIND

پر جدا جدا سپريم پروش آهي، جنهن کي سڀ کان اعليٰ نفس، غير تباهي ۽ رب سڏيو وڃي ٿو، جيڪو ٽنهي جهانن ۾ پکڙيل آهي ۽ انهن کي برقرار رکي ٿو.

TamilIND

ஆனால், உன்னத புருஷர் தனித்துவமானவர், உயர்ந்த சுயம், அழியாதவர் மற்றும் இறைவன் என்று அழைக்கப்படுகிறார், அவர் மூன்று உலகங்களையும் வியாபித்து அவற்றைத் தாங்குகிறார்.

KannadaIND

ಆದರೆ ವಿಭಿನ್ನವಾದ ಪರಮ ಪುರುಷ, ಅತ್ಯುನ್ನತ ಸ್ವಯಂ, ಅವಿನಾಶಿ ಮತ್ತು ಭಗವಂತ ಎಂದು ಕರೆಯುತ್ತಾರೆ, ಅವರು ಮೂರು ಲೋಕಗಳನ್ನು ವ್ಯಾಪಿಸಿರುವ ಮತ್ತು ಅವುಗಳನ್ನು ನಿರ್ವಹಿಸುತ್ತಾರೆ.

ManipuriIND

ꯑꯗꯨꯕꯨ ꯇꯣꯞ ꯇꯣꯞꯄꯥ ꯑꯃꯗꯤ ꯈ꯭ꯕꯥꯏꯗꯒꯤ ꯋꯥꯡꯕꯥ ꯑꯥꯠꯃꯥ, ꯃꯥꯡꯍꯟ ꯇꯥꯀꯍꯅꯕꯥ ꯉꯃꯗꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯚꯒꯕꯥꯟ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯀꯧꯕꯥ ꯑꯊꯣꯏꯕꯥ ꯄꯨꯔꯨꯁꯅꯤ, ꯃꯍꯥꯛꯅꯥ ꯃꯥꯂꯦꯝ ꯑꯍꯨꯝ ꯑꯁꯤꯕꯨ ꯂꯥꯟꯗꯥꯗꯨꯅꯥ ꯃꯈꯣꯌꯕꯨ ꯉꯥꯛꯇꯨꯅꯥ ꯊꯝꯂꯤ |

KonkaniIND

पूण त्रिलोकांत व्याप्त आनी तिगोवन दवरपी सर्वोच्च आत्मो, अविनाशी आनी प्रभु अशें म्हण्टात तो परम पुरुष वेगळो.

MizoIND

Mahse a danglam bik chu Purusha chungnung ber, Mahni sang ber, tihchhiat theih loh leh Lalpa tia koh, khawvel pathumte huaptu leh chhawmdawltu a ni.

DogriIND

पर विशिष्ट ऐ परम पुरुष, जिसगी उच्चतम आत्म, अविनाशी ते प्रभु आखदे न, जेह्ड़ा त्रै लोकें च व्याप्त ऐ ते उनेंगी संभालदा ऐ।

NepaliIND

तर भिन्न छ परम पुरुष, जसलाई सर्वोच्च स्व, अविनाशी र भगवान भनिन्छ, जसले तीन लोकमा व्याप्त र पालनपोषण गर्दछ।

OdiaIND

କିନ୍ତୁ ଭିନ୍ନ ହେଉଛି ସର୍ବୋଚ୍ଚ ପୁରଷା, ଯାହାକୁ ସର୍ବୋଚ୍ଚ ଆତ୍ମ, ଅବିସ୍ମରଣୀୟ ଏବଂ ପ୍ରଭୁ କୁହାଯାଏ, ଯିଏ ତିନୋଟି ଜଗତକୁ ବ୍ୟାପିଥାଏ ଏବଂ ସେମାନଙ୍କୁ ବଞ୍ଚାଇଥାଏ |

BengaliIND

কিন্তু স্বতন্ত্র হলেন পরম পুরুষ, যাকে বলা হয় সর্বোচ্চ আত্মা, অবিনশ্বর এবং ভগবান, যিনি তিন জগতকে পরিব্যাপ্ত করেন এবং তাদের টিকিয়ে রাখেন।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः -- पूर्वश्लोकमें क्षर और अक्षर दो प्रकारके पुरुषोंका वर्णन करनेके बाद अब भगवान् यह बताते हैं कि उन दोनोंसे उत्तम पुरुष तो अन्य ही है ।यहाँ अन्यः पद परमात्माको अविनाशी अक्षर(जीवात्मा) से भिन्न बतानके लिये नहीं? प्रत्युत उससे विलक्षण बतानेके लिये आया है। इसीलिये भगवान्ने आगे अठारहवें श्लोकमें अपनेको नाशवान् क्षरसे अतीत और अविनाशी अक्षरसे उत्तम बताया है। परमात्माका अंश होते हुए भी जीवात्माकी दृष्टि या खिंचाव नाशवान् क्षरकी ओर हो रहा है। इसीलिये यहाँ भगवान्को उससे विलक्षण बताया गया है।परमात्मेत्युदाहृतः -- उस उत्तम पुरुषको ही परमात्मा नामसे कहा जाता है। परमात्मा शब्द निर्गुणका वाचक माना जाता है? जिसका अर्थ है -- परम (श्रेष्ठ) आत्मा अथवा सम्पूर्ण जीवोंकी आत्मा। इस श्लोकमें परमात्मा और ईश्वर -- दोनों शब्द आये हैं? जिसका तात्पर्य है कि निर्गुण और सगुण सब एक पुरुषोत्तम ही है।यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः -- वह उत्तम पुरुष (परमात्मा) तीनों लोकोंमें अर्थात् सर्वत्र समानरूपसे नित्य व्याप्त है।यहाँ बिभर्ति पदका तात्पर्य यह है कि वास्तवमें परमात्मा ही सम्पूर्ण प्राणियोंका भरणपोषण करते हैं? पर जीवात्मा संसारसे अपना सम्बन्ध मान लेनेके कारण भूलसे सांसारिक व्यक्तियों आदिको अपना मानकर उनके भरणपोषणादिका भार अपने ऊपर ले लेता है। इससे वह व्यर्थ ही दुःख पाता रहता है ।भगवान्को अव्ययः कहनेका तात्पर्य है कि सम्पूर्ण लोकोंका भरणपोषण करते रहनेपर भी भगवान्का कोई व्यय (खर्चा) नहीं होता अर्थात् उनमें किसी तरहकी किञ्चिन्मात्र भी कमी नहीं आती। वे सदा ज्योंकेत्यों रहते हैं।ईश्वरः शब्द सगुणका वाचक माना जाता है? जिसका अर्थ है -- शासन करनेवाला।मार्मिक बातयद्यपि मातापिता बालकका पालनपोषण किया करते हैं? तथापि बालकको इस बातका ज्ञान नहीं होता कि मेरा पालनपोषण कौन करता है? कैसे करता है और किसलिये करता है इसी तरह यद्यपि भगवान् मात्र प्राणियोंका पालनपोषण करते हैं? तथापि अज्ञानी मनुष्यको (भगवान्पर दृष्टि न रहनेसे) इस बातका पता ही नहीं लगता कि मेरा पालनपोषण कौन करता है। भगवान्का शरणागत भक्त ही इस बातको ठीक तरहसे जानता है कि एक भगवान् ही सबका सम्यक् प्रकारसे पालनपोषण कर रहे हैं।पालनपोषण करनेमें भगवान् किसीके साथ कोई पक्षपात (विषमता) नहीं करते। वे भक्तअभक्त? पापीपुण्यात्मा? आस्तिकनास्तिक आदि सभीका समानरूपसे पालनपोषण करते हैं । प्रत्यक्ष देखनेमें आता है कि भगवान्द्वारा रचित सृष्टिमें सूर्य सबको समानरूपसे प्रकाश देता है? पृथ्वी सबको समानरूपसे धारण करती है? वैश्वानरअग्नि सबके अन्नको समानरूपसे पचाती है? वायु सबको (श्वास लेनेके लिये) समानरूपसे प्राप्त होती है? अन्नजल सबको समानरूपसे तृप्त करते हैं? इत्यादि। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें वर्णित उत्तम पुरुषके साथ अपनी एकता बताकर अब साकाररूपसे प्रकट भगवान् श्रीकृष्ण अपना अत्यन्त गोपनीय रहस्य प्रकट कहते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तथा जो क्षर और अक्षर -- इन दोनोंसे विलक्षण है? और क्षरअक्षररूप दोनों उपाधियोंके दोषसे रहित है वह नित्य? शुद्ध? बुद्ध और मुक्तस्वभाववाला --, उत्तमअतिशय उत्कृष्ट पुरुष तो अन्य ही है। अर्थात् इन दोनोंसे अत्यन्त विलक्षण है? जो कि परमात्मा नामसे कहा गया है। वह ईश्वर अविद्याजनित शरीरादि आत्माओंकी अपेक्षा पर है और सब प्राणियोंका आत्मा यानी अन्तरात्मा है इस कारण वैदान्तवाक्योंमें वह परमात्मा नामसे कहा गया है। उसीका विशेषरूपसे निरूपण करते हैं -- जो पृथ्वी? अन्तरिक्ष और स्वर्ग -- इन तीनों लोकोंको? अपने चैतन्यबलकी शक्तिसे उनमें प्रविष्ट होकर? केवल स्वरूपसत्तामात्रसे उनको धारण करता है और जो अविनाशी ईश्वर है? अर्थात् जिसका कभी नाश न हो? ऐसा नारायण नामक सर्वज्ञ और सबका शासन करनेवाला है।

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Sri Anandgiri

कार्यकारणाख्यौ राशी दर्शयित्वा राश्यन्तरं दर्शयति -- आभ्यामिति। वैलक्षण्यफलमाह -- क्षरेति। उपाधिद्वयकृतगुणदोषास्पर्शे फलितमाह -- नित्येति। आभ्यां क्षराक्षराभ्यामिति यावत्। उत्तमोऽन्य इति पदद्वयं वस्तुतः सर्वथैव क्षराक्षरात्मत्वाभावदृष्ट्यर्थम्। जडवर्गस्यान्यत्वकृतं स्वातन्त्र्यं निरस्यति -- स एवेति। लोकत्रयमित्युपलक्षणं सर्वं जगदपि विवक्षितम्। चैतन्यमेव बलं तत्र शक्तिर्माया तयेति यावत्। जगद्धारणे परस्य व्यापारान्तरं वारयति -- स्वरूपेति। नचास्यान्यो धारयिता स्वतोऽचलत्वादित्याह -- अव्यय इति।संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः इति श्रुत्यर्थं गृहीत्वाह -- ईश्वर इति।

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Sri Dhanpati

कार्यकारणाख्यौ राशी दर्शियत्वा ताभ्यां विलक्षणं राशयन्तरं परमात्माख्यं दर्शयति -- उत्तम इति। आभ्यां क्षराक्षराभ्यां अन्यो विलक्षणः उपाधिद्वयदोषेणासंस्पृष्टो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः उत्तमः उत्कृष्टमः पुरुषः अविद्यात्मभ्यो देहादिभ्यः परश्चासौ सर्वभूतानामात्मा च प्रत्यक्वेतन इत्यतः परमात्मेत्युदाहृतः वेदान्तेषु प्रतिपादितः। परमात्मानमेव विशिनष्टि। यो लोकत्रयं भूर्भुवःस्वराख्यं त्रिलोकीपक्षाश्रयेण समस्तं जगत् स्वकीयया मायया चैतन्यबलशत्त्या आविशय प्रविश्य स्वरुपसद्भावमात्रेण विभर्ति धारयति पोषयति प्रकाशयति। न विद्यते व्ययो यस्य सोऽव्ययः ईश्वरः ईशनशीलो नारायणाख्यः परमेश्वर इत्यर्थ।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
uttamaḥthe Supreme
puruṣhaḥDivine Personality
tubut
anyaḥbesides
paramaātmā
itithus
udāhṛitaḥis said
yaḥwho
loka trayamthe three worlds
āviśhyaenters
bibhartisupports
avyayaḥindestructible
īśhvaraḥthe controller
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 15.16
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते

इस संसारमें क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी) -- ये दो प्रकारके पुरुष हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर नाशवान् और कूटस्थ (जीवात्मा) अविनाशी कहा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 15.18
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः

मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 15Shlok 17
Bhagavad Gita · Adhyay 15, Shlok 17
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः

उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 17 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 17 का हिंदी अर्थ: "उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Purushottama Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 17?

Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 17 translates to: "But distinct is the Supreme Purusha, called the highest Self, indestructible and Lord, who pervades the three worlds and sustains them. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 15, श्लोक 17 है जो Bhagavad Gita के Purushottama Yoga में संकलित है। उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "uttamaḥ puruṣhas tv anyaḥ paramātmety udāhṛitaḥ" mean in English?

"uttamaḥ puruṣhas tv anyaḥ paramātmety udāhṛitaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 17. But distinct is the Supreme Purusha, called the highest Self, indestructible and Lord, who pervades the three worlds and sustains them. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.