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Sudarshana Chakra
Adhyay 15, Shlok 16
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते

इस संसारमें क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी) -- ये दो प्रकारके पुरुष हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर नाशवान् और कूटस्थ (जीवात्मा) अविनाशी कहा जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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BhojpuriIND

एह संसार में दू गो पुरुष बाड़े: नाशवान आ अविनाशी। सब जीव नाशवान हवें, आ कुतस्थ-अपरिवर्तनीय-अविनाशी कहल जाला।

BengaliIND

এই পৃথিবীতে দুটি পুরুষ আছে: ধ্বংসশীল এবং অবিনশ্বর। সমস্ত প্রাণীই বিনাশশীল, এবং কুটস্থ-অপরিবর্তনশীল-কে অবিনশ্বর বলা হয়।

TamilIND

இந்த உலகில் இரண்டு புருஷர்கள் உள்ளனர்: அழியக்கூடியது மற்றும் அழியாதது. அனைத்து உயிரினங்களும் அழியக்கூடியவை, மேலும் குடஸ்தம் - மாறாதது - அழியாதது என்று அழைக்கப்படுகிறது.

GujaratiIND

આ જગતમાં બે પુરૂષો છે: નાશવંત અને અવિનાશી. બધા જીવો નાશવંત છે, અને કુતસ્થ - અપરિવર્તનશીલ - અવિનાશી કહેવાય છે.

DogriIND

इस संसार च दो पुरुष न- नाशवान ते अविनाशी। सारे जीव नाशवान हन, ते कुतस्थ—अनचल—अविनाशी आखदे हन।

KonkaniIND

ह्या जगांत दोन पुरुष आसात: नाशवंत आनी अविनाशी. सगळे जीव नाशवंत आसतात आनी कुतस्थाक-अविकारीक-अविनाशी अशें म्हण्टात.

AssameseIND

এই জগতত দুজন পুৰুষ আছে: নষ্ট আৰু অক্ষয়। সকলো সত্তা বিনষ্ট, কুটস্থ— অপৰিৱৰ্তিত—ক অক্ষয় বোলা হয়।

MaithiliIND

एहि संसार मे दू टा पुरुष अछि- नाशवान आ अविनाशी। सब जीव नाशवान होइत अछि, आ कुतस्थ-अपरिवर्तनीय-अविनाशी कहल जाइत अछि |

ManipuriIND

ꯃꯥꯂꯦꯝ ꯑꯁꯤꯗꯥ ꯄꯨꯔꯨꯁ ꯑꯅꯤ ꯂꯩꯔꯤ: ꯃꯥꯡꯍꯟ ꯇꯥꯀꯍꯅꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯥꯡꯍꯟꯗꯕꯥ꯫ ꯖꯤꯕ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛ ꯃꯥꯡꯍꯟ ꯇꯥꯀꯍꯅꯕꯥ ꯌꯥꯏ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯀꯨꯇꯥꯁ꯭ꯊ – ꯍꯣꯡꯂꯛꯂꯤꯕꯥ – ꯃꯥꯉꯕꯥ ꯌꯥꯗꯕꯥ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯀꯧꯏ꯫

PunjabiIND

ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਵਿੱਚ ਦੋ ਪੁਰਸ਼ ਹਨ: ਨਾਸ਼ਵਾਨ ਅਤੇ ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ। ਸਾਰੇ ਜੀਵ ਨਾਸ਼ਵਾਨ ਹਨ, ਅਤੇ ਕੁਤਸਥ - ਅਟੱਲ - ਨੂੰ ਅਵਿਨਾਸ਼ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

KannadaIND

ಈ ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಇಬ್ಬರು ಪುರುಷರಿದ್ದಾರೆ: ನಾಶವಾಗುವ ಮತ್ತು ನಾಶವಾಗದ. ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳು ನಾಶವಾಗುತ್ತವೆ ಮತ್ತು ಕೂಟಸ್ಥ - ಬದಲಾಗದ - ಅವಿನಾಶಿ ಎಂದು ಕರೆಯಲಾಗುತ್ತದೆ.

TeluguIND

ఈ ప్రపంచంలో ఇద్దరు పురుషులు ఉన్నారు: నశించేవి మరియు నాశనమైనవి. అన్ని జీవులు నశించదగినవి, మరియు కుటస్థ-మార్పులేనిది-నాశరహితం అంటారు.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च -- यहाँ लोके पदको सम्पूर्ण संसारका वाचक समझना चाहिये। इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें जीवलोके पद भी इसी अर्थमें आया है।इस जगत्में दो विभाग जाननेमें आते हैं -- शरीरादि नाशवान् पदार्थ (जड) और अविनाशी जीवात्मा (चेतन)। जैसे? विचार करनेसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि एक तो प्रत्यक्ष दीखनेवाला शरीर है और एक उसमें रहनेवाला जीवात्मा है। जीवात्माके रहनेसे ही प्राण कार्य करते हैं और शरीरका संचालन होता है। जीवात्माके साथ प्राणोंके निकलते ही शरीरका संचालन बंद हो जाता है और शरीर सड़ने लगता है। लोग उस शरीरको जला देते हैं। कारण कि महत्त्व नाशवान् शरीरका नहीं? प्रत्युत उसमें रहनेवाले अविनाशी जीवात्माका है।पञ्चमहाभूतों(आकाश? वायु? अग्नि? जल और पृथ्वी) से बने हुए शरीरादि जितने पदार्थ हैं? वे सभी जड और नाशवान् हैं। प्राणियोंके (प्रत्यक्ष देखनेमें आनेवाले) स्थूलशरीर स्थूल समष्टिजगत्के साथ एक हैं दस इन्द्रियाँ? पाँच प्राण? मन और बुद्धि -- इन सत्रह तत्त्वोंसे युक्त सूक्ष्मशरीर सूक्ष्म समष्टिजगत्के साथ एक हैं और कारणशरीर (स्वभाव? कर्मसंस्कार? अज्ञान) कारण समष्टिजगत्(मूल प्रकृति) के साथ एक हैं। ये सब क्षरणशील (नाशवान्) होनेके कारण क्षर नामसे कहे गये हैं।वास्तवमें व्यष्टि नामसे कोई वस्तु है ही नहीं केवल समष्टिसंसारके थोड़े अंशकी वस्तुको अपनी माननेके कारण उसको व्यष्टि कह देते हैं। संसारके साथ शरीर आदि वस्तुओंकी भिन्नता केवल (रागममता आदिके कारण) मानी हुई है? वास्तवमें है नहीं। मात्र पदार्थ? और क्रियाएँ प्रकृतिकी ही हैं । इसलिये स्थूल? सूक्ष्म और कारणशरीरकी समस्त क्रियाएँ क्रमशः स्थूल? सूक्ष्म और कारण समष्टिसंसारके हितके लिये ही करनी हैं? अपने लिये नहीं।जिस तत्त्वका कभी विनाश नहीं होता और जो सदा निर्विकार रहता है? उस जीवात्माका वाचक यहाँ अक्षरः पद है । प्रकृति जड है और जीवात्मा (चेतन परमात्माका अंश होनेसे) चेतन है।इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने जिसका छेदन करनेके लिये कहा था? उस संसारको यहाँ क्षरः पदसे और सातवें श्लोकमें भगवान्ने जिसको अपना अंश बताया था? उस जीवात्माको यहाँ अक्षरः पदसे कहा गया है।यहाँ आये क्षर? अक्षर? और पुरुषोत्तम शब्द क्रमशः पुँल्लिङ्ग? स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग हैं। इससे यह समझना चाहिये कि प्रकृति? जीवात्मा और परमात्मा न तो स्त्री हैं? न पुरुष हैं और न नपुंसक ही हैं। वास्तवमें लिङ्ग भी शब्दकी दृष्टिसे है? तत्त्वसे कोई लिङ्ग नहीं है ।क्षर और अक्षर -- दोनोंसे उत्तम पुरुषोत्तम नामकी सिद्धिके लिये यहाँ भगवान्ने क्षर और अक्षर -- दोनोंको पुरुष नामसे कहा है।क्षरः सर्वाणि भूतानि -- इसी अध्यायके आरम्भमें जिस संसारवृक्षका स्वरूप बताकर उसका छेदन करनेकी प्रेरणा की गयी थी? उसी संसारवृक्षको यहाँ क्षर नामसे कहा गया है।यहाँ भूतानि पद प्राणियोंके स्थूल? सूक्ष्म और कारणशरीरोंका ही वाचक समझना चाहिये। कारण कि यहाँ भूतोंको नाशवान् बताया गया है। प्राणियोंके शरीर ही नाशवान् होते हैं? प्राणी स्वयं नहीं। अतः यहाँ,भूतानि पद जड शरीरोंके लिये ही आया है।कूटस्थोऽक्षर उच्यते -- इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान्ने जिसको अपना सनातन अंश बताया है? उसी जीवात्माको यहाँ अक्षर नामसे कहा गया है।जीवात्मा चाहे जितने शरीर धारण करे? चाहे जितने लोकोंमें जाय? उसमें कभी कोई विकार उत्पन्न नहीं होता वह सदा ज्योंकात्यों रहता है (गीता 8। 19 13। 31)। इसीलिये यहाँ उसको कूटस्थ कहा गया है।,गीतामें परमात्मा और जीवात्मा दोनोंके स्वरूपका वर्णन प्रायः समान ही मिलता है। जैसे परमात्माको (12। 3 में) कूटस्थ तथा (8। 4 में) अक्षर कहा गया है? ऐसे ही यहाँ (15। 16 में) जीवात्माको भी,कूटस्थ और अक्षर कहा गया है। जीवात्मा और परमात्मा -- दोनोंमें ही परस्पर तात्त्विक एवं स्वरूपगत एकता है।स्वरूपसे जीवात्मा सदासर्वदा निर्विकार ही है परन्तु भूलसे प्रकृति और उसके कार्य शरीरादिसे अपनी एकता मान लेनेके कारण उसकी जीव संज्ञा हो जाती है? नहीं तो (अद्वैतसिद्धान्तके अनुसार) वह साक्षात् परमात्मतत्त्व ही है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

अब? क्षर और अक्षर -- इन दोनों उपाधियोंसे अलग बतलाकर? उसी उपाधिरहित शुद्ध परमात्माके स्वरूपका निश्चय करनेकी इच्छासे? अगले श्लोकोंका आरम्भ किया जाता है। उनमें पहलेके और आगे आनेवाले सभी अध्यायोंके समस्त अभिप्रायको तीन भेदोंमें विभक्त करके कहते हैं --, समुदायरूपसे पृथक् किये हुए ये दो भाव? संसारमें पुरुष नामसे कहे जाते हैं। इनमेंसे एक समुदाय क्षीण होनेवाला -- नाशवान् क्षर पुरुष है और दूसरा उससे विपरीत अक्षर पुरुष है? जो कि भगवान्की मायाशक्ति है? क्षर पुरुषकी उत्पत्तिका बीज है? तथा अनेक संसारी जीवोंकी कामना और कर्म आदिके संस्कारोंका आश्रय है? वह अक्षर पुरुष कहलाता है। वे दोनों पुरुष कौन हैं सो भगवान् स्वयं ही बतलाते हैं -- समस्त भूत अर्थात् प्रकृतिका सारा विकार तो क्षर पुरुष है और कूटस्थ अर्थात् जो कूट -- राशिकी भाँति स्थित है अथवा कूट नाम मायाका है जिसके वञ्चना? छल? कुटिलता आदि पर्याय हैं? उपर्युक्त माया आदि अनेक प्रकारसे जो स्थित है? वह कूटस्थ है। संसारका बीज? अन्तरहित होनेके कारण वह कूटस्थ नष्ट नहीं होता? अतः अक्षर कहा जाता है।

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Sri Anandgiri

उत्तरश्लोकानां तात्पर्यं वक्तुं वृत्तं कीर्तयति -- भगवत इति। विशिष्टोपाधिराहित्यादिः। संप्रत्यध्यायसमाप्तेरुत्तरसंदर्भस्य तात्पर्यमाह -- अथेति। न केवलं निरुपाधिकात्मस्वरूपनिर्धारणायोत्तरग्रन्थः किंतु सर्वस्यैव गीताशास्त्रस्यार्थनिर्णयार्थमित्याह -- तत्रेति। क्षराक्षरोपाधिभ्यां परमात्मना च राशित्रयमुक्तेन सर्वात्मत्वेनाशुद्ध्यादिदोषप्रसक्तावुक्तं -- द्वाविमाविति। पुरुषोपाधित्वात्पुरुषत्वं न साक्षादिति विवक्षितत्वादाह --,पुरुषाविति। परं पुरुषं व्यावर्तयति -- भगवत इति। तत्र कार्यलिङ्गकमनुमानं सूचयति -- क्षराख्यस्येति। मायाशक्तिं विना भोक्तृ़णां कर्मादिसंस्कारा देवोक्तकार्योत्पत्तिरित्याशङ्क्य तस्य निमित्तत्वेऽपि मायाशक्तिरुपादानमिति मत्वाह -- अनेकेति। कामकर्मादीत्यादिशब्देन ज्ञानं गृह्यते। प्रकृतिं पुरुषं चैवेति प्रकृतयोरिह ग्रहणमिति शङ्कामाकाङ्क्षाद्वारा वारयति -- कौ ताविति। कूटशब्दार्थमुक्त्वा तेन स्थितस्य कूटस्थतेति संपिण्डितमर्थमाह -- अनेकेति। तस्य कथमक्षरत्वं विना ब्रह्मज्ञानमनाशादित्याह -- संसारेति।

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Sri Dhanpati

एवं यदादित्यगतं तेज इत्यादिना भगवत ईश्वरस्य नारायणाख्यस्य विभूतिसंक्षेपवर्णनेन सोपाधिकं स्वरुपमुक्त्वाथेदानीं तस्यैव परमात्मनः क्षराक्षरोपाधिविभक्त्या निरुपाधिकस्य केवलस्य स्वरुपनिर्धारणाय सर्वमेवातीतानागताध्यायार्थजातं त्रिधा राशीकृत्याह -- द्वाविति। क्षरक्षरोपाधिम्यां परमात्मना च राशित्रयं इमौ प्रत्यक्षादिना लोकेऽनुभूयमानौ पुरुषौ। कौ तौ पुरुषाविति तत्राह क्षरश्चाक्षर एव चेति क्षराक्षशब्दार्थं स्वयमेवाह भगवान्। क्षरः सर्वाणि भूतानि सर्वं विकारजातं क्षरतीति क्षरो विनाशी कूटस्थः कूटो राशिरिव स्थितः। यद्वा कूटात्मनाऽनेकमायावञ्चनादिप्रकारेण स्थितः कूटस्थः। संसारबीजानन्त्यान्न क्षरतीत्यक्षरो भगवतो मायाशक्तिः क्षराख्यस्योत्पत्तिबीजमनेकसंसारिजन्तुकामकर्मादिसंस्काराश्रयोऽक्षर उच्यते। यत्त्वपरे कूटः शिलाराशिः पर्वत इव देहेषु,नश्यत्स्वपि निर्विकारतया तिष्ठतीति कूटस्थश्चेतनो भोक्ता स तु अक्षरः पुरुष इत्युच्यते विवेकिभिरिति वर्णयन्ति तन्नोपादेयम् क्षेत्रज्ञस्यैवेह पुरुषोत्तमत्वेन प्रतिपाद्यत्वात्। अन्यथा क्षेत्रज्ञं तापि मां विद्धीत्यनेनोत्तमः पुरुषस्त्वन्य इत्यस्य विरोधापत्तेः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
dvautwo
imauthese
puruṣhaubeings
lokein creation
kṣharaḥthe perishable
chaand
akṣharaḥthe imperishable
evaeven
chaand
kṣharaḥthe perishable
sarvāṇiall
bhūtānibeings
kūṭasthaḥ
akṣharaḥthe imperishable
uchyateis said
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Bhagavad Gita · 15.15
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्

मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित हूँ। मेरेसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संशय आदि दोषोंका नाश) होता है। सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा मैं ही जाननेयोग्य हूँ। वेदोंके तत्त्वका निर्णय करनेवाला और वेदोंको जाननेवाला भी मैं ही हूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 15.17
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः

उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 15Shlok 16
Bhagavad Gita · Adhyay 15, Shlok 16
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते

इस संसारमें क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी) -- ये दो प्रकारके पुरुष हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर नाशवान् और कूटस्थ (जीवात्मा) अविनाशी कहा जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ: "इस संसारमें क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी) -- ये दो प्रकारके पुरुष हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर नाशवान् और कूटस्थ (जीवात्मा) अविनाशी कहा जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Purushottama Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 16?

Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 16 translates to: "Two Purushas there are in this world: the perishable and the imperishable. All beings are perishable, and the Kutastha—the unchanging—is called the imperishable. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 15, श्लोक 16 है जो Bhagavad Gita के Purushottama Yoga में संकलित है। इस संसारमें क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी) -- ये दो प्रकारके पुरुष हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर नाशवान् और कूटस्थ (जीवात्मा) अविनाशी कहा जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "dvāv imau puruṣhau loke kṣharaśh chākṣhara eva cha" mean in English?

"dvāv imau puruṣhau loke kṣharaśh chākṣhara eva cha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 16. Two Purushas there are in this world: the perishable and the imperishable. All beings are perishable, and the Kutastha—the unchanging—is called the imperishable. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.