
“मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित हूँ। मेरेसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संशय आदि दोषोंका नाश) होता है। सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा मैं ही जाननेयोग्य हूँ। वेदोंके तत्त्वका निर्णय करनेवाला और वेदोंको जाननेवाला भी मैं ही हूँ। — VaniSagar”
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અને હું સર્વના હૃદયમાં બેઠો છું; મારી પાસેથી સ્મૃતિ અને જ્ઞાન આવે છે, તેમજ તેમની ગેરહાજરી. હું ખરેખર તે જ છું જેને બધા વેદોએ જાણવું જોઈએ; હું ખરેખર વેદાંતનો રચયિતા અને વેદનો જાણકાર છું.
ಮತ್ತು ನಾನು ಎಲ್ಲರ ಹೃದಯದಲ್ಲಿ ಕುಳಿತಿದ್ದೇನೆ; ನನ್ನಿಂದ ನೆನಪು ಮತ್ತು ಜ್ಞಾನ ಬರುತ್ತದೆ, ಹಾಗೆಯೇ ಅವರ ಅನುಪಸ್ಥಿತಿ. ನಾನು ಎಲ್ಲ ವೇದಗಳಿಂದ ತಿಳಿಯಬೇಕಾದದ್ದು ನಿಜವಾಗಿ; ನಾನು ನಿಜವಾಗಿಯೂ ವೇದಾಂತದ ಕರ್ತೃ ಮತ್ತು ವೇದಗಳ ಜ್ಞಾನಿ.
आ हम सभक हृदय मे बैसल छी। हमरा सँ स्मृति आ ज्ञान सेहो अबैत अछि, संगहि ओकर अभाव सेहो। हम सत्ते ओ छी जकरा सब वेद द्वारा ज्ञात करय पड़त; हम सत्ते वेदान्तक रचयिता आ वेदक ज्ञाता छी।
மேலும் நான் அனைவரின் இதயங்களிலும் அமர்ந்திருக்கிறேன்; என்னிடமிருந்து நினைவாற்றலும் அறிவும் வருகின்றன, அத்துடன் அவை இல்லாதது. எல்லா வேதங்களாலும் அறியப்பட வேண்டியவன் நான்; நான் உண்மையில் வேதாந்தத்தின் ஆசிரியர் மற்றும் வேதங்களை அறிந்தவன்.
এবং আমি সকলের হৃদয়ে উপবিষ্ট; আমার কাছ থেকে স্মৃতি এবং জ্ঞান আসে, সেইসাথে তাদের অনুপস্থিতি। আমি সত্যই সেই যা সমস্ত বেদের দ্বারা জানতে হয়; আমি প্রকৃতপক্ষে বেদান্তের রচয়িতা এবং বেদ জ্ঞানী।
ਅਤੇ ਮੈਂ ਸਾਰਿਆਂ ਦੇ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਬੈਠਾ ਹਾਂ; ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਯਾਦ ਅਤੇ ਗਿਆਨ ਆਉਂਦੇ ਹਨ, ਨਾਲ ਹੀ ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਗੈਰਹਾਜ਼ਰੀ ਵੀ। ਮੈਂ ਸੱਚਮੁੱਚ ਉਹ ਹਾਂ ਜੋ ਸਾਰੇ ਵੇਦਾਂ ਦੁਆਰਾ ਜਾਣਿਆ ਜਾਣਾ ਹੈ; ਮੈਂ ਸੱਚਮੁੱਚ ਵੇਦਾਂਤ ਦਾ ਲੇਖਕ ਅਤੇ ਵੇਦਾਂ ਦਾ ਜਾਣਨ ਵਾਲਾ ਹਾਂ।
ते मैं सारें दे दिलें च बैठी गेदा हां; मेरे कोला स्मृति ते ज्ञान, ते कन्नै गै उंदी गैरहाजिरी बी औंदी ऐ। मैं सचमुच ओह हां जिसगी सारे वेदां नाल जानना पैंदा है; मैं वाकई वेदांत दा रचयिता ते वेद दा ज्ञाता हां।
ഞാൻ എല്ലാവരുടെയും ഹൃദയങ്ങളിൽ ഇരിക്കുന്നു; എന്നിൽ നിന്നാണ് ഓർമ്മയും അറിവും അവയുടെ അഭാവവും വരുന്നത്. എല്ലാ വേദങ്ങളാലും അറിയപ്പെടേണ്ടവനാണ് ഞാൻ; തീർച്ചയായും ഞാൻ വേദാന്തത്തിൻ്റെ രചയിതാവും വേദങ്ങളുടെ അറിവുമാണ്.
ꯑꯗꯨꯒꯥ ꯑꯩ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛꯀꯤ ꯊꯝꯃꯣꯌꯗꯥ ꯐꯃꯗꯨꯅꯥ ꯂꯩꯔꯤ; ꯑꯩꯉꯣꯟꯗꯒꯤ ꯅꯤꯡꯁꯤꯡꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯂꯧꯁꯤꯡ ꯂꯥꯀꯏ, ꯃꯈꯣꯌꯒꯤ ꯂꯩꯇꯕꯁꯨ ꯂꯥꯀꯏ꯫ ꯑꯩꯍꯥꯛ ꯇꯁꯦꯡꯅꯃꯛ ꯕꯦꯗ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛꯅꯥ ꯈꯉꯒꯗꯕꯥ ꯑꯗꯨꯅꯤ; ꯑꯩꯍꯥꯛ ꯇꯁꯦꯡꯅꯃꯛ ꯕꯦꯗꯥꯟꯇꯀꯤ ꯑꯏꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯕꯦꯗꯀꯤ ꯈꯉꯕꯥ ꯃꯤꯁꯛꯅꯤ꯫
आनी हांव सगळ्यांच्या काळजांत बसलां; म्हजे कडल्यान याद आनी गिन्यान तशेंच तांचें अभाव येता. हांव खरेंच तें जें सगळ्या वेदांनी वळखुपाक जाय; हांव खरेंच वेदांताचो रचणूक आनी वेदविज्ञ.
आ हम सबके दिल में बइठल बानी; हमरा से स्मृति आ ज्ञान के साथे-साथे उनकर अनुपस्थिति भी आवेला। हम त साँचहू ऊ हईं जवना के सगरी वेदन से जानल जरूरी बा; हम वाकई में वेदांत के रचयिता आ वेद के ज्ञाता हईं।
۽ مان سڀني جي دلين ۾ ويٺو آهيان. مون وٽان ياداشت ۽ علم ۽ گڏوگڏ انهن جي غير موجودگي. مان واقعي اھو آھيان جيڪو سڀني ويدن کي ڄاڻڻ گھرجي. مان واقعي ويدانت جو مصنف ۽ ويد جو ڄاڻو آهيان.
Sacred Commentaries
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Swami Ramsukhdas
व्याख्या -- सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः -- पीछेके श्लोकोंमें अपनी विभूतियोंका वर्णन करनेके बाद अब भगवान् यह रहस्य प्रकट करते हैं कि मैं स्वयं सब प्राणियोंके हृदयमें विद्यमान हूँ। यद्यपि शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि आदि सभी स्थानोंमें भगवान् विद्यमान हैं? तथापि हृदयमें वे विशेषरूपसे विद्यमान हैं।हृदय शरीरका प्रधान अङ्ग है। सब प्रकारके भाव हृदयमें ही होते हैं। समस्त कर्मोंमें भाव ही प्रधान होता है। भावकी शुद्धिसे समस्त पदार्थ? क्रिया आदिकी शुद्धि हो जाती है। अतः महत्त्व भावका ही है? वस्तु? व्यक्ति? कर्म आदिका नहीं। वह भाव हृदयमें होनेसे हृदयकी बहुत महत्ता है। हृदय सत्त्वगुणका कार्य है? इसलिये भी भगवान् हृदयमें विशेषरूपसे रहते हैं।भगवान् कहते हैं कि मैं प्रत्येक मनुष्यके अत्यन्त नजदीक उसके हृदयमें रहता हूँ अतः किसी भी साधकको (मेरेसे दूरी अथवा वियोगका अनुभव करते हुए भी) मेरी प्राप्तिसे निराश नहीं होना चाहिये। इसलिये पापीपुण्यात्मा? मूर्खपण्डित? निर्धनधनवान्? रोगीनिरोगी आदि कोई भी स्त्रीपुरुष किसी भी जाति? वर्ण? सम्प्रदाय? आश्रम? देश? काल? परिस्थिति आदिमें क्यों न हो? भगवत्प्राप्तिका वह पूरा अधिकारी है। आवश्यकता केवल भगवत्प्राप्तिकी ऐसी तीव्र अभिलाषा? लगन? व्याकुलताकी है? जिसमें भगवत्प्राप्तिके बिना रहा न जाय।परमात्मा सर्वव्यापी अर्थात् सब जगह समानरूपसे परिपूर्ण होनेपर भी हृदयमें प्राप्त होते हैं। जैसे गायके सम्पूर्ण शरीरमें दूध व्याप्त होनेपर भी वह उसके स्तनोंसे ही प्राप्त होता है अथवा पृथ्वीमें सर्वत्र जल रहनेपर भी वह कुएँ आदिसे ही प्राप्त होता है? ऐसे ही सूर्य? चन्द्र? अग्नि? पृथ्वी? वैश्वानर आदि सबमें व्याप्त होनेपर भी परमात्मा हृदय में प्राप्त होते हैं। (गीता 13। 17 18। 61)।परमात्मप्राप्तिसम्बन्धी विशेष बात हृदयमें निरन्तर स्थित रहनेके कारण परमात्मा वास्तवमें मनुष्यमात्रको प्राप्त हैं परन्तु जडता(संसार) से माने हुए सम्बन्धके कारण जडताकी तरफ ही दृष्टि रहनेसे नित्यप्राप्त परमात्मा अप्राप्त प्रतीत हो रहे हैं अर्थात् उनकी प्राप्तिका अनुभव नहीं हो रहा है। जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होते ही सर्वत्र विद्यमान (नित्यप्राप्त) परमात्मतत्त्व स्वतः अनुभवमें आ जाता है।परमात्मप्राप्तिके लिये जो सत्कर्म? सत्चर्चा और सत्चिन्तन किया जाता है? उसमें जडता(असत्) का आश्रय रहता ही है। कारण है कि जडता(स्थूल? सूक्ष्म और कारणशरीर) का आश्रय लिये बिना इनका होना सम्भव ही नहीं है। वास्तवमें इनकी सार्थकता जडतासे सम्बन्धविच्छेद करानेमें ही है। जडतासे,सम्बन्धविच्छेद तभी होगा? जब ये (सत्कर्म? सत्चर्चा और सत्चिन्तन) केवल संसारके हितके लिये ही किये जायँ? अपने लिये नहीं।किसी विशेष साधन? गुण? योग्यता? लक्षण आदिके बदलमें परमात्मप्राप्ति होगी -- यह बिलकुल गलत धारणा है। किसी मूल्यके बदलेमें जो वस्तु प्राप्त होती है? वह उस मूल्यसे कम मूल्यकी ही होती है -- यह सिद्धान्त है। अतः यदि किसी विशेष साधन? योग्यता आदिके द्वारा ही परमात्मप्राप्तिका होना माना जाय? तो परमात्मा उस साधन? योग्यता आदिसे कम मूल्यके (कमजोर) ही सिद्ध होते हैं? जबकि परमात्मा किसीसे कम मूल्यके नहीं हैं (गीता 11। 43)। इसलिये वे किसी साधन आदिसे खरीदे नहीं जा सकते। इसके सिवाय अगर किसी मूल्य(साधन? योग्यता आदि) के बदलेमें परमात्माकी प्राप्ति मानी जाय? तो उनसे हमें लाभ भी क्या होगा क्योंकि उनसे अधिक मूल्यकी वस्तु (साधन आदि) तो हमारे पास पहलेसे है हीजैसे सांसारिक पदार्थ कर्मोंसे मिलते हैं? ऐसे परमात्माकी प्राप्ति कर्मोंसे नहीं होती क्योंकि परमात्मप्राप्ति किसी कर्मका फल नहीं है। प्रत्येक कर्मकी उत्पत्ति अहंभावसे होती है और परमात्मप्राप्ति अहंभावके मिटनेपर होती है। कारण कि अहंभाव कृति (कर्म) है और परमात्मा कृतिरहित हैं। कृतिरहित तत्त्वको किसी कृतिसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है -- नास्त्यकृतः कृतेन। तात्पर्य यह हुआ कि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदि जडपदार्थोंके द्वारा नहीं? प्रत्युत जडताके त्यागसे होती है। जबतक मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर? देश? काल? वस्तु आदिका आश्रय है? तबतक एक परमात्माका आश्रय नहीं हो सकता। मन? बुद्धि आदिके आश्रयसे परमात्मप्राप्ति होगी -- यही साधककी मूल भूल है। अगर जडताका आश्रय और विश्वास छूट जाय तथा एकमात्र परमात्माका ही आश्रय और विश्वास हो जाय? तो परमात्मप्राप्तिमें देरी नहीं लग सकती।मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च -- किसी बातकी भूली हुई जानकारीका (किसी कारणसे) पुनः प्राप्त होना,स्मृति कहलाती है। स्मृति और चिन्तन -- दोनोंमें फरक है। नयी बातका चिन्तन और पुरानी बातकी स्मृति होती है। अतः चिन्तन संसारका और स्मृति परमात्माकी होती है क्योंकि संसार पहले नहीं था और परमात्मा पहले(अनादिकाल) से हैं। स्मृतिमें जो शक्ति है? वह चिन्तनमें नहीं है। स्मृतिमें कर्तापनका भाव कम रहता है? जबकि चिन्तनमें कर्तापनका भाव अधिक रहता है।एक स्मृति की जाती है और एक स्मृति होती है। जो स्मृति की जाती है? वह बुद्धिमें और जो होती है? वह स्वयंमें होती है। होनेवाली स्मृति जडतासे तत्काल सम्बन्धविच्छेद करा देती है। भगवान् यहाँ कहते हैं कि यह (होनेवाली) स्मृति मेरेसे ही होती है।परमात्माका अंश होते हुए भी जीव भूलसे परमात्मासे विमुख हो जाता है और अपना सम्बन्ध संसारसे मानने लगता है। इस भूलका नाश होनेपर मैं भगवान्का ही हूँ? संसारका नहीं ऐसा साक्षात् अनुभव हो जाना ही स्मृति है (गीता 18। 73)। स्मृतिमें कोई नया ज्ञान या अनुभव नहीं होता? प्रत्युत केवल विस्मृति(मोह) का नाश होता है। भगवान्से हमारा वास्तविक सम्बन्ध है। इस वास्तविकताका प्रकट होना ही स्मृतिका प्राप्त होना है।जीवमें निष्कामभाव (कर्मयोग)? स्वरूपबोध (ज्ञानयोग) और भगवत्प्रेम (भक्तियोग) -- तीनों स्वतः विद्यमान हैं। जीवको (अनादिकालसे) इनकी विस्मृति हो गयी है। एक बार इनकी स्मृति हो जानेपर फिर विस्मृति नहीं होती। कारण कि यह स्मृति स्वयंमें जाग्रत् होती है। बुद्धिमें होनेवाली लौकिक स्मृति (बुद्धिके क्षीण होनेपर) नष्ट भी हो सकती है? पर स्वयं में होनेवाली स्मृति कभी नष्ट नहीं होती।किसी विषयकी जानकारीको ज्ञान कहते हैं। लौकिक और पारमार्थिक जितना भी ज्ञान है? वह सब,ज्ञानस्वरूप परमात्माका अभासमात्र है। अतः ज्ञानको भगवान् अपनेसे ही होनेवाला बताते हैं। वास्तवमें ज्ञान वही है? जो स्वयं से जाना जाय। अनन्त? पूर्ण और नित्य होनेके कारण इस ज्ञानमें कोई सन्देह या भ्रम नहीं होता। यद्यपि इन्द्रिय और बुद्धिजन्य ज्ञान भी ज्ञान कहलाता है? तथापि सीमित? अलग (अपूर्ण) तथा परिवर्तनशील होनेके कारण इस ज्ञानमें सन्देह या भ्रम रहता है जैसे -- नेत्रोंसे देखनेपर सूर्य अत्यन्त बड़ा होते हुए भी (आकाशमें) छोटासा दीखता है इत्यादि। बुद्धिसे जिस बातको पहले ठीक समझते थे? बुद्धिके विकसित अथवा शुद्ध होनेपर वही बात गलत दीखने लग जाती है। तात्पर्य यह है कि इन्द्रिय और बुद्धिजन्य ज्ञान करणसापेक्ष और अल्प होता है। अल्प ज्ञान ही अज्ञान कहलाता है। इसके विपरीत स्वयं का ज्ञान किसी करण(इन्द्रिय? बुद्धि आदि) की अपेक्षा नहीं रखता और वह सदा पूर्ण होता है। वास्तवमें इन्द्रिय और बुद्धिजन्य ज्ञान भी स्वयं के ज्ञानसे प्रकाशित होते हैं अर्थात् सत्ता पाते हैं।संशय? भ्रम? विपर्यय (विपरीत भाव)? तर्कवितर्क आदि दोषोंके दूर होनेका नाम अपोहन है। भगवान् कहते हैं कि ये (संशय आदि) दोष भी मेरी कृपासे ही दूर होते हैं।शास्त्रोंकी बातें सत्य हैं या असत्य भगवान्को किसने देखा है संसार ही सत्य है इत्यादि संशय और भ्रम भगवान्की कृपासे ही मिटते हैं। सांसारिक पदार्थोंमें अपना हित दीखना? उनकी प्राप्तिमें सुख दीखना? प्रतिक्षण नष्ट होनेवाले संसारकी सत्ता दीखना आदि विपरीत भाव भी भगवान्की कृपासे ही दूर होते हैं। गीतोपदेशके अन्तमें अर्जुन भी भगवान्की कृपासे ही अपने मोहका नाश? स्मृतिकी प्राप्ति और संशयका नाश होना स्वीकार करते हैं (18। 73)।वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः -- यहाँ सर्वैः पद वेद एवं वेदानुकूल सम्पूर्ण शास्त्रोंका वाचक है। सम्पूर्ण शास्त्रोंका एकमात्र तात्पर्य परमात्माका वास्तविक ज्ञान कराने अथवा उनकी प्राप्ति करानेमें ही है।यहाँ भगवान् यह बात स्पष्ट करते हैं कि वेदोंका वास्तविक तात्पर्य मेरी प्राप्ति करानेमें ही है? सांसारिक भोगोंकी प्राप्ति करानेमें नहीं। श्रुतियोंमें सकामभावका विशेष वर्णन आनेका यह कारण भी है कि संसारमें सकाम मनुष्योंकी संख्या अधिक रहती है। इसलिये श्रुति (सबकी माता होनेसे) उनका भी पालन करती है।जाननेयोग्य एकमात्र परमात्मा ही हैं? जिनको जान लेनेपर फिर कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता। परमात्माको जाने बिना संसारको कितना ही क्यों न जान लें? जानकारी कभी पूरी नहीं होती? सदा अधूरी ही रहती है । अर्जुनमें भगवान्को जाननेकी विशेष जिज्ञासा थी। इसीलिये भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण वेदों और शास्त्रोंके द्वारा जाननेयोग्य मैं स्वयं तुम्हारे सामने बैठा हूँ।वेदान्तकृत् -- भगवान्से ही वेद प्रकट हुए हैं (गीता 3। 15 17। 23)। अतः वे ही वेदोंके अन्तिम सिद्धान्तको ठीकठीक बताकर वेदोंमें प्रतीत होनेवाले विरोधोंका अच्छी तरह समन्वय कर सकते हैं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि (वेदोंका पूर्ण वास्तविक ज्ञाता होनेके कारण) मैं ही वेदोंके यथार्थ तात्पर्यका निर्णय करनेवाला हूँ।वेदविदेव चाहम् -- वेदोंके अर्थ? भाव आदिको भगवान् ही यथार्थरूपसे जानते हैं। वेदोंमें कौनसी बात किस भाव या उद्देश्यसे कही गयी है वेदोंका यथार्थ तात्पर्य क्या है इत्यादि बातें भगवान् ही पूर्णरूपसे जानते हैं क्योंकि भगवान्से ही वेद प्रकट हुए हैं।वेदोंमें भिन्नभिन्न विषय होनेके कारण अच्छेअच्छे विद्वान् भी एक निर्णय नहीं कर पाते (गीता 2। 53)। इसलिये वेदोंके यथार्थ ज्ञाता भगवान्का आश्रय लेनेसे ही वे वेदोंका तत्त्व जान सकते हैं और श्रुतिविप्रतिपत्ति से मुक्त हो सकते हैं।इस (पंद्रहवें) अध्यायके पहले श्लोकमें भगवान्ने संसारवृक्षको तत्त्वसे जाननेवाले मनुष्यको वेदवित् कहा था। अब इस श्लोकमें भगवान् स्वयंको वेदवित् कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि संसारके यथार्थ तत्त्वको जान लेनेवाला महापुरुष भगवान्से अभिन्न हो जाता है। संसारके यथार्थ तत्त्वको जाननेका अभिप्राय है -- संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है और परमात्माकी ही सत्ता है -- इस प्रकार जानते हुए संसारसे माने हुए सम्बन्धको छोड़कर अपना सम्बन्ध भगवान्से जोड़ना? संसारका आश्रय छोड़कर भगवान्के आश्रित हो जाना।प्रकरणसम्बन्धी विशेष बात भगवान्ने श्रीमद्भगवद्गीताके चार अध्यायोंमें भिन्नभिन्न रूपोंसे अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है -- सातवें अध्यायमें आठवें श्लोकसे बारहवें श्लोकतक सृष्टिके प्रधानप्रधान पदार्थोंमें कारणरूपसे सत्रह विभूतियोंका वर्णन करके भगवान्ने अपनी सर्वव्यापकता और सर्वरूपता सिद्ध की है।नवें अध्यायमें सोलहवें श्लोकसे उन्नीसवें श्लोकतक क्रिया? भाव? पदार्थ आदिमें कार्यकारणरूपसे सैंतीस विभूतियोंका वर्णन करके भगवान्ने अपनेको सर्वव्यापक बताया है।दसवें अध्यायका तो नाम ही विभूतियोग है। इस अध्यायमें चौथे और पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने प्राणियोंके भावोंके रूपमें बीस विभूतियोंका और छठे श्लोकमें व्यक्तियोंके रूपमें पचीस विभूतियोंका वर्णन किया है। फिर बीसवें श्लोकसे उन्तालीसवें श्लोकतक भगवान्ने बयासी प्रधान विभूतियोंका विशेषरूपसे वर्णन किया है।इस पन्द्रहवें अध्यायमें बारहवें श्लोकसे पन्द्रहवें श्लोकतक भगवान्ने अपना प्रभाव बतलानेके लिये तेरह विभूतियोंका वर्णन किया है ।उपर्युक्त चारों अध्यायोंमें भिन्नभिन्न रूपमें विभूतियोंका वर्णन करनेका तात्पर्य यह है कि साधकको वासुदेवः सर्वम् (गीता 7। 19) सब कुछ वासुदेव ही है इस तत्त्वका अनुभव हो जाय। इसीलिये अपनी विभूतियोंका वर्णन करते समय भगवान्ने अपनी सर्वव्यापकताको ही विशेषरूपसे सिद्ध किया है जैसे -- मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति (7। 7)मेरेसे बढ़कर इस जगत्का दूसरा कोई भी महान् कारण नहीं है।,सदसच्चाहमर्जुन (9। 19)सत् और असत् -- सब कुछ मैं ही हूँ।,अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते (10। 8)मैं ही सबकी उत्पत्तिका कारण हूँ और मेरेसे ही सब जगत् चेष्टा करता है।,न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्। (10। 39)चर और अचर कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है? जो मेरेसे रहित हो अर्थात् चराचर सब प्राणी मेरे ही स्वरूप हैं।,इसी प्रकार इस पन्द्रहवें अध्यायमें भी अपनी विभूतियोंके वर्णनका उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं -- सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः (15। 15)मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हूँ। तात्पर्य यह हुआ कि सम्पूर्ण प्राणी? पदार्थ परमात्माकी सत्तासे ही सत्तावान् हो रहे हैं। परमात्मासे अलग किसीकी भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है।प्रकाशके अभाव(अन्धकार)में कोई वस्तु दिखायी नहीं देती। आँखोंसे किसी वस्तुको देखनेपर पहले प्रकाश दीखता है? उसके बाद वस्तु दीखती है अर्थात् हरेक वस्तु प्रकाशके अन्तर्गत ही दीखती है किन्तु हमारी दृष्टि प्रकाशपर न जाकर प्रकाशित होनेवाली वस्तुपर जाती है। इसी प्रकार यावन्मात्र वस्तु? क्रिया? भाव? आदिका ज्ञान एक विलक्षण और अलुप्त प्रकाश -- ज्ञानके अन्तर्गत होता है? जो सबका प्रकाशक और आधार है। प्रत्येक वस्तुसे पहले ज्ञान (स्वयंप्रकाश परमात्मतत्त्व) रहता है। अतः संसारमें परमात्माको व्याप्त कहनेपर भी वस्तुतः संसार बादमें है और उसका अधिष्ठान परमात्मतत्त्व पहले है अर्थात् पहले परमात्मतत्त्व दीखता है? बादमें संसार। परन्तु संसारमें राग होनेके के कारण मनुष्यकी दृष्टि उसके प्रकाशक(परमात्मतत्त्व) पर नहीं जाती।परमात्माकी सत्ताके बिना संसारकी कोई सत्ता नहीं है। परन्तु परमात्मसत्ताकी तरफ दृष्टि न रहने तथा सांसारिक प्राणीपदार्थोंमें राग या सुखासक्ति रहनेके कारण उन प्राणीपदार्थोंकी पृथक् (स्वतन्त्र) सत्ता प्रतीत होने लगती है और परमात्माकी वास्तविक सत्ता (जो तत्त्वसे है) नहीं दीखती। यदि संसारमें राग या सुखासक्तिका सर्वथा अभाव हो जाय? तो तत्त्वसे एक परमात्मसत्ता ही दीखने या अनुभवमें आने लगती है। अतः विभूतियोंके वर्णनका तात्पर्य यही है कि किसी भी प्राणीपदार्थकी तरफ दृष्टि जानेपर साधकको एकमात्र भगवान्की स्मृति होनी चाहिये अर्थात् उसे प्रत्येक प्राणीपदार्थमें भगवान्को ही देखना चाहिये। (गीता 10। 41)।वर्तमानमें समाजकी दशा बड़ी विचित्र है। प्रायः सब लोगोंके अन्तःकरणमें रुपयोंका बहुत ज्यादा महत्त्व हो गया है। रुपये खुद काममें नहीं आते? प्रत्युत उनसे खरीदी गयी वस्तुएँ ही काममें आती हैं परन्तु लोगोंने रुपयोंके उपयोगको खास महत्त्व न देकर उनकी संख्याकी वृद्धिको ही ज्यादा महत्त्व दे दिया इसलिये मनुष्यके पास जितने अधिक रुपये होते हैं? वह समाजमें अपनेको उतना ही अधिक बड़ा मान लेता है । इस प्रकार रुपयोंको ही महत्त्व देनेवाला व्यक्ति परमात्माके महत्त्वको समझ ही नहीं सकता। फिर परमात्मप्राप्तिके बिना रहा न जाय -- ऐसी लगन उस मनुष्यके भीतर उत्पन्न हो ही कैसे सकती है जिसके भीतर यह बात बैठी हुई है कि रुपयोंके बिना रहा ही नहीं जा सकता अथवा रुपयोंके बिना काम ही नहीं चल सकता? उसकी परमात्मामें एक निश्चयवाली बुद्धि हो ही नहीं सकती। वह यह बात समझ ही नहीं सकता कि रुपयोंके बिना भी अच्छी तरह काम चल सकता है।जिस प्रकार व्यापारीको (एकमात्र धनप्राप्तिका उद्देश्य रहनेपर) माल लेने? माल देने आदि व्यापारसम्बन्धी प्रत्येक क्रियामें धन ही दीखता है? इसी प्रकार परमात्मतत्त्वके जिज्ञासुको (एकमात्र परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रहनेपर) प्रत्येक वस्तु? क्रिया आदिमें तत्त्वरूपसे परमात्मा ही दीखते हैं। उसको ऐसा अनुभव हो जाता है कि परमात्माके सिवाय दूसरा कोई तत्त्व है ही नहीं? हो सकता ही नहीं।मार्मिक बातअर्जुनने चौदहवें अध्यायमें गुणातीत होनेका उपाय पूछा था। गुणोंके सङ्गसे ही जीव संसारमें फँसता है। अतः गुणोंका सङ्ग मिटानेके लिये भगवान्ने यहाँ अपने प्रभावका वर्णन किया है। छोटे प्रभावको मिटानेके लिये बड़े प्रभावकी आवश्यकता होती है। अतः जबतक जीवपर गुणों(संसार) का प्रभाव है? तबतक भगवान्के प्रभावको जाननेकी बड़ी आवश्यकता है।अपने प्रभावका वर्णन करते हुए भगवान्ने (इस अध्यायके बारहवेंसे पंद्रहवें श्लोकतक) यह बताया कि मैं ही सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करता हूँ मैं ही पृथ्वीमें प्रवेश करके सब प्राणियोंको धारण करता हूँ मैं ही पृथ्वीपर अन्न उत्पन्न करके उसको पुष्ट करता हूँ जब मनुष्य उस अन्नको खाता है? तब मैं ही वैश्वानररूपसे उस अन्नको पचाता हूँ और मनुष्यमें स्मृति? ज्ञान और अपोहन भी मैं ही करता हूँ। इस वर्णनसे सिद्ध होता है कि आदिसे अन्ततक? समष्टिसे व्यष्टितककी सम्पूर्ण क्रियाएँ भगवान्के अन्तर्गत? उन्हींकी शक्तिसे हो रही हैं। मनुष्य अहंकारवश अपनेको उन क्रियाओँका कर्ता मान लेता है अर्थात् उन क्रियाओंको व्यक्तिगत मान लेता है और बँध जाता है। सम्बन्ध -- भगवान्ने इसी अध्यायके पहले श्लोकसे पंद्रहवें श्लोकतक (तीन प्रकरणोंमें) क्रमशः संसार? जीवात्मा और परमात्माका विस्तारसे वर्णन किया। अब उस विषयका उपसंहार करते हुए आगेके दो श्लोकोंमें उन तीनोंका क्रमशः क्षर? अक्षर और पुरुषोत्तम नामसे स्पष्ट वर्णन करते हैं।
Sri Harikrishnadas Goenka
तथा --, मैं समस्त प्राणिमात्रका आत्मा होकर उनके अन्तःकरणमें स्थित हूँ। इसलिये समस्त प्राणियोंके स्मृति? ज्ञान और उनका लोप भी मुझ आत्मासे ही किया जाता है? अर्थात् जिन पुण्यकर्मा प्राणियोंको उनके पुण्यकर्मोंके अनुसार ज्ञान और स्मृति प्राप्त होते हैं तथा जिन पापाचारियोंके ज्ञान और स्मृतिका उनके पापकर्मानुसार लोप होता है ( वह मुझसे ही होता है )। समस्त वेदोंद्वारा मैं परमात्मा ही जाननेयोग्य हूँ। तथा वेदान्तका कर्ता? अर्थात् वेदान्तार्थके सम्प्रदायका कर्ता और वेदके अर्थको समझनेवाला भी मैं ही हूँ। यदादित्यगतं तेजः इत्यादि चार श्लोकोंद्वारा नारायण नामक भगवान् ईश्वरकी? विशेषउत्तम उपाधियोंसे,होनेवाली विभूतियाँ संक्षेपसे कही गयीं।
Sri Anandgiri
इतश्च सर्वात्मत्वेन सर्वव्यवहारास्पदत्वमीश्वरस्येत्याह -- किञ्चेति। प्राणिजातं ब्रह्मादिपुत्तिकान्तम्। आत्मतया बुद्धौ संनिविष्टत्वं तद्गुणदोषाणामशेषेण द्रष्टृत्वम्। अतो बुद्धिमध्यस्थस्य गुणदोषद्रष्टृत्वादिति यावत्। मत्तः सर्वकर्माध्यक्षाज्जगद्यन्त्रसूत्रधारादित्यर्थः। प्राणिनां स्मृतिज्ञानयोस्तदुपायस्य च भगवदधीनत्वे भगवतो वैषम्यं स्यादित्याशङ्क्याह -- येषामिति। स्मृतिर्जन्मान्तरादावनुभूतस्य परामर्शः। देशकालस्वभावविप्रकृष्टस्यापि ज्ञानमनुभवः। धर्माधर्माभ्यां विचित्रं कुर्वतो नेश्वरस्य वैषम्यमिति भावः। वेदवेद्यं परं ब्रह्म भगवतोऽन्यदिति शङ्कां वारयति -- वेदैरिति। वेदान्तानां पौरुषेयत्वं परिहरति -- वेदेति। तदर्थसंप्रदायप्रवर्तकत्वार्थं तदर्थयाथातथ्यज्ञानवत्त्वमाह -- वेदार्थेति।
Sri Dhanpati
एवं तत्पदस्य सर्वात्मत्वं सर्वव्यहारास्तपदत्वं विवक्षुर्विभूतिवर्णनमुपसंहरन्संकोचं परित्यजति -- सर्वस्येति। सर्वस्य ब्रह्मादिस्थावरान्तस्य प्राणिजातस्य हृदि संनिविष्टिः जीवात्मनान्तर्यामितया च। बुद्धौ संन्निविष्टत्वं बुद्धितादात्म्यापन्नत्वं तद्गुणदोषाणामशेषेण द्रष्टुत्वं च।अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरुपे व्याकरवाणि।यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानमन्तरः इत्यादिश्रुतरेरतो बुद्धौ चिदाभासरुपेण स्थितत्वात्? तन्मध्यस्थगुणदोषद्रष्टृत्वाच्च। मत्त आत्मनः सर्वप्राणिनां स्मृतिर्जन्मान्तरादावनुभूतस्य परामर्शः तेशकालस्वभावविप्रकृष्टस्याप्यनुभवो ज्ञानं तदपोहनं च। यथा पुण्यकर्मिणां पुण्यकर्मानुरोधेन ज्ञानस्मृती भवतः? तथा पापकर्मिणां पापकर्मानुपेण स्मृतिज्ञानयोरपोहनमपगमनं च। कर्माध्यक्षान्मत्त एव भवतीत्यर्थः। अतः कारणात्सर्वैर्वेदैः कर्मकाण्डादिलक्ष्णैश्चकारात्स्मृतीतिहासपुराणादिभीश्चाहमेव परमात्मा सर्वरुपो वेद्यो वेदितव्यः? अहमेव वेदान्तकृत् वेदान्तार्थसंप्रदायकृत् सर्ववेदार्थविच्चाहमेव।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| sarvasya | of all living beings |
| cha | and |
| aham | I |
| hṛidi | in the hearts |
| sanniviṣhṭaḥ | seated |
| mattaḥ | from me |
| smṛitiḥ | memory |
| jñānam | knowledge |
| apohanam | forgetfulness |
| cha | as well as |
| vedaiḥ | by the Vedas |
| cha | and |
| sarvaiḥ | all |
| aham | I |
| eva | alone |
| vedyaḥ | to be known |
| vedānta | kṛit |
| veda | vit |
| eva | alone |
| cha | and |
| aham | I |
Related Shloks
प्राणियोंके शरीरमें रहनेवाला मैं प्राण-अपानसे युक्त वैश्वानर होकर चार प्रकारके अन्नको पचाता हूँ। — VaniSagar
इस संसारमें क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी) -- ये दो प्रकारके पुरुष हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर नाशवान् और कूटस्थ (जीवात्मा) अविनाशी कहा जाता है। — VaniSagar
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“मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित हूँ। मेरेसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संशय आदि दोषोंका नाश) होता है। सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा मैं ही जाननेयोग्य हूँ। वेदोंके तत्त्वका निर्णय करनेवाला और वेदोंको जाननेवाला भी मैं ही हूँ। — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ: "मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित हूँ। मेरेसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संशय आदि दोषोंका नाश) होता है। सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा मैं ही जाननेयोग्य हूँ। वेदोंके तत्त्वका निर्णय करनेवाला और वेदोंको जाननेवाला भी मैं ही हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Purushottama Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 15?
Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 15 translates to: "And I am seated in the hearts of all; from Me come memory and knowledge, as well as their absence. I am verily That which has to be known by all the Vedas; I am indeed the author of the Vedanta and the knower of the Vedas. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 15, श्लोक 15 है जो Bhagavad Gita के Purushottama Yoga में संकलित है। मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित हूँ। मेरेसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संशय आदि दोषोंका नाश) होता है। सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा मैं ही जाननेयोग्य हूँ। वेदोंके तत्त्वका निर्णय करनेवाला और वेदोंको जाननेवाला भी मैं ही हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "sarvasya chāhaṁ hṛidi sanniviṣhṭo" mean in English?
"sarvasya chāhaṁ hṛidi sanniviṣhṭo" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 15. And I am seated in the hearts of all; from Me come memory and knowledge, as well as their absence. I am verily That which has to be known by all the Vedas; I am indeed the author of the Vedanta and the knower of the Vedas. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.