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Sudarshana Chakra
Adhyay 15, Shlok 18
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः

मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ। — VaniSagar

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KannadaIND

ನಾನು ನಾಶವಾಗುವದನ್ನು ಮೀರಿದ ಮತ್ತು ಅವಿನಾಶವಾದವುಗಳಿಗಿಂತಲೂ ಉನ್ನತನಾಗಿರುವುದರಿಂದ, ನಾನು ಪ್ರಪಂಚದಲ್ಲಿ ಮತ್ತು ವೇದಗಳಲ್ಲಿ ಅತ್ಯುನ್ನತ ಪುರುಷನೆಂದು ಘೋಷಿಸಲ್ಪಟ್ಟಿದ್ದೇನೆ.

MalayalamIND

ഞാൻ നശ്വരമായതിനെ മറികടക്കുകയും നശ്വരമായതിനെക്കാൾ ഉയർന്നവനാകുകയും ചെയ്യുമ്പോൾ, ഞാൻ ലോകത്തിലും വേദങ്ങളിലും ഏറ്റവും ഉയർന്ന പുരുഷനായി പ്രഖ്യാപിക്കപ്പെടുന്നു.

MaithiliIND

जेना-जेना हम नाशवान केँ पार करैत छी आ अविनाशी सँ सेहो उच्च छी, हमरा संसार मे आ वेद मे सर्वोच्च पुरुष घोषित कयल जाइत अछि |

BhojpuriIND

जइसे-जइसे हम नाशवान से परे बानी आ अविनाशी से भी ऊँच बानी, हमरा के दुनिया में आ वेद में सबसे ऊँच पुरुष घोषित कइल जाला।

KonkaniIND

जसो जसो हांव नाशवंतांक आडखळून वता आनी अविनाशी परसय उंच आसां तसो तसो संवसारांत आनी वेदांत म्हाका सगळ्यांत उंचेलो पुरुष म्हूण जाहीर जाता.

NepaliIND

म नाशवानलाई पार गरेर अविनाशीभन्दा पनि उच्च भएकोले म संसार र वेदहरूमा सर्वोत्कृष्ट पुरूष घोषित भएको छु।

PunjabiIND

ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਮੈਂ ਨਾਸ਼ਵਾਨ ਤੋਂ ਪਾਰ ਹਾਂ ਅਤੇ ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਤੋਂ ਵੀ ਉੱਚਾ ਹਾਂ, ਮੈਂ ਸੰਸਾਰ ਅਤੇ ਵੇਦਾਂ ਵਿੱਚ ਸਭ ਤੋਂ ਉੱਚਾ ਪੁਰਸ਼ ਘੋਸ਼ਿਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹਾਂ।

TamilIND

நான் அழியக்கூடியதைக் கடந்து, அழியாததை விட உயர்ந்தவனாக இருப்பதால், நான் உலகத்திலும் வேதங்களிலும் உயர்ந்த புருஷனாக அறிவிக்கப்படுகிறேன்.

TeluguIND

నేను నశించే వాటిని అధిగమించి, నాశనమైన వాటి కంటే కూడా ఉన్నతంగా ఉన్నాను కాబట్టి, నేను ప్రపంచంలో మరియు వేదాలలో అత్యున్నతమైన పురుషునిగా ప్రకటించబడ్డాను.

GujaratiIND

જેમ જેમ હું નાશવંતને પાર કરી રહ્યો છું અને અવિનાશી કરતાં પણ ઊંચો છું, તેમ હું વિશ્વમાં અને વેદોમાં સર્વોચ્ચ પુરૂષ તરીકે જાહેર થયો છું.

BengaliIND

যেহেতু আমি ধ্বংসশীলকে অতিক্রম করছি এবং অবিনশ্বর থেকেও উচ্চতর, তাই আমি বিশ্বের এবং বেদে সর্বোত্তম পুরুষ বলে ঘোষণা করেছি।

MarathiIND

मी नाशवंताच्या पलीकडे जाऊन अविनाशीपेक्षाही उच्च आहे म्हणून मी जगातील आणि वेदांमध्ये सर्वोच्च पुरुष म्हणून घोषित केले आहे.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- यस्मात्क्षरमतीतोऽहम् -- इन पदोंमें भगवान्का यह भाव है कि क्षर (प्रकृति) प्रतिक्षण परिवर्तनशील है और मैं नित्यनिरन्तर निर्विकाररूपसे ज्योंकात्यों रहनेवाला हूँ। इसलिये मैं क्षरसे सर्वथा अतीत हूँ।शरीरसे पर (व्यापक? श्रेष्ठ? प्रकाशक? सबल? सूक्ष्म) इन्द्रियाँ हैं? इन्द्रियोंसे पर मन है और मनसे पर बुद्धि है (गीता 3। 42)। इस प्रकार एकदूसरेसे पर होते हुए भी शरीर? इन्द्रियाँ? मन और बुद्धि एक ही जातिके? जड हैं। परन्तु परमात्मतत्त्व इनसे भी अत्यन्त पर है क्योंकि वह जड नहीं है? प्रत्युत चेतन है।अक्षरादपि चोत्तमः -- यद्यपि परमात्माका अंश होनेके कारण जीवात्मा(अक्षर) की परमात्मासे तात्त्विक एकता है? तथापि यहाँ भगवान् अपनेको जीवात्मासे भी उत्तम बताते हैं। इसके कारण ये हैं -- (1) परमात्माका अंश होनेपर भी जीवात्मा क्षर(जड प्रकृति) के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है (गीता 15। 7) और प्रकृतिके गुणोंसे मोहित हो जाता है? जबकि परमात्मा (प्रकृतिसे अतीत होनेके कारण) कभी मोहित नहीं होते (गीता 7।13)। (2) परमात्मा प्रकृतिको अपने अधीन करके लोकमें आते? अवतार लेते हैं (गीता 4। 6)? जबकि जीवात्मा प्रकृतिके वशमें होकर लोकमें आता है (गीता 8। 19)। (3) परमात्मा सदैव निर्लिप्त रहते हैं? (गीता 4। 14 9। 9)? जबकि जीवात्माको निर्लिप्त होनेके लिये साधन करना पड़ता है (गीता 4। 18 7। 14)।भगवान्द्वारा अपनेको क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम बतानेसे यह भाव भी प्रकट होता है कि क्षर और अक्षर -- दोनोंमें भिन्नता है। यदि उन दोनोंमें भिन्नता न होती? तो भगवान् अपनेको या तो उन दोनोंसे ही अतीत बताते या दोनोंसे ही उत्तम बताते। अतः यह सिद्ध होता है कि जैसे भगवान् क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम हैं? ऐसे ही अक्षर भी क्षरसे अतीत और उत्तम है।अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः -- यहाँ लोके पदका अर्थ है -- पुराण? स्मृति आदि शास्त्र। शास्त्रोंमें भगवान् पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हैं।शुद्ध ज्ञानका नाम वेद है? जो अनादि है। वही ज्ञान आनुपूर्वीरूपसे ऋक्? यजुः आदि वेदोंके रूपसे प्रकट हुआ है। वेदोंमें भी भगवान् पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हैं।पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा था कि क्षर और अक्षर -- दोनोंसे उत्तम पुरुष तो अन्य ही है। वह उत्तम पुरुष कौन है -- इसको बताते हुए भगवान् यह रहस्य प्रकट करते हैं कि वह उत्तम पुरुष -- पुरुषोत्तम मैं ही हूँ।विशेष बात(1) भौतिक सृष्टिमात्र क्षर (नाशवान्) है और परमात्माका सनातन अंश जीवात्मा अक्षर (अविनाशी) है। क्षरसे अतीत और उत्तम होनेपर भी अक्षरने क्षरसे अपना सम्बन्ध मान लिया -- इससे बढ़कर और कोई दोष? भूल या गलती है ही नहीं। क्षरके साथ यह सम्बन्ध केवल माना हुआ है? वास्तवमें एक क्षण भी रहनेवाला नहीं है। जैसे बाल्यावस्थासे अबतक शरीर बिलकुल बदल गया? फिर भी हम कहते हैं कि मैं वही हूँ। यह भी हम नहीं बता सकते कि अमुक दिन बाल्यावस्था खत्म हुई और युवावस्था शुरू हुई। कारण कि नदीके प्रवाहकी तरह शरीर निरन्तर ही बहता रहता है? जब कि अक्षर (जीवात्मा) नदीमें स्थित शिला(चट्टान) की तरह सदा अचल और असङ्ग रहता है। यदि अक्षर भी क्षरकी तरह निरन्तर परिवर्तनशील और नाशवान् होता तो इसकी आफत मिट जाती। परन्तु स्वयं (अक्षर) अपरिवर्तनशील और अविनाशी होते हुए भी निरन्तर परिवर्तनशील और नाशवान् क्षरको पकड़ लेता है -- उसको अपना मान लेता है। होता यह है कि अक्षर क्षरको छोड़ता नहीं और क्षर एक क्षण भी ठहरता नहीं। इस आफतको मिटानेका सुगम उपाय है -- क्षर(शरीरादि) को क्षर(संसार) की ही सेवामें लगा दिया जाय -- उसको संसाररूपी वाटिकाकी खाद बना दी जाय।मनुष्यको शरीरादि नाशवान् पदार्थ अधिकार करने अथवा अपना माननेके लिये नहीं मिले हैं? प्रत्युत सेवा करनेके लिये ही मिले हैं। इन पदार्थोंके द्वारा दूसरोंकी सेवा करनेकी ही मनुष्यपर जिम्मेवारी है? अपना माननेकी बिलकुल जिम्मेवारी नहीं।(2) पन्द्रहवें अध्यायमें भगवान्ने पहले क्षर -- संसारवृक्षका वर्णन किया। फिर उसका छेदन करके परम पुरुष परमात्माके शरण होने अर्थात् संसारसे अपनापन हटाकर एकमात्र परमात्माको अपना माननेकी प्रेरणा की। फिर अक्षर -- जीवात्माको अपना सनातन अंश बताते हुए उसके स्वरूपका वर्णन किया। उसके बाद भगवान्ने (बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक) अपने प्रभावका वर्णन करते हुए बताया कि सूर्य? चन्द्र और अग्निमें मेरा ही तेज है मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे चराचर सब प्राणियोंको धारण करता हूँ मैं ही अमृतमय चन्द्रके रूपसे सम्पूर्ण वनस्पतियोंको पुष्ट करता हूँ वैश्वानर अग्निके रूपमें मैं ही प्राणियोंके शरीरमें स्थित होकर उनके द्वारा खाये हुए अन्नको पचाता हूँ मैं ही सब प्राणियोंके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विद्यमान हूँ मेरेसे ही स्मृति? ज्ञान और अपोहन (भ्रम? संशय आदि दोषोंका नाश) होता है वेदादि सब शास्त्रोंके द्वारा,मैं ही जाननेयोग्य हूँ और वेदोंके अन्तिम सिद्धान्तका निर्णय करनेवाला तथा वेदोंको जाननेवाला भी मैं ही हूँ। इस प्रकार अपना प्रभाव प्रकट करनेके बाद इस श्लोकमें भगवान् यह गुह्यतम रहस्य प्रकट करते हैं कि जिसका यह सब प्रभाव है? वह (क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम) पुरुषोत्तम मैं (साक्षात् साकाररूपसे प्रकट श्रीकृष्ण) ही हूँ।भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनपर बहुत विशेष कृपा करके ही अपने रहस्यकी बात अपने मुखसे प्रकट की है जैसे -- कोई पिता अपने पुत्रके सामने अपनी गुप्त सम्पत्ति प्रकट कर दे अथवा कोई आदमी किसी भूलेभटके मनुष्यको अपना परिचय दे दे कि जिसके लिये तू भटक रहा है? वह मैं ही हूँ और तेरे सामने बैठा हूँ, सम्बन्ध -- चौदहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भगवान्ने जिस अव्यभिचारिणी भक्तिकी बात कही थी और जिसको प्राप्त करानेके लिये इस पन्द्रहवें अध्यायमें संसार? जीव और परमात्माका विस्तृत विवेचन किया गया? उसका अब आगेके श्लोकमें उपसंहार करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

उपर्युक्त ईश्वरका पुरुषोत्तम् यह नाम प्रसिद्ध है? उसका यह नाम किस कारणसे हुआ इसकी हेतुसहित उपपत्ति बतलाकर? नामकी सार्थकता दिखलाते हुए भगवान् अपने स्वरूपको प्रकट करते हैं कि मैं निरतिशय ईश्वर हूँ --, क्योंकि मैं क्षरभावसे अतीत हूँ अर्थात् अश्वत्थ नामक मायामय संसारवृक्षका अतिक्रमण किये हुए हूँ और संसारवृक्षके बीजस्वरूप अक्षरसे ( मूल प्रकृतिसे ) भी उत्तम -- अतिशय उत्कृष्ट अथवा अतिशय उच्च हूँ। इसीलिये अर्थात् क्षर और अक्षरसे उत्तम होनेके कारण? लोक और वेदमें? मैं पुरुषोत्तम नामसे विख्यात हूँ। भक्तजन मुझे इसी प्रकार जानते हैं और कविजन भी काव्यादिमें इसी नामका प्रयोग करते हैं अर्थात् पुरुषोत्तम् इसी नामसे ही मेरा वर्णन करते हैं।

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Sri Anandgiri

किञ्च लोकवेदयोर्भगवतो नामप्रसिद्ध्या सिद्धमप्रपञ्चत्वमित्याह -- यथेति। अश्वकर्णादिवदस्य नाम्नो रूढत्वादर्थविशेषाभावाद्भगवतोऽपि लौकिकेश्वरवदीश्वरत्वं सातिशयमिति नेत्याह -- तस्येति। यस्मादित्यस्यापेक्षितं निक्षिपति -- अत इति। उत्तमः पुरुष इति वाक्यशेषः।

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Sri Dhanpati

अतएव क्षराक्षराभ्यामुत्तम इति। मम नाम्नो निर्वचनप्रसिद्धिरर्थवतीत्याह। यस्मात्क्षरं संसारमायावृक्षं अश्वत्थाख्यमतीतोऽहमक्षरादपि तद्वीजभूतान्मायासंज्ञकादपि चोत्तमः उत्कृष्टमः ऊर्ध्वतमो वा? अतः क्षराक्षराभ्यामुत्तमत्वाद्धेतोर्लोके कविकाव्यातौ वेदे च पुरुषोत्तमः प्रथितः प्रख्यातःहरिर्यथैकः पुरुषोत्तमः स्मतःस उत्तमः पुरुषः इत्यादिलोकवेदप्रसिद्धा पुरुषोत्तम इति मां भक्तजाना विदुः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yasmāthence
kṣharamto the perishable
atītaḥtranscendental
ahamI
akṣharātto the imperishable
apieven
chaand
uttamaḥtranscendental
ataḥtherefore
asmiI am
lokein the world
vedein the Vedas
chaand
prathitaḥcelebrated
puruṣhauttamaḥ
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 15.17
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः

उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 15.19
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत

हे भरतवंशी अर्जुन ! इस प्रकार जो मोहरहित मनुष्य मुझे पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ सब प्रकारसे मेरा ही भजन करता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 15Shlok 18
Bhagavad Gita · Adhyay 15, Shlok 18
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः

मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ: "मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Purushottama Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 18?

Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 18 translates to: "As I transcend the perishable and am even higher than the imperishable, I am declared to be the highest Purusha in the world and in the Vedas. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 15, श्लोक 18 है जो Bhagavad Gita के Purushottama Yoga में संकलित है। मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yasmāt kṣharam atīto ’ham akṣharād api chottamaḥ" mean in English?

"yasmāt kṣharam atīto ’ham akṣharād api chottamaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 18. As I transcend the perishable and am even higher than the imperishable, I am declared to be the highest Purusha in the world and in the Vedas. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.