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Sudarshana Chakra
Adhyay 14, Shlok 19
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति

जब विवेकी (विचारकुशल) मनुष्य तीनों गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे पर अनुभव करता है, तब वह मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

যখন দ্রষ্টা গুন ব্যতীত অন্য কোন প্রতিনিধিকে দেখেন না এবং জানেন যে তাদের চেয়ে উচ্চতর, তখন সে আমার সত্ত্বাকে প্রাপ্ত হয়।

KannadaIND

ನೋಡುವವನು ಗುಣಗಳ ಹೊರತಾಗಿ ಬೇರಾವ ಕಾರಕವನ್ನು ನೋಡದೆ ಮತ್ತು ಅವುಗಳಿಗಿಂತ ಹೆಚ್ಚಿನದನ್ನು ತಿಳಿದಾಗ, ಅವನು ನನ್ನ ಅಸ್ತಿತ್ವವನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆ.

NepaliIND

जब द्रष्टाले गुणहरू बाहेक अरू कुनै कारक देख्दैन र तिनीहरू भन्दा उच्च के छ भनेर जान्दछ, तब उसले मेरो अस्तित्वलाई प्राप्त गर्दछ।

SindhiIND

جڏهن ڏسندڙ گنن کان سواءِ ٻيو ڪوبه نمائندو نه ٿو ڏسي ۽ ڄاڻي ٿو ته جيڪو انهن کان اعليٰ آهي، تڏهن هو منهنجي ذات تائين پهچي ٿو.

PunjabiIND

ਜਦੋਂ ਦਰਸ਼ਕ ਗੁਣਾਂ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਹੋਰ ਕੋਈ ਕਰਤਾ ਨਹੀਂ ਵੇਖਦਾ ਅਤੇ ਉਸ ਨੂੰ ਜਾਣਦਾ ਹੈ ਜੋ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨਾਲੋਂ ਉੱਚਾ ਹੈ, ਉਹ ਮੇਰੇ ਹਸਤੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

TamilIND

பார்ப்பவர் குணங்களைத் தவிர வேறு எவரையும் காணாததும், அவற்றை விட உயர்ந்ததை அறிந்ததும், அவர் எனது இருப்பை அடைகிறார்.

MarathiIND

जेव्हा द्रष्ट्याला गुणांशिवाय दुसरा कोणताच कर्ता दिसत नाही आणि त्यांच्यापेक्षा उच्च काय आहे हे जाणतो तेव्हा तो माझ्या अस्तित्वाला प्राप्त होतो.

GujaratiIND

જ્યારે દ્રષ્ટા ગુણો સિવાય અન્ય કોઈ કર્તાને જોતો નથી અને તે જાણે છે કે જે તેમના કરતાં ઉચ્ચ છે, ત્યારે તે મારા અસ્તિત્વને પ્રાપ્ત કરે છે.

OdiaIND

ଯେତେବେଳେ ଦର୍ଶକ ଗୁନା ବ୍ୟତୀତ ଅନ୍ୟ କ agent ଣସି ଏଜେଣ୍ଟକୁ ଦେଖନ୍ତି ନାହିଁ ଏବଂ ଜାଣନ୍ତି ଯାହା ସେମାନଙ୍କଠାରୁ ଅଧିକ, ସେ ମୋ ସୃଷ୍ଟିକୁ ପ୍ରାପ୍ତ କରନ୍ତି |

TeluguIND

చూసేవాడు గుణాలను తప్ప మరే ఇతర ఏజెంట్‌ను చూడనప్పుడు మరియు వాటి కంటే ఉన్నతమైనదాన్ని తెలుసుకున్నప్పుడు, అతను నా ఉనికిని పొందుతాడు.

MalayalamIND

ദർശകൻ ഗുണങ്ങളല്ലാതെ മറ്റൊരു പ്രതിനിധിയെയും കാണാതിരിക്കുകയും അവയെക്കാൾ ഉയർന്നത് അറിയുകയും ചെയ്യുമ്പോൾ, അവൻ എൻ്റെ സത്തയിൽ എത്തിച്ചേരുന്നു.

MizoIND

Seer chuan Gunas tih loh agent dang a hmuh loh a, anmahni aia sang zawk a hriat chuan Ka nihna a thleng ta a ni.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- नान्यं गुणेभ्यः ৷৷. मद्भावं सोऽधिगच्छति -- गुणोंके सिवाय अन्य कोई कर्ता है ही नहीं अर्थात् सम्पूर्ण क्रियाएँ गुणोंसे ही हो रही हैं? सम्पूर्ण परिवर्तन गुणोंमें ही हो रहा है। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण क्रियाओं और परिवर्तनोंमें गुण ही कारण हैं? और कोई कारण नहीं है। वे गुण जिससे प्रकाशित होते हैं? वह तत्त्व गुणोंसे पर है। गुणोंसे पर होनेसे वह कभी गुणोंसे लिप्त नहीं होता अर्थात् गुणों और क्रियाओँका उसपर कोई असर नहीं पड़ता। ऐसे उस तत्त्वको जो विचारकुशल साधक जान लेता है अर्थात् विवेकके द्वारा अपनेआपको गुणोंसे पर? असम्बद्ध? निर्लिप्त अनुभव कर लेता है कि गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध न कभी,हुआ है? न है? न होगा और न हो ही सकता है। कारण कि गुण परिवर्तनशील हैं और स्वयंमें कभी परिवर्तन होता ही नहीं। वह फिर मेरे भावको? मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य है कि वह जो भूलसे गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध मानता था? वह मान्यता मिट जाती है और मेरे साथ उसका जो स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है? वह ज्योंकात्यों रह जाता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

प्रकृतिमें स्थित होनारूप मिथ्याज्ञानसे युक्त पुरुषका सुखदुःखमोहात्मक भोगरूप गुणोंमें मैं सुखी? दुखी अथवा मूढ हूँ इस प्रकारका जो सङ्ग है? वह सङ्ग ही इस पुरुषकी अच्छीबुरी योनियोंमें जन्मप्राप्तिरूप संसारका कारण है। यह बात जो पहले तेरहवें अध्यायमें संक्षेपसे कही थी? उसीको यहाँ सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः इस श्लोकसे लेकर ( उपर्युक्त श्लोकतक ) गुणोंका स्वरूप? गुणोंका कार्य? अपने कार्यद्वारा गुणोंका बन्धकत्व तथा गुणोंके कार्यद्वारा बँधे हुए पुरुषकी जो गति होती है? इन सब मिथ्याज्ञानरूप अज्ञानमूलक बन्धनके कारणोंको? विस्तारपूर्वक बतलाकर? अब यथार्थ ज्ञानसे मोक्ष ( कैसे होता है सो ) बतलाना चाहिये? इसलिये भगवान् बोले --, जिस समय द्रष्टा पुरुष ज्ञानी होकर? कार्य? करण और विषयोंके आकारमें परिणत हुए गुणोंसे अतिरिक्त अन्य किसीको ( भी ) कर्ता नहीं देखता है? अर्थात् यही देखता है कि समस्त अवस्थाओंमें स्थित हुए गुण ही,समस्त कर्मोंके कर्ता हैं तथा गुणोंके व्यापारके साक्षीरूप आत्माको गुणोंसे पर जानता है? तब वह द्रष्टा मेरे भावको प्राप्त होता है।

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Sri Anandgiri

कस्मिन्गुणे कथमित्यादिप्रश्नान्प्रत्याख्याय गुणेभ्यो मोक्षणं कथमिति प्रत्याख्यानार्थं वृत्तानुवादपूर्वकं मिथ्याज्ञाननिवर्तकं सम्यग्ज्ञानं प्रस्तौति -- पुरुषस्येत्यादिना। पुरुषस्य या गतिः सा चेति शेषः। मोक्षो गुणेभ्यो विश्लेषपूर्वको ब्रह्मभावः। सम्यग्ज्ञानोक्तिपरं श्लोकं व्याख्यातुं प्रतीकमादत्ते -- नान्यमिति। सत्त्वादिकार्यविषयस्य गुणशब्दस्य विवक्षितमर्थमाह -- कार्येति। विद्यानन्तर्यमनुशब्दार्थः। अक्षरार्थमुक्त्वा पूर्वार्धस्यार्थिकमर्थमाह -- गुणा एवेति। सर्वावस्थास्तत्तत्कार्यकरणाकारपरिणता इति यावत्। सर्वकर्मणां कायिकवाचिकमानसानां विहितप्रतिषिद्धानामित्यर्थः। परं व्यतिरिक्तम्। व्यतिरेकमेव स्फोरयति -- गुणेति। निर्गुणब्रह्मात्मानमित्यर्थः। मद्भावं ब्रह्मात्मतामसौ प्राप्नोति। ब्रह्मभावोऽस्याभिव्यज्यत इत्यर्थः।

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Sri Dhanpati

प्रकृतिस्थस्वरुपेण मिथ्याज्ञानेन युक्तस्य पुरुषस्य भोग्येषु गुणेषु सुखदुःखमोहात्मकेषु सुखी दुःखी मूढोऽहमस्मीत्येवंरुपः सङ्गः पुरुषस्य सदसद्यो निजन्मप्राप्तिलक्षणस्य संसारस्य कारणमितिपुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्। कारणं गुणसङ्गेऽस्य सदसद्योनिजन्मसु इति पूर्वोध्याये संक्षेपेण यदुक्तं तदस्मिन्नध्यायेसत्त्वं रजस्तम् इति गुणाः

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
nano
anyamother
guṇebhyaḥof the guṇas
kartāramagents of action
yadāwhen
draṣhṭāthe seer
anupaśhyatisee
guṇebhyaḥto the modes of nature
chaand
paramtranscendental
vettiknow
matbhāvam
saḥthey
adhigachchhatiattain
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 14.18
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः

सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित मनुष्य अधोगतिमें जाते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 14.20
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते

देहधारी (विवेकी मनुष्य) देहको उत्पन्न करनेवाले इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थारूप दुःखोंसे रहित हुआ अमरताका अनुभव करता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 14Shlok 19
Bhagavad Gita · Adhyay 14, Shlok 19
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति

जब विवेकी (विचारकुशल) मनुष्य तीनों गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे पर अनुभव करता है, तब वह मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 19 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 19 का हिंदी अर्थ: "जब विवेकी (विचारकुशल) मनुष्य तीनों गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे पर अनुभव करता है, तब वह मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 19?

Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 19 translates to: "When the seer beholds no agent other than the Gunas and knows that which is higher than them, he attains to My Being. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिग" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 14, श्लोक 19 है जो Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga में संकलित है। जब विवेकी (विचारकुशल) मनुष्य तीनों गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे पर अनुभव करता है, तब वह मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "nānyaṁ guṇebhyaḥ kartāraṁ yadā draṣhṭānupaśhyati" mean in English?

"nānyaṁ guṇebhyaḥ kartāraṁ yadā draṣhṭānupaśhyati" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 19. When the seer beholds no agent other than the Gunas and knows that which is higher than them, he attains to My Being. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.