Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 14, Shlok 20
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते

देहधारी (विवेकी मनुष्य) देहको उत्पन्न करनेवाले इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थारूप दुःखोंसे रहित हुआ अमरताका अनुभव करता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

BengaliIND

মূর্ত ব্যক্তি, এই তিনটি গুণকে অতিক্রম করে যা থেকে দেহের বিকাশ ঘটে, জন্ম, মৃত্যু, ক্ষয় এবং বেদনা থেকে মুক্ত হয় এবং অমরত্ব লাভ করে।

KannadaIND

ದೇಹವು ವಿಕಸನಗೊಂಡ ಈ ಮೂರು ಗುಣಗಳನ್ನು ದಾಟಿದ ಮೂರ್ತರೂಪವು ಜನನ, ಮರಣ, ಕ್ಷಯ ಮತ್ತು ನೋವಿನಿಂದ ಬಿಡುಗಡೆ ಹೊಂದುತ್ತದೆ ಮತ್ತು ಅಮರತ್ವವನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತದೆ.

PunjabiIND

ਸਰੂਪ ਵਾਲਾ, ਇਨ੍ਹਾਂ ਤਿੰਨਾਂ ਗੁਣਾਂ ਤੋਂ ਪਾਰ ਲੰਘ ਕੇ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਤੋਂ ਸਰੀਰ ਦਾ ਵਿਕਾਸ ਹੋਇਆ ਹੈ, ਜਨਮ, ਮੌਤ, ਸੜਨ ਅਤੇ ਦੁੱਖ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਅਮਰਤਾ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ।

GujaratiIND

મૂર્તિમંત વ્યક્તિ, આ ત્રણ ગુણોથી આગળ વધીને, જેમાંથી શરીર વિકસિત થાય છે, તે જન્મ, મૃત્યુ, ક્ષય અને પીડામાંથી મુક્ત થાય છે, અને અમરત્વ પ્રાપ્ત કરે છે.

MalayalamIND

ശരീരം പരിണമിക്കുന്ന ഈ മൂന്ന് ഗുണങ്ങൾക്കപ്പുറം കടന്ന്, മൂർത്തീഭാവമുള്ളവൻ, ജനനം, മരണം, ശോഷണം, വേദന എന്നിവയിൽ നിന്ന് മുക്തനായി അമർത്യത പ്രാപിക്കുന്നു.

TamilIND

உடல் உருவான இம்மூன்று குணங்களையும் கடந்து, பிறப்பு, இறப்பு, சிதைவு, துன்பம் ஆகியவற்றில் இருந்து விடுபட்டு அழியாத நிலையை அடைகிறான்.

TeluguIND

మూర్తీభవించిన వాడు ఈ మూడు గుణాలను దాటి, దేహం పరిణామం చెంది, జనన, మరణ, క్షీణత, బాధల నుండి విముక్తి పొంది అమరత్వాన్ని పొందుతాడు.

DogriIND

सरीर, इन्हां त्रै गुणां तों परे पार हो के जिन्हां तों शरीर दा विकास होंदा है, जन्म, मौत, क्षय, ते पीड़ा तों मुक्त हो जांदा है ते अमरता हासिल करदा है।

MaithiliIND

शरीरधारी एहि तीन गुण सँ पार कए जाहि सँ शरीरक विकास होइत अछि, जन्म, मृत्यु, क्षय आ पीड़ा सँ मुक्त भ' अमरत्व प्राप्त करैत अछि |

KonkaniIND

ज्या तीन गुणांतल्यान कुडीची उत्क्रांती जाता, तातूंतल्यान मूर्ती आशिल्लो मनीस जल्म, मरण, क्षय आनी वेदना हांचेपसून मुक्त जावन अमरत्व मेळयता.

AssameseIND

শৰীৰৰ বিকশিত হোৱা এই তিনিটা গুণৰ সিপাৰে পাৰ হৈ দেহীজন জন্ম, মৃত্যু, ক্ষয় আৰু যন্ত্ৰণাৰ পৰা মুক্ত হৈ অমৰত্ব লাভ কৰে।

ManipuriIND

ꯍꯀꯆꯥꯡ ꯑꯁꯤ ꯁꯦꯃꯒꯠꯂꯀꯄꯥ ꯒꯨꯟ ꯑꯍꯨꯝ ꯑꯁꯤꯒꯤ ꯃꯊꯛꯇꯥ ꯂꯥꯟꯊꯣꯛꯂꯕꯥ ꯃꯇꯨꯡꯗꯥ ꯄꯣꯀꯄꯥ, ꯁꯤꯕꯥ, ꯁꯣꯀꯄꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯋꯥꯕꯥ ꯑꯁꯤꯗꯒꯤ ꯅꯥꯟꯊꯣꯀꯏ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯁꯤꯕꯥ ꯐꯪꯏ |

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् -- यद्यपि विचारकुशल मनुष्यका देहके साथ सम्बन्ध नहीं होता? तथापि लोगोंकी दृष्टिमें देहवाला होनेसे उसको यहाँ देही कहा गया है।देहको उत्पन्न करनेवाले गुण ही हैं। जिस गुणके साथ मनुष्य अपना सम्बन्ध मान लेता है? उसके अनुसार उसको ऊँचनीच योनियोंमें जन्म लेना ही पड़ता है (गीता 13। 21)।अभी इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकसे अठारहवें श्लोकतक जिनका वर्णन हुआ है? उन्हीं तीनों गुणोंके लिये यहाँ एतान् त्रीन् गुणान् पद आये हैं। विचारकुशल मनुष्य इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है अर्थात् इनके साथ अपना सम्बन्ध नहीं मानता? इनके साथ माने हुए सम्बन्धका त्याग कर देता है। कारण कि उसको यह स्पष्ट विवेक हो जाता है कि सभी गुण परिवर्तनशील हैं? उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं और अपना स्वरूप गुणोंसे कभी लिप्त हुआ नहीं? हो सकता भी नहीं। ध्यान देनेकी बात है कि जिस प्रकृतिसे ये गुण उत्पन्न होते हैं? उस प्रकृतिके साथ भी स्वयंका किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है? फिर गुणोंके साथ तो उसका सम्बन्ध हो ही कैसे सकता हैजन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते -- जब इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है? तो फिर उसको जन्म? मृत्यु और वृद्धावस्थाका दुःख नहीं होता। वह जन्ममृत्यु आदिके दुःखोंसे छूट जाता है क्योंकि जन्म आदिके होनेमें गुणोंका सङ्ग ही कारण है। ये गुण आतेजाते रहते हैं इनमें परिवर्तन होता रहता है। गुणोंकी वृत्तियाँ कभी सात्त्विकी? कभी राजसी और कभी तामसी हो जाती हैं परन्तु स्वयंमें कभी सात्त्विकपना? राजसपना और तामसपना आता ही नहीं। स्वयं (स्वरूप) तो स्वतः असङ्ग रहता है। इस असङ्ग स्वरूपका कभी जन्म नहीं होता। जब जन्म नहीं होता? तो मृत्यु भी नहीं होती। कारण कि जिसका जन्म होता है? उसीकी मृत्यु होती है तथा उसीकी वृद्धावस्था भी होती है। गुणोंका सङ्ग रहनेसे ही जन्म? मृत्यु और वृद्धावस्थाके दुःखोंका अनुभव होता है। जो गुणोंसे सर्वथा निर्लिप्तताका अनुभव कर लेता है? उसको स्वतःसिद्ध अमरताका अनुभव हो जाता है।देहसे तादात्म्य (एकता) माननेसे ही मनुष्य अपनेको मरनेवाला समझता है। देहके सम्बन्धसे होनेवाले सम्पूर्ण दुःखोंमें सबसे बड़ा दुःख मृत्यु ही माना गया है। मनुष्य स्वरूपसे है तो अमर ही किन्तु भोग और संग्रहमें आसक्त होनेसे और प्रतिक्षण नष्ट होनेवाले शरीरको अमर रखनेकी इच्छासे ही इसको अमरताका अनुभव नहीं होता। विवेकी मनुष्य देहसे तादात्म्य नष्ट होनेपर अमरताका अनुभव करता है।पूर्वश्लोकमें मद्भावं सोऽधिगच्छति पदोंसे भगवद्भावकी प्राप्ति कही गयी एवं यहाँ अमृतमश्नुते पदोंसे अमरताका अनुभव करनेको कहा गया -- वस्तुतः दोनों एक ही बात है।गीतामें जरामरणमोक्षाय (7। 29)? जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् (13। 8) और यहाँ जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तः (14। 20) -- इन तीनों जगह बाल्य और युवाअवस्थाका नाम न लेकर जरा (वृद्धावस्था) का ही नाम लिया गया है? जबकि शरीरमें बाल्य? युवा और वृद्ध -- ये तीनों ही अवस्थाएँ होती हैं। इसका कारण यह है कि बाल्य और युवाअवस्थामें मनुष्य अधिक दुःखका अनुभव नहीं करता क्योंकि इन दोनों ही अवस्थाओंमें शरीरमें बल रहता है। परन्तु वृद्धावस्थामें शरीरमें बल न रहनेसे मनुष्य अधिक दुःखका अनुभव करता है। ऐसे ही जब मनुष्यके प्राण छूटते हैं? तब वह भयंकर दुःखका अनुभव करता है।,परन्तु जो तीनों गुणोंका अतिक्रमण कर जाता है? वह सदाके लिये जन्म? मृत्यु और वृद्धावस्थाके दुःखोंसे मुक्त हो जाता है।इस मनुष्यशरीरमें रहते हुए जिसको बोध हो जाता है? उसका फिर जन्म होनेका तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता। हाँ? उसके अपने कहलानेवाले शरीरके रहते हुए वृद्धावस्था और मृत्यु तो आयेगी ही? पर उसको वृद्धावस्था और मृत्युका दुःख नहीं होगा।वर्तमानमें शरीरके साथ स्वयंकी एकता माननेसे ही पुनर्जन्म होता है और शरीरमें होनेवाले जरा? व्याधि आदिके दुःखोंको जीव अपनेमें मान लेता है। शरीर गुणोंके सङ्गसे उत्पन्न होता है। देहके उत्पादक गुणोंसे रहित होनेके कारण गुणातीत महापुरुष देहके सम्बन्धसे होनेवाले सभी दुःखोंसे मुक्त हो जाता है।अतः प्रत्येक मनुष्यको मृत्युसे पहलेपहले अपने गुणातीत स्वरूपका अनुभव कर लेना चाहिये। गुणातीत होनेसे जरा? व्याधि? मृत्यु आदि सब प्रकारके दुःखोंसे मुक्ति हो जाती है और मनुष्य अमरताका अनुभव कर लेता है। फिर उसका पुनर्जन्म होता ही नहीं। सम्बन्ध -- गुणातीत पुरुषं दुःखोंसे मुक्त होकर अमरताको प्राप्त कर लेता है -- ऐसा सुनकर अर्जुनके मनमें गुणातीत मनुष्यके लक्षण जाननेकी जिज्ञासा हुई। अतः वे आगेके श्लोकमें भगवान्से प्रश्न करते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

कैसे प्राप्त होता है सो बतलाते हैं --, देहोत्पत्तिके बीजभूत? इन मायोपाधिक पूर्वोक्त तीनों गुणोंका उल्लंघन कर? अर्थात् जीवितावस्थामें ही इनका अतिक्रम करके? यह देहधारी विद्वान् जीता हुआ ही जन्म मृत्यु? बुढ़ापे और दुःखोंसे मुक्त होकर अमृतका अनुभव करता है। अभिप्राय यह कि इस प्रकार वह मेरे भावको प्राप्त हो जाता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

अनर्थव्रातरूपमपोह्य विद्वान्ब्रह्मत्वं प्राप्नोतीत्येतत्प्रश्नद्वारा विवृणोति -- कथमित्यादिना। यथोक्तानित्येतदेव व्याचष्टे -- मायेति। मायैवोपाधिस्तद्भूतांस्तदात्मनः सत्त्वादीननर्थरूपानित्यर्थः। एभ्यः समुद्भवन्तीति समुद्भवा देहस्य समुद्भवा देहसमुद्भवास्तानिति व्युत्पत्तिं गृहीत्वा व्याचष्टे -- देहोत्पत्तीति। यो विद्वानविद्यामयान्गुणाञ्जीवन्नेवातिक्रम्य स्थितस्तमेव विशिनष्टि -- जन्मेति। पुरस्ताद्विस्तरेणोक्तस्य प्रसङ्गादत्र संक्षिप्तस्य सम्यग्ज्ञानस्य फलमुपसंहरति -- एवमिति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

कथमधिगच्छतीत्यपेक्षायमाह। गुणानेतान्यथोक्तान्मायात्मकांस्त्रीन्सत्त्वरजस्तमःसंज्ञकान् समुद्भवन्त्येभ्य इति समुद्भवाः देहस्य समुद्भवाः तान् देहसमुद्भवान् तान् देहसमुद्धवान् देहोत्पत्तिबीजभूतान् देही अतीत्य विद्वान्,जीवन्नेवातिक्रम्य जन्ममृत्युजरादुःखै जन्म च मृत्युश्च जरा च दुःखानि च तैः जीवन्नेव मुक्तः सर्वानर्थविनिर्मुक्तः अमृतं ब्रह्मानन्दं मद्भावं मोक्षमश्रुते प्राप्तोतीत्यर्थः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
guṇānthe three modes of material nature
etānthese
atītyatranscending
trīnthree
dehīthe embodied
dehabody
samudbhavānproduced of
janmabirth
mṛityudeath
jarāold age
duḥkhaiḥmisery
vimuktaḥfreed from
amṛitamimmortality
aśhnuteattains
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 14.19
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति

जब विवेकी (विचारकुशल) मनुष्य तीनों गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे पर अनुभव करता है, तब वह मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 14.21
अर्जुन उवाचकैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो।किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते

हे प्रभो ! इन तीनों गुणोंसे अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणोंसे युक्त होता है? उसके आचरण कैसे होते हैं? और इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है? — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 14Shlok 20
Bhagavad Gita · Adhyay 14, Shlok 20
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते

देहधारी (विवेकी मनुष्य) देहको उत्पन्न करनेवाले इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थारूप दुःखोंसे रहित हुआ अमरताका अनुभव करता है। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ: "देहधारी (विवेकी मनुष्य) देहको उत्पन्न करनेवाले इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थारूप दुःखोंसे रहित हुआ अमरताका अनुभव करता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 20?

Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 20 translates to: "The embodied one, having crossed beyond these three Gunas from which the body is evolved, is freed from birth, death, decay, and pain, and attains immortality. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 14, श्लोक 20 है जो Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga में संकलित है। देहधारी (विवेकी मनुष्य) देहको उत्पन्न करनेवाले इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थारूप दुःखोंसे रहित हुआ अमरताका अनुभव करता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "guṇān etān atītya trīn dehī deha-samudbhavān" mean in English?

"guṇān etān atītya trīn dehī deha-samudbhavān" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 20. The embodied one, having crossed beyond these three Gunas from which the body is evolved, is freed from birth, death, decay, and pain, and attains immortality. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.