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Sudarshana Chakra
Adhyay 14, Shlok 18
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः

सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित मनुष्य अधोगतिमें जाते हैं। — VaniSagar

Global Translations

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KannadaIND

ಸತ್ತ್ವದಲ್ಲಿ ಕುಳಿತವರು ಏರುತ್ತಾರೆ; ರಾಜಸಿಕ ಸ್ವಭಾವದವರು ಮಧ್ಯದಲ್ಲಿ ವಾಸಿಸುತ್ತಾರೆ; ಮತ್ತು ತಾಮಸಿಕ ಸ್ವಭಾವದವರು, ಕೆಳಮಟ್ಟದ ಗುಣದ ಕಾರ್ಯದಲ್ಲಿ ಬದ್ಧರಾಗುತ್ತಾರೆ.

PunjabiIND

ਸਤਵ ਵਿੱਚ ਬੈਠੇ ਉਹ ਚੜ੍ਹਦੇ ਹਨ; ਰਾਜਸੀ ਸੁਭਾਅ ਵਾਲੇ ਮੱਧ ਵਿੱਚ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ; ਅਤੇ ਤਾਮਸਿਕ ਪ੍ਰਕਿਰਤੀ ਵਾਲੇ, ਸਭ ਤੋਂ ਹੇਠਲੇ ਗੁਣਾਂ ਦੇ ਕਾਰਜ ਵਿੱਚ ਰਹਿੰਦੇ ਹੋਏ, ਉਤਰਦੇ ਹਨ।

BengaliIND

সত্ত্বে উপবিষ্ট ব্যক্তিরা আরোহণ করেন; রাজসিক প্রকৃতির যারা মাঝখানে থাকে; এবং তামসিক প্রকৃতির যারা নিম্নতম গুণের কাজ করে, তারা অবতরণ করে।

NepaliIND

सत्त्वमा बसेकाहरू चढ्छन्; राजसिक प्रकृतिका बीचमा बस्छन्; र निम्नतम गुणको कार्यमा रहने तामसिक प्रकृतिकाहरू अवतरण हुन्छन्।

SindhiIND

سَتَوا ۾ ويھي چڙھندا آھن. راجاسڪ طبيعت وارا وچ ۾ رهن ٿا. ۽ تاماس جي طبيعت وارا، سڀ کان هيٺين گونا جي ڪم ۾ رهڻ وارا، هيٺ لهندا آهن.

GujaratiIND

સત્વમાં બેઠેલાઓ ચઢે છે; રાજસિક પ્રકૃતિના લોકો મધ્યમાં રહે છે; અને તામસિક પ્રકૃતિના, સૌથી નીચલા ગુણના કાર્યમાં રહેનારા, નીચે ઉતરે છે.

TamilIND

சத்வத்தில் அமர்ந்திருப்பவர்கள் மேலேறுகிறார்கள்; ராஜசிக் இயல்புடையவர்கள் நடுவில் வசிக்கிறார்கள்; மற்றும் தாமசிக் குணம் கொண்டவர்கள், மிகக் குறைந்த குணத்தின் செயல்பாட்டில் நிலைத்திருப்பவர்கள், இறங்குகிறார்கள்.

TeluguIND

సత్వగుణంలో కూర్చున్న వారు ఆరోహణ చేస్తారు; రాజసిక్ స్వభావం ఉన్నవారు మధ్యలో ఉంటారు; మరియు తామసిక స్వభావం గలవారు, అత్యల్ప గుణ పనితీరులో కట్టుబడి ఉంటారు.

MalayalamIND

സത്വത്തിൽ ഇരിക്കുന്നവർ ആരോഹണം ചെയ്യുന്നു; രാജസിക് സ്വഭാവമുള്ളവർ നടുവിൽ വസിക്കുന്നു; തമസിക് സ്വഭാവമുള്ളവർ, ഏറ്റവും താഴ്ന്ന ഗുണത്തിൻ്റെ പ്രവർത്തനത്തിൽ നിലകൊള്ളുന്നു.

MarathiIND

सत्त्वगुणात बसलेले ते चढतात; राजसिक स्वभावाचे लोक मध्यभागी राहतात; आणि तामसिक प्रकृतीचे, निम्नतम गुणाच्या कार्यात राहून खाली उतरतात.

DogriIND

सत्त्व च बैठे दे लोक चढ़दे न; राजसी प्रकृति दे लोक बीच च रौंह्दे न; ते तामसी प्रकृति दे, निचले गुण दे कार्य च टिकदे, उतरदे न।

ManipuriIND

ꯁꯠꯠꯕꯇꯥ ꯐꯝꯂꯤꯕꯁꯤꯡ ꯑꯗꯨ ꯂꯥꯀꯏ; ꯔꯥꯖꯥꯁꯤꯛ ꯃꯍꯧꯁꯥꯒꯤ ꯑꯣꯏꯕꯥ ꯃꯈꯣꯌꯁꯤꯡ ꯑꯗꯨ ꯃꯔꯛꯇꯥ ꯂꯩꯔꯤ; ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯈ꯭ꯕꯥꯏꯗꯒꯤ ꯅꯦꯝꯕꯥ ꯒꯨꯅꯒꯤ ꯐꯉ꯭ꯀꯁꯟꯗꯥ ꯂꯩꯕꯥ ꯇꯥꯃꯥꯁꯤꯛ ꯃꯍꯧꯁꯥꯒꯤ ꯑꯣꯏꯕꯥ ꯃꯈꯣꯌꯁꯤꯡ ꯑꯗꯨ ꯂꯥꯀꯏ꯫

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्थाः -- जिनके जीवनमें सत्त्वगुणकी प्रधानता रही है और उसके कारण जिन्होंने भोगोंसे संयम किया है तीर्थ? व्रत? दान आदि शुभकर्म किये हैं दूसरोंके सुखआरामके लिये प्याऊ? अन्नक्षेत्र आदि चलाये हैं सड़कें बनवायी हैं पशुपक्षियोंकी सुखसुविधाके लिये पेड़पौधे लगाये हैं गौशालाएँ बनवायी हैं? उन मनुष्योंको यहाँ सत्त्वस्थाः कहा गया है। जब सत्त्वगुणकी प्रधानतामें ही ऐसे मनुष्योंका शरीर छूट जाता है? तब वे सत्त्वगुणका सङ्ग होनेसे? सत्त्वगुणमें आसक्ति होनेसे स्वर्गादि ऊँचे लोकोंमें चले जाते हैं। उन लोकोंका वर्णन इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें उत्तमविदां अमलान् लोकान् पदोंसे किया गया है। ऊर्ध्वलोकोंमें जानेवाले मनुष्योंको तेजस्तत्त्वप्रधान शरीरकी प्राप्ति होती है।मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः -- जिन मनुष्योंके जीवनमें रजोगुणकी प्रधानता होती है और उसके कारण जो शास्त्रकी मर्यादामें रहते हुए भी संग्रह करना और भोग भोगना ऐशआराम करना पदार्थोंमें ममता? आसक्ति रखना आदिमें लगे रहते हैं? उनको यहाँ राजसाः कहा गया है। जब रजोगुणकी प्रधानतामें ही अर्थात् रजोगुणके कार्योंके चिन्तनमें ही ऐसे मनुष्योंका शरीर छूट जाता है? तब वे पुनः इस मृत्युलोकमें ही जन्म लेते हैं। यहाँ उनको पृथ्वीतत्त्वप्रधान मनुष्यशरीरकी प्राप्ति होती है।यहाँ तिष्ठन्ति पद देनेका तात्पर्य है कि वे राजस मनुष्य अभी जैसे इस मृत्युलोकमें हैं? मरनेके बाद वे पुनः मृत्युलोकमें आकर ऐसे ही बन जाते हैं अर्थात् जैसे पहले थे? वैसे ही बन जाते हैं। वे अशुद्ध आचरण नहीं करते? शास्त्रकी मर्यादा भङ्ग नहीं करते? प्रत्युत शास्त्रकी मर्यादामें ही रहते हैं और शुद्ध आचरण करते हैं,परन्तु पदार्थों? व्यक्तियों आदिमें राग? आसक्ति? ममता रहनेके कारण वे पुनः मृत्युलोकमें ही जन्म लेते हैं।जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः -- जिन मनुष्योंके जीवनमें तमोगुणकी प्रधानता रहती है और उसके कारण जिन्होंने प्रमाद आदिके वशमें होकर निरर्थक पैसा और समय बरबाद किया है जो आलस्य तथा नींदमें ही पड़े रहे हैं आवश्यक कार्योंको भी जिन्होंने समयपर नहीं किया है जो दूसरोंका अहित ही सोचते आये हैं जिन्होंने दूसरोंका अहित किया है? दूसरोंको दुःख दिया है जिन्होंने झूठ? कपट? चोरी? डकैती आदि निन्दनीय कर्म किये हैं? ऐसे मनुष्योंको यहाँ जघन्यगुणवृत्तिस्थाः कहा गया है। जब तमोगुणकी प्रधानतामें ही अर्थात् तमोगुणके कार्योंके चिन्तनमें ही ऐसे मनुष्य मर जाते हैं? तब वे अधोगतिमें चले जाते हैं।अधोगतिके दो भेद हैं -- योनिविशेष और स्थानविशेष। पशु? पक्षी? कीट? पतङ्ग? साँप? बिच्छू? भूतप्रेत आदि योनिविशेष अधिगति हैं और वैतरिणी? असिपत्र? लालाभक्ष? कुम्भीपाक? रौरव? महारौरव आदि नरकके कुण्ड स्थानविशेष अधोगति है। जिनके जीवनमें सत्त्वगुण अथवा रजोगुण रहते हुए भी अन्तसमयमें तात्कालिक तमोगुण बढ़ जाता है? वे मनुष्य मरनेके बाद योनिविशेष अधोगतिमें अर्थात् मूढ़योनियोंमें चले जाते हैं (गीता 14। 15)। जिनके जीवनमें तमोगुणकी प्रधानता रही है और उसी तमोगुणकी प्रधानतामें जिनका शरीर छूट जाता है? वे मनुष्य मरनेके बाद स्थानविशेष अधोगतिमें अर्थात् नरकोंमें चले जाते हैं (गीता 16। 16)। तात्पर्य यह हुआ कि सात्त्विक? राजस अथवा तामस मनुष्यका अन्तिम चिन्तन और हो जानेसे उनकी गति तो अन्तिम चिन्तनके अनुसार ही होगी? पर सुखदुःखका भोग उनके कर्मोंके अनुसार ही होगा। जैसे -- कर्म तो अच्छे हैं? पर अन्तिम चिन्तन कुत्तेका हो गया? तो अन्तिम चिन्तनके अनुसार वह कुत्ता बन जायगा परन्तु उस योनिमें भी उसको कर्मोंके अनुसार बहुत सुखआराम मिलेगा। कर्म तो बुरे हैं? पर अन्तिम चिन्तन मनुष्य आदिका हो गया? तो अन्तिम चिन्तनके अनुसार वह मनुष्य बन जायगा परन्तु उसको कर्मोंके फलरूपमें भयंकर परिस्थिति मिलेगी। उसके शरीरमें रोगहीरोग रहेंगे। खानेके लिये अन्न? पीनेके लिये जल और पहननेके लिये कपड़ा भी कठिनाईसे मिलेगा।सात्त्विक गुणको बढ़ानेके लिये साधक सत्शास्त्रोंके पढ़नेमें लगा रहे। खानापीना भी सात्त्विक करे? राजसतामस खानपान न करे। सात्त्विक श्रेष्ठ मनुष्योंका ही सङ्ग करे? उन्हींके सान्निध्यमें रहे? उनके कहे अनुसार साधन करे। शुद्ध? पवित्र तीर्थ आदि स्थानोंका सेवन करे जहाँ कोलाहल होता हो? ऐसे राजस स्थानोंका और जहाँ अण्डा? माँस? मदिरा बिकती हो? ऐसे तामस स्थानोंका सेवन न करे। प्रातःकाल और सायंकालका समय सात्त्विक माना जाता है अतः इस सात्त्विक समयका विशेषतासे सदुपयोग करे अर्थात् इसे भजन? ध्यान आदिमें लगाये। शास्त्रविहित शुभकर्म ही करे? निषिद्ध कर्म कभी न करे राजसतामस कर्म कभी न करे। जो जिस वर्ण? आश्रममें स्थित है? उसीमें अपनेअपने कर्तव्यका ठीक तरहसे पालन करे। ध्यान भगवान्का ही करे। मन्त्र भी सात्त्विक ही जपे। इस प्रकार सब कुछ सात्त्विक करनेसे पुराने संस्कार मिट जाते हैं और सात्त्विक संसार (सत्त्वगुण) बढ़ जाते हैं। श्रीमद्भागवतमें गुणोंको बढ़ानेवाले दस हेतु बताये गये हैं -- आगमोऽपः प्रजा देशः कालः कर्म च जन्म च।ध्यानं मन्त्रोऽथ संस्कारो दशैते गुणहेतवः।।(11। 13। 4)शास्त्र? जल (खानपान)? प्रजा (सङ्ग)? स्थान? समय? कर्म? जन्म? ध्यान? मन्त्र और संस्कार -- ये दस वस्तुएँ यदि सात्त्विक हों तो सत्त्वगुणकी? राजसी हों तो रजोगुणकी और तामसी हों तो तमोगुणकी वृद्धि करती हैं।विशेष बातअन्तसमयमें रजोगुणकी तात्कालिक वृत्तिके बढ़नेपर मरनेवाला मनुष्य मनुष्यलोकमें जन्म लेता है (14। 15) और रजोगुणकी प्रधानतावाला मनुष्य मरकर फिर इस मनुष्यलोकमें ही आता है (14। 18) -- इन दोनों बातोंसे यही सिद्ध होता है कि इस मनुष्यलोकके सभी मनुष्य रजोगुणवाले ही होते हैं सत्त्वगुण और तमोगुण इनमें नहीं होता। अगर वास्तवमें ऐसी बात है? तो फिर सत्त्वगुणकी तात्कालिक वृत्तिके बढ़नेपर मरनेवाला (14। 14) और सत्त्वगुणमें स्थित रहनेवाला मनुष्य ऊँचे लोकोंमें जाता है (14। 18) तथा तमोगुणकी तात्कालिक वृत्तिके बढ़नेपर मरनेवाला (14। 15) और तमोगुणमें स्थित रहनेवाला मनुष्य अधोगतिमें जाता है (14। 18) सत्त्व? रज और तम -- ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं (14। 5) यह सारा संसार तीनों गुणोंसे मोहित है (7। 13) सात्त्विक? राजस और तामस -- ये तीन प्रकारके कर्ता कहे जाते हैं (18। 26 -- 28) यह सम्पूर्ण त्रिलोकी त्रिगुणात्मक है (18। 40)? आदि बातें भगवान्ने कैसी कही हैंइस शङ्का समाधान यह है कि ऊर्ध्वगतिमें सत्त्वगुणकी प्रधनाता तो है? पर साथमें रजोगुणतमोगुण भी रहते हैं। इसलिये देवताओंके भी सात्त्विक? राजस और तामस स्वभाव होते हैं। अतः सत्त्वगुणकी प्रधानता होनेपर भी उसमें अवान्तर भेद रहते हैं। ऐसे ही मध्यगतिमें रजोगुणकी प्रधानता होनेपर भी साथमें सत्त्वगुणतमोगुण रहते हैं। इसलिये मनुष्योंके भी सात्त्विक? राजस और तामस स्वभाव होते हैं। अधोगतिमें तमोगुणकी प्रधानता है? पर साथमें सत्त्वगुणरजोगुण भी रहते हैं। इसलिये पशु? पक्षी आदिमें तथा भूत? प्रेत? गुह्यक आदिमें और नरकोंके प्राणियोंमें भी भिन्नभिन्न स्वभाव होता है। कई सौम्य स्वभावके होते हैं? कई मध्यम स्वभावके होते हैं और कई क्रूर स्वभावके होते हैं। तात्पर्य है कि जहाँ किसी भी गुणके साथ सम्बन्ध है? वहाँ तीनों गुण रहेंगे ही। इसलिये भगवान्ने (18। 40 में) कहा है कि त्रिलोकीमें ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है? जो तीनों गुणोंसे रहित हो।ऊर्ध्वगतिमें सत्त्वगुणकी प्रधानता? रजोगुणकी गौणता और तमोगुणकी अत्यन्त गौणता रहती है। मध्यगतिमें रजोगुणकी प्रधानता? सत्त्वगुणकी गौणता और तमोगुणकी अत्यन्त गौणता रहती है। अधोगतिमें तमोगुणकी प्रधानता? रजोगुणकी गौणता और सत्त्वगुणकी अत्यन्त गौणती रहती है। तात्पर्य है कि सत्त्व? रज और तम -- तीनों गुणोंकी प्रधानतावालोंमें भी अधिक? मध्यम और कनिष्ठमात्रामें प्रत्येक गुण रहता है। इस तरह गुणोंके सैकड़ोहजारों सूक्ष्म भेद हो जाते हैं। अतः गुणोंके तारतम्यसे प्रत्येक प्राणीका अलगअलग स्वभाव होता है।जैसे भगवान्के द्वारा सात्त्विक? राजस और तामस कार्य होते हुए भी वे गुणातीत ही रहते हैं (7। 13)? ऐसे ही गुणातीत महापुरुषके अपने कहलानेवाले अन्तःकरणमें सात्त्विक? राजस और तामस वृत्तियोंके आनेपर भी वह गुणातीत ही रहता है (14। 22)। अतः भगवान्की उपासना करना और गुणातीत महापुरुषका सङ्ग करना -- ये दोनों ही निर्गुण होनेसे साधकको गुणातीत करनेवाले हैं। सम्बन्ध -- पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतक प्रकृतिके कार्य गुणोंका परिचय देकर अब आगेके दो श्लोकोंमें स्वयंको तीनों गुणोंसे अतीत अनुभव करनेका वर्णन करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तथा --, सत्त्वगुणमें यानी सात्त्विक भावोंमें स्थित पुरुष उच्च स्थानको जाते हैं अर्थात् देवलोक आदि उच्च लोकोंमें उत्पन्न होते हैं। और राजस पुरुष बीचमें रहते हैं अर्थात् मनुष्ययोनियोंमें उत्पन्न होते हैं। तथा जघन्य गुणके आचरणोंमें स्थित हुए अर्थात् जो जघन्य -- निन्दनीय गुण है? उस तमोगुणके कार्य -- निद्रा और आलस्य आदिमें स्थित हुए मूढ़ -- तामसी पुरुष नीचे गिरते हैं -- वे पशु? पक्षी आदि योनियोंमें उत्पन्न होते हैं।

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Sri Anandgiri

सात्त्विकादिज्ञानकर्मफलान्युक्त्वानुक्तसंग्रहार्थं सामान्येनोपसंहरति -- किञ्चेति। वक्ष्यमाणफलद्वारापि सत्त्वादिज्ञानमित्यर्थः। सत्त्वगुणस्य वृत्तं शोभनं ज्ञानं कर्म वा तत्र तिष्ठन्तीति तथा। राजसा रजोगुणनिमित्ते ज्ञाने कर्मणि वा निरताः।

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Sri Dhanpati

तस्मात्सत्त्व एव स्थेयं नतु रजसि समसि वेति बोधनाय सत्त्वादिगुणवत्तत्शितानां फलभेदं वदन्नुपसंहरति -- ऊर्ध्वमिति। अत्र तमसि वृत्तशब्दप्रयोगात् सत्त्वरजसोरपि वृत्तमेव विवक्षितं सत्त्वस्थाः। सत्त्ववृते शास्त्रीयोपासनायां कर्मणइ च निरताः ऊर्ध्वं उपासनादितारतम्येन ब्रह्मलोकपर्यन्तं गच्छन्ति देवेषु उत्पद्यन्ते। तथा राजसाः रजोगुणवृत्ते लोबादिपूर्वके काम्यनिषिद्धादिराजसे कर्मणि स्थिताः मध्ये दुःखबहुलेऽल्पसुखे मनुष्यलोके तिष्ठन्ति मनुष्येषूत्पद्यन्ते। जघन्यः गुणद्वयापेक्षया निकृष्टः स चासौ गुणश्च तस्य जघन्यगुणस्य तमसः वृत्ते निद्रालस्यादौ स्थिता जघन्यगुणवृत्तस्था मूढाः सदैव तामसाः अधो गच्छन्ति पश्वादिषूत्पद्यन्ते।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
ūrdhvamupward
gachchhantirise
sattvasthāḥ
madhyein the middle
tiṣhṭhantistay
rājasāḥthose in the mode of passion
jaghanyaabominable
guṇaquality
vṛittisthāḥ
adhaḥdown
gachchhantigo
tāmasāḥthose in the mode of ignorance
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 14.17
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च

सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं; तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 14.19
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति

जब विवेकी (विचारकुशल) मनुष्य तीनों गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता और अपनेको गुणोंसे पर अनुभव करता है, तब वह मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 14Shlok 18
Bhagavad Gita · Adhyay 14, Shlok 18
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः

सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित मनुष्य अधोगतिमें जाते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ: "सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित मनुष्य अधोगतिमें जाते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 18?

Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 18 translates to: "Those seated in Sattva ascend; those of Rajasic nature dwell in the middle; and those of Tamasic nature, abiding in the function of the lowest Guna, descend. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 14, श्लोक 18 है जो Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga में संकलित है। सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित मनुष्य अधोगतिमें जाते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "ūrdhvaṁ gachchhanti sattva-sthā madhye tiṣhṭhanti rājasāḥ" mean in English?

"ūrdhvaṁ gachchhanti sattva-sthā madhye tiṣhṭhanti rājasāḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 18. Those seated in Sattva ascend; those of Rajasic nature dwell in the middle; and those of Tamasic nature, abiding in the function of the lowest Guna, descend. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.