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Sudarshana Chakra
Adhyay 14, Shlok 17
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च

सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं; तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है। — VaniSagar

Global Translations

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NepaliIND

सत्वबाट ज्ञान र रजसबाट लोभ उत्पन्न हुन्छ। अज्ञानता र भ्रम तामसबाट उत्पन्न हुन्छ, अज्ञानता पनि।

TeluguIND

సత్వగుణం నుండి జ్ఞానం పుడుతుంది, మరియు రాజసం నుండి దురాశ; అజాగ్రత్త మరియు భ్రాంతి తమస్సు నుండి ఉత్పన్నమవుతాయి మరియు అజ్ఞానం కూడా.

MalayalamIND

സത്വത്തിൽ നിന്ന് അറിവും രജസിൽ നിന്ന് അത്യാഗ്രഹവും ഉണ്ടാകുന്നു; അശ്രദ്ധയും വ്യാമോഹവും തമസ്സിൽ നിന്നാണ് ഉണ്ടാകുന്നത്, കൂടാതെ അജ്ഞാനത്തിൽ നിന്നും.

BengaliIND

সত্ত্ব থেকে জ্ঞান, আর রজস থেকে লোভ উৎপন্ন হয়; গাফিলতি ও ভ্রম তমস থেকে উৎপন্ন হয় এবং অজ্ঞানতাও।

KannadaIND

ಸತ್ವದಿಂದ ಜ್ಞಾನವು ಹುಟ್ಟುತ್ತದೆ, ಮತ್ತು ರಜಸ್ಸಿನಿಂದ ದುರಾಸೆ; ಅಜಾಗರೂಕತೆ ಮತ್ತು ಭ್ರಮೆಯು ತಮಸ್ಸಿನಿಂದ ಉಂಟಾಗುತ್ತದೆ, ಮತ್ತು ಅಜ್ಞಾನ.

GujaratiIND

સત્વથી જ્ઞાન થાય છે, અને રજસમાંથી લોભ થાય છે; બેદરકારી અને ભ્રમણા તમસમાંથી ઉત્પન્ન થાય છે અને અજ્ઞાન પણ.

MarathiIND

सत्त्वापासून ज्ञान उत्पन्न होते आणि रजांपासून लोभ उत्पन्न होतो; तामस आणि अज्ञानातून बेफिकीरपणा आणि भ्रम निर्माण होतो.

PunjabiIND

ਸਤਤਵ ਤੋਂ ਗਿਆਨ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਰਾਜਿਆਂ ਤੋਂ ਲਾਲਚ; ਬੇਪਰਵਾਹੀ ਅਤੇ ਭਰਮ ਤਾਮਸ ਤੋਂ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਅਗਿਆਨਤਾ ਵੀ।

SindhiIND

سَتَوا مان پيدا ٿئي ٿو علم، ۽ راجس مان لالچ؛ تامس مان غفلت ۽ فريب پيدا ٿئي ٿو ۽ جهالت به.

TamilIND

சத்வத்திலிருந்து அறிவும், ரஜஸிலிருந்து பேராசையும் உண்டாகின்றன; கவனமின்மை மற்றும் மாயை ஆகியவை தமஸிலிருந்து எழுகின்றன, மேலும் அறியாமை.

ManipuriIND

ꯁꯠꯠꯕꯗꯒꯤ ꯖ꯭ꯅꯥꯟ ꯊꯣꯔꯀꯏ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯔꯥꯖꯗꯒꯤ ꯂꯣꯚ ꯂꯥꯀꯏ; ꯃꯤꯠꯌꯦꯡ ꯆꯪꯗꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯤꯄꯥꯏꯕꯥ ꯄꯣꯀꯍꯅꯕꯥ ꯑꯁꯤ ꯇꯥꯃꯥꯁꯇꯒꯤ ꯂꯥꯀꯏ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯖ꯭ꯅꯥꯅꯁꯨ ꯊꯣꯀꯏ꯫

AssameseIND

সত্ত্বৰ পৰা জ্ঞান উৎপন্ন হয়, আৰু ৰজাৰ পৰা লোভ; অসাৱধানতা আৰু মোহ তামাছৰ পৰাই উদ্ভৱ হয়, আৰু অজ্ঞানতাও।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- सत्त्वात्संजायते ज्ञानम् -- सत्त्वगुणसे ज्ञान होता है अर्थात् सुकृतदुष्कृत कर्मोंका विवेक जाग्रत् होता है। उस विवेकसे मनुष्य सुकृत? सत्कर्म ही करता है। उन सुकृत कर्मोंका फल सात्त्विक? निर्मल होता है।रजसो लोभ एव च -- रजोगुणसे लोभ आदि पैदा होते हैं। लोभको लेकर मनुष्य जो कर्म करता है? उन कर्मोंका फल दुःख होता है।जितना मिला है? उसकी वृद्धि चाहनेका नाम लोभ है। लोभके दो रूप हैं -- उचित खर्च न करना और अनुचित रीतिसे संग्रह करना। उचित कामोंमें धन खर्च न करनेसे? उससे जी चुरानेसे मनुष्यके मनमें अशान्ति? हलचल रहती है और अनुचित रीतिसे अर्थात् झूठ? कपट आदिसे धनका संग्रह करनेसे पाप बनते हैं? जिससे नरकोंमें तथा चौरासी लाख योनियोंमें दुःख भोगना पड़ता है। इस दृष्टिसे राजस कर्मोंका फल दुःख होता है।प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च -- तमोगुणसे प्रमाद? मोह और अज्ञान पैदा होता है। इन तीनोंके बुद्धिमें आनेसे विवेकविरुद्ध काम होते हैं (गीता 18। 32)? जिससे अज्ञान ही बढ़ता है? दृढ़ होता है।यहाँ तो तमोगुणसे अज्ञानका पैदा होना बताया है और इसी अध्यायके आठवें श्लोकमें अज्ञानसे तमोगुणका पैदा होना बताया है। इसका तात्पर्य यह है कि जैसे वृक्षसे बीज पैदा होते हैं और उन बीजोंसे आगे बहुतसे वृक्ष पैदा होते हैं? ऐसे ही तमोगुणसे अज्ञान पैदा होता है और अज्ञानसे तमोगुण बढ़ता है? पुष्ट होता है।पहले आठवें श्लोकमें भगवान्ने प्रमाद? आलस्य और निद्रा -- ये तीन बताये। परन्तु तेरहवें श्लोकमें और यहाँ प्रमाद तो बताया? पर निद्रा नहीं बतायी। इससे यह सिद्ध होता है कि आवश्यक निद्रा तमोगुणी नहीं है और निषिद्ध भी नहीं है तथा बाँधनेवाली भी नहीं है। कारण कि शरीरके लिये आवश्यक निद्रा तो सात्त्विक पुरुषको भी आती है और गुणातीत पुरुषको भी वास्तवमें अधिक निद्रा ही बाँधनेवाली? निषिद्ध और तमोगुणी है क्योंकि अधिक निद्रासे शरीरमें आलस्य बढ़ता है? पड़े रहनेका ही मन करता है? बहुत समय बरबाद हो जाता है।विशेष बातयह जीव साक्षात् परमात्माका अंश होते हुए भी जब प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है? तब इसका प्रकृतिजन्य गुणोंके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है। फिर गुणोंके अनुसार उसके अन्तःकरणमें वृत्तियाँ पैदा होती हैं। उन वृत्तियोंके अनुसार कर्म होते हैं और इन्हीं कर्मोंका फल ऊँचनीच गतियाँ होती हैं। तात्पर्य है कि जीवितअवस्थामें अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितियाँ आती हैं और मरनेके बाद ऊँचनीच गतियाँ होती हैं। वास्तवमें उन कर्मोंके मूलमें भी गुणोंकी वृत्तियाँ ही होती हैं? जो कि पुनर्जन्मके होनेमें खास कारण हैं (गीता 13। 21)। तात्पर्य है कि गुणोंका सङ्ग कर्मोंसे कमजोर नहीं है। जैसे कर्म शुभअशुभ फल देते हैं? ऐसे ही गुणोंका सङ्ग भी शुभअशुभ फल देता है (गीता 8। 6)। इसीलिये पाँचवेंसे अठारहवें श्लोकतकके इस प्रकरणमें पहले चौदहवेंपन्द्रहवें श्लोकोंमें गुणोंकी तात्कालिक वृत्तियोंके बढ़नेका फल बताया और जीवितअवस्थामें जो परिस्थितियाँ आती हैं? उनको सोलहवें श्लोकमें बताया तथा आगे अठारहवें श्लोकमें गुणोंकी स्थायी वृत्तियोंका फल बतायेंगे। अतः वृत्तियों और कर्मोंके होनेमें गुण ही मुख्य हैं। इस पूरे प्रकरणमें गुणोंकी मुख्य बात इसी (सत्रहवें) श्लोकमें कही गयी है।जिसका उद्देश्य संसार नहीं है? प्रत्युत परमात्मा है? वह साधारण मनुष्योंकी तरह प्रकृतिमें स्थित नहीं है। अतः उसमें प्रकृतिजन्य गुणोंकी परवशता नहीं रहती और साधन करतेकरते आगे चलकर जब अहंता परिवर्तित होकर लक्ष्यकी दृढ़ता हो जाती है? तब उसको अपने स्वतःसिद्ध गुणातीत स्वरूपका अनुभव हो जाता है। इसीका नाम बोध है। इस बोधके विषयमें भगवान्ने इस अध्यायका पहलादूसरा श्लोक कहा और गुणातीतके विषयमें बाईसवेंसे छब्बीसवेंतकके पाँच श्लोक कहे। इस तरह यह पूरा अध्याय गुणोंसे अतीत स्वतःसिद्ध स्वरूपका अनुभव करनेके लिये ही कहा गया है। सम्बन्ध -- तात्कालिक गुणोंके बढ़नेपर मरनेवालोंकी गतिका वर्णन तो चौदहवेंपन्द्रहवें श्लोकोंमें कर दिया परन्तु जिनके जीवनमें सत्त्वगुण? रजोगुण अथवा तमोगुणकी प्रधानता रहती है? उनकी (मरनेपर) क्या गति होती है -- इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

गुणोंसे क्या उत्पन्न होता है ( सो कहते हैं -- ) उत्कर्षको प्राप्त हुए सत्त्वगुणसे ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुणसे लोभ होता है तथा तमोगुणसे प्रमाद और मोह -- ये दोनों होते हैं और अज्ञान भी होता है।

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Sri Anandgiri

विहितप्रतिषिद्धज्ञानकर्माणि सत्त्वादीनां लक्षणानि संक्षिप्य दर्शयति -- किञ्चेति। ज्ञानं सर्वकरणद्वारकम्। अज्ञानं विवेकाभावः।

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Sri Dhanpati

किंच गुणेभ्यो भवति एतादृशफलवैचित्र्यमित्यपेक्षायामाह -- सत्त्वादिति। रजस्तमसी अभिभूय लब्धात्मकात्मत्त्वाज्ज्ञानं संजायते। रजसा सत्त्वं तमश्चाभिभूय लब्धस्वरुपाल्लोभः संजायते। चः प्रवृत्त्यादिसमुच्चायार्थः। एवकारो व्यभिचारवारणार्थः। एवं रजःसत्त्वं चाभिभूयोद्भूतात्तमसः प्रमादमोहौ भवतोऽज्ञानं च भवति। अव्ययार्थः प्राग्वत्। तथाच प्रकाशजनकसत्त्वकार्यस्य कर्मणः प्रकाशबहुलं सुखमेव फलमनुरुपं लोभादिजन्करजःकार्यस्य कर्मणः दुःखबहुलमेव फलमनुरुपं प्रमादादिजनकं तमःकार्यस्य कर्मणोऽज्ञानबहुलमेव फलं उचितमिति भावः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sattvātfrom the mode of goodness
sañjāyatearises
jñānamknowledge
rajasaḥfrom the mode of passion
lobhaḥgreed
evaindeed
chaand
pramādanegligence
mohaudelusion
tamasaḥfrom the mode of ignorance
bhavataḥarise
ajñānamignorance
evaindeed
chaand
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 14.16
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्

(विवेकी पुरुषोंने) शुभ-कर्मका तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्मका फल दुःख कहा है और तामस कर्मका फल अज्ञान (मूढ़ता) कहा है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 14.18
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः

सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित मनुष्य अधोगतिमें जाते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 14Shlok 17
Bhagavad Gita · Adhyay 14, Shlok 17
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च

सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं; तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 17 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 17 का हिंदी अर्थ: "सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं; तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 17?

Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 17 translates to: "From Sattva arises knowledge, and greed from Rajas; heedlessness and delusion arise from Tamas, and also ignorance. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 14, श्लोक 17 है जो Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga में संकलित है। सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं; तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sattvāt sañjāyate jñānaṁ rajaso lobha eva cha" mean in English?

"sattvāt sañjāyate jñānaṁ rajaso lobha eva cha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 17. From Sattva arises knowledge, and greed from Rajas; heedlessness and delusion arise from Tamas, and also ignorance. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.