Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 6
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः

मूल प्रकृति, समष्टि बुद्धि (महत्तत्त्व), समष्टि अहंकार, पाँच महाभूत और दस इन्द्रियाँ, एक मन तथा पाँचों इन्द्रियोंके पाँच विषय ( -- यह चौबीस तत्त्वोंवाला क्षेत्र है)। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

BengaliIND

মহৎ উপাদান, অহংবোধ, বুদ্ধি এবং অপ্রকাশিত প্রকৃতি, দশ ইন্দ্রিয়, একটি মন এবং ইন্দ্রিয়ের পাঁচটি বস্তু।

MarathiIND

महान तत्वे, अहंकार, बुद्धी, तसेच अव्यक्त प्रकृती, दहा इंद्रिये, एक मन आणि इंद्रियांच्या पाच वस्तू.

PunjabiIND

ਮਹਾਨ ਤੱਤ, ਅਹੰਕਾਰ, ਬੁੱਧੀ, ਅਤੇ ਅਪ੍ਰਗਟ ਕੁਦਰਤ, ਦਸ ਇੰਦਰੀਆਂ, ਅਤੇ ਇੱਕ ਮਨ, ਅਤੇ ਇੰਦਰੀਆਂ ਦੀਆਂ ਪੰਜ ਵਸਤੂਆਂ।

NepaliIND

महान तत्वहरू, अहंकार, बुद्धि, र अव्यक्त प्रकृति, दश इन्द्रियहरू, एक मन, र इन्द्रियहरूका पाँच वस्तुहरू।

TamilIND

பெரிய கூறுகள், அகங்காரம், புத்தி, மேலும் வெளிப்படுத்தப்படாத இயல்பு, பத்து புலன்கள் மற்றும் ஒரு மனம், மற்றும் புலன்களின் ஐந்து பொருள்கள்.

GujaratiIND

મહાન તત્વો, અહંકાર, બુદ્ધિ, અને અવ્યક્ત પ્રકૃતિ, દસ ઇન્દ્રિયો અને એક મન, અને ઇન્દ્રિયોના પાંચ પદાર્થો.

KannadaIND

ಮಹಾನ್ ಅಂಶಗಳು, ಅಹಂಕಾರ, ಬುದ್ಧಿಶಕ್ತಿ ಮತ್ತು ಅವ್ಯಕ್ತವಾದ ಪ್ರಕೃತಿ, ಹತ್ತು ಇಂದ್ರಿಯಗಳು ಮತ್ತು ಒಂದು ಮನಸ್ಸು ಮತ್ತು ಇಂದ್ರಿಯಗಳ ಐದು ವಸ್ತುಗಳು.

MalayalamIND

മഹത്തായ ഘടകങ്ങൾ, അഹംഭാവം, ബുദ്ധി, കൂടാതെ അവ്യക്തമായ പ്രകൃതി, പത്ത് ഇന്ദ്രിയങ്ങൾ, ഒരു മനസ്സ്, ഇന്ദ്രിയങ്ങളുടെ അഞ്ച് വസ്തുക്കൾ.

TeluguIND

గొప్ప అంశాలు, అహంభావం, బుద్ధి, అలాగే వ్యక్తీకరించబడని స్వభావం, పది ఇంద్రియాలు మరియు ఒకే మనస్సు మరియు ఇంద్రియాల యొక్క ఐదు వస్తువులు.

SindhiIND

عظيم عناصر، انا پرستي، عقل، ۽ پڻ اڻڄاتل فطرت، ڏهه حواس، هڪ ذهن، ۽ حواس جا پنج شيون.

MizoIND

Thil ropui tak tak, egoism, intellect, leh chubakah Unmanfested Nature, hriatna sawm, leh rilru pakhat, leh hriatna thil panga te.

AssameseIND

মহান উপাদান, অহংকাৰ, বুদ্ধি, আৰু লগতে অপ্ৰকাশিত প্ৰকৃতি, দহ ইন্দ্ৰিয় আৰু এক মন, আৰু ইন্দ্ৰিয়ৰ পঞ্চ বস্তু।

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- अव्यक्तमेव च -- अव्यक्त नाम मूल प्रकृतिका है। मूल प्रकृति समष्टि बुद्धिका कारण होनेसे और स्वयं किसीका भी कार्य न होनेसे केवल प्रकृति ही है।बुद्धिः -- यह पद समष्टि बुद्धि अर्थात् महत्तत्त्वका वाचक है। इस बुद्धिसे अहंकार पैदा होता है? इसलिये यह प्रकृति है और मूल प्रकृतिका कार्य होनेसे यह विकृति है। तात्पर्य है कि यह बुद्धि प्रकृतिविकृति है।अहंकारः -- यह पद समष्टि अहंकारका वाचक है। इसको अहंभाव भी कहते हैं। पञ्चमहाभूतका कारण होनेसे यह अहंकार प्रकृति है और बुद्धिका कार्य होनेसे यह विकृति है। तात्पर्य है कि यह अहंकार प्रकृतिविकृति है।महाभूतानि -- पृथ्वी? जल? तेज? वायु और आकाश -- ये पाँच महाभूत हैं। महाभूत दो प्रकारके होते हैं -- पञ्चीकृत और अपञ्चीकृत। एकएक महाभूतके पाँच विभाग होकर जो मिश्रण होता है? उसको,पञ्चीकृत महाभूत कहते हैं । इन पाँच महाभूतोंके विभाग न होनेपर इनको,अपञ्चीकृत महाभूत कहते हैं। यहाँ इन्हीं अपञ्चीकृत महाभूतोंका वाचक महाभूतानि पद है। इन महाभूतोंको पञ्चतन्मात्राएँ तथा सूक्ष्ममहाभूत भी कहते हैं।दस इन्द्रियाँ? एक मन और शब्दादि पाँच विषयोंके कारण होनेसे ये महाभूत प्रकृति हैं और अहंकारके कार्य होनेसे ये विकृति हैं। तात्पर्य है कि ये पञ्चमहाभूत प्रकृतिविकृति हैं।इन्द्रियाणि दश -- श्रोत्र? त्वचा? नेत्र? रसना और घ्राण -- ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं तथा वाक्? पाणि? पाद? उपस्थ और पायु -- ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। ये दसों इन्द्रियाँ अपञ्चीकृत महाभूतोंसे पैदा होनेसे और स्वयं किसीका भी कारण न होनेसे केवल विकृति ही हैं।एकं च -- अपञ्चीकृत महाभूतोंसे पैदा होनेसे और स्वयं किसीका भी कारण न होनेसे मन केवल,विकृति ही है।पञ्च चेन्द्रियगोचराः -- शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- ये (पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके) पाँच विषय हैं। अपञ्चीकृत महाभूतोंसे पैदा होनेसे और स्वयं किसीके भी कारण न होनेसे ये पाँचों विषय केवल विकृति ही हैं।इन सबका निष्कर्ष यह निकला कि पाँच महाभूत? एक अहंकार और एक बुद्धि -- ये सात प्रकृतिविकृति हैं? मूल प्रकृति केवल प्रकृति है और दस इन्द्रियाँ? एक मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके विषय -- ये सोलह केवल विकृति हैं। इस तरह इन चौबीस तत्त्वोंके समुदायका नाम क्षेत्र है। इसीका एक तुच्छ अंश यह मनुष्यशरीर है? जिसको भगवान्ने पहले श्लोकमें इदं शरीरम् और तीसरे श्लोकमें तत्क्षेत्रम् पदसे कहा है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

इस प्रकार स्तुति सुनकर सम्मुख हुए अर्जुनसे भगवान् कहते हैं --, महाभूत यानी सूक्ष्मभूत? वे सब विकारोंमें व्यापक होनेके कारण महान् भी हैं और भूत भी हैं? इसलिये वे महाभूत कहे जाते हैं। स्थूल पञ्चभूत तो इन्द्रियगोचरशब्दसे कहे जायँगे? इसलिये यहाँ महाभूतशब्दसे सूक्ष्म पञ्चमहाभूतोंका ग्रहण है। महाभूतोंका कारण अहंप्रत्ययरूप अहंकार तथा अहंकारकी कारणरूपा निश्चयात्मिका बुद्धि और उसकी भी कारणरूपा अव्यक्त प्रकृति अर्थात् जो व्यक्त नहीं है ऐसी अव्यक्त नामक अव्याकृत -- ईश्वरशक्ति जो कि मम माया दुरत्यया इत्यादि वचनोंसे कही गयी है। यहाँ एव शब्द प्रकृतिको विशेषरूपसे बतलानेके लिये है और च शब्द सारे भेदका समुच्चय करनेके लिये है। अभिप्राय यह कि यही आठ प्रकारसे विभक्त हुई अपरा प्रकृति है। तथा दश इन्द्रियाँ अर्थात् श्रोत्रादि पाँच ज्ञान उत्पन्न करनेवाली होनेके कारण ज्ञानेन्द्रियाँ और वाणी आदि पाँच कर्म सम्पादन करनेवाली होनेसे कर्मेन्द्रियाँ और एक ग्यारहवाँ संकल्पविकल्पात्मक मन तथा शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्धये पाँच इन्द्रियोंके विषय। इन सबको ही सांख्यमतावलम्बी चौबीस तत्त्व कहते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

अव्यक्ताहंकारादीनां त्रैगुण्याभिमानादिधर्मकत्वं प्रसिद्धमिति शब्दादीनामेव ग्रहणे कर्मेन्द्रियाणां विषयानुक्तेर्वैरूप्यप्रसङ्गात्क्षेत्रनिरूपणस्य च प्रकृतत्वात्स्वरूपनिर्देशेनैव तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्वेति व्याख्यातमिदानीमिच्छादीनामात्मविकारत्वनिवृत्तये क्षेत्रविकारत्वनिरूपणेन यद्विकारीत्येतन्निरूपयन्मतान्तरनिवृत्तिपरत्वेन श्लोकमवतारयति -- अथेति। सर्वज्ञोक्तिविरोधाद्धेयं वैशेषिकं मतमिति मत्वोक्तं -- भगवानिति। उपलब्धजातीयस्योपलभ्यमानस्यादानेच्छायां हेतुमाह -- सुखेति। इतिशब्दो हेत्वर्थः। सुखहेतुत्वात्तस्मिन्निच्छेत्यर्थः। इच्छां सुखतद्धेतुविषयत्वेन व्याख्यायात्मधर्मत्वं तस्या व्युदस्यति -- सेयमिति। तथापि कथं क्षेत्रान्तर्भूतत्वं तत्राह -- ज्ञेयत्वादिति। इच्छावद्द्वेषोऽपि धर्मो बुद्धेरित्याह -- तथेति। कोऽसौ द्वेषो यस्य बुद्धिधर्मत्वं तत्राह -- यज्जातीयमिति। तस्यापीच्छावत्क्षेत्रान्तर्भावमाह -- सोऽयमिति। इच्छाद्वेषवद्बुद्धिधर्मः सुखमपीत्याह -- तथेति। तस्यापि स्वरूपोक्त्या क्षेत्रान्तःपातित्वमाह -- अनुकूलमिति। दुःखस्यापि स्वरूपोक्त्या क्षेत्रमध्यवर्तित्वमाह -- दुःखमिति। देहेन्द्रियात्मवादौ व्युदसितुं क्षेत्रान्तर्भूतमेव संघातं विभजते -- देहेति। विज्ञानवादं प्रत्याह -- तस्यामिति। तप्ते लोहपिण्डे वह्नेरभिव्यक्तिवदुक्तसंहतौ बुद्धिवृत्तिरभिव्यज्यते। तत्र चाग्निरभिव्यक्तो लोहपिण्डमेवाग्निबुद्ध्या ग्राहयति। तथात्मचैतन्यं बुद्धिवृत्तावभिव्यक्तं तामेवात्मतया बोधयत्यतस्तदाभासानुविद्धा सैव चेतनेत्युच्यते। सा च मुख्यचेतनं प्रति ज्ञेयत्वादतद्रूपत्वात्क्षेत्रमेवेत्यर्थः। धृतिस्वरूपोक्त्या क्षेत्रत्वं तस्या दर्शयति -- धृतिरित्यादिना। नन्वन्येऽपि संकल्पादयो मनोधर्माः सन्ति ते किमित्यत्र क्षेत्रत्वेन नोच्यन्ते तत्राह -- सर्वेति। तस्योपलक्षणार्थत्वे हेतुमाह -- यत इति। इच्छादिवदस्मिन्नवसरे संकल्पादीनामपि दर्शितत्वं सिद्धवत्कृत्य प्रकरणविभागार्थं यतो भगवदुक्तं क्षेत्रमुपसंहरत्यतो युक्तमिच्छादिग्रहस्य सर्वानुक्तबुद्धिधर्मोपलक्षणार्थत्वमित्यर्थः। विरक्तस्य ज्ञानाधिकाराय वैराग्यार्थं क्षेत्रं व्याख्यातमित्यनुवदति -- यस्येति। क्षेत्रभेदजातस्य व्यष्टिदेहविभागस्य सर्वस्येत्यर्थः। संहतिः समष्टिशरीरम्।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

एवं क्षेत्रादियाथात्म्यस्तुत्याभिमुखीकृतायार्जनाय किं तदिति जिज्ञासवे यथोद्देशं क्षेत्रं निर्दिशति -- महाभूतानीति। सर्बविकारव्यापकत्वान्महान्ति च तानि भूतानि सूक्ष्माणि अहंप्रत्ययरुपोहंकारः महाभूतकारण बुद्धिरध्वसायलक्षणाहंकारकारणं न व्यकतव्यक्तं अव्याकृतमीश्वरशक्तिर्मायामायां तु प्रकृतिं विद्यात्?मम माया दुरत्यया इत्युक्ता। एवशब्दोऽवधारणार्थः। एतावत्येवाष्टधा भिन्ना प्रकृतिरित्यर्थः। चकारः मूलप्रकृत्या सह तन्मात्रादिभेदानां समुच्चयार्थः। इन्द्रियाणि दश श्रोत्रत्वक्चक्षूरसनघ्राणाख्यानि ज्ञानोत्पादकत्वाज्ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्च? वाक्पाणिपादपायुपस्थाख्यानि कर्मनिर्वर्तकत्वात्मकर्मेन्द्रियाणि पञ्च एकं एकादशं संकल्पविकल्पात्मकं मनः पञ्चेन्द्रियाणां गोचराः विषयाः शब्दस्पर्शरुपरसगन्धाख्यगुणविशिष्टानि स्थूलभूतानीत्यर्थः। तान्येतानिमूलप्रकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त।,षोडशकस्तु विकारः इति वादिनः सांख्याश्चतुर्विशतितत्त्वानि व्याचक्षते।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
mahābhūtāni
ahankāraḥthe ego
buddhiḥthe intellect
avyaktamthe unmanifested primordial matter
evaindeed
chaand
indriyāṇithe senses
daśhaekam
chaand
pañchafive
chaand
indriyago
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.5
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्िचतैः

(यह क्षेत्रक्षेत्रज्ञका तत्त्व) ऋषियोंके द्वारा बहुत विस्तारसे कहा गया है तथा वेदोंकी ऋचाओं-द्वारा बहुत प्रकारसे कहा गया है और युक्तियुक्त एवं निश्चित किये हुए ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा भी कहा गया है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.7
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः।एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्

इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना (प्राणशक्ति) और धृति -- इन विकारोंसहित यह क्षेत्र संक्षेपसे कहा गया है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 6
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 6
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः

मूल प्रकृति, समष्टि बुद्धि (महत्तत्त्व), समष्टि अहंकार, पाँच महाभूत और दस इन्द्रियाँ, एक मन तथा पाँचों इन्द्रियोंके पाँच विषय ( -- यह चौबीस तत्त्वोंवाला क्षेत्र है)। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ: "मूल प्रकृति, समष्टि बुद्धि (महत्तत्त्व), समष्टि अहंकार, पाँच महाभूत और दस इन्द्रियाँ, एक मन तथा पाँचों इन्द्रियोंके पाँच विषय ( -- यह चौबीस तत्त्वोंवाला क्षेत्र है)। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 6?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 6 translates to: "The great elements, egoism, intellect, and also the Unmanifested Nature, the ten senses, and one mind, and the five objects of the senses. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 6 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। मूल प्रकृति, समष्टि बुद्धि (महत्तत्त्व), समष्टि अहंकार, पाँच महाभूत और दस इन्द्रियाँ, एक मन तथा पाँचों इन्द्रियोंके पाँच विषय ( -- यह चौबीस तत्त्वोंवाला क्षेत्र है)। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "mahā-bhūtāny ahankāro buddhir avyaktam eva cha" mean in English?

"mahā-bhūtāny ahankāro buddhir avyaktam eva cha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 6. The great elements, egoism, intellect, and also the Unmanifested Nature, the ten senses, and one mind, and the five objects of the senses. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.