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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 7
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः।एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्

इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना (प्राणशक्ति) और धृति -- इन विकारोंसहित यह क्षेत्र संक्षेपसे कहा गया है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

SindhiIND

خواهش، نفرت، لذت، درد، مجموعي (جسم)، هوشياري ۽ پختگي، اهڙيءَ طرح هن فيلڊ کي مختصر طور تي ان جي ترميمن سان بيان ڪيو ويو آهي.

NepaliIND

इच्छा, घृणा, सुख, पीडा, समग्र (शरीर), बुद्धि र दृढता- क्षेत्रलाई यसरी परिमार्जन सहित संक्षिप्त रूपमा वर्णन गरिएको छ।

MarathiIND

इच्छा, द्वेष, आनंद, वेदना, एकूण (शरीर), बुद्धिमत्ता आणि धैर्य - या क्षेत्राचे थोडक्यात बदलांसह वर्णन केले आहे.

BengaliIND

ইচ্ছা, ঘৃণা, আনন্দ, বেদনা, সমষ্টি (শরীর), বুদ্ধিমত্তা এবং দৃঢ়তা—ক্ষেত্রটিকে সংক্ষেপে সংক্ষেপে এর পরিবর্তন সহ বর্ণনা করা হয়েছে।

GujaratiIND

ઈચ્છા, દ્વેષ, આનંદ, પીડા, એકંદર (શરીર), બુદ્ધિ અને મનોબળ - આ ક્ષેત્રનું સંક્ષિપ્તમાં તેના ફેરફારો સાથે વર્ણન કરવામાં આવ્યું છે.

PunjabiIND

ਇੱਛਾ, ਨਫ਼ਰਤ, ਅਨੰਦ, ਦਰਦ, ਸਮੁੱਚੀ (ਸਰੀਰ), ਬੁੱਧੀ ਅਤੇ ਦ੍ਰਿੜਤਾ - ਖੇਤਰ ਨੂੰ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਇਸ ਦੇ ਸੰਸ਼ੋਧਨਾਂ ਨਾਲ ਸੰਖੇਪ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਵਰਣਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ।

TamilIND

ஆசை, வெறுப்பு, இன்பம், வலி, மொத்த (உடல்), புத்திசாலித்தனம் மற்றும் துணிவு-இவ்வாறு அந்தத் துறை அதன் மாற்றங்களுடன் சுருக்கமாக விவரிக்கப்பட்டுள்ளது.

KannadaIND

ಆಸೆ, ದ್ವೇಷ, ಸಂತೋಷ, ನೋವು, ಒಟ್ಟು (ದೇಹ), ಬುದ್ಧಿವಂತಿಕೆ ಮತ್ತು ಸ್ಥೈರ್ಯ-ಕ್ಷೇತ್ರವನ್ನು ಅದರ ಮಾರ್ಪಾಡುಗಳೊಂದಿಗೆ ಸಂಕ್ಷಿಪ್ತವಾಗಿ ವಿವರಿಸಲಾಗಿದೆ.

MalayalamIND

ആഗ്രഹം, വിദ്വേഷം, സുഖം, വേദന, മൊത്തത്തിലുള്ള (ശരീരം), ബുദ്ധിശക്തി, മനക്കരുത്ത് - ഈ മേഖലയെ അതിൻ്റെ പരിഷ്ക്കരണങ്ങളോടെ ചുരുക്കി വിവരിച്ചിരിക്കുന്നു.

TeluguIND

కోరిక, ద్వేషం, ఆనందం, బాధ, మొత్తం (శరీరం), తెలివితేటలు మరియు దృఢత్వం-ఈ క్షేత్రం దాని మార్పులతో క్లుప్తంగా వివరించబడింది.

ManipuriIND

ꯑꯄꯥꯝꯕꯥ, ꯌꯦꯛꯅꯕꯥ, ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯕꯥ, ꯑꯋꯥꯕꯥ, ꯑꯦꯒ꯭ꯔꯤꯒꯦꯠ (ꯍꯀꯆꯥꯡ), ꯋꯥꯈꯜ ꯂꯧꯁꯤꯡ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯐꯣꯔꯇꯤꯆꯨꯗ-ꯑꯁꯨꯝꯅꯥ ꯂꯝ ꯑꯁꯤ ꯃꯁꯤꯒꯤ ꯃꯣꯗꯤꯐꯤꯀꯦꯁꯅꯁꯤꯡꯒꯥ ꯂꯣꯌꯅꯅꯥ ꯁꯟꯗꯣꯛꯅꯥ ꯇꯥꯀꯈ꯭ꯔꯦ꯫

AssameseIND

কামনা, ঘৃণা, আনন্দ, যন্ত্ৰণা, সমষ্টি (শৰীৰ), বুদ্ধিমত্তা আৰু ধৈৰ্য্য—এইদৰে এই ক্ষেত্ৰখনৰ পৰিৱৰ্তনৰ সৈতে চমুকৈ বৰ্ণনা কৰা হৈছে।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- इच्छा -- अमुक वस्तु? व्यक्ति? परिस्थिति आदि मिले -- ऐसी जो मनमें चाहना रहती है? उसको इच्छा कहते हैं। क्षेत्रके विकारोंमें भगवान् सबसे पहले इच्छारूप विकारका नाम लेते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि इच्छा मूल विकार है क्योंकि ऐसा कोई पाप और दुःख नहीं है? जो सांसारिक इच्छाओंसे,पैदा न होता हो अर्थात् सम्पूर्ण पाप और दुःख सांसारिक इच्छाओंसे ही पैदा होते हैं।द्वेषः -- कामना और अभिमानमें बाधा लगनेपर क्रोध पैदा होता है। अन्तःकरणमें उस क्रोधका जो सूक्ष्म रूप रहता है? उसको द्वेष कहते हैं। यहाँ द्वेषः पदके अन्तर्गत क्रोधको भी समझ लेना चाहिये।सुखम् -- अनुकूलताके आनेपर मनमें जो प्रसन्नता होती है अर्थात् अनुकूल परिस्थिति जो मनको सुहाती है? उसको सुख कहते हैं।दुःखम् -- प्रतिकूलताके आनेपर मनमें जो हलचल होती है अर्थात् प्रतिकूल परिस्थिति जो मनको सुहाती नहीं है? उसको दुःख कहते हैं।संघातः -- चौबीस तत्त्वोंसे बने हुए शरीररूप समूहका नाम संघात है। शरीरका उत्पन्न होकर सत्तारूपसे दीखना भी विकार है तथा उसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होते रहना भी विकार है।चेतना -- चेतना नाम प्राणशक्तिका है अर्थात् शरीरमें जो प्राण चल रहे हैं? उसका नाम चेतना है। इस चेतनामें परिवर्तन होता रहता है जैसे -- सात्त्विकवृत्ति आनेपर प्राणशक्ति शान्त रहती है और चिन्ता? शोक? भय? उद्वेग आदि होनेपर प्राणशक्ति वैसी शान्त नहीं रहती? क्षुब्ध हो जाती है। यह प्राणशक्ति निरन्तर नष्ट होती रहती है। अतः यह भी विकाररूप ही है।साधारण लोग प्राणवालोंको चेतन और निष्प्राणवालोंको अचेतन कहते हैं? इस दृष्टिसे यहाँ प्राणशक्तिको,चेतना कहा गया है।धृतिः -- धृति नाम धारणशक्तिका है। यह धृति भी बदलती रहती है। मनुष्य कभी धैर्यको धारण करता है और कभी (प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर) धैर्यको छोड़ देता है। कभी धैर्य ज्यादा रहता है और कभी धैर्य कम रहता है। मनुष्य कभी अच्छी बातको धारण करता है और कभी विपरीत बातको धारण करता है। अतः धृति भी क्षेत्रका विकार है।[अठारहवें अध्यायके तैंतीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक धृतिके सात्त्विकी? राजसी और तामसी -- इन तीन भेदोंका वर्णन किया गया है। परमात्माकी तरफ चलनेमें सात्त्विकी धृतिकी बड़ी आवश्यकता है।]एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् -- जैसे पहले श्लोकमें इदं शरीरम् कहकर व्यष्टि शरीरसे अपनेको अलग देखनेके लिये कहा? ऐसे ही दृश्य(क्षेत्र और उसमें होनेवाले विकार) से द्रष्टाको अलग दिखानेके लिये यहाँ एतत् पद आया है।पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने समष्टि संसारका वर्णन किया और यहाँ छठे श्लोकमें व्यष्टि शरीरके विकारोंका वर्णन किया क्योंकि समष्टि संसारमें इच्छाद्वेषादि विकार होते ही नहीं। तात्पर्य यह है कि व्यष्टि शरीर समष्टि संसारसे और समष्टि संसार व्यष्टि शरीरसे अलग नहीं है अर्थात् ये दोनों एक हैं। जैसे इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रज्ञके साथ अपनी एकता बतायी? ऐसे ही यहाँ व्यष्टि शरीर और उसमें होनेवाले विकारोंकी समष्टि संसारके साथ एकता बताते हैं। आगे इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने पुरुषकी स्थिति शरीरमें न बताकर प्रकृतिमें बतायी है -- पुरुषः प्रकृतिस्थो हि। इससे भी सिद्ध होता है कि पुरुषकी स्थिति (सम्बन्ध) व्यष्टि शरीरमें हो जानेसे उसकी स्थिति समष्टि प्रकृतिमें हो जाती है क्योंकि व्यष्टि शरीर और समष्टि प्रकृति -- दोनों एक ही हैं। वास्तवमें देखा जाय तो व्यष्टि है ही नहीं? केवल समष्टि ही है। व्यष्टि केवल भूलसे मानी हुई है। जैसे समुद्रकी लहरोंको समुद्रसे अलग मानना भूल है? ऐसे ही व्यष्टि,शरीरको समष्टि संसारसे अलग (अपना) मानना भूल ही है।विशेष बात -- क्षेत्रज्ञ जब अविवेकसे क्षेत्रके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है? तब क्षेत्रमें इच्छाद्वेषादि विकार पैदा हो जाते हैं। क्षेत्रज्ञका वास्तविक स्वरूप तो सर्वथा निर्विकार ही है। क्षेत्रक्षेत्रज्ञके संयोगसे पैदा होनेवाले विकार सर्वथा मिटाये जा सकते हैं क्योंकि क्षेत्रज्ञका क्षेत्रके साथ संयोग केवल माना हुआ है। इस माने हुए संयोगको मिटानेके लिये भगवान् इस अध्यायके पहले श्लोकमें शरीरको अपनेसे पृथक् देखनेके लिये और फिर दूसरे श्लोकमें परमात्मासे अपने नित्यसंयोग(एकता) का अनुभव करनेके लिये कहते हैं। ऐसा अनुभव होनेपर क्षेत्रके साथ मानी हुई एकताका सर्वथा अभाव हो जाता है और फिर विकार उत्पन्न हो ही नहीं सकते।बोध होनेपर अर्थात् क्षेत्र(शरीर) से सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर इच्छा और द्वेष सदाके लिये सर्वथा मिट जाते हैं। सुख और दुःख अर्थात् अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिका ज्ञान तो होता है? पर उससे अन्तःकरणमें कोई विकार पैदा नहीं होता अर्थात् अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति प्राप्त होनेपर जीवन्मुक्त महापुरुष सुखीदुःखी नहीं होता। सुखदुःखका ज्ञान होना दोषी नहीं है? प्रत्युत उसका असर पड़ना (विकार होना) दोषी है ।जीवन्मुक्त महापुरुषका संघात अर्थात् शरीरसे किञ्चिन्मात्र भी मैंमेरेपनका सम्बन्ध न रहनेके कारण उसका कहा जानेवाला शरीर यद्यपि महान् पवित्र हो जाता है? तथापि प्रारब्धके अनुसार उसका यह शरीर रहता ही है। जबतक शरीर रहता है? तबतक चेतना (प्राणशक्ति) भी रहती है। परिश्रम होनेपर उसमें चञ्चलता आती है? नहीं तो वह शान्त रहती है। साधनावस्थामें जो सात्त्विकी धृति थी? वह बोध होनेपर भी रहती है। परन्तु अन्तःकरणसे तादात्म्य न रहनेसे तत्त्वज्ञ महापुरुषका चेतना और धृतिरूप विकारोंसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता।तात्पर्य यह हुआ कि शरीरके साथ तादात्म्य होनेसे जो विकार होते हैं? वे विकार बोध होनेपर नहीं होते। संघात? चेतना और धृतिरूप विकारोंके रहनेपर भी उनका स्वयंपर कुछ भी असर नहीं पड़ता। सम्बन्ध -- शरीरके साथ तादात्म्य कर लेनेसे ही इच्छा? द्वेष आदि विकार पैदा होते हैं और उन विकारोंका स्वयंपर असर पड़ता है। इसलिये भगवान् शरीरके साथ किये हुए तादात्म्यको मिटानेके लिये आवश्यक बीस साधनोंका ज्ञान के नामसे आगेके पाँच श्लोकोंमें वर्णन करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

अब जिन इच्छा आदिको वैशेषिकमतावलम्बी आत्माके धर्म मानते हैं वे भी क्षेत्रके ही धर्म हैं आत्माके नहीं यह बात भगवान् कहते हैं --, इच्छा -- जिस प्रकारके सुखदायक विषयका पहले उपभोग किया हो? फिर वैसे ही पदार्थके प्राप्त होनेपर उसको सुखका कारण समझकर मनुष्य उसे लेना चाहता है? उस चाहका नाम इच्छा है? वह अन्तःकरणका धर्म है और ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र है। तथा द्वेष -- जिस प्रकारके पदार्थको दुःखका कारण समझकर पहले अनुभव किया हो? फिर उसी जातिके पदार्थके प्राप्त होनेपर जो उससे मनुष्य द्वेष करता है? उस भावका नाम द्वेष है? वह भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है। उसी प्रकार सुख? जो कि अनुकूल? प्रसन्नतारूप और सात्त्विक है? ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है तथा प्रतिकूलतारूप दुःख भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है। देह और इन्द्रियोंका समूह संघात कहलाता है। उसमें प्रकाशित हुई जो अन्तःकरणकी वृत्ति है जो कि अग्निसे प्रज्वलित लोहपिण्डकी भाँति आत्मचैतन्यके आभासरूपसे व्याप्त है? वह चेतना भी ज्ञेय होनेके कारण क्षेत्र ही है। व्याकुल हुए शरीर और इन्द्रियादि जिससे धारण किये जाते हैं? वह धृति भी ज्ञेय होनेसे क्षेत्र ही है। अन्तःकरणके समस्त धर्मोंका संकेत करनेके लिये यहाँ इच्छादि धर्मोंका ग्रहण किया गया है। जो कुछ कहा गया है? उसका उपसंहार करते हैं -- महत्तत्त्वादि विकारोंसे सहित क्षेत्रका यह स्वरूप संक्षेपसे कहा गया। अर्थात् जिन समस्त क्षेत्रभेदोंका समूह यह शरीर क्षेत्र है ऐसा कहा गया है? महाभूतोंसे लेकर धृतिपर्यन्त भेदोंसे विभिन्न हुए उस क्षेत्रकी व्याख्या कर दी गयी। जो आगे कहे जानेवाले विशेषणोंसे युक्त क्षेत्रज्ञ है? जिस क्षेत्रज्ञको प्रभावसहित जान लेनेसे ( मनुष्य ) अमृतरूप हो जाता है? उसको भगवान् स्वयं आगे चलकर ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि इत्यादि वचनोंसे विशेषणोंके सहित कहेंगे।

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Sri Anandgiri

ननूक्ते क्षेत्रे क्षेत्रज्ञो वक्तव्यस्तं हित्वा किमित्यन्यदुच्यते तत्राह -- क्षेत्रज्ञ इति। अनादिमदित्यादिना वक्ष्यमाणविशेषणं क्षेत्रज्ञं स्वयमेव भगवान्विवक्षितविशेषणसहितं ज्ञेयं यत्तदित्यादिना वक्ष्यतीति संबन्धः। किमिति क्षेत्रज्ञो वक्ष्यते तत्राह -- यस्येति। ज्ञेयं यत्तदित्यतः प्राक्तनग्रन्थस्य तात्पर्यमाह -- अधुनेति। अमानित्वादिलक्षणं विदधातीत्युत्तरत्र संबन्धः। ज्ञानसाधनसमुदायबोधनं कुत्रोपयुज्यते तत्राह -- यस्मिन्निति।योग्यमधिकृतमेव विवृणोति -- यत्पर इति। एतज्ज्ञानमिति वचनात्कथमिदं ज्ञानसाधनमित्याशङ्क्याह -- तमिति। तद्विधानस्य वक्तृद्वारा दार्ढ्यं सूचयति -- भगवानिति। अमानित्वादिनिष्ठस्यान्तर्धियो ज्ञानमिति,नियमार्थमाह -- अमानित्वमिति। मानस्तिरोहितोऽवलेपः। स चात्मन्युत्कर्षारोपहेतुः सोऽस्येति मानी न मान्यमानी तस्य भावोऽमानित्वमिति व्याकरोति -- अमानित्वमित्यादिना। प्रतियोगिमुखेनादम्भित्वं विवृणोति -- अदम्भित्वमिति। वाङ्मनोदेहैरपीडनं प्राणिनामहिंसनम्? तदेवाहिंसेत्याह -- अहिंसेति। परापराधस्य चित्तविकारकारणस्य प्राप्तावेवाविकृतचित्तत्वेनापकारसहिष्णुत्वं क्षान्तिरित्याह -- क्षान्तिरिति। अवक्रत्वमकौटिल्यं यथाहृदयव्यवहारः सदैकरूपप्रवृत्तिनिमित्तत्वं चेत्यर्थः।उपनीय तु यः शिष्यम् इत्यादिनोक्तमाचार्यं व्यवच्छिनत्ति -- मोक्षेति। शुश्रूषादीत्यादिपदं नमस्कारादिविषयम्। बाह्यमाभ्यन्तरं च द्विप्रकारं शौचं क्रमेण विभजते --,शौचमित्यादिना। मनसो रागादिमलानामिति संबन्धः। तापनयोपायमुपदिशति -- प्रतिपक्षेति। रागादिप्रतिकूलस्य भावनाविषयेषु दोषदृष्ट्या वृत्तिस्तयेति यावत्। स्थिरभावमेव विशदयति -- मोक्षेति। आत्मनो नित्यसिद्धस्यानाधेयातिशयस्य कुतो विनिग्रहस्तत्राह -- आत्मन इति।

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Sri Dhanpati

एवं क्षेत्रस्वरुपनिर्देशेनैव तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्चेति व्याख्यायेच्छादीनामात्मविकारत्वानिवृत्तये क्षेत्रविकारत्वनिरुपणेन यद्विकारीत्येतन्नरुपयन्नात्मगुणा इति यानाचक्षते वैशेषिकास्तेऽपि क्षेत्रधर्मा एव नतु क्षेत्रज्ञस्येत्याशयेनाह -- इच्छेति। इच्छा पर्वोपलब्धसुखहेतुसजातीये हेतौ उपलभमाने इदं मे स्यादिति स्पृहा। तथानुभूतदुःखहेतुसजातीये हेतावुपलभमाने इदं मे मा भूदिति चित्तवृत्तिर्द्वेषः। तथा प्रसन्नत्वात्मकमनुकूलं सुखं प्रतिकूलात्मकं देहेन्द्रियाणआं संहतिः संघातः। तस्मिन्नभिव्यक्तान्तःकरणवृत्तिरात्मचैतन्याभासानुविद्धा चेतना ययावसादप्राप्तानि देहेन्द्रियाणि ध्रियन्ते सा घृतिः। इच्छादिग्रहणं संकल्पविकल्पाद्यन्तःकरणधर्मोपलक्षणार्थम्। तथाच श्रुतिः -- कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्ह्नीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन ए इति। तथा चेच्छादीनां ज्ञेयत्वाज्ज्ञेयान्तःकरणधर्मत्वप्रतिपादनेन श्रुत्या सर्वज्ञेन भगवता च वैशेषिकमतस्य हेयत्वं बोधितम्। क्षेत्रनिरुपणमुपसंहरति। एतत्क्षेत्रं सविकारं विकारेण महदादिना तद्विकारेण चेच्छादिना सहितं समासेन सेक्षेपेणोदाहृत्मुक्तं। यस्य क्षेत्रभेदजातस्य संहतिरिदं शरीरं क्षेत्रमित्युक्तं तत्क्षेत्रं महाभूतादिभेदभिन्नं धृत्यन्तं विरक्तस्य ज्ञानाधिकाराय वैराग्यार्थं व्याख्यातमित्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
ichchhādesire
dveṣhaḥaversion
sukhamhappiness
duḥkhammisery
saṅghātaḥthe aggregate
chetanāthe consciousness
dhṛitiḥthe will
etatall these
kṣhetramthe field of activities
samāsenacomprise of
savikāram
udāhṛitamare said
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.6
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः

मूल प्रकृति, समष्टि बुद्धि (महत्तत्त्व), समष्टि अहंकार, पाँच महाभूत और दस इन्द्रियाँ, एक मन तथा पाँचों इन्द्रियोंके पाँच विषय ( -- यह चौबीस तत्त्वोंवाला क्षेत्र है)। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.8
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः

मानित्व-(अपनेमें श्रेष्ठताके भाव-) का न होना, दम्भित्व-(दिखावटीपन-) का न होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरुकी सेवा, बाहर-भीतरकी शुद्धि, स्थिरता और मनका वशमें होना। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 7
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 7
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः।एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्

इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना (प्राणशक्ति) और धृति -- इन विकारोंसहित यह क्षेत्र संक्षेपसे कहा गया है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 7 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 7 का हिंदी अर्थ: "इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना (प्राणशक्ति) और धृति -- इन विकारोंसहित यह क्षेत्र संक्षेपसे कहा गया है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 7?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 7 translates to: "Desire, hatred, pleasure, pain, the aggregate (body), intelligence, and fortitude—the field has thus been briefly described with its modifications. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः।एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 7 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना (प्राणशक्ति) और धृति -- इन विकारोंसहित यह क्षेत्र संक्षेपसे कहा गया है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "ichchhā dveṣhaḥ sukhaṁ duḥkhaṁ saṅghātaśh chetanā dhṛitiḥ" mean in English?

"ichchhā dveṣhaḥ sukhaṁ duḥkhaṁ saṅghātaśh chetanā dhṛitiḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 7. Desire, hatred, pleasure, pain, the aggregate (body), intelligence, and fortitude—the field has thus been briefly described with its modifications. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.