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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 5
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्िचतैः

(यह क्षेत्रक्षेत्रज्ञका तत्त्व) ऋषियोंके द्वारा बहुत विस्तारसे कहा गया है तथा वेदोंकी ऋचाओं-द्वारा बहुत प्रकारसे कहा गया है और युक्तियुक्त एवं निश्चित किये हुए ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा भी कहा गया है। — VaniSagar

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BengaliIND

ঋষিরা বিভিন্নভাবে গান গেয়েছেন, বিভিন্ন স্বাতন্ত্র্যসূচক মন্ত্রের সাথে এবং পরমকে নির্দেশকারী ইঙ্গিতপূর্ণ শব্দ দিয়ে, যুক্তিতে পরিপূর্ণ এবং সিদ্ধান্তমূলক।

GujaratiIND

ઋષિમુનિઓએ વિવિધ વિશિષ્ટ મંત્રોચ્ચાર સાથે અને સંપૂર્ણ, તર્કથી ભરપૂર અને નિર્ણાયકનું સૂચક સૂચક શબ્દો સાથે ઘણી રીતે ગાયું છે.

PunjabiIND

ਸਾਧੂਆਂ ਨੇ ਕਈ ਤਰੀਕਿਆਂ ਨਾਲ ਗਾਇਆ ਹੈ, ਵੱਖੋ-ਵੱਖਰੇ ਵੱਖੋ-ਵੱਖਰੇ ਉਚਾਰਣ ਦੇ ਨਾਲ ਅਤੇ ਸੰਪੂਰਨਤਾ ਦੇ ਸੰਕੇਤਕ ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੇ ਨਾਲ, ਤਰਕ ਨਾਲ ਭਰਪੂਰ ਅਤੇ ਨਿਰਣਾਇਕ.

KannadaIND

ಋಷಿಮುನಿಗಳು ಅನೇಕ ವಿಧಗಳಲ್ಲಿ ಹಾಡಿದ್ದಾರೆ, ವಿವಿಧ ವಿಶಿಷ್ಟವಾದ ಪಠಣಗಳೊಂದಿಗೆ ಮತ್ತು ಸಂಪೂರ್ಣವನ್ನು ಸೂಚಿಸುವ ಸೂಚಿತ ಪದಗಳೊಂದಿಗೆ, ತಾರ್ಕಿಕ ಪೂರ್ಣ ಮತ್ತು ನಿರ್ಣಾಯಕ.

KonkaniIND

ऋषींनी जायत्या तरांनी गायन केलां, वेगवेगळ्या खाशेल्या मंत्रांनी आनी तशेंच निरपेक्षतायेचो संकेत दिवपी सुचवपी उतरांनी, तर्कशास्त्रान भरिल्ल्या आनी निर्णायकपणान.

MizoIND

Mi fingte chuan kawng tam takin hla an sa a, hla hrang hrang hmangin leh Absolute tilangtu thumal rawtna hmangin, ngaihtuahna fim tak leh thutlukna siam thei tak tak hmangin an sa bawk.

AssameseIND

ঋষিসকলে বহু ধৰণে গাইছে, বিভিন্ন স্বকীয় গীতেৰে আৰু লগতে নিৰপেক্ষৰ সূচক, যুক্তিৰে ভৰা আৰু নিৰ্ণায়ক শব্দৰে।

TeluguIND

ఋషులు అనేక విధాలుగా పాడారు, వివిధ విలక్షణమైన కీర్తనలతో మరియు సంపూర్ణతను సూచించే సూచనాత్మక పదాలతో, పూర్తి తార్కికం మరియు నిర్ణయాత్మకమైనది.

TamilIND

முனிவர்கள் பல வழிகளில் பாடியுள்ளனர், பல்வேறு தனித்துவமான மந்திரங்கள் மற்றும் முழுமையானதைக் குறிக்கும், பகுத்தறிவு மற்றும் தீர்க்கமானவை.

SindhiIND

ساجن ڪيترن ئي طريقن سان ڳايو آهي، مختلف مخصوص راڳن سان ۽ پڻ تجويز ڪيل لفظن سان، مطلق جو اشارو، دليلن سان ڀريل ۽ فيصلو ڪندڙ.

MarathiIND

ऋषींनी अनेक प्रकारे गायन केले आहे, विविध विशिष्ट मंत्रांसह आणि निरपेक्षतेचे सूचक शब्दांसह, तर्काने परिपूर्ण आणि निर्णायक.

MalayalamIND

ഋഷിമാർ പലവിധത്തിൽ പാടിയിട്ടുണ്ട്, വിവിധ വ്യതിരിക്തമായ മന്ത്രങ്ങളോടെയും, സമ്പൂർണ്ണതയെ സൂചിപ്പിക്കുന്ന സൂചകമായ വാക്കുകളോടെയും, യുക്തിസഹവും നിർണ്ണായകവും.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- ऋषिभिर्बहुधा गीतम् -- वैदिक मन्त्रोंके द्रष्टा तथा शास्त्रों? स्मृतियों और पुराणोंके रचयिता ऋषियोंने अपनेअपने (शास्त्र? स्मृति आदि) ग्रन्थोंमें जडचेतन? सत्असत्? शरीरशरीरी? देहदेही? नित्यअनित्य आदि शब्दोंसे क्षेत्रक्षेत्रज्ञका बहुत विस्तारसे वर्णन किया है।छन्दोभिर्विविधैः पृथक् -- यहाँ विविधैः विशेषणसहित छन्दोभिः पद ऋक? यजुः? साम और अथर्व -- इन चारों वेदोंके संहिता और ब्राह्मण भागोंके मन्त्रोंका वाचक है। इन्हींके अन्तर्गत सम्पूर्ण उपनिषद् और भिन्नभिन्न शाखाओंको भी समझ लेना चाहिये। इनमें क्षेत्रक्षेत्रज्ञका अलगअलग वर्णन किया गया है।ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः -- अनेक युक्तियोंसे युक्त तथा अच्छी तरहसे निश्चित किये हुए ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा भी क्षेत्रक्षेत्रज्ञके तत्त्वका वर्णन किया गया है।इस श्लोकमें भगवान्का आशय यह मालूम देता है कि क्षेत्रक्षेत्रज्ञका जो संक्षेपसे वर्णन मैं कर रहा हूँ? उसे अगर कोई विस्तारसे देखना चाहे तो वह उपर्युक्त ग्रन्थोंमें देख सकता है। सम्बन्ध -- तीसरे श्लोकमें क्षेत्रक्षेत्रज्ञके विषयमें जिन छः बातोंको संक्षेपसे सुननेकी आज्ञा दी थी? उनमेंसे क्षेत्रकी दो बातोंका अर्थात् उसके स्वरूप और विकारोंका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

श्रोताकी बुद्धिमें रुचि उत्पन्न करनेके लिये? उस कहे जानेवाले क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके यथार्थ स्वरूपकी स्तुति करते हैं --, ( यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व ) वसिष्ठादि ऋषियोंद्वारा बहुत प्रकारसे कहा गया है और ऋग्वेदादि नाना प्रकारके श्रुतिवाक्योंद्वारा भी पृथक्पृथक् -- विवेचनपूर्वक कहा गया है। तथा संशयरहित निश्चित ज्ञान उत्पन्न करनेवाले विनिश्चित और युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्रके पदोंसे भी कहा गया है। जो वाक्य ब्रह्मके सूचक हैं उसका नाम ब्रह्मसूत्र है? उनके द्वारा ब्रह्म पाया जाता है -- जाना जाता है? इसलिये उनको पद कहते हैं? उनसे भी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व कहा गया है क्योंकि केवल आत्मा ही सब कुछ है ऐसी उपासना करनी चाहिये इत्यादि ब्रह्मसूचक पदोंसे ही आत्मा जाना जाता है।

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Sri Anandgiri

क्षेत्रादियाथात्म्यस्तुत्या प्रलोभिताय किं तदिति जिज्ञासवे यथोद्देशं क्षेत्रं निर्दिशति -- स्तुत्येति। महत्त्वे हेतुमाह -- सर्वेति। भूतशब्देन स्थूलानामपि विशेषाभावाद्ग्रहे का हानिरित्याशङ्क्याह -- स्थूलानीति। अहंकारोऽहंप्रत्ययलक्षण इति संबन्धः। भूतानां प्रातीतिकत्वेनाभिमानमात्रात्मत्वं मत्वाहंकारं विशिनष्टि -- महाभूतेति। महतः परमित्यादौ प्रसिद्धं महच्छब्दार्थमहंकारहेतुमाह -- अहंकारेति। ईश्वरशक्तिरित्युक्ते चैतन्यमपि शङ्क्येत तदर्थमाह -- ममेति। अवधारणरूपमर्थमेव स्फुटयति -- एतावत्येवेति। पञ्चतन्मात्राण्यहंकारो महदव्याकृतमित्यष्टधा भिन्नत्वम्। मूलप्रकृत्या सह तन्मात्रादिभेदानां समुच्चयश्चकारार्थः। दशेन्द्रियाण्येव विभज्य व्युत्पादयति -- श्रोत्रेत्यादिना। तदेव प्रश्नद्वारा स्फुटयति -- किं तदिति। शब्दादिविषयशब्देन स्थूलानि भूतानि गृह्यन्ते। उक्तेषु तन्मात्रादिषु तन्त्रान्तरीयसंमतिमाह -- तानीति।मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त। षो़डशकश्च विकारः इति पठन्ति।

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Sri Dhanpati

श्रोतृप्ररोचनाय क्षेत्रक्षेत्रज्ञयाथात्म्यं स्तौति -- ऋषिभिरिति। ऋषिभिर्वसिष्ठादिभिर्वासिष्ठातौ बहुधा बहुप्रकारं गीतं कथितम्। न केवलमाप्तोक्तमेव क्षेत्रादियाथात्म्ये प्रमाणमपितु छन्दांसीत्याह। छन्दोभिऋःगादिभिर्विविधैः शाखामेदेन नानाप्रकारैः पृथग्विवेकतो गीतम्। उक्तार्थे श्रुतिस्मृती प्रमाणमभिधाय युक्तमाह -- ब्रह्मेति। ब्रह्मणः सूचकानि वाक्यानि ब्रह्मसूत्राणिः तैः पद्यते ज्ञायते ब्रह्मेति तानि पदान्युचयन्ते तैरेवं क्षेत्रक्षेत्रज्ञयाथात्म्यं गीतं इत्यनुवर्तते। आत्मेत्येवोपासीतेत्येवमादिभिर्हि ब्रह्मसूत्रपदैः आत्मा ज्ञायते हेतुमद्भिर्युक्तियुक्तैः विनिश्चितेः न संशयरुपैः निश्चितप्रत्ययोत्पादकैः इति भाष्ये। आदिपदात्यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति? सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म? तत्त्वमसि? ब्रह्मविदाप्नोति परं? न स वेद यथा पशुः इत्यादीनि सूत्रपदानि गृह्यन्ते। तथैच ब्रह्मसूत्राणि च तानि पदानीति भाष्योक्तलघुभूतकर्मधारयं विहाय ब्रह्मसूत्राणि च पदानि चेति समासो न प्रदर्शनीयः फलाभावात्। हेतुमद्भिर्युक्तियुक्तैःसदेव सोभ्येदमग्र आसीत्?कथमसतः सज्जायेत इति। तथाको ह्येवानयात्कः प्राण्यात् यदेश आकाश आनन्दो न स्यात्? एष ह्येवानन्दयति?अन्नेन सोम्य शुङ्गेनापोमूलमन्विच्छ अद्भिः सोभ्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः प्रजाः इत्यादिभिः। यद्वाअथातो ब्रह्मजिज्ञासा इत्यादीन्यपि सूत्राण्यत्र गृहीतानि। अन्यथा छन्दोभिरित्यादिना पौनरुक्त्यादिति मत्वा विशिनष्टि। हेतुमद्भिरिति। यत् ऋष्यादिभिर्गीतं तत्सामासेन श्रृण्वित्यन्वयः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
ṛiṣhibhiḥby great sages
bahudhāin manifold ways
gītamsung
chhandobhiḥin Vedic hymns
vividhaiḥvarious
pṛithakvariously
brahmasūtra
padaiḥby the hymns
chaand
evaespecially
hetumadbhiḥ
viniśhchitaiḥconclusive evidence
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.4
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्।स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु

वह क्षेत्र जो है, जैसा है, जिन विकारोंवाला है और जिससे जो पैदा हुआ है; तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाववाला है, वह सब संक्षेपमें मेरेसे सुन। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.6
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः

मूल प्रकृति, समष्टि बुद्धि (महत्तत्त्व), समष्टि अहंकार, पाँच महाभूत और दस इन्द्रियाँ, एक मन तथा पाँचों इन्द्रियोंके पाँच विषय ( -- यह चौबीस तत्त्वोंवाला क्षेत्र है)। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 5
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 5
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्िचतैः

(यह क्षेत्रक्षेत्रज्ञका तत्त्व) ऋषियोंके द्वारा बहुत विस्तारसे कहा गया है तथा वेदोंकी ऋचाओं-द्वारा बहुत प्रकारसे कहा गया है और युक्तियुक्त एवं निश्चित किये हुए ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा भी कहा गया है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 5 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 5 का हिंदी अर्थ: "(यह क्षेत्रक्षेत्रज्ञका तत्त्व) ऋषियोंके द्वारा बहुत विस्तारसे कहा गया है तथा वेदोंकी ऋचाओं-द्वारा बहुत प्रकारसे कहा गया है और युक्तियुक्त एवं निश्चित किये हुए ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा भी कहा गया है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 5?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 5 translates to: "Sages have sung in many ways, with various distinctive chants and also with suggestive words indicative of the Absolute, full of reasoning and decisive. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्िच" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 5 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। (यह क्षेत्रक्षेत्रज्ञका तत्त्व) ऋषियोंके द्वारा बहुत विस्तारसे कहा गया है तथा वेदोंकी ऋचाओं-द्वारा बहुत प्रकारसे कहा गया है और युक्तियुक्त एवं निश्चित किये हुए ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा भी कहा गया है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "ṛiṣhibhir bahudhā gītaṁ chhandobhir vividhaiḥ pṛithak" mean in English?

"ṛiṣhibhir bahudhā gītaṁ chhandobhir vividhaiḥ pṛithak" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 5. Sages have sung in many ways, with various distinctive chants and also with suggestive words indicative of the Absolute, full of reasoning and decisive. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.