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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 4
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्।स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु

वह क्षेत्र जो है, जैसा है, जिन विकारोंवाला है और जिससे जो पैदा हुआ है; तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाववाला है, वह सब संक्षेपमें मेरेसे सुन। — VaniSagar

Global Translations

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MarathiIND

हे क्षेत्र काय आहे, त्याचे स्वरूप काय आहे, त्याचे काय बदल आहेत, ते कोठून आहे, तो कोण आहे आणि त्याच्या शक्ती काय आहेत हे माझ्याकडून थोडक्यात ऐका.

KannadaIND

ಕ್ಷೇತ್ರ ಯಾವುದು, ಅದು ಯಾವ ಸ್ವರೂಪದ್ದು, ಅದರ ಮಾರ್ಪಾಡುಗಳು ಏನು, ಅದು ಎಲ್ಲಿಂದ, ಅವನು ಯಾರು ಮತ್ತು ಅವನ ಶಕ್ತಿಗಳು ಯಾವುವು ಎಂಬುದನ್ನು ಸಂಕ್ಷಿಪ್ತವಾಗಿ ನನ್ನಿಂದ ಕೇಳಿ.

BengaliIND

আমার কাছ থেকে সংক্ষেপে শুনুন ক্ষেত্রটি কী, এটি কী প্রকৃতির, এর পরিবর্তনগুলি কী, এটি কোথা থেকে এসেছে, তিনি কে এবং তাঁর ক্ষমতাগুলি কী।

TamilIND

அந்தத் துறை என்ன, அது என்ன இயல்பு, அதன் மாற்றங்கள் என்ன, அது எங்கிருந்து வருகிறது, அவர் யார், அவருடைய சக்திகள் என்ன என்பதைச் சுருக்கமாக என்னிடம் கேளுங்கள்.

GujaratiIND

મારી પાસેથી સંક્ષિપ્તમાં સાંભળો કે ક્ષેત્ર શું છે, તે કેવું છે, તેના ફેરફારો શું છે, તે ક્યાંથી છે, તે કોણ છે અને તેની શક્તિઓ શું છે.

MalayalamIND

ഫീൽഡ് എന്താണെന്നും അതിൻ്റെ സ്വഭാവം എന്താണെന്നും അതിൻ്റെ പരിഷ്കാരങ്ങൾ എന്താണെന്നും എവിടെ നിന്നാണ്, അവൻ ആരാണെന്നും അവൻ്റെ ശക്തികൾ എന്താണെന്നും എന്നിൽ നിന്ന് ചുരുക്കത്തിൽ കേൾക്കുക.

OdiaIND

କ୍ଷେତ୍ରଟି କ’ଣ, ପ୍ରକୃତି କ’ଣ, ଏହାର ପରିବର୍ତ୍ତନ କ’ଣ, କେଉଁଠୁ, ସେ କିଏ, ଏବଂ ତାଙ୍କର ଶକ୍ତି କ’ଣ ମୋ ବିଷୟରେ ସଂକ୍ଷେପରେ ଶୁଣ |

TeluguIND

క్షేత్రం అంటే ఏమిటి, దాని స్వభావం ఏమిటి, దాని మార్పులు ఏమిటి, అది ఎక్కడ నుండి వచ్చింది, అతను ఎవరు మరియు అతని శక్తులు ఏమిటో క్లుప్తంగా నా నుండి వినండి.

SindhiIND

مون کان مختصر طور ٻڌو ته فيلڊ ڇا آهي، ڪهڙي نوعيت جو آهي، ان ۾ ڪهڙيون تبديليون آهن، اهو ڪٿان آيو آهي، هو ڪير آهي ۽ سندس طاقتون ڇا آهن.

PunjabiIND

ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਸੰਖੇਪ ਵਿੱਚ ਸੁਣੋ ਕਿ ਖੇਤਰ ਕੀ ਹੈ, ਇਹ ਕਿਸ ਕਿਸਮ ਦਾ ਹੈ, ਇਸ ਦੀਆਂ ਸੋਧਾਂ ਕੀ ਹਨ, ਇਹ ਕਿੱਥੋਂ ਹੈ, ਉਹ ਕੌਣ ਹੈ, ਅਤੇ ਉਸ ਦੀਆਂ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਕੀ ਹਨ।

NepaliIND

क्षेत्र के हो, यो कस्तो प्रकृतिको हो, यसका परिमार्जनहरू के हुन्, यो कहाँबाट हो, उहाँ को हुनुहुन्छ र उहाँका शक्तिहरू के हुन्, मबाट संक्षिप्तमा सुन्नुहोस्।

MizoIND

Field chu eng nge a nih, eng ang chiah nge a nih, a siamthatnate, khawi atanga lo chhuak nge, tu nge A nih, leh A thiltihtheihnate chu eng nge ni tih tawi te tein Ka hnen atangin ngaithla rawh.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- तत्क्षेत्रम् -- तत् शब्द दोका वाचक होता है -- पहले कहे हुए विषयका और दूरीका। इसी अध्यायके पहले श्लोकमें जिसको इदम् पदसे कहा गया है? उसीको यहाँ तत् पदसे कहा है। क्षेत्र सब देशमें नहीं है? सब कालमें नहीं है और अभी भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है -- यह क्षेत्रकी (स्वयंसे) दूरी है।यच्च -- उस क्षेत्रका जो स्वरूप है? जिसका वर्णन इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकमें हुआ है।यादृक् च -- उस क्षेत्रका जैसा स्वभाव है? जिसका वर्णन इसी अध्यायके छब्बीसवेंसत्ताईसवें श्लोकोंमें उसे उत्पन्न और नष्ट होनेवाला बताकर किया गया है।यद्विकारि -- यद्यपि प्रकृतिका कार्य होनेसे इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकमें आये तेईस तत्त्वोंको भी विकार कहा गया है? तथापि यहाँ उपर्युक्त पदसे क्षेत्रक्षेत्रज्ञके माने हुए सम्बन्धके कारण क्षेत्रमें उत्पन्न होनेवाले इच्छाद्वेषादि विकारोंको ही विकार कहा गया है? जिनका वर्णन छठे श्लोकमें हुआ है।यतश्च यत् -- यह क्षेत्र जिससे पैदा होता है अर्थात् प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले सात विकार और तीन गुण? जिनका वर्णन इसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें हुआ है।स च -- पहले श्लोकके उत्तरार्धमें जिस क्षेत्रज्ञका वर्णन हुआ है? उसी क्षेत्रज्ञका वाचक यहाँ सः पद है और उसीके विषयमें यहाँ सुननेके लिये कहा जा रहा है।यः -- इस क्षेत्रज्ञका जो स्वरूप है? जिसका वर्णन इसी अध्यायके बीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें और बाईसवें श्लोकमें किया गया है।यत्प्रभावश्च -- वह क्षेत्रज्ञ जिस प्रभाववाला है जिसका वर्णन इसी अध्यायके इकतीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक किया गया है।तत्समासेन मे श्रृणु -- यहाँ तत् पदके अन्तर्गत क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ -- दोनोंको लेना चाहिये। तात्पर्य है कि वह क्षेत्र जो है? जैसा है? जिन विकारोंवाला और जिससे पैदा हुआ है -- इस तरह क्षेत्रके विषयमें चार बातें और वह क्षेत्रज्ञ जो है और जिस प्रभाववाला है -- इस तरह क्षेत्रज्ञके विषयमें दो बातें तू मेरेसे संक्षेपमें सुन।यद्यपि इस अध्यायके आरम्भमें पहले दो श्लोकोंमें क्षेत्रक्षेत्रज्ञका सूत्ररूपसे वर्णन हुआ है? जिसको भगवान्ने,ज्ञान भी कहा है तथापि क्षेत्रक्षेत्रज्ञके विभागका स्पष्टरूपसे विवेचन (विकारसहित क्षेत्र और निर्विकार क्षेत्रज्ञके स्वरूपका प्रभावसहित विवेचन) इस तीसरे श्लोकसे आरम्भ किया गया है। इसलिये भगवान् इसको सावधान होकर सुननेकी आज्ञा देते हैं।इस श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रके विषयमें तो चार बातें सुननेकी आज्ञा दी है? पर क्षेत्रज्ञके विषयमें केवल दो बातें -- स्वरूप और प्रभाव ही सुननेकी आज्ञा दी है। इससे यह शङ्का हो सकती है कि क्षेत्रका प्रभाव भी क्यों नहीं कहा गया और साथ ही क्षेत्रज्ञके स्वभाव? विकार और जिससे जो पैदा हुआ -- इन विषयोंपर भी क्यों नहीं कहा गया इसका समाधान यह है कि एक क्षण भी एक रूपमें स्थिर न रहनेवाले क्षेत्रका प्रभाव हो ही क्या सकता है प्रकृतिस्थ (संसारी) पुरुषके अन्तःकरणमें धनादि जड पदार्थोंका महत्त्व रहता है? इसीलिये उसको संसारमें क्षेत्रका (धनादि जड पदार्थोंका) प्रभाव दीखता है। वास्तवमें स्वतन्त्ररूपसे क्षेत्रका कुछ भी प्रभाव नहीं है। अतः उसके प्रभावका कोई वर्णन नहीं किया गया।क्षेत्रज्ञका स्वरूप उत्पत्तिविनाशरहित है? इसलिये उसका स्वभाव भी उत्पत्तिविनाशरहित है। अतः भगवान्ने उसके स्वभावका अलगसे वर्णन न करके स्वरूपके अन्तर्गत ही कर दिया। क्षेत्रके साथ अपना सम्बन्ध माननेके कारण ही क्षेत्रज्ञमें इच्छाद्वेषादि विकारोंकी प्रतीति होती है? अन्यथा क्षेत्रज्ञ (स्वरूपतः) सर्वथा निर्विकार ही है। अतः निर्विकार क्षेत्रज्ञके विकारोंका वर्णन सम्भव ही नहीं। क्षेत्रज्ञ अद्वितीय? अनादि और नित्य है। अतः इसके विषयमें कौन किससे पैदा हुआ -- यह प्रश्न ही नहीं बनता। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें जिसको संक्षेपसे सुननेके लिये कहा गया है? उसका विस्तारसे वर्णन कहाँ हुआ है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

इदं शरीरम् इत्यादि श्लोकोंद्वारा उपदेश किये हुए क्षेत्राध्यायके अर्थका संक्षेपरूप यह तत्क्षेत्रं यच्च इत्यादि श्लोक कहा जाता है क्योंकि जिस अर्थका विस्तारपूर्वक वर्णन करना हो? उसका संक्षेप पहले कह देना उचित ही है --, जिसका पहले इदं शरीरम् इत्यादि ( वाक्य ) से वर्णन किया गया है? यहाँ तत् शब्दसे उसीका संकेत करते हैं। यह जो पूर्वोवत क्षेत्र है वह जैसा है अर्थात् अपने धर्मोंके कारण वह जिस प्रकारका है तथा जैसे विकारोंवाला है और जिस कारणसे जो कार्य उत्पन्न होता है -- यहाँ च शब्द समुच्चयके लिये है और कार्य उत्पन्न होता है यह वाक्यशेष है। तथा जिसे क्षेत्रज्ञ कहा गया है वह भी जिस प्रभाववाला अर्थात् जिनजिन उपाधिकृत शक्तियोंवाला है? उन क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ दोनोंका उपर्युक्त विक्षेषणोंसे युक्त यथार्थ स्वरूप तू मुझसे संक्षेपसे सुन अर्थात् सुनकर निश्चय कर।

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Sri Anandgiri

श्लोकान्तरस्य तात्पर्यमाह -- तदित्यादिना। विवक्षितं जिज्ञासितमित्यर्थः। स्तुतिफलमाह -- श्रोत्रिति। न केवलमाप्तोक्तेरेव क्षेत्रादियाथात्म्यं संभावितं किंतु वेदवाक्यादपीत्याह -- छन्दोभिश्चेति। ऋगादीनां चतुर्णामपि वेदानां नानाप्रकारत्वं शाखाभेदादिष्टम्। न केवलं श्रुतिस्मृतिसिद्धमुक्तं याथात्म्यं किंतु यौक्तिकं चेत्याह -- किञ्चेति। कानि तानि सूत्राणीत्याशङ्क्याह -- आत्मेत्येवेति। आदिपदेनब्रह्मविदाप्नोति परम्?अथ योऽन्यां देवताम् इत्यादीनि विद्याविद्यासूत्राण्युक्तानि। आत्मेति क्षेत्रज्ञोपादानं तच्च क्षेत्रोपलक्षणम्।अथातो ब्रह्मजिज्ञासा इत्यादीन्यपि सूत्राण्यत्र गृहीतान्यन्यथा छन्दोभिरित्यादिना पौनरुक्त्यादिति मत्त्वा विशिनष्टि -- हेतुमद्भिरिति।

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Sri Dhanpati

इदं शरीरमित्यादिनोपदिष्टस्य क्षेत्राध्यायार्थस्य संग्रहश्लोकं प्रतिपत्तिसौकर्यार्थमुपन्यस्याति -- तदिति। इदं शरीरमिति यन्निर्दिष्टं तत्तदा परामृशति। यच्चेदं निर्दिष्टं क्षेत्रं स्वरुपतो जडं स्तावरजंगमादिभेबैर्भिन्नं दृश्यत्वादिस्वभावं तत्। यादृक् च स्वकीयैधर्मैः यादृशं यत्प्रकारकं च यद्विकारि ये विकारा अस्य तत्। यतो यस्माच्च यत्कार्यमुत्पद्यत इति शेषः। यतश्च प्रकृतिपुरुषसंयोगाद्भवति। यदिति यैः स्तावरजंगमादिभेदैर्भिन्नमिति त्वाचार्यैर्यच्चेत्यस्मिन्नुक्तस्य यत्पदार्थस्यान्तर्भावाद्यत्पदवैयर्थ्यमभिप्रेत्य न व्याख्यातम्। अत्र चकाराः सर्वे समुच्चायार्थाः। सच क्षेत्रज्ञो यः निर्दिष्टः स्वरुपतः सच्चिदानन्दस्वभावः यत्प्रभावाः प्रभावा शक्तयो यस्य स तद्यथोक्तविशेषणविशिष्टक्षेत्रज्ञयाथात्म्यं समासेन संक्षेपेण मे मम वाक्यात् श्रृणु श्रुत्वाऽवधारयेत्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
tatthat
kṣhetramfield of activities
yatwhat
chaand
yādṛikits nature
chaand
yatvikāri
yataḥfrom what
chaalso
yatwhat
saḥhe
chaalso
yaḥwho
yatprabhāvaḥ
chaand
tatthat
samāsenain summary
mefrom me
śhṛiṇulisten
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.3
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! तू सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ मेरेको ही समझ; और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरे मतमें ज्ञान है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.5
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्िचतैः

(यह क्षेत्रक्षेत्रज्ञका तत्त्व) ऋषियोंके द्वारा बहुत विस्तारसे कहा गया है तथा वेदोंकी ऋचाओं-द्वारा बहुत प्रकारसे कहा गया है और युक्तियुक्त एवं निश्चित किये हुए ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा भी कहा गया है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 4
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 4
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्।स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु

वह क्षेत्र जो है, जैसा है, जिन विकारोंवाला है और जिससे जो पैदा हुआ है; तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाववाला है, वह सब संक्षेपमें मेरेसे सुन। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 4 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 4 का हिंदी अर्थ: "वह क्षेत्र जो है, जैसा है, जिन विकारोंवाला है और जिससे जो पैदा हुआ है; तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाववाला है, वह सब संक्षेपमें मेरेसे सुन। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 4?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 4 translates to: "Hear from Me in brief what the field is, of what nature it is, what its modifications are, whence it is, who He is, and what His powers are. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्।स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 4 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। वह क्षेत्र जो है, जैसा है, जिन विकारोंवाला है और जिससे जो पैदा हुआ है; तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाववाला है, वह सब संक्षेपमें मेरेसे सुन। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "tat kṣhetraṁ yach cha yādṛik cha yad-vikāri yataśh cha yat" mean in English?

"tat kṣhetraṁ yach cha yādṛik cha yad-vikāri yataśh cha yat" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 4. Hear from Me in brief what the field is, of what nature it is, what its modifications are, whence it is, who He is, and what His powers are. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.