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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 25
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे

कई मनुष्य ध्यानयोगके द्वारा, कई सांख्ययोगके द्वारा और कई कर्मयोगके द्वारा अपने-आपसे अपने-आपमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

MalayalamIND

ചിലർ ധ്യാനത്തിലൂടെയും മറ്റുചിലർ അറിവിൻ്റെ യോഗയിലൂടെയും മറ്റുചിലർ കർമ്മയോഗത്തിലൂടെയും തങ്ങളിലുള്ള ആത്മാവിനെ കാണുന്നു.

SindhiIND

ڪي مراقبي ذريعي پاڻ کي پنهنجي اندر ۾ ڏسن ٿا، ٻيا علم جي يوگا ذريعي، ۽ ٻيا وري عمل جي يوگا ذريعي.

PunjabiIND

ਕੁਝ ਸਿਮਰਨ ਦੁਆਰਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਵੇਖਦੇ ਹਨ, ਕੁਝ ਗਿਆਨ ਦੇ ਯੋਗ ਦੁਆਰਾ, ਅਤੇ ਕੁਝ ਹੋਰ ਕਰਮ ਯੋਗ ਦੁਆਰਾ।

TamilIND

சிலர் தியானத்தின் மூலம் தங்களுக்குள்ளேயே சுயத்தை காண்கிறார்கள், மற்றவர்கள் அறிவின் யோகத்தின் மூலம், இன்னும் சிலர் செயல் யோகத்தின் மூலம்.

KannadaIND

ಕೆಲವರು ಧ್ಯಾನದ ಮೂಲಕ ತಮ್ಮೊಳಗಿನ ಆತ್ಮವನ್ನು ನೋಡುತ್ತಾರೆ, ಇತರರು ಜ್ಞಾನದ ಯೋಗದ ಮೂಲಕ ಮತ್ತು ಇನ್ನೂ ಕೆಲವರು ಕ್ರಿಯೆಯ ಯೋಗದ ಮೂಲಕ.

TeluguIND

కొందరు ధ్యానం ద్వారా, మరికొందరు జ్ఞాన యోగం ద్వారా, మరికొందరు కార్య యోగం ద్వారా తమలోని ఆత్మను చూసుకుంటారు.

MarathiIND

काहींना ध्यानाद्वारे, काहींना ज्ञान योगाद्वारे, तर काहीजण कृतीयोगाद्वारे स्वतःला स्वतःमध्ये पाहतात.

GujaratiIND

કેટલાક ધ્યાન દ્વારા, કેટલાક જ્ઞાનના યોગ દ્વારા અને અન્ય લોકો ક્રિયાના યોગ દ્વારા સ્વયંને પોતાની અંદર જુએ છે.

NepaliIND

कोही ध्यानद्वारा, कोही ज्ञान योगद्वारा, र कोही कर्मयोगद्वारा स्वयंलाई देख्छन्।

BengaliIND

কেউ ধ্যানের মাধ্যমে নিজের মধ্যে আত্মাকে দেখেন, কেউ জ্ঞান যোগের মাধ্যমে, আবার কেউ কর্ম যোগের মাধ্যমে।

KonkaniIND

कांय जाण ध्यानावरवीं, कांय जाण गिन्यानाच्या योगान आनी कांय जाण कर्मयोगावरवीं आत्म्याक पळयतात.

BhojpuriIND

केहू ध्यान के माध्यम से आत्म के अपना भीतर देखेला, केहू ज्ञान के योग के माध्यम से आ तबो कुछ कर्म के योग के माध्यम से।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना -- पाँचवें अध्यायके सत्ताईसवेंअट्ठाईसवें श्लोकोंमें छठे अध्यायके दसवेंसे अट्ठाईसवें श्लोकतक और आठवें अध्यायके आठवेंसे चौदहवें श्लोकतक जो सगुणसाकार? निर्गुणनिराकार आदिके ध्यानका वर्णन हुआ है? उस ध्यानमें जिसकी जैसी रुचि? श्रद्धाविश्वास और योग्यता है? उसके अनुसार ध्यान करके कई साधक अपनेआपसे अपनेमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं।जो सम्बन्धविच्छेद प्रकृति और पुरुषको अलगअलग जाननेसे होता है? वह सम्बन्धविच्छेद ध्यानसे भी होता है। ध्यान न तो चित्तकी मूढ़ वृत्तिमें होता है और न क्षिप्त वृत्तिमें होता है। ध्यान विक्षिप्त वृत्तिमें आरम्भ होता है। चित्त जब स्वरूपमें एकाग्र हो जाता है? तब समाधि हो जाती है। एकाग्र होनेपर चित्त निरुद्ध हो जाता है। इस तरह जिस अवस्थामें चित्त निरुद्ध हो जाता है। उस अवस्थामें चित्त संसार? शरीर? वृत्ति? चिन्तन आदिसे भी उपरत हो जाता है। उस समय ध्यानयोगी अपनेआपसे अपनेआपमें अपना अनुभव करके सन्तुष्ट हो जाता है (गीता 6। 19 20)।अन्ये सांख्येन योगेन -- दूसरे अध्यायके ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक चौथे अध्यायके तैंतीसवेंसे उन्तालीसवें श्लोकतक पाँचवें अध्यायके आठवें? नवें तथा तेरहवेंसे छब्बीसवें श्लोकतक और बारहवें अध्यायके चौथेपाँचवें आदि श्लोकोंमें कहे हुए सांख्ययोगके द्वारा कई साधक अपनेआपसे अपनेमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं।सांख्ययोग नाम है विवेकका। उस विवेकके द्वारा सत्असत्का निर्णय हो जाता है कि सत् नित्य है? सर्वव्यापक है? स्थिर स्वभाववाला है? अचल है? अव्यक्त है? अचिन्त्य है और असत् चल है? अनित्य है? विकारी है? परिवर्तनशील है। ऐसे विवेकविचारसे सांख्ययोगी प्रकृति और उसके कार्यसे बिलकुल अलग हो जाता है और अपनेआपसे अपनेआपमें परमात्मतत्त्वका अनुभव कर लेता है।कर्मयोगेन चापरे -- दूसरे अध्यायके सैंतालीसवेंसे तिरपनवें श्लोकतक तीसरे अध्यायके सातवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक चौथे अध्यायके सोलहवेंसे बत्तीसवें श्लोकतक पाँचवें अध्यायके छठेसातवें आदि श्लोकोंमें कहे हुए कर्मयोगके द्वारा कई साधक अपनेआपसे अपनेमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं।जो सम्बन्धविच्छेद प्रकृति और पुरुषको अलगअलग जाननेसे होता है? वह सम्बन्धविच्छेद कर्मयोगसे भी होता है। कर्मयोगी जो कुछ भी करे? वह केवल संसारके हितके लिये ही करे। यज्ञ? दान? तप? तीर्थ? व्रत आदि जो कुछ भी करे? वह सब मात्र प्राणियोंके कल्याणके लिये ही करे? अपने लिये नहीं। ऐसा करनेसे स्वयंका उन क्रियाओंसे? पदार्थ? शरीर आदिसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है और अपनेआपसे अपनेमें परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।मनुष्यने स्वाभाविक ही अपनेमें देहको स्वीकार किया है? माना है। इस मान्यताको दूर करनेके लिये अपनेमें,परमात्माको देखना अर्थात् देहकी जगह अपनेमें परमात्माको मानना बहुत आवश्यक है।अपनेमें परमात्माको देखना करणनिरपेक्ष होता है। करणसापेक्ष ज्ञान प्रकृतिके सम्बन्धसे होता है। इसलिये साधक किसी करणके द्वारा परमात्मामें स्थित नहीं होता? प्रत्युत स्वयं ही स्थित होता है स्वयंकी परमात्मामें स्थिति किसी करणके द्वारा हो ही नहीं सकती।

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Sri Harikrishnadas Goenka

यहाँ आत्मदर्शनके विषयमें ये ध्यान आदि भिन्नभिन्न साधन विकल्पसे कहे जाते हैं --, शब्दादि विषयोंसे श्रोत्रादि इन्द्रियोंको हटाकर उनका मनमें निरोध करके और मनको अन्तरात्मामें ( निरोध करके ) जो एकाग्रभावसे चिन्तन करते रहना है? उसका नाम ध्यान है। तथा जैसे बगुला ध्यान करता है जैसे पृथिवी ध्यान करती है जैसे पर्वत ध्यान करते हैं इत्यादि उपमा दी जानेके कारण तैलधाराकी भाँति निरन्तर अविच्छिन्नभावसे चिन्तन करनेका नाम ध्यान है? उस ध्यानद्वारा कितने ही योगीलोग आत्मामें -- बुद्धिमें? आत्माको यानी प्रत्यक्चेतनको आत्मासे -- ध्यानाभ्यासद्वारा शुद्ध हुए अन्तःकरणसे -- देखते हैं। अन्य कई योगीजन सांख्ययोगके द्वारा ( देखते हैं ) -- सत्त्व? रज और तम -- ये तीनों गुण मुझसे देखे जानेवाले हैं और मैं उनसे भिन्न उनके व्यापारका साक्षी? उन गुणोंसे विलक्षण और नित्य ( चेतन ) आत्मा हूँ इस प्रकारके चिन्तनका नाम सांख्य है? यही योग है? ऐसे सांख्ययोगके द्वारा -- आत्मामें आत्माको देखते हैं। तथा अपर योगीजन कर्मयोगके द्वारा -- ईश्वरार्पणबुद्धिसे अनुष्ठान की हुई चेष्टाका नाम कर्म है? वही योगका साधन होनेके कारण गौणरूपसे योग कहा जाता है? उस कर्मयोगके द्वारा -- अन्तःकरणकी शुद्धि और,ज्ञानप्राप्तिके क्रमसे? ( आत्मामें आत्माको देखते हैं )।

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Sri Anandgiri

अधमतमानधिकारिणो मोक्षमार्गे प्रवृत्तिं प्रतिलम्भयति -- अन्ये त्विति। आचार्याधीनां श्रुतिमेवाभिनयति -- इदमिति। उपासनमेव विवृणोति -- श्रद्दधाना इति। परोपदेशात्प्रवृत्तानामपि प्रवृत्तेः,साफल्यमाह -- तेऽपीति। तेषां मुख्याधिकारित्वं व्यावर्तयति -- श्रुतीति। तेऽपीत्यपिना सूचितमर्थमाह -- किमिति।

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Sri Dhanpati

एवं तत्त्वंपदार्थौ संशोध्य प्रतिपादितमिदानीमात्मदर्शनोपायविकल्पान्यथाधिकारं प्रतिपादयति -- ध्यानेनेति। केचिदुत्तमाधिकारिणो योगिनः एतज्जन्मनि जन्मान्तरे वा कृताभ्यां श्रवणममनाभ्यामसंभावनादिदोषनिर्मुक्ताः शब्दादिविषयेभ्यः श्रोत्रादीनि करणानि मनस्युपसंहृत्य मनश्च पत्गात्मन्येकाग्रं विधाय तैलधारावत्संतताविच्छिन्नप्रत्ययेन निदिध्यासनापरपर्यायेण ध्यानेनात्मनि बुद्धौ आत्मानं प्रत्यक्वेतनमात्मना ध्यानसंस्कृतेनान्तःकरणेन पश्यन्ति साक्षात्कुर्वन्ति। आत्मनि देहे इति व्याख्याने तूक्तार्थापेक्षया सामञ्जस्यं चिन्त्यम्। अन्ये मध्यमाधिकारिणः। श्रवणमननपरायणा इमे सत्त्वरजस्तमांसि गुणाः सविकाराः अनात्मानं मिथ्याभूतास्तद्य्वापारसाक्षिभूतोऽपिणामी नित्यो गुणविलक्षणो विभुः सच्चिदानन्दघन आत्मेति वेदान्तविचारजन्येन चिन्तनात्मकेन सांख्येन योगेन ध्यानोत्पत्तिद्वारा आत्मन्यात्मानमात्मना पश्यन्तीति पूर्ववत्। अपरे मन्दाधिकारिणः कर्मैव योगार्थत्वगुणेन योगस्तेन कर्मयोगेन ईश्वरार्पणबुद्य्धानुष्ठीयमानेन सत्त्वशुद्धश्रवणमननध्यानापरोक्षज्ञानोत्पत्तिद्वारेणात्मन्यात्मानमात्मना पश्यन्तीति पूर्ववत्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
dhyānenathrough meditation
ātmaniwithin one’s heart
paśhyantipercieve
kechitsome
ātmānamthe Supreme soul
ātmanāby the mind
anyeothers
sānkhyenathrough cultivation of knowledge
yogenathe yog system
karmayogena
chaand
apareothers
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.24
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह। सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते

इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य अलग-अलग जानता है, वह सब तरहका बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.26
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते।तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः

दूसरे मनुष्य इस प्रकार (ध्यानयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग, आदि साधनोंको) नहीं जानते, केवल (जीवन्मुक्त महापुरुषोंसे) सुनकर उपासना करते हैं, ऐसे वे सुननेके परायण मनुष्य भी मृत्युको तर जाते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 25
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 25
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे

कई मनुष्य ध्यानयोगके द्वारा, कई सांख्ययोगके द्वारा और कई कर्मयोगके द्वारा अपने-आपसे अपने-आपमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 25 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 25 का हिंदी अर्थ: "कई मनुष्य ध्यानयोगके द्वारा, कई सांख्ययोगके द्वारा और कई कर्मयोगके द्वारा अपने-आपसे अपने-आपमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 25?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 25 translates to: "Some behold the Self within themselves through meditation, others through the Yoga of knowledge, and still others through the Yoga of action. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 25 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। कई मनुष्य ध्यानयोगके द्वारा, कई सांख्ययोगके द्वारा और कई कर्मयोगके द्वारा अपने-आपसे अपने-आपमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "dhyānenātmani paśhyanti kechid ātmānam ātmanā" mean in English?

"dhyānenātmani paśhyanti kechid ātmānam ātmanā" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 25. Some behold the Self within themselves through meditation, others through the Yoga of knowledge, and still others through the Yoga of action. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.