Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 24
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह। सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते

इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य अलग-अलग जानता है, वह सब तरहका बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

SindhiIND

جيڪو اهڙيءَ طرح روح ۽ مادو کي انهن جي خوبين سان گڏ ڄاڻي ٿو، هو ڪهڙي به حالت ۾ هجي، هو وري پيدا نه ٿيو آهي.

MarathiIND

अशा प्रकारे जो आत्मा आणि पदार्थ यांना त्यांच्या गुणांसह जाणतो, तो कोणत्याही स्थितीत असो, त्याचा पुनर्जन्म होत नाही.

MalayalamIND

ഇപ്രകാരം ആത്മാവിനെയും ദ്രവ്യത്തെയും അവയുടെ ഗുണങ്ങളോടുകൂടി അറിയുന്നവൻ ഏതു അവസ്ഥയിലായാലും പുനർജനിക്കുന്നില്ല.

PunjabiIND

ਉਹ ਜੋ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਆਤਮਾ ਅਤੇ ਪਦਾਰਥ ਨੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਗੁਣਾਂ ਸਮੇਤ ਜਾਣਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਭਾਵੇਂ ਕਿਸੇ ਵੀ ਸਥਿਤੀ ਵਿੱਚ ਹੋਵੇ, ਉਹ ਦੁਬਾਰਾ ਜਨਮ ਨਹੀਂ ਲੈਂਦਾ।

BengaliIND

যে এইভাবে আত্মা এবং বস্তুকে তাদের গুণাবলী সহ একত্রে জানে, সে যে অবস্থায়ই থাকুক না কেন, তার পুনর্জন্ম হয় না।

GujaratiIND

જે આ રીતે આત્મા અને દ્રવ્યને તેમના ગુણો સાથે જાણે છે, તે ગમે તે સ્થિતિમાં હોય, તેનો પુનર્જન્મ થતો નથી.

KannadaIND

ಈ ರೀತಿ ಚೈತನ್ಯ ಮತ್ತು ವಸ್ತುವನ್ನು ಅವರ ಗುಣಗಳೊಂದಿಗೆ ತಿಳಿದಿರುವವನು, ಅವನು ಯಾವುದೇ ಸ್ಥಿತಿಯಲ್ಲಿರಲಿ, ಅವನು ಮರುಜನ್ಮ ಪಡೆಯುವುದಿಲ್ಲ.

TamilIND

இவ்வாறு ஆன்மாவையும் பொருளையும் அவற்றின் குணங்களோடு அறிபவன் எத்தகைய நிலையில் இருந்தாலும் அவன் மீண்டும் பிறப்பதில்லை.

NepaliIND

जसले यस प्रकार आत्मा र पदार्थलाई तिनीहरूका गुणहरू सहित जान्दछ, ऊ जस्तोसुकै अवस्थामा भए पनि, उसको पुनर्जन्म हुँदैन।

TeluguIND

ఈ విధంగా ఆత్మను మరియు పదార్థాన్ని వాటి గుణాలతో కలిపి తెలుసుకున్నవాడు, అతను ఏ స్థితిలో ఉన్నా, అతను పునర్జన్మ పొందడు.

OdiaIND

ଯିଏ ଏହିପରି ଭାବରେ ଆତ୍ମା ​​ଏବଂ ବିଷୟକୁ ସେମାନଙ୍କ ଗୁଣ ସହିତ ଜାଣେ, ସେ ଯେକ condition ଣସି ଅବସ୍ଥାରେ ଥାଆନ୍ତି, ସେ ପୁନର୍ବାର ଜନ୍ମ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ |

BhojpuriIND

जे एह तरह से आत्मा आ पदार्थ के गुण के साथे जानत बा, चाहे ऊ कवनो हालत में होखे, ओकर पुनर्जन्म ना होला।

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- य एवं वेत्ति ৷৷. न स भूयोऽभिजायते -- पूर्वश्लोकमें देहेऽस्मिन् पुरुषः परः पदोंसे पुरुषको देहसे पर अर्थात् सम्बन्धरहित कहा है? उसीको यहाँ एवम् पदसे कहते हैं कि जो साधक इस तरह पुरुषको देहसे? प्रकृतिसे पर अर्थात् सम्बन्धरहित जान लेता है तथा विकार? कार्य? करण? विषय आदि रूपसे जो कुछ भी संसार दीखता है? वह सब प्रकृति और उसके गुणोंका कार्य है -- ऐसा यथार्थरूपसे जान लेता है? वह फिर वर्ण? आश्रम? परिस्थिति आदिके अनुसार प्राप्त कर्तव्यकर्मको करता हुआ भी पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता। कारण कि जन्म होनेमें गुणोंका सङ्ग ही कारण है (गीता 13। 21)।यहाँ सर्वथा वर्तमानोऽपि पदोंमें निषिद्ध आचरण नहीं लेना चाहिये क्योंकि जो अपनेको देहके सम्बन्धसे रहित अनुभव करता है और गुणोंके सहित प्रकृतिको अपनेसे अलग अनुभव करता है? उसमें असत् वस्तुओंकी कामना पैदा हो ही नहीं सकती। कामना न होनेसे उसके द्वारा निषिद्ध आचरण होना असम्भव है क्योंकि निषिद्ध आचरणके होनेमें कामना ही हेतु है (गीता 3। 37)।भगवान् यहाँ साधकको अपना वास्तविक स्वरूप जाननेके लिये सावधान करते हैं? जिससे वह अच्छी प्रकार,जान ले कि स्वरूपमें वस्तुतः कोई भी क्रिया नहीं है। अतः वह किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं है और कर्ता न होनेके कारण वह भोक्ता भी नहीं होता। साधक जब अपनेआपको अकर्ता जान लेता है? तब उसका कर्तापनका अभिमान स्वतः नष्ट हो जाता है और उसमें क्रियाकी फलासक्ति भी नहीं रहती। फिर भी उसके द्वारा शास्त्रविहित क्रियाएँ स्वतः होती रहती हैं। गुणातीत होनेके कारण वह पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जन्मरहित होनेमें प्रकृतिपुरुषको यथार्थ जानना कारण बताया। अब यह जिज्ञासा होती है कि क्या जन्ममरणसे रहित होनेका और भी कोई उपाय है इसपर भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें चार साधन बताते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

इस प्रकार उस उपर्युक्त लक्षणोंसे युक्त आत्माको --, उस पुरुषको जो मनुष्य उपर्युक्त प्रकारसे अर्थात् साक्षात् आत्मभावसे कि यही मैं हूँ इस प्रकार जानता है और उपर्युक्त अविद्यारूप प्रकृतिको भी? अपने विकाररूप गुणोंके सहित? विद्याद्वारा निवृत्त की हुई -- अभावको प्राप्त की हुई जानता है। वह सब प्रकारसे बर्तता हुआ भी? इस विद्वत्शरीरके नाश होनेपर फिर दूसरे शरीरमें जन्म नहीं लेता अर्थात् दूसरे शरीरको ग्रहण नहीं करता। अपि शब्दसे यह अभिप्राय है कि अपने वर्णाश्रमधर्मके अनुकूल बर्तनेवाला पुनः उत्पन्न नहीं होता? इसमें तो कहना ही क्या है पू0 -- यद्यपि ज्ञान उत्पन्न होनेके पश्चात् पुनर्जन्मका अभाव बतलाया गया है? तथापि ज्ञान उत्पन्न होनेसे पहले किये हुए? ज्ञानोत्पत्तिके पश्चात् किये जानेवाले और अनेक भूतपूर्व जन्मोंमें किये हुए जो कर्म हैं? फल प्रदान किये बिना उनका नाश मानना युक्तियुक्त नहीं है? अतः ( ज्ञान प्राप्त होनेके बाद भी ) तीन जन्म और होने चाहिये। अभिप्राय यह है कि सभी कर्म समान हैं? उनमें कोई भेद प्रतीत नहीं होता? अतः फल देनेके लिये प्रवृत्त हुए जन्मारम्भ करनेवाले प्रारब्ध कर्मोंके समान ही किये हुए अन्य कर्मोंका भी ( बिना फल दिये ) नाश ( मानना ) उचित नहीं? सुतरां तीनों प्रकारके कर्म तीन जन्मोंका आरम्भ करेंगे अथवा सब मिलकर एक जन्मका ही आरम्भ करेंगे ( ऐसा मानना चाहिये )। नहीं तो किये हुए कर्मोंका ( बिना फल दिये ) नाश माननेसे? सर्वत्र अविश्वासका प्रसंग आ जायगा और शास्त्रकी व्यर्थता सिद्ध हो जायगी। अतः यह कहना कि वह फिर जन्म नहीं लेता ठीक नहीं है। उ0 -- यह बात नहीं क्योंकि इसके समस्त कर्म क्षय हो जाते हैं ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्म ही हो जाता है उसके ( मोक्षमें ) तभीतककी देर है अग्निमें तृणके अग्रभागकी भाँति उसके समस्त कर्म भस्म हो जाते हैं इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंद्वारा विद्वान्के सब कर्मोंका दाह होना कहा गया है। यहाँ गीताशास्त्रमें भी यथैधांसि इत्यादि श्लोकमें समस्त कर्मोंका दाह कहा गया है और आगे भी कहेंगे। युक्तिसे भी यही बात सिद्ध होती है क्योंकि अविद्या? कामना आदि क्लेशरूप बीजोंसे युक्त हुए ही कारणरूप कर्म अन्य जन्मरूप अंकुरका आरम्भ किया करते हैं। यहाँ गीताशास्त्रमें भी भगवान्ने जगहजगह कहा है कि अहंकार और फलाकाङ्क्षायुक्त कर्म ही फलका आरम्भ करनेवाले होते हैं? अन्य नहीं। तथा जैसे अग्निमें दग्ध हुए बीज फिर नहीं उगते? वैसे ही ज्ञानसे दग्ध हुए क्लेशोंद्वारा आत्मा पुनः शरीर,ग्रहण नहीं करता ऐसा भी ( शास्त्रोंका वचन है )। पू0 -- ज्ञान होनेके पश्चात् किये हुए कर्मोंका ज्ञानद्वारा दाह हो सकता है क्योंकि वे ज्ञानके साथ होते हैं। परंतु इस जन्ममें ज्ञान उत्पन्न होनेसे पहले किये हुए और भूतपूर्व अनेक जन्मोंमें किये हुए कर्मोंका? ज्ञानद्वारा नाश मानना उचित नहीं। उ0 -- यह कहना ठीक नहीं क्योंकि सारे कर्म ( दग्ध हो जाते हैं ) ऐसा विशेषण दिया गया है। पू0 -- यदि ऐसा मानें कि ज्ञानके पश्चात् होनेवाले सब कर्मोंका ही ( ज्ञानद्वारा दाह होता है तो ) उ0 -- यह बात नहीं है। क्योंकि ( इस प्रकारके ) संकोचका ( कोई ) कारण नहीं सिद्ध होता। तुमने जो कहा कि जैसे ज्ञान हो जानेपर भी? वर्तमान जन्मका आरम्भ करनेवाले? फल देनेके लिये प्रवृत्त हुए प्रारब्धकर्म नष्ट नहीं होते? वैसे ही जिनका फल आरम्भ नहीं हुआ है? उन कर्मोंका भी नाश ( मानना ) युक्तियुक्त नहीं है? सो ऐसा कहना भी ठीक नहीं। क्योंकि वे प्रारब्ध कर्म छोड़े हुए बाणकी भाँति फल देनेके लिये प्रवृत्त हो चुके हैं? इसलिये ( उनका फल अवश्य होता है? पर अन्यका नहीं )। जैसे पहले लक्ष्यका वेध करनेके लिये धनुषसे छोड़ा हुआ बाण? लक्ष्यवेध हो जानेके पश्चात् ही आरम्भ हुए वेगका नाश होनेपर गिरकर ही शान्त होता है? वैसे ही शरीरका आरम्भ करनेवाले प्रारब्ध कर्म भी? शरीरस्थितिरूप प्रयोजनके निवृत्त हो जानेपर भी? जबतक संस्कारोंका वेग क्षय नहीं हो जाता? तबतक पहलेकी भाँति बर्तते ही रहते हैं। वही बाण? जिसका प्रवृत्तिके लिये वेग आरम्भ नहीं हुआ है -- जो छोड़ा नहीं गया है? यदि धनुषपर चढ़ा भी लिया गया हो तो भी उसको रोका जा सकता है? वैसे ही जिन कर्मोंके फलका आरम्भ नहीं हुआ है? वे अपने आश्रयमें स्थित हुए ही ज्ञानद्वारा निर्बीज किये जा सकते हैं। अतः इस विद्वत्शरीरके गिरनेके पीछे वह फिर उत्पन्न नहीं होता यह कहना उचित ही है? यह बात सिद्ध हुई।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

ज्ञेयं यत्तदित्यादिना तत्पदार्थस्त्वंपदार्थश्चानन्तरमेव शोधितौ तयोरैक्यं चक्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि इत्युक्तमिदानीं तद्दृष्टिहेतून्यथाधिकारं कथयति -- अत्रेति। ध्यानाख्यं साधनं किंरूपमिति पृच्छति -- ध्यानं नामेति। तद्रूपं वदन्नुत्तरमाह -- शब्दादिभ्य इति। एकाग्रतयोपसंहृत्येति संबन्धः। यच्चिन्तनं प्रत्यक्चेतयितरीति पूर्वेणान्वयः। किं तच्चिन्तनमित्युक्ते दृष्टान्तद्वारा श्रुत्यवष्टम्भेन ध्यानं प्रपञ्चयति -- तथेति। विवक्षितध्यानानुरोधेनेति यावत्? आत्मानं पश्यन्ति परमात्मतयेति शेषः। केचिदित्युत्तमाधिकारिणो गृह्यन्ते। मध्यमाधिकारिणो निर्दिशति -- अन्य इति। सांख्यशब्दितं साधनं किं नामेत्युक्ते विचारजन्यं ज्ञानं तदेव ज्ञानं,हेतुतया योगतुल्यत्वाद्योगशब्दितमित्याह -- सांख्यमिति। अधमानधिकारिणः संगिरते -- कर्मेति। चित्तैकाग्र्यं योगस्तादर्थ्यं कर्मणः शुद्धिहेतोरस्ति तेन गौण्या वृत्त्या योगशब्दितं कर्मेत्याह -- गुणत इति। अपरे पश्यन्त्यात्मानमात्मनेति पूर्ववदनुषङ्गमङ्गीकृत्याह -- तेनेति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

क्षेत्रज्ञं तापि मां विद्वीत्युपन्यस्तमात्मतत्त्वं व्याख्यायोपसंहृतमिदानीं शुद्धार्थयोरैक्यरुपात्मतत्त्वस्य प्रागुक्तस्य ज्ञानं फलोक्त्या स्तौति -- यइति। एवं यथोक्तेन प्रकारेण पुरुषं जीवेश्वरादिसर्वकल्पनाधिष्ठानं यो वेत्ति उक्तलक्षणः पुरुषोऽहमिति साक्षाज्जानाति प्रकृतिं चानद्यनिर्वाच्यां सर्वानर्थोपाधिभूतां गुणैः स्वविकारैः सह प्रागुक्तैकत्वगोचरया विद्यया।ञभावमापादितां यो वेत्तीति संबन्धः। स सर्वथा वर्णाश्रमधर्मानुल्लङ्घ्य प्रवर्तमानोऽपि भूयः पुनः पतितेऽस्मिञशरीरे देहान्तराय न जायते नोत्पद्यते। आवर्तमानो जन्मालावनपि सर्वथा भूयो नाभिजायत इति कल्पना तु भाष्यबहिर्भूता नादर्तव्या। आवर्तमान इत्याद्युक्तेः फलाभावात्।क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरेब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवतितस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येइषीकातूलवच्च सर्वकर्माणि प्रदह्यन्ते?यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्मस्मसात्कुरुतेऽर्जुने। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथाबीजान्यग्नयुपदग्धानि न रोहन्ति यथा पुनः। ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैर्नात्मा संपद्यते पुनः।।अविद्याकामक्लेशबीजनिमित्तानां फलारम्भकाणां जन्मान्तराङ्कुरारम्भसामर्थ्यवतां कर्मणां ज्ञानग्मिनोक्तबीजदाहे सति जन्माङ्करारम्भसामर्थ्य न घटते इति श्रुतिस्मृतियुक्तभिरुक्तम्। विदुषो जन्माभावमभिप्रेत्य भगवतोक्तं न स भूयोभिजायत इति। एतेन ज्ञानोत्पत्तेः प्राक्कृतानां कर्मणामुत्तरकालभाविनामति क्रान्तोनेकजन्मकृतानां च फलमदत्त्वा प्रारब्धकर्मवन्नाशो न युक्तः।नाभूक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि इत्यादिवचनात्। तस्मान्त्रिप्रकाराण्यपि कर्माणि त्रीणि जन्मामि संहतानि वा सर्वाण्येकं जन्मारभेरन्। अन्यथा कृतविप्रणाशे सर्वत्रानाश्वासप्रशङ्गः शास्त्रानर्थक्यं च स्यादीति शङ्का प्रत्युक्ता। सर्वकर्माणीति विशेषणात्। सर्वेषां कर्मणां दाहस्य वक्तुं युक्तत्वात्। ननु ज्ञानोत्पत्त्युत्तरकालकृतानां सर्वकर्मणां ज्ञानसहभावित्वात्तेन दाहोऽस्तु नत्वन्येषाम्। तथाच न विशेषणवैयर्थ्यमिति चेन्न। संकोचे मानाभावात्। प्रारब्धकर्मणां मुक्तेषुवत्प्रवृत्तफलत्वात्तत्साम्यमनारब्धवेगेषुवदन्येषां कर्मणां न युज्यत इत्यतः पतितेऽस्मिन्विद्वच्छरीरे न स भूयोभिजायत इति युक्तमेवोक्तमिति सिद्धम्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yaḥwho
evamthus
vettiunderstand
puruṣhamPuruṣh
prakṛitimthe material nature
chaand
guṇaiḥthe three modes of nature
sahawith
sarvathāin every way
vartamānaḥsituated
apialthough
nanot
saḥthey
bhūyaḥagain
abhijāyatetake birth
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.23
उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः

यह पुरुष प्रकृति-(शरीर-) के साथ सम्बन्ध रखनेसे 'उपद्रष्टा', उसके साथ मिलकर सम्मति, अनुमति देनेसे 'अनुमन्ता', अपनेको उसका भरणपोषण करनेवाला माननेसे 'भर्ता', उसके सङ्गसे सुखदुःख भोगनेसे 'भोक्ता', और अपनेको उसका स्वामी माननेसे 'महेश्वर' बन जाता है। परन्तु स्वरूपसे यह पुरुष 'परमात्मा' कहा जाता है। यह देहमें रहता हुआ भी देहसे पर (सम्बन्ध-रहित) ही है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.25
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे

कई मनुष्य ध्यानयोगके द्वारा, कई सांख्ययोगके द्वारा और कई कर्मयोगके द्वारा अपने-आपसे अपने-आपमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 24
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 24
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह। सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते

इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य अलग-अलग जानता है, वह सब तरहका बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 24 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 24 का हिंदी अर्थ: "इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य अलग-अलग जानता है, वह सब तरहका बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 24?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 24 translates to: "He who thus knows the Spirit and Matter together with their qualities, in whatever condition he may be, he is not reborn. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह। सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 24 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य अलग-अलग जानता है, वह सब तरहका बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "ya evaṁ vetti puruṣhaṁ prakṛitiṁ cha guṇaiḥ saha" mean in English?

"ya evaṁ vetti puruṣhaṁ prakṛitiṁ cha guṇaiḥ saha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 24. He who thus knows the Spirit and Matter together with their qualities, in whatever condition he may be, he is not reborn. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.