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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 23
उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः

यह पुरुष प्रकृति-(शरीर-) के साथ सम्बन्ध रखनेसे 'उपद्रष्टा', उसके साथ मिलकर सम्मति, अनुमति देनेसे 'अनुमन्ता', अपनेको उसका भरणपोषण करनेवाला माननेसे 'भर्ता', उसके सङ्गसे सुखदुःख भोगनेसे 'भोक्ता', और अपनेको उसका स्वामी माननेसे 'महेश्वर' बन जाता है। परन्तु स्वरूपसे यह पुरुष 'परमात्मा' कहा जाता है। यह देहमें रहता हुआ भी देहसे पर (सम्बन्ध-रहित) ही है। — VaniSagar

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TeluguIND

ఈ శరీరంలోని పరమాత్మను పరిశీలకుడు, అనుమతించేవాడు, పోషించేవాడు, ఆనందించేవాడు, గొప్ప భగవంతుడు మరియు పరమాత్మ అని కూడా అంటారు.

MalayalamIND

ഈ ശരീരത്തിലെ പരമാത്മാവിനെ നിരീക്ഷകൻ, അനുവാദം നൽകുന്നവൻ, പരിപാലിക്കുന്നവൻ, ആസ്വാദകൻ, മഹാനായ ഭഗവാൻ, പരമാത്മാവ് എന്നും വിളിക്കുന്നു.

TamilIND

இந்த சரீரத்தில் உள்ள பரமாத்மாவானவர் பார்ப்பவர், அனுமதிப்பவர், பேணுபவர், அனுபவிப்பவர், மஹா பகவான், பரம சுயம் என்றும் அழைக்கப்படுகிறார்.

GujaratiIND

આ શરીરમાં રહેલા પરમાત્માને નિરીક્ષક, અનુમતિ આપનાર, પાલનહાર, ભોગવનાર, મહાન ભગવાન અને પરમ આત્મા પણ કહેવામાં આવે છે.

MarathiIND

या शरीरातील परमात्म्याला प्रेक्षक, परवानगी देणारा, पालनकर्ता, उपभोगकर्ता, महान भगवान आणि परम आत्मा असेही म्हणतात.

KannadaIND

ಈ ದೇಹದಲ್ಲಿರುವ ಪರಮಾತ್ಮನನ್ನು ವೀಕ್ಷಕ, ಅನುಮತಿಸುವವನು, ಪೋಷಕ, ಆನಂದದಾಯಕ, ಮಹಾನ್ ಭಗವಂತ ಮತ್ತು ಪರಮಾತ್ಮ ಎಂದೂ ಕರೆಯಲಾಗುತ್ತದೆ.

SindhiIND

هن جسم ۾ موجود روح کي نگهبان، اجازت ڏيندڙ، پاليندڙ، لطف وٺندڙ، عظيم رب ۽ خود اعليٰ نفس به سڏيو ويندو آهي.

PunjabiIND

ਇਸ ਸਰੀਰ ਵਿਚਲੀ ਪਰਮ ਆਤਮਾ ਨੂੰ ਦੇਖਣ ਵਾਲਾ, ਆਗਿਆ ਦੇਣ ਵਾਲਾ, ਪਾਲਣ ਵਾਲਾ, ਭੋਗਣ ਵਾਲਾ, ਮਹਾਨ ਪ੍ਰਭੂ ਅਤੇ ਪਰਮ ਆਤਮ ਵੀ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

NepaliIND

यस शरीरमा परमात्मालाई प्रेक्षक, अनुज्ञप्ति, पालनकर्ता, भोगकर्ता, महान भगवान र परमात्मा पनि भनिन्छ।

BengaliIND

এই দেহের পরমাত্মাকে পর্যবেক্ষক, অনুমতিদাতা, ধারক, ভোগকারী, মহান ভগবান এবং পরমাত্মাও বলা হয়।

OdiaIND

ଏହି ଶରୀରରେ ଥିବା ସର୍ବୋଚ୍ଚ ଆତ୍ମାକୁ ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷକ, ଅନୁମତିଦାତା, ରକ୍ଷକ, ଭୋଗକାରୀ, ମହାନ ପ୍ରଭୁ ଏବଂ ସର୍ବୋଚ୍ଚ ଆତ୍ମ ମଧ୍ୟ କୁହାଯାଏ |

DogriIND

इस शरीर च परमात्मा गी पर्यवेक्षक, अनुमति देने आह्ला, धारण करने आह्ला, भोक्ता, महान प्रभु ते परमात्मा बी आखेआ जंदा ऐ।

Sacred Commentaries

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Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः -- यह पुरुष स्वरूपसे नित्य है? सब जगह परिपूर्ण है? स्थिर है? अचल है? सदा रहनेवाला है (गीता 2। 24)। ऐसा होता हुआ भी जब यह प्रकृति और उसके कार्य शरीरकी तरफ दृष्टि डालता है अर्थात् उनके साथ अपना सम्बन्ध मानता है? तब इसकी उपद्रष्टा संज्ञा हो जाती है।यह हरेक कार्यके करनेमें सम्मति? अनुमति देता है। अतः इसका नाम अनुमन्ता है।यह एक व्यष्टि शरीरके साथ मिलकर? उसके साथ तादात्म्य करके अन्नजल आदिसे शरीरका पालनपोषण करता है शीतउष्ण आदिसे उसका संरक्षण करता है। अतः इसका नाम भर्ता हो जाता है।यह शरीरके साथ मिलकर अनुकूल परिस्थितिके आनेसे अपनेको सुखी मानता है और प्रतिकूल परिस्थितिके आनेसे अपनेको दुःखी मानता है। अतः इसकी भोक्ता संज्ञा हो जाती है।यह अपनेको शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि तथा धन? सम्पत्ति आदिका मालिक मानता है। अतः यह महेश्वर नामसे कहा जाता है।परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः -- पुरुष सर्वोत्कृष्ट है? परम आत्मा है? इसलिये शास्त्रोंमें इसको परमात्मा नामसे कहा गया है। यह देहमें रहता हुआ भी देहके सम्बन्धसे स्वतः रहित है। आगे इसी अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें इसके विषयमें कहा गया है कि यह शरीरमें रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है।इस श्लोकमें एक ही तत्त्वको भिन्नभिन्न उपाधियोंके सम्बन्धसे उपद्रष्टा आदि पदोंसे सम्बोधित किया गया है? इसलिये इन पृथक्पृथक् नामोंसे पुरुषके ही स्वरूपका वर्णन समझना चाहिये। वास्तवमें उसमें किसी प्रकारका भेद नहीं है। जैसे एक ही व्यक्ति देश? काल? वेश? सम्बन्ध आदिके अनुसार भिन्नभिन्न (पिता? चाचा? नाना? भाई आदि) नामोंसे पुकारा जाता है? ऐसे ही पुरुष भिन्नभिन्न नामोंसे पुकारा जानेपर भी वास्तवमें एक ही है। सम्बन्ध -- उन्नीसवें श्लोकसे बाईसवें श्लोकतक प्रकृति और पुरुषका विवेचन करके अब आगेके श्लोकमें उन दोनोंको तत्त्वसे जाननेका फल बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

उसीका फिर साक्षात् निर्देश किया जाता है --, ( यह आत्मा ) उपद्रष्टा है अर्थात् स्वयं क्रिया न करता हुआ पासमें स्थित होकर देखनेवाला है। जैसे कोई यज्ञविद्यामें कुशल अन्य पुरुष स्वयं यज्ञ न करता हुआ? यज्ञकर्ममें लगे हुए पुरोहित और यजमानोंद्वारा किये हुए कर्मसम्बन्धी गुणदोषोंको तटस्थभावसे देखता है? उसी प्रकार कार्य और करणोंके व्यापारमें स्वयं न लगा हुआ उनसे अन्यविलक्षण आत्मा उन व्यापारयुक्त कार्य और करणोंको समीपस्थ भावसे देखनेवाला है। अथवा देह? चक्षु? मन? बुद्धि और आत्मा -- ये सभी द्रष्टा हैं? उनमें बाह्य द्रष्टा शरीर है और उससे लेकर उन सबकी अपेक्षा अन्तरतम -- समीपस्थ द्रष्टा अन्तरात्मा है। जिसकी अपेक्षा और कोई आन्तरिक द्रष्टा न हो? वह अतिशय सामीप्य भावसे देखनेवाला होनेके कारण उपद्रष्टा होता है ( अतः आत्मा उपद्रष्टा है )। अथवा ( यों समझो कि ) यज्ञके उपद्रष्टाकी भाँति सबका अनुभव करनेवाला होनेसे आत्मा उपद्रष्टा है। तथा यह अनुमन्ता है -- क्रिया करनेमें लगे हुए अन्तःकरण और इन्द्रियादिकी क्रियाओंमें सन्तोषरूप अनुमोदनका नाम अनुमनन है? उसका करनेवाला है। अथवा यह इसीलिये अनुमन्ता है कि कार्यकरणकी प्रवृत्तिमें स्वयं प्रवृत्त न होता हुआ भी उनके अनुकूल प्रवृत्त हुआ सा दीखता है। अथवा अपने व्यापारमें लगे हुए अन्तःकरण और इन्द्रियादिको उनका साक्षी होकर भी कभी निवारण नहीं करता? इसलिये अनुमन्ता है। तथा यह भर्ता है? चैतन्यस्वरूप आत्माके भोग और अपवर्गकी सिद्धिके निमित्तसे संहत हुए चेतन्यके आभासरूप शरीर? इन्द्रिय? मन और बुद्धि आदिका स्वरूप धारण करना भी भरण है और वह चैतन्यरूप आत्माका ही किया हुआ है? इसलिये आत्माको भर्ता कहते हैं। आत्मा भोक्ता है। अग्निके उष्णत्वकी भाँति नित्यचैतन्य आत्मसत्तासे समस्त विषयोंमें पृथक्पृथक् होनेवाली जो बुद्धिकी सुखदुःख और मोहरूप प्रतीतियाँ हैं? वे सब चैतन्य आत्माद्वारा ग्रस्त की हुईसी दीखती हैं? अतः आत्माको भोक्ता कहा जाता है। आत्मा महेश्वर है। वह सबका आत्मा होनेके कारण और स्वतन्त्र होनेके कारण महान् ईश्वर है? इसलिये महेश्वर है। वह परमात्मा है। अविद्याद्वारा प्रत्यक् आत्मारूप माने हुए जो शरीरसे लेकर बुद्धिपर्यन्त ( आत्मशब्दवाच्य पदार्थ ) हैं। उन सबसे उपद्रष्टा आदि लक्षणोंवाला आत्मा परम ( श्रेष्ठ ) है -- इसलिये वह परमात्मा है। श्रुतिमें भी वह भीतर व्यापक परमात्मा है इन शब्दोंसे उसका वर्णन किया गया है। ऐसा आत्मा कहाँ है वह अव्यक्तसे पर पुरुष इसी शरीरमें है जो कि उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः इस प्रकार आगे कहा जायगा और जो क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि इस प्रकार पहले कहा जा चुका है तथा जिसकी व्याख्या करके उपसंहार किया गया है।

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Sri Anandgiri

यथोक्तप्रकारेण जीवेश्वरादिसर्वकल्पनाधिष्ठानत्वेनेत्यर्थः। साक्षादपरोक्षत्वेनेति यावत्। यथोक्तामनाद्यनिर्वाच्यां सर्वानर्थोपाधिभूतामित्यर्थः। विद्यया प्रागुक्तैकत्वगोचरया प्रकृतिमविद्यारूपां सकार्यामभावमापादितां यो वेत्तीति संबन्धः। सर्वप्रकारेण विहितेन निषिद्धेन चेत्यर्थः। पुनर्नकारोऽन्वयार्थः। निपातसूचितं न्यायमाह -- अपीति। न स भूयोऽभिजायत इत्युक्तमाक्षिपति -- नन्विति। ज्ञानोत्पत्त्यनन्तरं जन्माभावस्योक्तत्वात्पुनर्देहारम्भमुपेत्य नाक्षेपः स्यादित्याशङ्क्याह -- यद्यपीति। तथापि स्युस्त्रीणि जन्मानीति संबन्धः। वर्तमानदेहे ज्ञानात्पूर्वोत्तरकालानां कर्मणां फलमदत्त्वा नाशायोगाज्जन्मद्वयमावश्यकमतीतानेकदेहेष्वपि,कृतकर्मणांनाभुक्तं क्षीयते कर्म इत्येव स्मृतेरदत्त्वा फलमनाशादस्ति तृतीयमपि जन्मेत्याह -- प्रागिति। फलदानं विनापि कर्मनाशे दोषमाह -- कृतेति। न युक्त इति कृत्वा फलमदत्त्वा कर्मनाशो नेति शेषः। विमतानि कर्माणि फलमदत्त्वा न क्षीयन्ते वैदिककर्मत्वादारब्धकर्मवदिति मत्वाह -- यथेति। नाशो न ज्ञानादिति शेषः। नन्वनारब्धकर्मणां ज्ञानान्नाशो युक्तोऽप्रवृत्तफलवत्त्वादारब्धकर्मणां तु प्रवृत्तफलवत्त्वेन बलवत्त्वान्न ज्ञानात्तन्निवृत्तिरित्याह -- नचेति। अज्ञानोत्थत्वेन ज्ञानविरोधित्वाविशेषात्प्रवृत्ताप्रवृत्तफलत्वमनुपयुक्तमिति भावः। कर्मणां फलमदत्त्वा नाशाभावे फलितमाह -- तस्मादिति। ननु कर्मणां बहुत्वात्तत्फलेषु जन्मसु कुतस्त्रित्वमारम्भकर्मणां त्रिप्रकारत्वादिति चेन्नानारब्धत्वेनैकप्रकारकत्वसंभवात्तत्राह -- संहतानीति। नास्ति ज्ञानस्यैकान्तिकफलत्वमिति शेषः। उक्तकर्मणां जन्मानारम्भकत्वे प्रागुक्तं दोषमनुभाष्यं तस्यातिप्रसञ्जकत्वमाह -- अन्यथेति। सर्वत्रेत्यारब्धकर्मस्वपीति यावत्। फलजनकत्वानिश्चयोऽनाश्वासः। कर्मणां जन्मानारम्भकत्वे कर्मकाण्डानर्थक्यं दोषान्तरमाह -- शास्त्रेति। अनारब्धकर्मणां सत्यपि ज्ञाने जन्मान्तरारम्भकत्वध्रौव्ये फलितमाह -- इत्यत इति। श्रुत्यवष्टम्भेन परिहरति -- नेत्यादिना। ज्ञानादनारब्धकर्मदाहे भगवतोऽपि संमतिमाह -- इहापीति। ज्ञानाधीनसर्वकर्मदाहे सर्वधर्मान्परित्यज्येति वाक्यशेषोऽपि प्रमाणीभवतीत्याह -- वक्ष्यति चेति। ज्ञानादनारब्धाशेषकर्मक्षये युक्तिरपि वक्तुं शक्येत्याह -- उपपत्तेश्चेति। तामेव विवृणोति -- अविद्येति। अज्ञस्याविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाख्यक्लेशात्मकानि सर्वानर्थबीजानि तानि निमित्तीकृत्य यानि धर्माधर्मकर्माणि तानि जन्मान्तरारम्भकाणि यानि तु विदुषो विद्यादग्धक्लेशबीजस्य प्रतिभासमात्रशरीराणि कर्माणि न तानि शरीरारम्भकाणि दग्धपटवदर्थक्रियासामर्थ्याभावादित्यर्थः। प्रतीतिमात्रदेहानां कर्माभासानां न फलारम्भकतेत्यस्मिन्नर्थे भगवतोऽपि संमतिमाह -- इहापीति। तत्त्वज्ञानादूर्ध्वं प्रातीतिकक्लेशानां कर्मद्वारा देहानारम्भकत्वे वाक्यान्तरमपि प्रमाणयति -- बीजानीति। ज्ञानानन्तरभाविकर्मणां ज्ञानेन दाहमङ्गीकरोति -- अस्त्विति। विरोधिग्रस्तानामेवोत्पत्तिरिति हेतुमाह -- ज्ञानेति। अस्मिञ्जन्मनि जन्मान्तरे वा ज्ञानात्पूर्वभाविकर्मणां न ततो दाहो विरोधिनं विना प्रवृत्तेरित्याह -- नत्विति। श्रुतिस्मृतिविरोधान्नैवमिति परिहरति -- नेत्यादिना। सर्वशब्दश्रुतेः। संकोचं शङ्कते -- ज्ञानेति। प्रकरणादिसंकोचकाभावान्नैवमित्याह -- नेति। आक्षेपदशायामुक्तमनुमानमनुवदति -- यत्त्विति। आभासत्वादिदमसाधकमिति दूषयति -- तदसदिति। व्याप्त्यादिसत्त्वे कथमाभासत्वमिति पृच्छति -- कथमिति। प्रवृत्तफलत्वोपाधिना हेतोर्व्याप्तिभङ्गादाभासत्वधीरित्याह -- तेषामिति। तदेव प्रपञ्चयति -- यथेत्यादिना। धनुषः सकाशादिषुर्मुक्तो बलवत्प्रतिबन्धकाभावे मध्ये न पतति तथा प्रबलप्रतिबन्धकं विना प्रवृत्तफलानां कर्मणां भोगादृते न क्षयो नच तत्त्वज्ञानं तादृक्प्रतिबन्धकमुत्पत्तावेव पूर्वप्रवृत्तेन कर्मणा प्रतिबद्धशक्तित्वादित्यर्थः। यत्र ज्ञानेनादाह्यत्व तत्र प्रवृत्तफलत्वमित्यन्वयेऽपि यत्राप्रवृत्तफलत्वं तत्र ज्ञानदाह्यत्वमिति न व्यतिरेकसिद्धिरित्याशङ्क्याह -- स एवेति। प्रवृत्तौ निमित्तभूतोऽनारब्धो वेगोऽनेनेति विग्रहः। स्वाश्रयस्थानि साभासान्तःकरणनिष्ठानीति यावत्। विमतानि तत्त्वधीनिमित्तनिवृत्तीनि तत्कृतकारणनिवृत्तित्वाद्रज्जुसर्पादिवदिति व्यतिरेकसिद्धिरिति भावः। विदुषो वर्तमानदेहपाते देहहेत्वभावात्तत्वधीरैकान्तिकफलेत्युपसंहरति -- पतित इति।

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Sri Dhanpati

पुरुषमेव साक्षान्निर्दिशति -- उपद्रष्टेति। यथा ऋत्विग्यजमानेषु यज्ञकर्मव्यापृतेषु तटस्थोऽन्यो व्यापृतो यज्ञविद्याकुशलस्तद्य्वापारगुणदोषणामीक्षिता तथा कार्यकरणानां व्यापारवतां समीपे स्थितः सन् स्वयव्यापृतो द्रष्टा सन्निधिमात्रेण तेषां साक्षी। यद्वा देहचक्षुर्मनोबुद्य्धात्मानो द्रष्टारः तेषां बाह्यो द्रष्टा देहस्तत आरभ्यान्तरतमश्च प्रत्यक्समीप आत्मा द्रष्टा यतः परतरो नास्ति द्रष्टा सोऽतिशयमामीप्येन द्रष्टृत्वादुपद्रष्टा स्यात्। यज्ञोपद्रषश्टृवद्वा सर्वविषयीकरणादुपद्रष्टा। ये स्वयं कुर्वन्तो व्यापारवन्तो भवन्ति तेषु कुर्वत्सु यास्तेषां क्रियास्तासु पार्श्वस्थस्य परितोषोऽनुमननमनुमोदनं तस्य संनिधिमात्रेण कर्ता अमुमन्ता? कार्यकरणप्रवृत्तिषु स्वयमप्रवृत्तोऽपि प्रवृत्त इव तदनुकूलो विभाव्यते तेन वानुमन्ता? स्वव्यापारेषु प्रवृत्तान् तत्साक्षिभूतः कदाचिदपि न निवारयतीति वाऽनुमन्ता? देहेन्द्रियमनोबुद्धीनां,संहतानां चैतन्यात्मपारार्थ्येन निमित्तभूतेन चैतन्याभासानां स्वरुपावधारणस्य चैतन्यात्मकृत्वात् भर्तात्मोच्यते। भोक्ता नित्यचैतन्यस्वरुपेण बुद्धेः सुखदुःखमोहात्मिकान् प्रत्ययान्सर्वविषयविषयान् विभक्ततयोपलब्धातो भोक्ता आत्मोच्यते सर्वात्मत्वात्स्वन्त्रत्वाच्च। महांश्चासावीश्वरश्चेति महेश्वरः देहादिबुद्य्धन्तानां प्रत्गात्मत्वेनाविद्यया प्रकल्पितानां परम उपद्रष्टृत्वादिलक्षण आत्मेति परमात्मा इत्यनेन शब्देन चाप्युक्तः श्रुतौ कथितः। यः परमात्मा श्रुतावुक्तः स एव देहेस्मिन् पुरुषः परः अव्यक्तादुत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृत इति वक्ष्यमाणः। श्रुतिःसाक्षी चेता केवलो निर्गुणश्चएष भूताधिपतिरेष लोकेश्वर एष लोकपालःईशानं भूतभव्यस्यतस्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत?अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरुपे व्याकरवाणिअव्यक्तात्पुरुषः परः इत्याद्या।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
upadraṣhṭāthe witness
anumantāthe permitter
chaand
bhartāthe supporter
bhoktāthe transcendental enjoyer
mahāīśhvaraḥ
paramaātmā
itithat
cha apiand also
uktaḥis said
dehewithin the body
asminthis
puruṣhaḥ paraḥthe Supreme Lord
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.22
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु

प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है और गुणोंका सङ्ग ही उसके ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बनता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.24
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह। सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते

इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य अलग-अलग जानता है, वह सब तरहका बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 23
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 23
उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः

यह पुरुष प्रकृति-(शरीर-) के साथ सम्बन्ध रखनेसे 'उपद्रष्टा', उसके साथ मिलकर सम्मति, अनुमति देनेसे 'अनुमन्ता', अपनेको उसका भरणपोषण करनेवाला माननेसे 'भर्ता', उसके सङ्गसे सुखदुःख भोगनेसे 'भोक्ता', और अपनेको उसका स्वामी माननेसे 'महेश्वर' बन जाता है। परन्तु स्वरूपसे यह पुरुष 'परमात्मा' कहा जाता है। यह देहमें रहता हुआ भी देहसे पर (सम्बन्ध-रहित) ही है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 23 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 23 का हिंदी अर्थ: "यह पुरुष प्रकृति-(शरीर-) के साथ सम्बन्ध रखनेसे 'उपद्रष्टा', उसके साथ मिलकर सम्मति, अनुमति देनेसे 'अनुमन्ता', अपनेको उसका भरणपोषण करनेवाला माननेसे 'भर्ता', उसके सङ्गसे सुखदुःख भोगनेसे 'भोक्ता', और अपनेको उसका स्वामी माननेसे 'महेश्वर' बन जाता है। परन्तु स्वरूपसे यह पुरुष 'परमात्मा' कहा जाता है। यह देहमें रहता हुआ भी देहसे पर (सम्बन्ध-रहित) ही है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 23?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 23 translates to: "The Supreme Soul in this body is also called the observer, the permitter, the sustainer, the enjoyer, the great Lord, and the Supreme Self. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरु" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 23 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। यह पुरुष प्रकृति-(शरीर-) के साथ सम्बन्ध रखनेसे 'उपद्रष्टा', उसके साथ मिलकर सम्मति, अनुमति देनेसे 'अनुमन्ता', अपनेको उसका भरणपोषण करनेवाला माननेसे 'भर्ता', उसके सङ्गसे सुखदुःख भोगनेसे 'भोक्ता', और अपनेको उसका स्वामी माननेसे 'महेश्वर' बन जाता है। परन्तु स्वरूपसे यह पुरुष 'परमात्मा' कहा जाता है। यह देह Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "upadraṣhṭānumantā cha bhartā bhoktā maheśhvaraḥ" mean in English?

"upadraṣhṭānumantā cha bhartā bhoktā maheśhvaraḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 23. The Supreme Soul in this body is also called the observer, the permitter, the sustainer, the enjoyer, the great Lord, and the Supreme Self. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.