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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 22
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु

प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है और गुणोंका सङ्ग ही उसके ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बनता है। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

প্রকৃতিতে উপবিষ্ট আত্মা প্রকৃতির জন্মগত গুণাবলী অনুভব করে; গুণাবলীর প্রতি আসক্তিই তার জন্মের কারণ শুভ ও মন্দ গর্ভে।

DogriIND

प्रकृति च बैठी दी आत्मा कुदरत दे पैदा होए गुणें दा अनुभव करदी ऐ; गुणें कन्नै लगाव गै इसदे भलाई-बुरे कोखें च पैदा होने दा कारण ऐ।

MaithiliIND

प्रकृति मे बैसल आत्मा प्रकृति सँ जन्मल गुणक अनुभव करैत अछि; गुणक प्रति आसक्ति एकर जन्म नीक-अशुभ गर्भ मे होयबाक कारण अछि |

AssameseIND

প্ৰকৃতিত বহি থকা আত্মাই প্ৰকৃতিৰ জন্ম হোৱা গুণবোৰ অনুভৱ কৰে; গুণৰ প্ৰতি মোহই ইয়াৰ জন্মৰ কাৰণ ভাল-অশুভ গৰ্ভত।

MalayalamIND

പ്രകൃതിയിൽ ഇരിക്കുന്ന ആത്മാവ് പ്രകൃതിയിൽ നിന്ന് ജനിച്ച ഗുണങ്ങൾ അനുഭവിക്കുന്നു; ഗുണങ്ങളോടുള്ള ആസക്തിയാണ് നല്ലതും ചീത്തയുമായ ഗർഭാശയങ്ങളിൽ അതിൻ്റെ ജനനത്തിന് കാരണം.

KonkaniIND

सैमांत बसल्ल्या आत्म्याक सैमांतल्यान जल्माक आयिल्ल्या गुणांचो अणभव येता; गुणांकडेन आसक्ति होच ताच्या बऱ्या-वायट गर्भांत जल्माक येवपाचें कारण.

TeluguIND

ప్రకృతిలో కూర్చున్న ఆత్మ ప్రకృతి నుండి పుట్టిన లక్షణాలను అనుభవిస్తుంది; మంచి మరియు చెడు గర్భాలలో దాని పుట్టుకకు గుణాలకు అనుబంధం కారణం.

ManipuriIND

ꯃꯍꯧꯁꯥꯗꯥ ꯐꯝꯂꯤꯕꯥ ꯊꯋꯥꯏ ꯑꯗꯨꯅꯥ ꯃꯍꯧꯁꯥꯗꯒꯤ ꯄꯣꯀꯄꯥ ꯃꯒꯨꯅꯁꯤꯡ ꯑꯗꯨ ꯊꯦꯡꯅꯩ; ꯃꯒꯨꯅꯁꯤꯡꯒꯥ ꯃꯔꯤ ꯂꯩꯅꯕꯥ ꯑꯁꯤꯅꯥ ꯑꯐꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯐꯠꯇꯕꯥ ꯃꯤꯔꯣꯜꯂꯤꯕꯤ ꯅꯨꯄꯤꯁꯤꯡꯗꯥ ꯄꯣꯀꯄꯒꯤ ꯃꯔꯃꯅꯤ꯫

BhojpuriIND

प्रकृति में बइठल आत्मा प्रकृति से पैदा भइल गुणन के अनुभव करेला; गुणन से आसक्ति एकर जनम के कारण होला नीमन-अशुभ गर्भ में।

MarathiIND

निसर्गात बसलेला आत्मा निसर्गातून जन्मलेल्या गुणांचा अनुभव घेतो; गुणांची आसक्ती हे चांगल्या आणि वाईट पोटात जन्म घेण्याचे कारण आहे.

PunjabiIND

ਕੁਦਰਤ ਵਿਚ ਬੈਠੀ ਆਤਮਾ ਕੁਦਰਤ ਦੇ ਪੈਦਾ ਹੋਏ ਗੁਣਾਂ ਦਾ ਅਨੁਭਵ ਕਰਦੀ ਹੈ; ਗੁਣਾਂ ਦਾ ਮੋਹ ਇਸ ਦੇ ਚੰਗੇ ਅਤੇ ਮੰਦੇ ਗਰਭਾਂ ਵਿਚ ਪੈਦਾ ਹੋਣ ਦਾ ਕਾਰਨ ਹੈ।

TamilIND

இயற்கையில் அமர்ந்திருக்கும் ஆன்மா இயற்கையால் பிறந்த குணங்களை அனுபவிக்கிறது; குணங்களின் மீதான பற்றுதலே அது நல்ல மற்றும் தீய வயிற்றில் பிறப்பதற்குக் காரணம்.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् -- वास्तवमें पुरुष प्रकृति(शरीर) में स्थित है ही नहीं। परन्तु जब वह प्रकृति(शरीर)के साथ तादात्म्य करके शरीरको मैं और मेरा मान लेता है? तब वह प्रकृतिमें स्थित कहा जाता है। ऐसा प्रकृतिस्थ पुरुष ही (गुणोंके द्वारा रचित अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिको सुखदायीदुःखदायी मानकर) अनुकूल परिस्थितिके आनेपर सुखी होता है और प्रतिकूल परिस्थितिके आनेपर दुःखी होता है। यही पुरुषका प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनना है।जैसे मोटरदुर्घटनामें मोटर और चालक -- दोनोंका हाथ रहता है। क्रियाके होनेमें तो केवल मोटरकी ही प्रधानता रहती है? पर दुर्घटनाका फल (दण्ड) मोटरसे अपना सम्बन्ध जोड़नेवाले चालक(कर्ता) को ही भोगना पड़ता है। ऐसे ही सांसारिक कार्योंको करनेमें प्रकृति और पुरुष -- दोनोंका हाथ रहता है। क्रियाओंके होनेमें तो केवल शरीरकी ही प्रधानता रहती है? पर सुखदुःखरूप फल शरीरसे अपना सम्बन्ध जोड़नेवाले पुरुष(कर्ता) को ही भोगना पड़ता है। अगर वह शरीरके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े और सम्पूर्ण क्रियाओंको प्रकृतिके द्वारा ही होती हुई माने (गीता 13। 29)? तो वह उन क्रियाओंका फल भोगनेवाला नहीं बनेगा।कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु -- जिन योनियोंमें सुखकी बहुलता होती है? उनको सत्योनि कहते हैं और जिन योनियोंमें दुःखकी बहुलता होती है? उनको असत्योनि कहते हैं। पुरुषका सत्असत् योनियोंमें जन्म लेनेका कारण गुणोंका सङ्ग ही है।सत्त्व? रज और तम -- ये तीनों गुण प्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं। इन तीनों गुणोंसे ही सम्पूर्ण पदार्थों और क्रियाओंकी उत्पत्ति होती है। प्रकृतिस्थ पुरुष जब इन गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है? तब ये उसके ऊँचनीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बन जाते हैं।प्रकृतिमें स्थित होनेसे ही पुरुष प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है और यह गुणोंका सङ्ग? आसक्ति? प्रियता ही पुरुषको ऊँचनीच योनियोंमें ले जानेका कारण बनती है। अगर यह प्रकृतिस्थ न हो? प्रकृति(शरीर) में अहंताममता न करे? अपने स्वरूपमें स्थित रहे? तो यह पुरुष सुखदुःखका भोक्ता कभी नहीं बनता? प्रत्युत सुखदुःखमें सम हो जाता है? स्वस्थ हो जाता है (गीता 14। 24)। अतः यह प्रकृतिमें भी स्थित हो सकता है और अपने स्वरूपमें भी। अन्तर इतना ही है कि प्रकृतिमें स्थित होनेमें तो यह परतन्त्र है और स्वरूपमें स्थित होनेमें यह स्वाभाविक स्वतन्त्र है। बन्धनमें पड़ना इसका अस्वाभाविक है और मुक्त होना इसका स्वाभाविक है। इसलिये बन्धन इसको सुहाता नहीं है और मुक्त होना इसको सुहाता है।जहाँ प्रकृति और पुरुष -- दोनोंका भेद (विवेक) है? वहाँ ही प्रकृतिके साथ तादात्म्य करनेका? सम्बन्ध जोड़नेका अज्ञान है। इस अज्ञानसे ही यह पुरुष स्वयं प्रकृतिके साथ तादात्म्य कर लेता है। तादात्म्य कर लेनेसे यह पुरुष अपनेको प्रकृतिस्थ अर्थात् प्रकृति(शरीर) में स्थित मान लेता है। प्रकृतिस्थ होनेसे शरीरमें मैं और मेरापन हो जाता है। यही गुणोंका सङ्ग है। इस गुणसङ्गसे पुरुष बँध जाता है (गीता 14। 5)। गुणोंके द्वारा बँध जानेसे ही पुरुषकी गुणोंके अनुसार गति होती है (गीता 14। 18)। सम्बन्ध -- उन्नीसवें? बीसवें और इक्कीसवें श्लोकमें प्रकृति और पुरुषका वर्णन हुआ। अब आगेके श्लोकमें पुरुषका विशेषतासे वर्णन करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

यह जो कहा कि सुखदुःखोंका भोक्तृत्व ही पुरुषका संसारित्व है? सो वह उसमें किस कारणसे है यह बतलाते हैं --, क्योंकि पुरुष -- जीवात्मा प्रकृतिमें स्थित है अर्थात् कार्य और करणके रूपमें परिणत हुई अविद्यारूपा प्रकृतिमें स्थित है -- प्रकृतिको अपना स्वरूप मानता है? इसलिये वह प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सुखदुःख और मोहरूपसे प्रकट गुणोंको मैं सुखी हूँ? दुःखी हूँ? मूढ़ हूँ? पण्डित हूँ इस प्रकार मानता हुआ भोगता है अर्थात् उनका उपभोग करता है। यद्यपि जन्मका कारण अविद्या है तो भी भोगे जाते हुए सुखदुःख और मोहरूप गुणोंमें जो आसक्त हो जाना है -- तद्रूप हो जाना है? वह जन्मरूप संसारका प्रधान कारण है। वह जैसी कामनावाला होता है वैसा ही कर्म करता है इस श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है। इसी बातको भगवान् कहते हैं कि गुणोंका सङ्ग ही अर्थात् गुणोंमें जो आसक्ति है वही इस भोक्ता पुरुषके अच्छीबुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है। अच्छी और बुरी योनियोंका नाम सदसत् योनि है? उनमें जन्मोंका होना सदसद्योनिजन्म है? इन भोग्यरूप सदसद्योनिजन्मोंका कारण गुणोंका सङ्ग ही है। अथवा संसारपदका अध्याहार करके यह अर्थ कर लेना चाहिये कि अच्छी औरबुरी योनियोंमें जन्म लेकर गुणोंका सङ्ग करना ही इस संसारका कारण है। देवादि योनियाँ सत् योनि हैं और पशु आदि योनियाँ असत् योनि हैं। प्रकरणकी सामर्थ्यसे मनुष्ययोनियोंको भी सत् असत् योनियाँ माननेमें ( किसी प्रकारका ) विरोध नहीं समझना चाहिये। कहनेका तात्पर्य यह है कि प्रकृतिमें स्थित होनारूप अविद्या और गुणोंका सङ्ग -- आसक्ति ये ही दोनों संसारके कारण हैं और वे छोड़नेके लिये ही बतलाये गये हैं। गीताशास्त्रमें इनकी निवृत्तिके साधन संन्यासके सहित ज्ञान और वैराग्य प्रसिद्ध हैं। वह क्षेत्रक्षेत्रज्ञविषयक ज्ञान पहले बतलाया ही गया है। साथ ही ( न सत्तन्नासदुच्यते इत्यादि कथनसे ) अन्यों ( धर्मों ) का निषेध करके और ( सर्वतः पाणिपादम् इत्यादि कथनसे ) अनात्म धर्मोंका अध्यारोप करके ज्ञेयके स्वरूपका भी यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते आदि वचनोंसे प्रतिपादन किया गया है।

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Sri Anandgiri

प्रकृतस्यैव मोक्षहेतोर्ज्ञानस्य साक्षान्निर्देशायोत्तरश्लोकमुत्थापयति -- तस्येति। कार्यकारणानां व्यापारवतां समीपे स्थितः संनिधिमात्रेण तेषां साक्षीत्येवमर्थत्वेनोपद्रष्टेति पदं व्याचष्टे -- समीपस्थ इति। लौकिकस्येव द्रष्टुरस्यापि स्वव्यापारविशिष्टतया निष्क्रियत्वविरोधमाशङ्क्याह -- स्वयमिति। स्वव्यापारादृते संनिधिरेव द्रष्टृत्वं। दृष्टान्तेन स्पष्टयति -- यथेति। उपद्रष्टेत्यस्यार्थान्तरमाह -- अथवेति। बहूनां द्रष्टृत्वेऽपि कस्योपद्रष्टृत्वं तत्राह -- तेषामिति। उपोपसर्गस्य सामीप्यार्थत्वेन प्रत्यगर्थत्वात्तत्रैव सामीप्यावसानात्प्रत्यगात्मा च द्रष्टा चेत्युपद्रष्टा सर्वसाक्षी प्रत्यगात्मेत्यर्थः। उक्तमेव व्यनक्ति -- यत इति। यथा यजमानस्य ऋत्विजां च यज्ञकर्मणि गुणं दोषं वा सर्वयज्ञाभिज्ञः सन्नुपद्रष्टा विषयीकरोति तथायमात्मा चिन्मात्रस्वभावः सर्वं गोचरयतीत्युपद्रष्टेति पक्षान्तरमाह -- यज्ञेति। अनुमन्ता चेत्येतद्व्याकरोति -- अनुमन्तेति। ये स्वयं कुर्वन्तो व्यापारयन्तो भवन्ति तेषु कुर्वत्सु सत्सु यास्तेषां क्रियास्तासु पार्श्वस्थस्य परितोषोऽनुमननं तच्चानुमोदनं तस्य संनिधिमात्रेण कर्ता यः सोऽनुमन्तेत्यर्थः। व्याख्यान्तरमाह -- अथवेति। तदेव स्फुटयति -- कार्येति। अर्थान्तरमाह -- अथवेत्यादिना। भर्तेति पदमादाय किं भरणं नामेति पृच्छति -- भर्तेति। तद्रूपं निरूपयन्नात्मनो भर्तृत्वं साधयति -- देहेति। भोक्तेत्युक्ते क्रियावत्त्वे प्राप्ते भोगश्चिदवसानतेति न्यायेन विभजते -- अग्नीति। विशेषणान्तरमादाय व्याचष्टे -- महेश्वर इति। परमात्मत्वमुपपादयति -- देहादीनामिति। अविद्यया कल्पितानामिति संबन्धः। परमत्वं प्रकृष्टत्वम्। स पूर्वोक्तविशेषणवानिति यावत्। परमात्मशब्दस्य प्रकृतात्मविषयत्वे श्रुतिमनुकूलयति -- अन्त इति। तस्य ताटस्थ्यं प्रश्नद्वारा प्रत्याचष्टे -- क्वेति। कस्मात्परत्वं तदाह -- अव्यक्तादिति। तत्रैव वाक्यशेषानुकूल्यमाह -- उत्तम इति। सोऽस्मिन्देहे परः पुरुष इति संबन्धः। शोधितार्थयोरैक्यज्ञानं प्रागुक्तं फलोक्त्या स्तौति -- क्षेत्रज्ञं चेति।

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Sri Dhanpati

पुरुषस्य सुखदुःखभोक्तृत्वलक्षणसंसारित्वं किंनिमित्तमितिचेत् अविद्यैक्याध्यासनिमित्तमित्याह -- पुरुष इति। हि यस्मात्पुरुषो प्रकृतावविद्यालक्षणायां स्थितस्तदैक्याध्यासं प्राप्तस्तस्मात्सुखी दुःखी मूढः पण्डितोऽहमित्येवं प्रकृते जातान्सुखदुःखमोहाकाराभिव्यक्तान् गुणान्सत्त्वादीन् भुङ्क्ते उपलभते। प्रकृतिस्थस्तत्कार्ये देहे तादात्म्येन स्थित इति त्वाचार्यैः देहतादात्म्यस्याप्यविद्यातादात्म्याध्यासायत्तत्वं मुख्यार्थत्यागापत्तिं चाभिप्रेत्य न व्याख्यातम्। भोक्तृत्वलक्षणे संसारित्वे प्रकृतिस्थत्वं कारणमुक्त्वा जन्मनः प्रधानं कारणमाह -- कारणामिति। अस्य पुरुषस्य भोक्तुः सत्यश्चासत्यश्च योनयः सद्योनयोदेवादियोनयः असद्योनयः पश्वादियोनयः। योनिद्वयनिर्देशसामर्थ्यान्मध्यवर्तिन्यः सदसद्योनयो मनुष्ययोनयोपि द्रष्टव्याः। तासु जन्मानि तेषु विषयभूतेषु गुणेषु गुणसङ्गः गुणेषु सुखदुःखमोहात्मकेषु विषयेषु भूज्यमानेषु यस्तादात्म्यभाव आसीक्तिर्वा स एव सत्यायामप्यविद्यायां प्रधानं कारणमित्यर्थः।स यथाकामो भवति तत्कतुर्भवति यत्कतुर्भवति तत्कर्म कुरुते यत्कर्म कुरुते तदभिसंपद्यते इति श्रुतेः। सदसद्योनिजन्मनस्तस्य संसारस्य गुणसङ्गः कारणमिति संसारपदमध्याहृत्य वा व्याख्यायेयम्। गुणसङ्गः सत्त्वरजस्तमोगुणात्मकप्रकृतितादात्म्याभिमान इति तु प्रकृतिमात्मत्वेन गतः प्रकृतिस्थ इत्यनेन पौररुक्त्यमभिप्रेत्याचार्यैर्न व्याख्यातम्। गुणैः शुभाशुभकर्मकारिभिरिन्द्रियैः सङ्गस्य विषयसङ्गाधीनत्वमभिप्रेत्य न प्रदर्शितम्।इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था इति श्रुतेः। अन्ये तु यद्वा प्रकृतिस्थो विद्वान्वा गुणान् भुङ्क्ते। पश्वादिभिश्चाविशेषादितिन्यायात्। तत्किं विद्वानिवाविद्वानपि कुतो न मुच्यते। अविद्वानिव विद्वानपि कुतो न बध्यत इत्याशङ्क्याह -- कारणमिति। गुणेषु देहेन्द्रियविषयेषु सङ्गः अहमिदं ममेदमित्यभिनिवेशः स एव जन्म कारणं विदुषां तु तदभावान्न जन्म। समानेऽपि देहसंबन्धे यदा यक्षो देहाभिमानं धत्ते तदा स एव देहपीडया पीड्यते नतु देहपतिर्जीवः। यदात्वयं देहाभिमानं धत्ते तदा नेतर इति प्रसिद्धम्। सङ्गस्य बन्धकत्वं नतु सांनिध्यमात्रं बन्धकं अतो विद्वदविदुषो समानेपि देहसंबन्धे संगतदभावकृतो महाविशेष इति भाव इति वर्णयन्ति। भाष्यकारैस्तु प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्य्धनादी उभावपीत्युपक्रमानुरोधेन पुरुषशब्दार्थप्रदर्शनसामञ्जस्यभिप्रेत्यामर्थो न प्रदर्शितः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
puruṣhaḥthe individual soul
prakṛitisthaḥ
hiindeed
bhuṅktedesires to enjoy
prakṛitijān
guṇānthe three modes of nature
kāraṇamthe cause
guṇasaṅgaḥ
asyaof its
satasat
janmasuof birth
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.21
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते

प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुखदुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.23
उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः

यह पुरुष प्रकृति-(शरीर-) के साथ सम्बन्ध रखनेसे 'उपद्रष्टा', उसके साथ मिलकर सम्मति, अनुमति देनेसे 'अनुमन्ता', अपनेको उसका भरणपोषण करनेवाला माननेसे 'भर्ता', उसके सङ्गसे सुखदुःख भोगनेसे 'भोक्ता', और अपनेको उसका स्वामी माननेसे 'महेश्वर' बन जाता है। परन्तु स्वरूपसे यह पुरुष 'परमात्मा' कहा जाता है। यह देहमें रहता हुआ भी देहसे पर (सम्बन्ध-रहित) ही है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 22
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 22
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु

प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है और गुणोंका सङ्ग ही उसके ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बनता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 22 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 22 का हिंदी अर्थ: "प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है और गुणोंका सङ्ग ही उसके ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बनता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 22?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 22 translates to: "The soul seated in Nature experiences the qualities born of Nature; attachment to the qualities is the cause of its birth in good and evil wombs. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 22 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है और गुणोंका सङ्ग ही उसके ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बनता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "puruṣhaḥ prakṛiti-stho hi bhuṅkte prakṛiti-jān guṇān" mean in English?

"puruṣhaḥ prakṛiti-stho hi bhuṅkte prakṛiti-jān guṇān" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 22. The soul seated in Nature experiences the qualities born of Nature; attachment to the qualities is the cause of its birth in good and evil wombs. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.