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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 21
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते

प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुखदुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है। — VaniSagar

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MarathiIND

परिणाम आणि कारणाच्या निर्मितीमध्ये, निसर्ग (पदार्थ) हे कारण आहे असे म्हटले जाते; सुख-दुःखाच्या अनुभवात, आत्मा जबाबदार आहे असे म्हटले जाते.

MalayalamIND

ഫലത്തിൻ്റെയും കാരണത്തിൻ്റെയും ഉൽപാദനത്തിൽ, പ്രകൃതി (ദ്രവ്യം) കാരണമായി പറയുന്നു; സുഖത്തിൻ്റെയും വേദനയുടെയും അനുഭവത്തിൽ, ആത്മാവ് ഉത്തരവാദിയാണെന്ന് പറയപ്പെടുന്നു.

SindhiIND

اثر ۽ سبب جي پيداوار ۾، فطرت (معاملو) کي سبب چيو ويندو آهي. خوشي ۽ درد جي تجربي ۾، روح کي چيو ويندو آهي هڪ ذميوار آهي.

KannadaIND

ಪರಿಣಾಮ ಮತ್ತು ಕಾರಣದ ಉತ್ಪಾದನೆಯಲ್ಲಿ, ಪ್ರಕೃತಿ (ವಸ್ತು) ಕಾರಣವೆಂದು ಹೇಳಲಾಗುತ್ತದೆ; ಸಂತೋಷ ಮತ್ತು ನೋವಿನ ಅನುಭವದಲ್ಲಿ, ಆತ್ಮವು ಜವಾಬ್ದಾರನೆಂದು ಹೇಳಲಾಗುತ್ತದೆ.

GujaratiIND

અસર અને કારણના ઉત્પાદનમાં, પ્રકૃતિ (દ્રવ્ય) એ કારણ કહેવાય છે; આનંદ અને દુઃખના અનુભવમાં, આત્મા જવાબદાર હોવાનું કહેવાય છે.

BengaliIND

প্রভাব ও কারণের উৎপাদনে, প্রকৃতিকে (বস্তু) কারণ বলা হয়; আনন্দ ও বেদনার অভিজ্ঞতায় আত্মাকেই দায়ী বলা হয়।

KonkaniIND

परिणाम आनी कारण हांच्या उत्पादनांत सैम (द्रव्य) हें कारण अशें म्हण्टात; सुख-दुख्खाच्या अणभवांत आत्मोच जापसालदार अशें म्हण्टात.

DogriIND

प्रभाव ते कारण दे उत्पादन च प्रकृति (द्रव्य) गी कारण आखेआ जंदा ऐ; सुख-दुख दे अनुभव च आत्मा गी गै जिम्मेदार आखेआ जंदा ऐ।

MaithiliIND

प्रभाव आ कारण के उत्पादन में प्रकृति (द्रव्य) के कारण कहल गेल अछि; सुख-दुःखक अनुभव मे आत्मा केँ जिम्मेदार कहल जाइत छैक |

ManipuriIND

ꯏꯐꯦꯛꯇ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯔꯝ ꯄꯨꯊꯣꯀꯄꯗꯥ ꯅꯦꯆꯔ (ꯃꯦꯇꯔ) ꯑꯁꯤꯅꯥ ꯃꯔꯝ ꯑꯣꯏ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯍꯥꯌꯅꯩ; ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯋꯥꯕꯒꯤ ꯑꯦꯛꯁꯄꯔꯤꯌꯦꯟꯁꯇꯥ ꯊꯋꯥꯏꯅꯥ ꯊꯧꯗꯥꯡ ꯂꯧꯔꯤ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯍꯥꯌꯅꯩ꯫

BhojpuriIND

प्रभाव आ कारण के उत्पादन में प्रकृति (पदार्थ) के कारण कहल जाला; सुख-दुख के अनुभव में आत्मा के जिम्मेदार कहल जाला।

AssameseIND

প্ৰভাৱ আৰু কাৰণৰ উৎপাদনত প্ৰকৃতি (পদাৰ্থ)ক কাৰণ বুলি কোৱা হয়; সুখ-দুখৰ অভিজ্ঞতাত আত্মাক দায়ী বুলি কোৱা হয়।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- [इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रके विषयमें यच्च (जो है)? यादृक् च (जैसा है)? यद्विकारि (जिन विकारोंवाला है) और यतश्च यत् (जिससे जो उत्पन्न हुआ है) -- ये चार बातें सुननेकी आज्ञा दी थी। उनमेंसे यच्च का वर्णन पाँचवें श्लोकमें और यद्विकारि का वर्णन छठे श्लोकमें कर दिया। यादृक् च का वर्णन आगे इसी अध्यायके छब्बीसवेंसत्ताईसवें श्लोकोंमें करेंगे। अब यतश्च यत् का वर्णन करते हुए प्रकृतिसे विकारों और गुणोंको उत्पन्न हुआ बताते हैं। इसमें भी देखा जाय तो विकारोंका वर्णन पहले छठे श्लोकमें इच्छा द्वेषः आदि पदोंसे किया जा चुका है। यहाँ गुण प्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं -- यह बात नयी बतायी है।बारहवेंसे अठारहवें श्लोकतक ज्ञेय तत्त्व(परमात्मा) का वर्णन है और यहाँ उन्नीसवेंसे चौंतीसवें श्लोकतक पुरुष(क्षेत्रज्ञ) का वर्णन है। वहाँ तो ज्ञेय तत्त्वके अन्तर्गत ही सब कुछ है और यहाँ पुरुषके अन्तर्गत सब कुछ है अर्थात् वहाँ ज्ञेय तत्त्वके अन्तर्गत पुरुष है और यहाँ पुरुषके अन्तर्गत ज्ञेय तत्त्व है। तात्पर्य यह है कि ज्ञेय तत्त्व (परमात्मा) और पुरुष (क्षेत्रज्ञ) -- दोनों तत्त्वसे दो नहीं हैं? प्रत्युत एक ही हैं।]प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि -- यहाँ प्रकृतिम्पद सम्पूर्ण क्षेत्र(जगत्)की कारणरूप मूल प्रकृतिका वाचक है। सात प्रकृतिविकृति (पञ्चमहाभूत? अहंकार और महत्तत्त्व) तथा सोलह विकृति (दस? इन्द्रियाँ? मन और पाँच विषय) -- ये सभी प्रकृतिके कार्य हैं और प्रकृति इन सबकी मूल कारण है।पुरुषम् पद यहाँ क्षेत्रज्ञका वाचक है? जिसको इसी अध्यायके पहले श्लोकमें क्षेत्रको जाननेवाला कहा गया है।प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको अनादि कहनेका तात्पर्य है कि जैसे परमात्माका अंश यह पुरुष (जीवात्मा) अनादि है? ऐसे ही यह प्रकृति भी अनादि है। इन दोनोंके अनादिपनेमें फरक नहीं है किन्तु दोनोंके स्वरूपमें फरक है। जैसे -- प्रकृति गुणोंवाली है और पुरुष गुणोंसे सर्वथा रहित है प्रकृतिमें विकार होता है और पुरुषमें विकार नहीं होता प्रकृति जगत्की कारण बनती है और पुरुष किसीका भी कारण नहीं बनता प्रकृतिमें कार्य एवं कारणभाव है और पुरुष कार्य एवं कारणभावसे रहित है।उभौ एव कहनेका तात्पर्य है कि प्रकृति और पुरुष -- दोनों अलगअलग हैं। अतः जैसे प्रकृति और पुरुष अनादि हैं? ऐसे ही उन दोनोंका यह भेद (विवेक) भी अनादि है।इसी अध्यायके पहले श्लोकमें आये इदं शरीरं क्षेत्रम् पदोंसे मनुष्यशरीरकी तरफ ही दृष्टि जाती है अर्थात् व्यष्टि मनुष्यशरीरका ही बोध होता है और क्षेत्रज्ञः पदसे मनुष्यशरीरको जाननेवाले व्यष्टि क्षेत्रज्ञका ही,बोध होता है। अतः प्रकृति और उसके कार्यमात्रका बोध करानेके लिये यहाँ प्रकृतिम् पदका और मात्र क्षेत्रज्ञोंका बोध करानेके लिये यहाँ पुरुषम् पदका प्रयोग किया गया है।इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें क्षेत्रज्ञकी परमात्माके साथ एकता जाननेके लिये विद्धि पदका प्रयोग किया था और यहाँ पुरुषकी प्रकृतिसे भिन्नता जाननेके लिये विद्धि पदका प्रयोग किया गया है। तात्पर्य है कि मनुष्य स्वयंको और शरीरको एक समझता है? इसलिये भगवान् यहाँ विद्धि पदसे अर्जुनको यह आज्ञा देते हैं कि ये दोनों सर्वथा अलगअलग हैं -- इस बातको तुम ठीक तरहसे समझ लो।विकारांश्च गुणंश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् -- इच्छा? द्वेष? सुख? दुःख? संघात? चेतना और धृति -- इन सात विकारोंको तथा सत्त्व? रज और तम -- इन तीन गुणोंको प्रकृतिसे उत्पन्न हुए समझो। इसका तात्पर्य यह है कि पुरुषमें विकार और गुण नहीं हैं।सातवें अध्यायमें तो भगवान्ने गुणोंको अपनेसे उत्पन्न बताया है (7। 12) और यहाँ गुणोंको प्रकृतिसे उत्पन्न बताते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि वहाँ भक्तिका प्रकरण होनेसे भगवान्ने गुणोंको अपनेसे उत्पन्न बताया है और गुणमयी मायासे तरनेके लिये अपनी शरणागति बतायी है। परन्तु यहाँ ज्ञानका प्रकरण होनेसे गुणोंको प्रकृतिसे उत्पन्न बताया है। अतः साधक गुणोंसे अपना सम्बन्ध न मानकर ही गुणोंसे छूट सकता है।कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते -- आकाश? वायु? अग्नि? जल और पृथ्वी तथा शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- इन दस(महाभूतों और विषयों)का नाम कार्य है। श्रोत्र? त्वचा? नेत्र? रसना? घ्राण? वाणी? हस्त? पाद? उपस्थ और गुदा तथा मन? बुद्धि और अहंकार -- इन तेरह(बहिःकरण और अन्तःकरण)का नाम करण है। इन सबके द्वारा जो कुछ क्रियाएँ होती हैं? उनको उत्पन्न करनेमें प्रकृति ही हेतु है।जो उत्पन्न होता है? वह कार्य कहलाता है और जिसके द्वारा कार्यकी सिद्धि होती है? वह करण कहलाता है अर्थात् क्रिया करनेके जितने औजार (साधन) हैं? वे सब करण कहलाते हैं। करण तीन तरहके होते हैं -- (1) कर्मेन्द्रियाँ? (2) ज्ञानेन्द्रियाँ और (3) मन? बुद्धि एवं अहंकार। कर्मेन्द्रियाँ स्थूल हैं? ज्ञानेन्द्रियाँ सूक्ष्म हैं और मन? बुद्धि एवं अहंकार अत्यन्त सूक्ष्म हैं। कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंको बहिःकरण कहते हैं तथा मन? बुद्धि और अहंकारको अन्तःकरण कहते हैं। जिनसे क्रियाएँ होती है? वे कर्मेन्द्रियाँ हैं और कर्मेन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियोंपर जो शासन करते हैं? वे मन? बुद्धि और अहंकार हैं। तात्पर्य है कि कर्मेन्द्रियोंपर ज्ञानेन्द्रियोंका शासन है? ज्ञानेन्द्रियोंपर मनका शासन है? मनपर बुद्धिका शासन है और बुद्धिपर अहंकारका शासन है। मन? बुद्धि और अहंकारके बिना कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ काम नहीं करतीं। ज्ञानेन्द्रियोंके साथ जब मनका सम्बन्ध हो जाता है? तब विषयोंका ज्ञान होता है। मनसे जिन विषयोंका ज्ञान होता है? उन विषयोंमेंसे कौनसा विषय ग्राह्य है और कौनसा त्याज्य है? कौनसा विषय ठीक है और कौनसा बेठीक है -- इसका निर्णय बुद्धि करती है। बुद्धिके द्वारा निर्णीत विषयोंपर अहंकार शासन करता है।अहंकार दो तरहका होता है -- (1) अहंवृत्ति और (2) अहंकर्ता। अहंवृत्ति किसीके लिये कभी दोषी नहीं होती? पर उस अहंवृत्तिके साथ जब स्वयं (पुरुष) अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है? तादात्म्य कर लेता है? तब वह अहंकर्ता बन जाता है। तात्पर्य है कि अहंवृत्तिसे मोहित होकर? उसके परवश होकर स्वयं उस अहंवृत्तिसे मोहित होकर? उसके परवश होकर स्वयं उस अहंवृत्तिमें अपनी स्थिति मान लेता है तो वह कर्ता बन जाता है -- अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते (गीता 3। 27)।प्रकृतिका कार्य बुद्धि (महत्तत्त्व) है और बुद्धिका कार्य अहंवृत्ति (अहंकार) है। यह अहंवृत्ति है तो बुद्धिका कार्य? पर इसके साथ तादात्म्य करके स्वयं बुद्धिका मालिक बन जाता है अर्थात् कर्ता और भोक्ता बन जाता है -- पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् (गीता 13। 21)। परन्तु जब तत्त्वका बोध हो जाता है? तब स्वयं न कर्ता बनता है और न भोक्ता ही बनता है -- शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते (गीता 13। 31)। फिर कर्तृत्वभोक्तृत्वरहित पुरुषके शरीरद्वारा जो कुछ क्रियाएँ होती हैं? वे सब क्रियाएँ अहंवृत्तिसे ही होती हैं। इसी अहंवृत्तिके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको गीतामें कई तरहसे बताया गया है जैसे -- प्रकृतिके द्वारा ही सब क्रियाएँ होती हैं। (13। 29) प्रकृतिके गुणोंद्वारा ही सब क्रियाएँ होती हैं (3। 27) गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं (3। 28) गुणोंके सिवाय दूसरा कोई कर्ता नहीं है (14। 19) इन्द्रियाँ ही अपनेअपने विषयोंमें बरत रही हैं (5। 9) आदि। तात्पर्य है कि बहिःकरण और अन्तःकरणके द्वारा जो क्रियाएँ होती हैं? वे सब प्रकृतिसे ही होती हैं।पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते -- अनुकूल परिस्थितिके आनेपर सुखी (राजी) होना -- यह सबका भोग है और प्रतिकूल परिस्थितिके आनेपर दुःखी (नाराज) होना -- यह दुःखका भोग है। यह सुखदुःखका भोग पुरुष(चेतन)में ही होता है -- प्रकृति(जड)में नहीं क्योकि जड प्रकृतिमें सुखीदुःखी होनेकी सामर्थ्य नहीं है। अतः सुखदुःखके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा गया है। अगर पुरुष अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितियोंसे मिलकर राजीनाराज न हो तो वह सुखदुःखका भोक्ता नहीं बन सकता।सातवें अध्यायके चौथेपाँचवें श्लोकोंमें भगवान्ने अपरा (जड) और परा (चेतन) नामसे अपनी दो प्रकृतियोंका वर्णन किया है। ये दोनों प्रकृतियाँ भगवान्के स्वभाव हैं? इसलिये ये दोनों स्वतः ही भगवान्की ओर जा रही हैं। परन्तु परा प्रकृति (चेतन)? जो परमात्माका अंश है और जिसकी स्वाभाविक रुचि परमात्माकी ओर जानेकी ही है? तात्कालिक सुखभोगमें आकर्षित होकर अपरा प्रकृति(जड)के साथ तादात्म्य कर लेता है। इतना ही नहीं? प्रकृतिके साथ तादात्म्य करके वह प्रकृतिस्थ पुरुषके रूपमें अपनी एक स्वतन्त्र सत्ताका निर्माण कर लेता है (गीता 13। 21)? जिसको अहम् कहते हैं। इस अहम् में जड और चेतन दोनों हैं। सुखदुःखरूप जो विकार होता है? वह जडअंशमें ही होता है? पर जडसे तादात्म्य होनेके कारण उसका परिणाम ज्ञाता चेतनपर होता है अर्थात् जडके सम्बन्धसे सुखदुःखरूप विकारको चेतन अपनेमें मान लेता है कि मैं सुखी हूँ? मैं दुःखी हूँ। जैसे? घाटा लगता है दूकानमें? पर दूकानदार कहता है कि मुझे घाटा लग गया। ज्वर शरीरमें आता है? पर मान लेता है कि मेरेमें ज्वर आ गया। स्वयंमें ज्वर नहीं आता ? यदि आता तो कभी मिटता नहीं।सुखदुःखका परिणाम चेतनपर होता है? तभी वह सुखदुःखसे मुक्ति चाहता है। अगर वह सुखीदुःखी न हो? तो उसमें मुक्तिकी इच्छा हो ही नहीं सकती। मुक्तिकी इच्छा जडके सम्बन्धसे ही होती है क्योंकि जडको स्वीकार करनेसे ही बन्धन हुआ है। जो अपनेको सुखीदुःखी मानता है? वही सुखदुःखरूप विकारसे अपनी मुक्ति चाहता है और उसीकी मुक्ति होती है। तात्पर्य है कि तादात्म्यमें मुक्ति(कल्याण) की इच्छामें चेतनकी मुख्यता और भोगोंकी इच्छामें जडकी मुख्यता होती है? इसलिये अन्तमें कल्याणका भागी चेतन ही होता है? जड नहीं।विकृतिमात्र जडमें ही होती है? चेतनमें नहीं। अतः वास्तवमें सुखीदुःखी होना चेतनका धर्म नहीं है? प्रत्युत जडके सङ्गसे अपनेको सुखीदुःखी मानना ज्ञाता चेतनका स्वभाव है। तात्पर्य है कि चेतन सुखीदुःखी होता नहीं? प्रत्युत (सुखाकारदुःखाकार वृत्तिसे मिलकर) अपनेको सुखीदुःखी मान लेता है। चेतनमें एकदूसरेसे विरुद्ध सुखदुःखरूप दो भाव हो ही कैसे सकते हैं दो रूप परिवर्तनशील प्रकृतिमें ही हो सकते हैं। जो परिवर्तनशील नहीं है? उसके दो रूप नहीं हो सकते। तात्पर्य यह है कि सब विकार परिवर्तनशीलमें ही हो सकते हैं। चेतन स्वयं ज्योंकात्यों रहते हुए भी परिवर्तनशील प्रकृतिके संगसे उसके विकारोंको अपनेमें आरोपित करता रहता है। यह सबका अनुभव भी है कि हम सुखमें दूसरे तथा दुःखमें दूसरे नहीं हो जाते। सुख और दुःख दोनों अलगअलग हैं? पर हम एक ही रहते हैं इसीलिये कभी सुखी होते हैं और कभी दुःखी होते हैं। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने पुरुषको सुखदुःखके भोगनेमें हेतु बताया। इसपर प्रश्न होता है कि कौनसा पुरुष सुखदुःखका भोक्ता बनता है इसका उत्तर अब भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

प्रकृतिसे उत्पन्न हुए वे विकार और गुण कौनसे हैं --, कार्य शरीरको कहते हैं और उसमें स्थित ( मन? बुद्धि? अहंकार तथा दश इन्द्रियाँ -- ये ) तेरह कारण हैं। इनके कर्त्तापनमें ( हेतु प्रकृति है )। शरीरको उत्पन्न करनेवाले पाँच भूत और शब्द आदि पाँच विषय ये पहले कहे हुए प्रकृतिजन्य दश विकार तो यहाँ कार्यके ग्रहणसे ग्रहण किये जाते हैं और सुखदुःख? मोह आदिके रूपमें परिणत हुए प्रकृतिजन्य समस्त गुण बुद्धि आदि कारणोंके आश्रित होनेके कारण करणोंके ग्रहणसे ग्रहण किये जाते हैं। उन कार्य और करणोंका जो कर्तापन अर्थात् उनको उत्पन्न करनेका भाव है उसका नाम कार्यकरण कर्तृत्व है? उन कार्यकरणोंके कर्तृत्वमें आरम्भ करनेवाली होनेसे प्रकृति कारण कही जाती है। इस प्रकार कार्यकरणोंको उत्पन्न करनेवाली होनेसे प्रकृति संसारकी कारण है। कार्यकारणकर्तृत्वे ऐसा पाठ माननेसे भी यही अर्थ होगा कि जो जिसका परिणाम है? वह उसका कार्य अर्थात् विकार है? और कारण विकारी -- विकृत होनेवाला -- है। उन विकारी और विकाररूप कारण और कार्योंके उत्पन्न करनेमें ( प्रकृति हेतु है )। अथवा सोलह विकार तो कार्य और सात प्रकृति विकृति कारण हैं? इस प्रकार ये ( तेईस तत्त्व ) ही कार्यकारणके नामसे कहे जाते हैं। इनके कर्तापनमें प्रारम्भकत्वसे ही प्रकृति हेतु कही जाती है। पुरुष भी जिस प्रकार संसारका कारण होता है? सो कहा जाता है -- पुरुष अर्थात् जीव? क्षेत्रज्ञ? भोक्ता इत्यादि जिसके पर्याय शब्द है? वह सुखदुःख आदि भोगोंके भोक्तापनमें,अर्थात् उनका उपभोग करनेमें हेतु कहा जाता है। पू0 -- परंतु इस कार्यकरणके कर्तापनसे और सुख दुःखके भोक्तापनसे प्रकृति और पुरुष दोनोंको संसारका कारण कैसे बतलाया जाता है उ0 -- कार्यकरण और सुखदुःखादिरूप हेतु और फलके आकारमें प्रकृतिका परिणाम न होनेपर तथा चेतन पुरुषमें उन सबका भोक्तापन न होनेसे संसार कैसे सिद्ध होगा। जब कार्यकरणरूप हेतु और फलके आकारमें परिणत हुई भोग्यरूपा प्रकृतिके साथ उससे विपरीत धर्मवाले पुरुषका? भोक्ता भावसे अविद्यारूप संयोग होगा? तभी संसार ( प्रतीत ) होगा। इसलिये प्रकृतिके कार्यकरणविषयक कर्तापन और पुरुषके सुख दुःखविषयक भोक्तापनको लेकर जो उन दोनोंका संसारकारणत्व प्रतिपादन किया गया? वह उचित ही है। पू0 -- तो यह संसारनामक वस्तु क्या है उ0 -- सुख दुःखोंका भोग ही संसार है और पुरुषमें जो सुखदुःखोंका भोक्तृत्व है? यही उसका संसारित्व है।

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Sri Anandgiri

श्लोकान्तरं प्रश्नोत्तरत्वेनावतारयति -- यदिति। निमित्तं वक्तुमादौ संसारित्वमस्याविद्यैक्याध्यासादित्याह -- पुरुष इति। यस्मात्प्रकृतिमात्मत्वेन गतस्तस्माद्भुङ्क्त इति योजना। गुणविषयं भोगमभिनयति -- सुखीति। अविद्याया भोगहेतुत्वात्किं कारणान्वेषणयेत्याशङ्क्याह -- सत्यमपीति। सङ्गस्य जन्मादौ संसारे प्रधानहेतुत्वे मानमाह -- स यथेति। उक्तेऽर्थे द्वितीयार्धमवतार्य व्याचष्टे -- तदेतदित्यादिना। साध्याहारं योजनान्तरमाह -- अथवेति। सदसद्योनीर्विविच्य व्याचष्टे -- सद्योनय इति। योनिद्वयनिर्देशान्मध्यवर्तिन्यो मनुष्ययोनयोऽपि ध्वनिता इत्याह -- सामर्थ्यादिति। सङ्गस्य संसारकारणत्वे नाविद्यायास्तत्कारणत्वमेकस्मादेव हेतोस्तदुपपत्तेरित्याशङ्क्याह -- एतदिति। अविद्योपादानं सङ्गो निमित्तमित्युभयोरपि कारणत्वं सिध्यतीत्यर्थः। द्विविधहेतूक्तेर्विवक्षितं फलमाह -- तच्चेति। सासङ्गस्याज्ञानस्य स्वतोऽनिवृत्तेस्तन्निवर्तकं वाच्यमित्याशङ्क्याह -- अस्येति। वैराग्ये सति संन्यासस्तत्पूर्वकं च ज्ञानं सासङ्गाज्ञाननिवर्तकमित्यर्थः। उक्ते ज्ञाने मानमाह -- गीतेति। अध्यायादौ चोक्तं ज्ञानमुदाहृतमित्याह -- तच्चेति। तदेव ज्ञानं यज्ज्ञात्वेत्यादिना न सत्तन्नासदित्यन्तेनान्यनिषेधेन सर्वतःपाणिपादमित्यादिना चातद्धर्माध्यासेनोक्तमित्याह -- यज्ज्ञात्वेति।

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Sri Dhanpati

के पुनर्विकारा गुणाश्च प्रकृतिसंभवा इत्याकाङ्क्षायां तान्यदर्शयन् प्रकृतेः संसारहेतुत्वं दर्शयति -- कार्येति। कार्यं शरीरम्। कार्यग्रहणेन शरीरारम्भकाणि भूतानि विषयाश्च गृह्यन्ते। करणानि देहस्थानि। ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं कर्मेन्द्रियपञ्चकं मनो बुद्धिरहंकारश्चेति त्रयोदश। करणग्रहणेन करणाश्रितत्वात्सुघदुःखमोहात्मका गुणा गृह्यन्ते। तेषां कार्यकरणानां कर्तत्वे उत्पादकत्वे प्रकृतिरारम्भकत्वेन हेतुः कारणमुच्यते। एवं कार्यकरणकर्तृत्वेन संसारस्य कारणं प्रकृतिरुक्ता। कार्यकारणकर्तृत्वे इति पाठेप्ययमेवार्थः। यद्वा एकादशेन्द्रियाणि प़ञ्चविषयाः षोडशविकाराः कार्यं महानहंकारो भूततन्मात्राणि पञ्चेति सप्तप्रकृतिविकृतयः कारणं तेषां कर्तत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते इत्यर्थः। एवमपरप्रकृतेः संसारकारणत्वं प्रदर्श्य,परप्रकृतेस्तत्कारणत्वं दर्शयति। पुरुषः जीवः क्षेत्रज्ञः सुखदुःखानां भोग्यानां भोक्तृत्वे उपलब्धृत्वे हेतुरुच्यते। तथाच कार्यकारणसुखदुःस्वरुपेण हेतुफलात्मना प्रकृतेः परिणामाभावे पुरुषस्य च चेतनस्य तदुपलब्धृत्वेऽसति संसारो न संभवतीत्यतः प्रकृतिपुरुषयोः कार्यकारणकर्तृत्वेन सुखदुःभोक्तृत्वेन च संसारकारणत्वमिति। संसारश्च सुखदुःखभोगः पुरुषस्य च सुखदुःखानां भोक्तृत्वं संसारित्वं। अन्ये तु यथाभाष्यं व्याख्यातमित्युक्त्वा वर्णयन्ति। यद्वा पुरुषस्य कार्यत्वे कारणत्वे कर्तत्वे च प्रकृतिरेव पुरुषतादात्म्यं प्राप्ता हेतुर्भवति। तथा प्रकृतेः सुखदुःखभोक्तृत्वे स्वच्छायाप्रदाने पुरुषः कारणं कार्यत्वादयः प्राकृतदेहेन्द्रियबुद्धिधर्माः सन्तश्चिदात्मन्यारोप्यन्ते गौरोहममुष्य पुत्रोऽहं काणोऽहं खञ्जोऽहं करोभ्यमकार्षमहमिति तथा चिच्छायापन्ना बुद्धिः तेचयाम्यहं सुखदुःखादीनुपालमे इति मन्यत। सायं प्रकृतिपुरुषोरन्योन्यधर्माध्यासः संसारस्य कारणमित्युपपादितं भवति। सांख्याभिमतं पुरुषस्य भोक्तृत्वमपि निरस्तं भवति। अन्यथा प्रकृतिः कर्त्री पुरुषो भोक्तेति कर्तृत्वभोक्तृत्वयोर्वैयदिकण्यमापद्येत। नच भोक्तुर्निर्विकारित्वमपि वक्तुं शक्यमिति। अत्रेदमवधेयम्। यथा मूलं व्याख्यानकर्तृ़णां सर्वज्ञानां भाष्कृतां व्याख्याने सांख्यमतस्येश्वरानधिष्ठितं जडं प्रधानं कर्तृ चेतनश्च भोक्तेत्येवंरुपस्य नास्ति प्रवेशः प्रकृतिरीश्वरस्य हि विकारकारणशक्तिस्त्रिगुणात्मिका माया पुरुषः जीवः क्षेत्रज्ञ इत्येवं तैरुक्तत्वात्। उत्तरश्लोके पुरुषो भोक्ता प्रकृतिस्थः प्रकृतावविद्यालक्षणायां स्थिति इत्यादिवक्ष्यमाणत्वाच्च। तताचाविद्यैक्याध्यासादात्मनो भोक्तृत्वेन संसारित्वमिति वस्तुतो निर्विकारत्वं दुर्निवारम्। यद्यपि प्रकृतिस्थस्य कर्तृत्वभोक्तृत्वे तथापि कर्तृत्वे उपाधिप्राधान्यात्पृकृतेः कर्तृत्वमुच्यते। भोक्तृत्वे तूपहितस्य प्राधान्याज्जीवस्य भोक्तृत्वमतो न वैयधिकरण्यदोषोऽपीत्यादिसर्वं भाष्यादेव लभ्यत इत्यतोऽध्याहारेण क्लिष्टकल्पनया च भाष्यातिरिक्तव्याख्यानप्रदर्शनं नोचितमिति। एतेन कार्यं यज्ञब्रह्महत्यादि कारणं पुरोडाशखङ्गादि कर्तृत्वं साधनप्रयोक्तृत्वं तच्च तच्चेति द्वन्द्वे एकवद्भावः। हेतुः प्रकृतिरुच्यते एवं चेत्प्रकृतेरेव स्वर्गनरकादि भवेन्न जीवस्य। तथाच बन्धाभावान्न मोक्षे जीवानां प्रयत्नः स्यादित्यत आह। पुरुषइत्यादिकाः पूर्वोत्तरप्रकरणानुरोधविनिर्मुक्ता भाष्यबहिर्भूताः कल्पना निराकृता वेदितव्याः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
kāryaeffect
kāraṇacause
kartṛitvein the matter of creation
hetuḥthe medium
prakṛitiḥthe material energy
uchyateis said to be
puruṣhaḥthe individual soul
sukhaduḥkhānām
bhoktṛitvein experiencing
hetuḥis responsible
uchyateis said to be
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Bhagavad Gita · 13.20
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्

प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुख-दुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.22
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु

प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है और गुणोंका सङ्ग ही उसके ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बनता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 21
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 21
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते

प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुखदुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है। — VaniSagar

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Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 21 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 21 का हिंदी अर्थ: "प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुखदुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 21?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 21 translates to: "In the production of the effect and the cause, Nature (matter) is said to be the cause; in the experience of pleasure and pain, the soul is said to be the one responsible. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यत" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 21 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुखदुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "kārya-kāraṇa-kartṛitve hetuḥ prakṛitir uchyate" mean in English?

"kārya-kāraṇa-kartṛitve hetuḥ prakṛitir uchyate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 21. In the production of the effect and the cause, Nature (matter) is said to be the cause; in the experience of pleasure and pain, the soul is said to be the one responsible. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.