
“प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुख-दुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है। — VaniSagar”
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জেনে রাখুন যে প্রকৃতি (বস্তু) এবং আত্মা উভয়ই অনাদি, এবং এটিও জেনে রাখুন যে সমস্ত পরিবর্তন এবং গুণাবলী প্রকৃতি থেকে জন্মগ্রহণ করে।
இயற்கை (பொருள்) மற்றும் ஆவி இரண்டும் தொடக்கமற்றவை என்பதை அறிந்து கொள்ளுங்கள், மேலும் அனைத்து மாற்றங்களும் குணங்களும் இயற்கையிலிருந்து பிறந்தவை என்பதையும் அறிந்து கொள்ளுங்கள்.
ಪ್ರಕೃತಿ (ವಸ್ತು) ಮತ್ತು ಆತ್ಮ ಎರಡೂ ಆರಂಭವಿಲ್ಲದವು ಎಂದು ತಿಳಿಯಿರಿ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲಾ ಮಾರ್ಪಾಡುಗಳು ಮತ್ತು ಗುಣಗಳು ಪ್ರಕೃತಿಯಿಂದ ಹುಟ್ಟಿವೆ ಎಂದು ತಿಳಿಯಿರಿ.
हे जाणून घ्या की प्रकृती (पदार्थ) आणि आत्मा दोन्ही अनादि आहेत, आणि हे देखील जाणून घ्या की सर्व बदल आणि गुण निसर्गापासून जन्माला येतात.
प्रकृति र परमात्मा दुवै अनादि छन् भन्ने जान्नुहोस् र यो पनि जान्नुहोस् कि सबै परिमार्जन र गुणहरू प्रकृतिबाट उत्पन्न हुन्छन्।
જાણો કે પ્રકૃતિ (દ્રવ્ય) અને આત્મા બંને અનાદિ છે, અને એ પણ જાણો કે બધા ફેરફારો અને ગુણો કુદરતમાંથી જન્મે છે.
ڄاڻو ته فطرت (مادو) ۽ روح ٻئي بي ابتدا آهن، ۽ اهو به ڄاڻو ته سڀئي تبديليون ۽ خاصيتون فطرت مان پيدا ٿين ٿيون.
ਜਾਣੋ ਕਿ ਕੁਦਰਤ (ਪਦਾਰਥ) ਅਤੇ ਆਤਮਾ ਦੋਵੇਂ ਬੇਅੰਤ ਹਨ, ਅਤੇ ਇਹ ਵੀ ਜਾਣੋ ਕਿ ਸਾਰੀਆਂ ਸੋਧਾਂ ਅਤੇ ਗੁਣ ਕੁਦਰਤ ਤੋਂ ਪੈਦਾ ਹੋਏ ਹਨ।
ప్రకృతి (పదార్థం) మరియు ఆత్మ రెండూ ప్రారంభం లేనివని తెలుసుకోండి మరియు అన్ని మార్పులు మరియు గుణాలు ప్రకృతి నుండి పుట్టాయని కూడా తెలుసుకోండి.
പ്രകൃതിയും (ദ്രവ്യവും) ആത്മാവും തുടക്കമില്ലാത്തതാണെന്ന് അറിയുക, കൂടാതെ എല്ലാ പരിഷ്കാരങ്ങളും ഗുണങ്ങളും പ്രകൃതിയിൽ നിന്നാണ് ജനിച്ചതെന്നും അറിയുക.
प्रकृति (द्रव्य) आ आत्मा दुनू आदिहीन अछि से जानू, आ ईहो जानू जे सभ परिवर्तन आ गुण प्रकृति सँ जन्म लैत अछि |
Nature (matter) leh Thlarau hi bul tanna nei lo an ni tih hria la, siamthatna leh mizia zawng zawng hi Nature atanga lo piang a ni tih pawh hre bawk ang che.
Sacred Commentaries
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Swami Ramsukhdas
व्याख्या -- [इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रके विषयमें यच्च (जो है)? यादृक् च (जैसा है)? यद्विकारि (जिन विकारोंवाला है) और यतश्च यत् (जिससे जो उत्पन्न हुआ है) -- ये चार बातें सुननेकी आज्ञा दी थी। उनमेंसे यच्च का वर्णन पाँचवें श्लोकमें और यद्विकारि का वर्णन छठे श्लोकमें कर दिया। यादृक् च का वर्णन आगे इसी अध्यायके छब्बीसवेंसत्ताईसवें श्लोकोंमें करेंगे। अब यतश्च यत् का वर्णन करते हुए प्रकृतिसे विकारों और गुणोंको उत्पन्न हुआ बताते हैं। इसमें भी देखा जाय तो विकारोंका वर्णन पहले छठे श्लोकमें इच्छा द्वेषः आदि पदोंसे किया जा चुका है। यहाँ गुण प्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं -- यह बात नयी बतायी है।बारहवेंसे अठारहवें श्लोकतक ज्ञेय तत्त्व(परमात्मा) का वर्णन है और यहाँ उन्नीसवेंसे चौंतीसवें श्लोकतक पुरुष(क्षेत्रज्ञ) का वर्णन है। वहाँ तो ज्ञेय तत्त्वके अन्तर्गत ही सब कुछ है और यहाँ पुरुषके अन्तर्गत सब कुछ है अर्थात् वहाँ ज्ञेय तत्त्वके अन्तर्गत पुरुष है और यहाँ पुरुषके अन्तर्गत ज्ञेय तत्त्व है। तात्पर्य यह है कि ज्ञेय तत्त्व (परमात्मा) और पुरुष (क्षेत्रज्ञ) -- दोनों तत्त्वसे दो नहीं हैं? प्रत्युत एक ही हैं।]प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि -- यहाँ प्रकृतिम्पद सम्पूर्ण क्षेत्र(जगत्)की कारणरूप मूल प्रकृतिका वाचक है। सात प्रकृतिविकृति (पञ्चमहाभूत? अहंकार और महत्तत्त्व) तथा सोलह विकृति (दस? इन्द्रियाँ? मन और पाँच विषय) -- ये सभी प्रकृतिके कार्य हैं और प्रकृति इन सबकी मूल कारण है।पुरुषम् पद यहाँ क्षेत्रज्ञका वाचक है? जिसको इसी अध्यायके पहले श्लोकमें क्षेत्रको जाननेवाला कहा गया है।प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको अनादि कहनेका तात्पर्य है कि जैसे परमात्माका अंश यह पुरुष (जीवात्मा) अनादि है? ऐसे ही यह प्रकृति भी अनादि है। इन दोनोंके अनादिपनेमें फरक नहीं है किन्तु दोनोंके स्वरूपमें फरक है। जैसे -- प्रकृति गुणोंवाली है और पुरुष गुणोंसे सर्वथा रहित है प्रकृतिमें विकार होता है और पुरुषमें विकार नहीं होता प्रकृति जगत्की कारण बनती है और पुरुष किसीका भी कारण नहीं बनता प्रकृतिमें कार्य एवं कारणभाव है और पुरुष कार्य एवं कारणभावसे रहित है।उभौ एव कहनेका तात्पर्य है कि प्रकृति और पुरुष -- दोनों अलगअलग हैं। अतः जैसे प्रकृति और पुरुष अनादि हैं? ऐसे ही उन दोनोंका यह भेद (विवेक) भी अनादि है।इसी अध्यायके पहले श्लोकमें आये इदं शरीरं क्षेत्रम् पदोंसे मनुष्यशरीरकी तरफ ही दृष्टि जाती है अर्थात् व्यष्टि मनुष्यशरीरका ही बोध होता है और क्षेत्रज्ञः पदसे मनुष्यशरीरको जाननेवाले व्यष्टि क्षेत्रज्ञका ही,बोध होता है। अतः प्रकृति और उसके कार्यमात्रका बोध करानेके लिये यहाँ प्रकृतिम् पदका और मात्र क्षेत्रज्ञोंका बोध करानेके लिये यहाँ पुरुषम् पदका प्रयोग किया गया है।इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें क्षेत्रज्ञकी परमात्माके साथ एकता जाननेके लिये विद्धि पदका प्रयोग किया था और यहाँ पुरुषकी प्रकृतिसे भिन्नता जाननेके लिये विद्धि पदका प्रयोग किया गया है। तात्पर्य है कि मनुष्य स्वयंको और शरीरको एक समझता है? इसलिये भगवान् यहाँ विद्धि पदसे अर्जुनको यह आज्ञा देते हैं कि ये दोनों सर्वथा अलगअलग हैं -- इस बातको तुम ठीक तरहसे समझ लो।विकारांश्च गुणंश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् -- इच्छा? द्वेष? सुख? दुःख? संघात? चेतना और धृति -- इन सात विकारोंको तथा सत्त्व? रज और तम -- इन तीन गुणोंको प्रकृतिसे उत्पन्न हुए समझो। इसका तात्पर्य यह है कि पुरुषमें विकार और गुण नहीं हैं।सातवें अध्यायमें तो भगवान्ने गुणोंको अपनेसे उत्पन्न बताया है (7। 12) और यहाँ गुणोंको प्रकृतिसे उत्पन्न बताते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि वहाँ भक्तिका प्रकरण होनेसे भगवान्ने गुणोंको अपनेसे उत्पन्न बताया है और गुणमयी मायासे तरनेके लिये अपनी शरणागति बतायी है। परन्तु यहाँ ज्ञानका प्रकरण होनेसे गुणोंको प्रकृतिसे उत्पन्न बताया है। अतः साधक गुणोंसे अपना सम्बन्ध न मानकर ही गुणोंसे छूट सकता है।कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते -- आकाश? वायु? अग्नि? जल और पृथ्वी तथा शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- इन दस(महाभूतों और विषयों)का नाम कार्य है। श्रोत्र? त्वचा? नेत्र? रसना? घ्राण? वाणी? हस्त? पाद? उपस्थ और गुदा तथा मन? बुद्धि और अहंकार -- इन तेरह(बहिःकरण और अन्तःकरण)का नाम करण है। इन सबके द्वारा जो कुछ क्रियाएँ होती हैं? उनको उत्पन्न करनेमें प्रकृति ही हेतु है।जो उत्पन्न होता है? वह कार्य कहलाता है और जिसके द्वारा कार्यकी सिद्धि होती है? वह करण कहलाता है अर्थात् क्रिया करनेके जितने औजार (साधन) हैं? वे सब करण कहलाते हैं। करण तीन तरहके होते हैं -- (1) कर्मेन्द्रियाँ? (2) ज्ञानेन्द्रियाँ और (3) मन? बुद्धि एवं अहंकार। कर्मेन्द्रियाँ स्थूल हैं? ज्ञानेन्द्रियाँ सूक्ष्म हैं और मन? बुद्धि एवं अहंकार अत्यन्त सूक्ष्म हैं। कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंको बहिःकरण कहते हैं तथा मन? बुद्धि और अहंकारको अन्तःकरण कहते हैं। जिनसे क्रियाएँ होती है? वे कर्मेन्द्रियाँ हैं और कर्मेन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियोंपर जो शासन करते हैं? वे मन? बुद्धि और अहंकार हैं। तात्पर्य है कि कर्मेन्द्रियोंपर ज्ञानेन्द्रियोंका शासन है? ज्ञानेन्द्रियोंपर मनका शासन है? मनपर बुद्धिका शासन है और बुद्धिपर अहंकारका शासन है। मन? बुद्धि और अहंकारके बिना कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ काम नहीं करतीं। ज्ञानेन्द्रियोंके साथ जब मनका सम्बन्ध हो जाता है? तब विषयोंका ज्ञान होता है। मनसे जिन विषयोंका ज्ञान होता है? उन विषयोंमेंसे कौनसा विषय ग्राह्य है और कौनसा त्याज्य है? कौनसा विषय ठीक है और कौनसा बेठीक है -- इसका निर्णय बुद्धि करती है। बुद्धिके द्वारा निर्णीत विषयोंपर अहंकार शासन करता है।अहंकार दो तरहका होता है -- (1) अहंवृत्ति और (2) अहंकर्ता। अहंवृत्ति किसीके लिये कभी दोषी नहीं होती? पर उस अहंवृत्तिके साथ जब स्वयं (पुरुष) अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है? तादात्म्य कर लेता है? तब वह अहंकर्ता बन जाता है। तात्पर्य है कि अहंवृत्तिसे मोहित होकर? उसके परवश होकर स्वयं उस अहंवृत्तिसे मोहित होकर? उसके परवश होकर स्वयं उस अहंवृत्तिमें अपनी स्थिति मान लेता है तो वह कर्ता बन जाता है -- अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते (गीता 3। 27)।प्रकृतिका कार्य बुद्धि (महत्तत्त्व) है और बुद्धिका कार्य अहंवृत्ति (अहंकार) है। यह अहंवृत्ति है तो बुद्धिका कार्य? पर इसके साथ तादात्म्य करके स्वयं बुद्धिका मालिक बन जाता है अर्थात् कर्ता और भोक्ता बन जाता है -- पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् (गीता 13। 21)। परन्तु जब तत्त्वका बोध हो जाता है? तब स्वयं न कर्ता बनता है और न भोक्ता ही बनता है -- शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते (गीता 13। 31)। फिर कर्तृत्वभोक्तृत्वरहित पुरुषके शरीरद्वारा जो कुछ क्रियाएँ होती हैं? वे सब क्रियाएँ अहंवृत्तिसे ही होती हैं। इसी अहंवृत्तिके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको गीतामें कई तरहसे बताया गया है जैसे -- प्रकृतिके द्वारा ही सब क्रियाएँ होती हैं। (13। 29) प्रकृतिके गुणोंद्वारा ही सब क्रियाएँ होती हैं (3। 27) गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं (3। 28) गुणोंके सिवाय दूसरा कोई कर्ता नहीं है (14। 19) इन्द्रियाँ ही अपनेअपने विषयोंमें बरत रही हैं (5। 9) आदि। तात्पर्य है कि बहिःकरण और अन्तःकरणके द्वारा जो क्रियाएँ होती हैं? वे सब प्रकृतिसे ही होती हैं।पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते -- अनुकूल परिस्थितिके आनेपर सुखी (राजी) होना -- यह सबका भोग है और प्रतिकूल परिस्थितिके आनेपर दुःखी (नाराज) होना -- यह दुःखका भोग है। यह सुखदुःखका भोग पुरुष(चेतन)में ही होता है -- प्रकृति(जड)में नहीं क्योकि जड प्रकृतिमें सुखीदुःखी होनेकी सामर्थ्य नहीं है। अतः सुखदुःखके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा गया है। अगर पुरुष अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितियोंसे मिलकर राजीनाराज न हो तो वह सुखदुःखका भोक्ता नहीं बन सकता।सातवें अध्यायके चौथेपाँचवें श्लोकोंमें भगवान्ने अपरा (जड) और परा (चेतन) नामसे अपनी दो प्रकृतियोंका वर्णन किया है। ये दोनों प्रकृतियाँ भगवान्के स्वभाव हैं? इसलिये ये दोनों स्वतः ही भगवान्की ओर जा रही हैं। परन्तु परा प्रकृति (चेतन)? जो परमात्माका अंश है और जिसकी स्वाभाविक रुचि परमात्माकी ओर जानेकी ही है? तात्कालिक सुखभोगमें आकर्षित होकर अपरा प्रकृति(जड)के साथ तादात्म्य कर लेता है। इतना ही नहीं? प्रकृतिके साथ तादात्म्य करके वह प्रकृतिस्थ पुरुषके रूपमें अपनी एक स्वतन्त्र सत्ताका निर्माण कर लेता है (गीता 13। 21)? जिसको अहम् कहते हैं। इस अहम् में जड और चेतन दोनों हैं। सुखदुःखरूप जो विकार होता है? वह जडअंशमें ही होता है? पर जडसे तादात्म्य होनेके कारण उसका परिणाम ज्ञाता चेतनपर होता है अर्थात् जडके सम्बन्धसे सुखदुःखरूप विकारको चेतन अपनेमें मान लेता है कि मैं सुखी हूँ? मैं दुःखी हूँ। जैसे? घाटा लगता है दूकानमें? पर दूकानदार कहता है कि मुझे घाटा लग गया। ज्वर शरीरमें आता है? पर मान लेता है कि मेरेमें ज्वर आ गया। स्वयंमें ज्वर नहीं आता ? यदि आता तो कभी मिटता नहीं।सुखदुःखका परिणाम चेतनपर होता है? तभी वह सुखदुःखसे मुक्ति चाहता है। अगर वह सुखीदुःखी न हो? तो उसमें मुक्तिकी इच्छा हो ही नहीं सकती। मुक्तिकी इच्छा जडके सम्बन्धसे ही होती है क्योंकि जडको स्वीकार करनेसे ही बन्धन हुआ है। जो अपनेको सुखीदुःखी मानता है? वही सुखदुःखरूप विकारसे अपनी मुक्ति चाहता है और उसीकी मुक्ति होती है। तात्पर्य है कि तादात्म्यमें मुक्ति(कल्याण) की इच्छामें चेतनकी मुख्यता और भोगोंकी इच्छामें जडकी मुख्यता होती है? इसलिये अन्तमें कल्याणका भागी चेतन ही होता है? जड नहीं।विकृतिमात्र जडमें ही होती है? चेतनमें नहीं। अतः वास्तवमें सुखीदुःखी होना चेतनका धर्म नहीं है? प्रत्युत जडके सङ्गसे अपनेको सुखीदुःखी मानना ज्ञाता चेतनका स्वभाव है। तात्पर्य है कि चेतन सुखीदुःखी होता नहीं? प्रत्युत (सुखाकारदुःखाकार वृत्तिसे मिलकर) अपनेको सुखीदुःखी मान लेता है। चेतनमें एकदूसरेसे विरुद्ध सुखदुःखरूप दो भाव हो ही कैसे सकते हैं दो रूप परिवर्तनशील प्रकृतिमें ही हो सकते हैं। जो परिवर्तनशील नहीं है? उसके दो रूप नहीं हो सकते। तात्पर्य यह है कि सब विकार परिवर्तनशीलमें ही हो सकते हैं। चेतन स्वयं ज्योंकात्यों रहते हुए भी परिवर्तनशील प्रकृतिके संगसे उसके विकारोंको अपनेमें आरोपित करता रहता है। यह सबका अनुभव भी है कि हम सुखमें दूसरे तथा दुःखमें दूसरे नहीं हो जाते। सुख और दुःख दोनों अलगअलग हैं? पर हम एक ही रहते हैं इसीलिये कभी सुखी होते हैं और कभी दुःखी होते हैं। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने पुरुषको सुखदुःखके भोगनेमें हेतु बताया। इसपर प्रश्न होता है कि कौनसा पुरुष सुखदुःखका भोक्ता बनता है इसका उत्तर अब भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
Sri Harikrishnadas Goenka
सातवें अध्यायमें ईश्वरकी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञरूप अपरा और परा -- दो प्रकृतियाँ बतलायी गयी हैं तथा यह भी कहा गया है कि ये दोनों प्रकृतियाँ समस्त प्राणियोंकी योनि ( कारण ) हैं। अब यह बात बतलायी जाती है कि वे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञरूप दोनों प्रकृतियाँ सब भूतोंकी योनि किस प्रकार हैं --, प्रकृति और पुरुष जो कि ईश्वरकी प्रकृतियाँ हैं? उन दोनोंको ही तू अनादि जान। जिनका आदि न हो उनका नाम अनादि है। ईश्वरका ईश्वरत्व नित्य होनेके कारण उसकी दोनों प्रकृतियोंका भी नित्य होना उचित ही है क्योंकि इन दोनों प्रकृतियोंसे युक्त होना ही ईश्वरकी ईश्वरता है। जिन दोनों प्रकृतियोंद्वारा ईश्वर जगत्की उत्पत्ति स्थिति और प्रलयका कारण है? वे दोनों अनादिसिद्ध ही संसारकी कारण हैं। कोईकोई टीकाकार जो आदि ( कारण ) नहीं हैं वे अनादि कहे जाते हैं? इस प्रकार यहाँ तत्पुरुषसमासका वर्णन करते हैं ( और कहते हैं कि ) इससे केवल ईश्वर ही जगत्का कारण है? यह बात,सिद्ध होती है। यदि प्रकृति और पुरुषको नित्य माना जाय तो संसार उन्हींका रचा हुआ माना जायगा? ईश्वर जगत्का कर्ता सिद्ध न होगा। किंतु ऐसा मानना ठीक नहीं क्योंकि ( यदि प्रकृति और पुरुषको नित्य न माने तो ) प्रकृति और पुरुषकी उत्पत्तिसे पूर्व शासन करने योग्य वस्तुका अभाव होनेसे ईश्वरमें अनीश्वरताका प्रसङ्ग आ जाता है। तथा संसारको बिना निमित्तके उत्पन्न हुआ माननेसे उसके अन्तके अभावका प्रसङ्ग? शास्त्रकी व्यर्थताका प्रसङ्ग और बन्धमोक्षके अभावका प्रसङ्ग प्राप्त होता है? ( इसलिये भी उपर्युक्त अर्थ ठीक नहीं है। ) परंतु ईश्वरकी इन दोनों प्रकृतियोंको नित्य मान लेनेसे यह सब व्यवस्था ठीक हो जाती है। कैसे ( सो कहते हैं -- ) विकारोंको और गुणोंको तू प्रकृतिसे उत्पन्न जान अर्थात् बुद्धिसे लेकर शरीर और इन्द्रियोंतक अगले श्लोकमें बतलाये हुए विकारोंको तथा सुखदुःख और मोह आदि वृत्तियोंके रूपमें परिणत हुए तीनों गुणोंको तू प्रकृतिसे उत्पन्न हुए जान। अभिप्राय यह है कि विकारोंकी कारणरूपा जो ईश्वरकी त्रिगुणमयी माया शक्ति है? उसका नाम प्रकृति है। वह जिन विकारों और गुणोंको उत्पन्न करनेवाली है? उन विकारों और गुणोंको तू प्रकृतिजनित -- प्रकृतिके ही परिणाम समझ।
Sri Anandgiri
विकाराणां गुणानां प्रकृतेश्च स्वरूपमाकाङ्क्षाद्वारा निर्णेतुमुत्तरश्लोकपूर्वार्धं पातयति -- के पुनरिति। पुरुषस्यानादित्वकृतं बन्धहेतुत्वमाह -- पुरुष इति। पूर्वार्धं व्याचष्टे -- कार्यमित्यादिना। ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं कर्मेन्द्रियपञ्चकं मनो बुद्धिरहंकारश्चेति त्रयोदश करणानि। तथापि भूतानां विषयाणां च ग्रहणात्कथं तेषां प्रकृतिकार्यतेत्याशङ्क्याह -- देहेति। तथापि गुणानामिहाग्रहणान्न प्रकृतिकार्यत्वं तत्राह -- गुणाश्चेति। उक्तरीत्या निष्पन्नमर्थमाह -- एवमिति। पाठान्तरमनूद्य व्याख्यापूर्वकमर्थाभेदमाह -- कार्येत्यादिना। व्याख्यान्तरमाह -- अथवेति। एकादशेन्द्रियाणि पञ्च विषया इति षोडशसंख्याकविकारोऽत्र कार्यशब्दार्थः? महानहंकारो भूततन्मात्राणीति प्रकृतिविकृतयः सप्त कारणं? तेषामारम्भकत्वेन कर्तृत्वेन हेतुराश्रयो मूलप्रकृतिरित्यर्थः। उत्तरार्धस्य तात्पर्यमाह -- पुरुषश्चेति। तस्य परमात्मत्वं व्यवच्छिनत्ति -- जीव इति। तस्य प्राणधारणनिमित्तस्य तदर्थं चेतनत्वमाह -- क्षेत्रज्ञ इति। तस्यानौपाधिकत्वं वारयति -- भोक्तेति। तयोः,संसारकारणत्वमुपपादयितुं शङ्कते -- कथमिति। अन्वयव्यतिरेकाभ्यां तयोस्तथात्वमित्याह -- अत्रेति। तत्र व्यतिरेकं दर्शयति -- कार्येति। नहि नित्यमुक्तस्यात्मनः स्वतः संसारोऽस्तीत्यर्थः। इदानीमन्वयमाह -- यदेति। अन्वयादिफलमुपसंहरति -- अत इति। आत्मनोऽविक्रियस्य संसरणं नोचितमित्याक्षिपति -- कः पुनरिति। सुखदुःखान्यतरसाक्षात्कारो भोगः स चाविक्रियस्यैव द्रष्टुः संसारस्तथाविधभोक्तृत्वमस्य संसारित्वमित्युत्तरमाह -- सुखेति। श्लोकव्याख्यासमाप्तावितिशब्दः।
Sri Dhanpati
सप्तमे ईश्वरस्य द्वे प्रकृती परापरे क्षेत्रक्षेत्रज्ञलक्षणे उपन्यस्य एतद्योनीनि भूतानित्युक्तं तत्र प्रकृतिद्वयनिरुपणार्थमारब्धेऽस्मिन्नध्याये इदं शरीरमिति द्वाभ्यां क्षेत्रक्षेत्रलक्षणप्रकृतिद्वयस्वरुपं निर्दिश्य तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्चेत्यादिना तत्प्रतिपादितं? ततो महाभूतानीत्यादिना यच्च यादृक्चेति प्रतिपाद्य सच यो यत्प्रभावश्चेति पुरुष इति द्वाभ्यां प्रतिपादयितुमादौ एतद्योनीनि भूतानिति निरुपणाय प्रतिज्ञातं यद्विकारि यतश्च यदिति प्रतिपादयति -- प्रकृतिमिति द्वाभ्याम्। प्रकृतिरीश्वरस्य हि विकारकारणशक्तिस्त्रिगुणात्मिका मायामायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरं।देवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया िति श्रुतिस्मृतिभ्यां पुरुषः क्षेत्रज्ञलक्षणा परा प्रकृतिः तौ प्रकृतिपुरुषावुभावपि अनादी एव नतु सादी इति विद्धि। नैक्सायपि सादित्त्वमिति द्रढयितुमुभावपीत्युक्तं। न विद्यते आदिः कारणं ययोस्तावनादी। ईश्वरस्य नित्यत्वात्तत्प्रकृत्योरपि तथात्वेन भवितुं युक्तम्। संसारोत्पादनोपयुक्तमनादित्वं ययोस्ताभ्यां प्रकृतिभ्यामीश्वरस्य जगदुत्पत्तिस्थतिप्रलयहेतुत्वसंपत्त्या तद्वयवत्त्वमेव तस्येश्वरत्वम्। ननु प्रकृतिपुरुषोरनादित्वे तयोरेव जगत्कर्तृत्वं नेश्वरस्य तयोरादिमत्त्वे त्वीश्वरस्य तत्कर्तृत्वं सिध्यतीत्यतो न अनादीति तत्पुरुषसमासो वक्तव्य इतिचेन्न। प्रकृतिपुरुषोरुत्पत्तेः प्रागीशितव्याभावादीश्वरस्यानीश्वरत्वप्रशङ्गात्। संसारस्य निर्निमित्तत्वे मुक्तानामपि संसारापत्तेरनिषेधादनिर्मोक्षप्रसघङ्गेन शास्त्रानर्थक्यप्रसङ्गात्। तदुतयात्पर्वं बन्धस्याभावेन तन्निवृत्त्यात्मनो मोक्षास्याभावात् बन्धमोक्षाभावप्रसङ्गाच्च। प्रकृतिपुरुषयोरनादित्वे विकाराणआं गुणानां च प्रकृतिकार्यत्वादात्म नो निर्विकारत्वं निर्गुणत्वं च सिध्यति। इदमेवाभिप्रेत्याह। इदमेवाभिप्रेत्याह। विकारन्वक्ष्यमाणान् बुद्य्धादिदेहेन्द्रियान्तान् गुणांस्चैव सुखदुःखमोहप्रत्ययाकारपरिणतान् सत्त्वरजस्तमःसंज्ञान् प्रकृतिसंभवान् त्रिगुणात्मिकमायापरिणामान् विद्धि जानीहि। पुरुषं च वित् हि विद्धीति पुरुषादिशब्दावृत्त्या उत्तरार्धस्तविद्धीत्यस्य संबन्धेन योज्यम्। तेन नित्यज्ञानस्वरुपस्य विवक्षितत्वात्पुरुषशब्दस्य कार्यकरणसंघाते प्रसिद्धेस्तस्य च सादित्वात्कथमनादित्मिति शङ्का न प्रभवतीति क्लिष्टकल्पना तु पूर्वं महता प्रयत्नेन संघातात्पुरुषवैलक्षण्यप्रतिपादनादस्याः शङ्कयाया एवाभावात्सर्वज्ञैराचार्यैः कथं कर्तव्येति तदकरणातेषां न्यूनता न शङ्कनीया।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| prakṛitim | material nature |
| puruṣham | the individual souls |
| cha | and |
| eva | indeed |
| viddhi | know |
| anādī | beginningless |
| ubhau | both |
| api | and |
| vikārān | transformations (of the body) |
| cha | also |
| guṇān | the three modes of nature |
| cha | and |
| eva | indeed |
| viddhi | know |
| prakṛiti | material energy |
| sambhavān | produced by |
Related Shloks
इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयको संक्षेपसे कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्त्वसे जानकर मेरे भावको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar
प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुखदुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है। — VaniSagar
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“प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुख-दुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है। — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ: "प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुख-दुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 20?
Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 20 translates to: "Know that Nature (matter) and the Spirit are both beginningless, and know also that all modifications and qualities are born from Nature. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवा" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 20 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुख-दुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva viddhy anādī ubhāv api" mean in English?
"prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva viddhy anādī ubhāv api" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 20. Know that Nature (matter) and the Spirit are both beginningless, and know also that all modifications and qualities are born from Nature. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.