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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 19
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते

इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयको संक्षेपसे कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्त्वसे जानकर मेरे भावको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

இவ்வாறு, புலம், அறிவும், அறியும் தன்மையும் சுருக்கமாகக் கூறப்பட்டுள்ளன. என் பக்தன், இதை அறிந்து, என் உள்ளத்தில் நுழைகிறான்.

KannadaIND

ಹೀಗಾಗಿ, ಕ್ಷೇತ್ರ, ಹಾಗೆಯೇ ಜ್ಞಾನ ಮತ್ತು ತಿಳಿಯಬಹುದಾದವುಗಳನ್ನು ಸಂಕ್ಷಿಪ್ತವಾಗಿ ಹೇಳಲಾಗಿದೆ. ನನ್ನ ಭಕ್ತನು ಇದನ್ನು ತಿಳಿದುಕೊಂಡು ನನ್ನ ಅಸ್ತಿತ್ವವನ್ನು ಪ್ರವೇಶಿಸುತ್ತಾನೆ.

PunjabiIND

ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ, ਖੇਤਰ, ਨਾਲ ਹੀ ਗਿਆਨ ਅਤੇ ਜਾਣਨਯੋਗ, ਨੂੰ ਸੰਖੇਪ ਵਿੱਚ ਦੱਸਿਆ ਗਿਆ ਹੈ। ਮੇਰਾ ਭਗਤ, ਇਹ ਜਾਣ ਕੇ, ਮੇਰੇ ਅੰਦਰ ਪ੍ਰਵੇਸ਼ ਕਰਦਾ ਹੈ।

NepaliIND

यसरी, क्षेत्र, साथै ज्ञान र जान्ने, संक्षिप्त रूपमा भनिएको छ। यो थाहा पाएर मेरो भक्त मेरो अस्तित्वमा प्रवेश गर्छ।

TeluguIND

ఈ విధంగా, క్షేత్రం, అలాగే జ్ఞానం మరియు తెలిసినవి క్లుప్తంగా చెప్పబడ్డాయి. నా భక్తుడు, ఇది తెలిసి, నా జీవిలోకి ప్రవేశిస్తాడు.

MarathiIND

अशा प्रकारे, क्षेत्र, तसेच ज्ञान आणि जाणता, थोडक्यात सांगितले आहे. माझा भक्त, हे जाणून, माझ्या अस्तित्वात प्रवेश करतो.

MalayalamIND

അങ്ങനെ, ഫീൽഡ്, അതുപോലെ തന്നെ അറിവും അറിയാവുന്നവയും സംക്ഷിപ്തമായി പ്രസ്താവിച്ചു. എൻ്റെ ഭക്തൻ ഇതറിഞ്ഞുകൊണ്ട് എൻ്റെ സത്തയിൽ പ്രവേശിക്കുന്നു.

GujaratiIND

આમ, ક્ષેત્ર, તેમજ જ્ઞાન અને જાણકાર, સંક્ષિપ્તમાં જણાવ્યું છે. મારો ભક્ત, આ જાણીને, મારા અસ્તિત્વમાં પ્રવેશ કરે છે.

BengaliIND

এভাবে ক্ষেত্র তথা জ্ঞান ও জ্ঞাতকে সংক্ষেপে বলা হয়েছে। আমার ভক্ত এই জেনে আমার সত্তায় প্রবেশ করে।

SindhiIND

اهڙيءَ طرح علم ۽ ڄاڻو جو به مختصر ذڪر ڪيو ويو آهي. منھنجو عقيدتمند، اھو ڄاڻي، منھنجي وجود ۾ داخل ٿئي ٿو.

OdiaIND

ଏହିପରି, କ୍ଷେତ୍ର, ତଥା ଜ୍ଞାନ ଏବଂ ଜଣାଶୁଣା, ସଂକ୍ଷେପରେ ବର୍ଣ୍ଣନା କରାଯାଇଛି | ମୋର ଭକ୍ତ, ଏହା ଜାଣି ମୋ ସୃଷ୍ଟିକୁ ପ୍ରବେଶ କରେ |

BhojpuriIND

एह तरह से क्षेत्र के साथे-साथे ज्ञान आ जाने लायक के भी संक्षेप में बतावल गइल बा। हमार भक्त ई जान के हमरा अस्तित्व में प्रवेश करेला।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः -- इसी अध्यायके पाँचवें और छठे श्लोकमें जिसका वर्णन किया गया है? वह क्षेत्र है सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक जिस साधनसमुदायका,वर्णन किया गया है? वह ज्ञान है और बारहवेंसे सत्रहवें श्लोकतक जिसका वर्णन किया गया है? वह ज्ञेय है। इस तरह मैंने क्षेत्र? ज्ञान और ज्ञेयका संक्षेपसे वर्णन किया है।मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते -- मेरा भक्त क्षेत्रको? साधनसमुदायरूप ज्ञानको और ज्ञेय तत्त्व(परमात्मा)को तत्त्वसे जानकर मेरे भावको प्राप्त हो जाता है।क्षेत्रको ठीक तरहसे जान लेनेपर क्षेत्रसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। ज्ञानको अर्थात् साधनसमुदायको ठीक तरहसे जाननेसे? अपनानेसे देहाभिमान (व्यक्तित्व) मिट जाता है। ज्ञेय तत्त्वको ठीक तरहसे जान लेनेपर उसकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् परमात्मतत्त्वके साथ अभिन्नताका अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध -- इसी अध्यायके पहले और दूसरे श्लोकमें जिस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका संक्षेपसे वर्णन किया था? उसीका विस्तारसे वर्णन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

उपर्युक्त समस्त अर्थका उपसंहार करनेके लिये यह श्लोक आरम्भ किया जाता है --, इस प्रकार यह महाभूतोंसे लेकर धृतिपर्यन्त क्षेत्रका स्वरूप?अमानित्व आदिसे लेकर तत्त्वज्ञानार्थदर्शन पर्यन्त ज्ञानका स्वरूप और ज्ञेयं यत्तत् यहाँ लेकर तमसः परमुच्यते यहाँतक ज्ञेयका स्वरूप? संक्षेपसे कह दिया गया। यह सब वेदोंका और गीताका अर्थ इकट्ठा करके कहा गया है। इस यथार्थ ज्ञानका अधिकारी कौन है? सो कहा जाता है -- मेरा भक्त अर्थात् मुझ सर्वज्ञ? परमगुरु? वासुदेव परमेश्वरमें अपने सारे भावोंको जिसने अर्पण कर दिया है। जिस किसी भी वस्तुको देखता? सुनता और स्पर्श करता है? उस सबमें सब कुछ भगवान् वासुदेव ही है ऐसी निश्चित बुद्धिवाला जो मेरा भक्त है। वह उपर्युक्त यथार्थ ज्ञानको समझकर मेरे भावको अर्थात् मेरा जो परमात्मभाव है? उसको प्राप्त करनेमें समर्थ होता है? अर्थात् मोक्ष लाभ कर लेता है।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

प्रकृतिमित्यादि वक्ष्यमाणमनन्तरपूर्वग्रन्थसंबन्धीत्याशङ्क्य व्यवहितेन संबन्धार्थं व्यवहितमनुवदति -- तत्रेति। तयोश्च प्रकृत्योरुक्तं भूतकारणत्वमित्याह -- एतदिति। भूतानामिव प्रकृत्योरपि प्रकृत्यन्तरापेक्षयानवस्थानान्न भूतयोनितेति शङ्कते -- क्षेत्रेति। तत्राकृताभ्यागमादिवारणाय बन्धस्य निदानज्ञानार्थमात्मनो विक्रियावत्त्वादिदोषनिरासार्थं च प्रकृतिपुरुषयोरनादित्वं क्षेत्रत्वेनोक्तानां प्रकृतिंप्रति विकारभावं च दर्शयति -- अयमर्थ इति। स च यो यत्स्वभावश्चेत्युद्दिष्टं व्याचष्टे -- प्रकृतिमिति। ईश्वस्यापरा प्रकृतिरत्र प्रकृतिशब्देनोक्ता परा तु प्रकृतिर्जीवाख्या पुरुषशब्देन विवक्षितेति व्याकरोति -- ईश्वरस्येति। तयोरनादित्वं व्युत्पादयति -- नेत्यादिना। तत्र युक्तिमाह -- नित्यत्वादीश्वरस्येति। ईश्वरस्योक्तप्रकृतिद्वयवत्त्वं कथमित्याशङ्क्याह -- प्रकृतीति। तस्य जगज्जन्मादौ स्वातन्त्र्यमेवेश्वरत्वं न प्रकृतिद्वयवत्वमित्याशङ्क्याह -- याभ्यामिति। प्रकृत्योरनादित्वं कुत्रोपयुक्तमित्याशङ्क्याह -- ते इति। मतान्तरमाह -- नेत्यादिना। तयोर्मूलकारणत्वाभावे कस्य तदेष्टव्यमित्याशङ्क्याह -- तेन हीति। प्रकृत्योरेव मूलकारणत्वे श्रुतिस्मृतिसिद्धमीश्वरस्य तथात्वं न स्यादित्याह -- यदीति। प्रकृतिद्वयस्य कार्यत्वपक्षं प्रत्याह -- तदसदिति। किञ्च प्रकृतिद्वयमनपेक्ष्येश्वरस्य संसारहेतुत्वे स्वातन्त्र्यान्मुक्तानामपि ततःसंसाराप्तेरनिषेधान्मोक्षशास्त्राप्रामाण्यान्न तस्यैव संसारहेतुतेत्याह -- संसारस्येति। निर्निमित्तत्वं प्रकृतिद्वयापेक्षामृते परस्यैव निमित्तत्वमिति यावत्। किञ्च कार्यत्वे प्रकृत्योस्तदुदयात्पूर्वं बन्धाभावे तद्विश्लेषात्मनो मोक्षस्याभावात्कदाचिदुभयाभावे पुनस्तदप्रसङ्गान्न प्रकृतिद्वयस्य कार्यतेत्याह -- बन्धेति। प्रकृत्योर्मूलकारणत्वे नानुपपत्तिरित्याह -- नित्यत्व इति। स्वपक्षे दोषाभावं प्रश्नपूर्वकं प्रपञ्चयति -- कथमित्यादिना। संभवः सत्ताप्रापको हेतुः प्रकृतेरनादित्वे विकाराणां गुणानां च तत्कार्यत्वादात्मनो निर्विकारत्वं निर्गुणत्वं च सिध्यतीति भावः।

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Sri Dhanpati

प्रतिज्ञातार्थमुपपाद्योपसंहरति -- इतीति। इत्येवं क्षेत्रं महाभूतादिधृत्यन्तं? तथा ज्ञानममानित्वादि तत्त्वज्ञानार्तदर्शनावसानं? ज्ञेयं च ज्ञेयं यत्तदित्यादि तमसः परमुच्यत इत्येवमन्तमुक्तं। हृदि सर्वस्य विष्ठितमित्यन्तमित्याधुनिकानामुक्तस्तु नादर्तव्या। ज्ञानादेर्ज्ञेयप्रवचनपरत्वेऽस्वरसस्योक्तत्वात्। वसिष्ठादिभिर्यद्विस्तरेण गीतं तत्समासतः संक्षेपतो मया प्रतिपादितं एतावानेव सर्ववेदार्थो गीतार्थश्चातः संक्षिप्य भगवतोपसंहृत्योक्तः। यथोक्तसम्यग्दर्शने कोऽधिकारित्यत आह। मयि सर्वेश्वरे सर्वज्ञे परमगुरौ भगवति वासुदेवे यच्छ्रणोति स्पृशति पश्यति आस्वादयति जिघ्रति वा सर्वेमेव श्रीभगवान्वासुदेव इत्येवं ग्रहाविष्टबुद्धितया समर्पितसर्वात्मभावो मद्भक्तः एतादृशः सन्नेतद्यथोक्तं क्षेत्रज्ञानज्ञयानां याथात्म्यं विज्ञाय मद्भवाय परमात्मभावाय मोक्षायोपपद्यते योग्यो भवतीत्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
itithus
kṣhetramthe nature of the field
tathāand
jñānamthe meaning of knowledge
jñeyamthe object of knowledge
chaand
uktamrevealed
samāsataḥin summary
matbhaktaḥ
etatthis
vijñāyahaving understood
matbhāvāya
upapadyateattain
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.18
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्

वह परमात्मा सम्पूर्ण ज्योतियोंका भी ज्योति और अज्ञानसे अत्यन्त परे कहा गया है। वह ज्ञानस्वरूप, जाननेयोग्य, ज्ञान(साधन-समुदाय) से प्राप्त करनेयोग्य और सबके हृदयमें विराजमान है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.20
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्

प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुख-दुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 19
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 19
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते

इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयको संक्षेपसे कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्त्वसे जानकर मेरे भावको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 19 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 19 का हिंदी अर्थ: "इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयको संक्षेपसे कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्त्वसे जानकर मेरे भावको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 19?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 19 translates to: "Thus, the field, as well as knowledge and the knowable, have been briefly stated. My devotee, knowing this, enters into My being. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यत" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 19 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयको संक्षेपसे कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्त्वसे जानकर मेरे भावको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "iti kṣhetraṁ tathā jñānaṁ jñeyaṁ choktaṁ samāsataḥ" mean in English?

"iti kṣhetraṁ tathā jñānaṁ jñeyaṁ choktaṁ samāsataḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 19. Thus, the field, as well as knowledge and the knowable, have been briefly stated. My devotee, knowing this, enters into My being. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.