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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 26
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते।तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः

दूसरे मनुष्य इस प्रकार (ध्यानयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग, आदि साधनोंको) नहीं जानते, केवल (जीवन्मुक्त महापुरुषोंसे) सुनकर उपासना करते हैं, ऐसे वे सुननेके परायण मनुष्य भी मृत्युको तर जाते हैं। — VaniSagar

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KannadaIND

ಹೀಗೆ ತಿಳಿಯದ ಇತರರೂ, ಇತರರಿಂದ ಅದನ್ನು ಕೇಳಿ ಪೂಜಿಸುತ್ತಾರೆ; ಅವರೂ ಸಹ ಮರಣವನ್ನು ದಾಟಿ, ತಾವು ಕೇಳಿದ್ದನ್ನು ಪರಮ ಆಶ್ರಯವೆಂದು ಪರಿಗಣಿಸುತ್ತಾರೆ.

TeluguIND

అలా తెలియని మరికొందరు కూడా, ఇతరుల నుండి దాని గురించి విని పూజిస్తారు; వారు కూడా, మృత్యువును దాటి, వారు విన్నది సర్వోన్నత ఆశ్రయం.

TamilIND

இவ்வாறு அறியாத பிறரும், பிறரிடம் கேட்டு, வழிபடுகின்றனர்; அவர்களும், மரணத்தைத் தாண்டி, தாங்கள் கேட்டதை உயர்ந்த அடைக்கலமாகக் கருதுகிறார்கள்.

GujaratiIND

અન્ય લોકો પણ, જેઓ આ રીતે જાણતા નથી, તેઓ અન્ય લોકો પાસેથી તે સાંભળીને પૂજા કરે છે; તેઓ, પણ, મૃત્યુને પાર કરે છે, જે તેઓએ સર્વોચ્ચ આશ્રય તરીકે સાંભળ્યું છે.

MizoIND

Mi dangte pawhin chutianga hre lote chuan mi dangte hnen ata an hriat tawh avangin an chibai a; anni pawh hian an thil hriatte chu inhumhimna sang ber anga ngaiin thihna piah lam an pel a ni.

ManipuriIND

ꯑꯇꯣꯞꯄꯁꯤꯡꯅꯁꯨ ꯑꯁꯨꯝꯅꯥ ꯈꯉꯗꯕꯥ, ꯑꯇꯣꯞꯄꯗꯒꯤ ꯇꯥꯕꯥ ꯐꯪꯗꯨꯅꯥ ꯂꯥꯠꯂꯤ; ꯃꯈꯣꯌꯁꯨ ꯃꯈꯣꯌꯅꯥ ꯇꯥꯈꯤꯕꯥ ꯑꯗꯨꯕꯨ ꯈ꯭ꯕꯥꯏꯗꯒꯤ ꯋꯥꯡꯕꯥ ꯉꯥꯀꯁꯦꯜ ꯑꯣꯏꯅꯥ ꯂꯧꯗꯨꯅꯥ ꯁꯤꯕꯒꯤ ꯃꯊꯛꯇꯥ ꯂꯥꯟꯊꯣꯀꯏ꯫

DogriIND

दूए बी, जेह्ड़े इस चाल्ली नेईं जानदे, दूएं कोला इसदी गल्ल सुनियै पूजा करदे न; ओह़ बी, जेके सुनेया ऐ, उसी परम शरण दे रूप च समझ़दे होई मौत दे परे पार करदे न।

AssameseIND

আন কিছুমানেও, যিসকলে এইদৰে নাজানে, আনৰ পৰা ইয়াৰ বিষয়ে শুনি পূজা কৰে; তেওঁলোকেও মৃত্যুৰ সিপাৰে পাৰ হৈ যায়, তেওঁলোকে শুনা কথাক পৰম আশ্ৰয় হিচাপে গণ্য কৰে।

MaithiliIND

आन लोक सेहो, जे एहि तरहें नहि जनैत छथि, दोसर सँ एकर विषय मे सुनि पूजा करैत छथि; ओहो सभ जे सुनने छथि तकरा परम शरण मानैत मृत्यु सँ परे पार करैत छथि |

PunjabiIND

ਹੋਰ, ਜੋ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦੇ, ਦੂਜਿਆਂ ਤੋਂ ਇਹ ਸੁਣ ਕੇ ਪੂਜਾ ਕਰਦੇ ਹਨ; ਉਹ ਵੀ, ਮੌਤ ਤੋਂ ਪਾਰ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਉਹਨਾਂ ਨੇ ਸਰਵਉੱਚ ਪਨਾਹ ਵਜੋਂ ਸੁਣਿਆ ਹੈ।

BengaliIND

অন্যরা, যারা এইভাবে জানেন না, তারা অন্যদের কাছ থেকে এটি শুনে উপাসনা করেন; তারাও, মৃত্যুর ওপারে অতিক্রম করে, যাকে তারা সর্বোচ্চ আশ্রয় বলে শুনেছে।

MarathiIND

इतर, ज्यांना असे माहीत नाही, ते इतरांकडून ऐकून पूजा करतात; ते देखील, मृत्यूच्या पलीकडे जातात, जे त्यांनी सर्वोच्च आश्रय म्हणून ऐकले आहे त्याबद्दल.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- अन्ये त्वेवमजानन्तः ৷৷. मृत्युं श्रुतिपरायणाः -- कई ऐसे तत्त्वप्राप्तिकी उत्कण्ठावाले मनुष्य हैं? जो ध्यानयोग? सांख्ययोग? कर्मयोग? हठयोग? लययोग आदि साधनोंको समझते ही नहीं अतः वे साधन उनके अनुष्ठानमें भी नहीं आते। ऐसे मनुष्य केवल तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंकी आज्ञाका पालन करके मृत्युको तर जाते हैं अर्थात् तत्त्वज्ञानको प्राप्त कर लेते हैं। जैसे धनी आदमीकी आज्ञाका पालन करनेसे धन मिलता है? ऐसे ही तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंकी आज्ञाका पालन करनेसे तत्त्वज्ञान मिलता है। हाँ? इसमें इतना फरक है कि धनी जब देता है? तब धन मिलता है परन्तु सन्तमहापुरुषोंकी आज्ञाका पालन करनेसे? उनके मनके? संकेतके? आज्ञाके अनुसार तत्परतापूर्वक चलनेसे मनुष्य स्वतः उस परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है? जो कि सबको सदासे ही स्वतःस्वाभाविक प्राप्त है। कारण कि धन तो धनीके अधीन होता है? पर परमात्मतत्त्व किसीके अधीन नहीं है।शरीरके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही मृत्यु होती है। जो मनुष्य महापुरुषोंकी आज्ञाके परायण हो जाते हैं? उनका शरीरसे माना हुआ सम्बन्ध छूट जाता है। अतः वे मृत्युको तर जाते हैं अर्थात् वे पहले शरीरकी मृत्युसे अपनी मृत्यु मानते थे? उस मान्यतासे रहित हो जाते हैं।ऐसे श्रुतिपरायण साधकोंकी तीन श्रेणियाँ होती हैं -- 1 -- यदि साधकमें सांसारिक सुखभोगकी इच्छा नहीं है? केवल तत्त्वप्राप्तिकी ही उत्कट अभिलाषा है और वह जिनकी आज्ञका पालन करता है? वे अनुभवी महापुरुष हैं? तो साधकको शीघ्र ही परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।2 -- यदि साधकमें सुखभोगकी इच्छा शेष है? तो केवल महापुरुषकी आज्ञाका पालन करनेसे ही उसकी उस इच्छाका नाश हो जायगा और उसको परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी।3 -- साधक जिनकी आज्ञाका पालन करता है? वे अनुभवी महापुरुष नहीं हैं? पर साधकमें किञ्चिन्मात्र भी सांसारिक इच्छा नहीं है और उसका उद्देश्य केवल परमात्माकी प्राप्ति करना है? तो उसको भगवत्कृपासे परमात्मप्राप्ति हो जायगी क्योंकि भगवान् तो उसको जानते ही हैं।अगर किसी कारणवश साधककी संतमहापुरुषके प्रति अश्रद्धा? दोषदृष्टि हो जाय तो उनमें साधकको अवगुणहीअवगुण दीखेंगे? गुण दीखेंगे ही नहीं। इसका कारण यह है कि महापुरुष गुणअवगुणोंसे ऊँचे उठे (गुणातीत) होते हैं अतः उनमें अश्रद्धा होनेपर अपना ही भाव अपनेको दीखता है। मनुष्य जिस भावसे देखता है? उसी भावसे उसका सम्बन्ध हो जाता है। अवगुण देखनेसे उसका सम्बन्ध अवगुणोंसे हो जाता है। इसलिये साधकको चाहिये कि वह तत्त्वज्ञ महापुरुषकी क्रियाओंपर? उनके आचरणोंपर ध्यान न देकर उनके पास तटस्थ होकर रहे। संतमहापुरुषसे ज्यादा लाभ वही ले सकता है? जो उनसे किसी प्रकारके सांसारिक व्यवहारका सम्बन्ध न रखकर केवल पारमार्थिक (साधनका) सम्बन्ध रखता है। दूसरी बात? साधक इस बातकी सावधानी रखे कि उसके द्वारा उन महापुरुषकी कहीं भी निन्दा न हो। यदि वह उनकी निन्दा करेगा? तो उसकी कहीं भी उन्नति नहीं होगी। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें कहा गया कि श्रुतिपरायण साधक भी मृत्युको तर जाते हैं? तो अब प्रश्न होता है कि मृत्युके होनेमें क्या कारण है इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

अन्य कई एक साधकजन उपर्युक्त विकल्पोंमेंसे किसी एकके भी द्वारा पूर्वोक्त आत्मतत्त्वको न जानते हुए अन्य आचार्योंसे सुनकर -- उनकी ऐसी आज्ञा पाकर कि तुम इसीका चिन्तन किया करो उपासना करते हैं -- श्रद्धापूर्वक चिन्तन करते हैं। वे केवल सुननेके परायण हुए पुरुष भी अर्थात् जिनके मतमें श्रवण करना ही मोक्षमार्गसम्बन्धी प्रवृत्तिमें परम आश्रय -- गति? परम साधन है? ऐसे केवल अन्य आचार्योंके उपदेशको ही प्रमाण माननेवाले? स्वयं विवेकहीन श्रुतिपरायण पुरुष भी मृत्युको यानी मृत्युयुक्त संसारको निःसंन्देह पार कर जाते हैं। फिर प्रमाण करनेमें जो स्वतन्त्र हैं वे विवेकी पुरुष मृत्युयुक्त संसारसे तर जाते हैं? इसमें तो कहना ही क्या है यह अभिप्राय है।,

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Sri Anandgiri

ऐक्यधीर्मुक्तिहेतुरिति प्रागुक्तमनूद्य प्रश्नपूर्वकं जिज्ञासितहेतुपरत्वेन श्लोकमवतारयति -- क्षेत्रेति। सर्वस्य प्राणिजातस्य क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंबन्धाधीना यस्मादुत्पत्तिस्तस्मात्क्षेत्रज्ञात्मकपरमात्मातिरेकेण प्राणिनिकायस्याभावादैक्यज्ञानादेव मुक्तिरित्याह -- कस्मादिति। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंबन्धमुक्तमाक्षिपति -- कः पुनरिति। क्षेत्रज्ञस्य क्षेत्रेण संबन्धः संयोगो वा समवायो वेति विकल्प्याद्यं दूषयति -- न तावदिति। द्वितीयं निरस्यति -- नापीति। वास्तवसंबन्धाभावेऽपि तयोरध्यासस्वरूपः सोऽस्तीति परिहरति -- उच्यत इति। भिन्नस्वभावत्वे हेतुमाह -- विषयेति। इतरेतरवत्क्षेत्रे क्षेत्रज्ञे वा तद्धर्मस्य क्षेत्रानधिकरणस्य क्षेत्रज्ञगतस्य चैतन्यस्य क्षेत्रज्ञानाधारस्य च क्षेत्रनिष्ठस्य जाड्यादेरारोपरूपो योगस्तयोरित्याह -- इतरेति। तत्र निमित्तमाह -- क्षेत्रेति। अविवेकादारोपितसंयोगे दृष्टान्तमाह -- रज्िज्वति। उक्तं संबन्धं निगमयति -- सोऽयमिति। तस्य निवृत्तियोग्यत्वं सूचयति -- मिथ्येति। कथं तर्हि मिथ्याज्ञानस्य निवृत्तिरित्याशङ्क्याह -- यथेति।योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु इत्यादि त्वंपदार्थविषयं शास्त्रमनुसृत्य विवेकज्ञानमापाद्य महाभूतादिधृत्यन्तात्क्षेत्रादुपद्रष्टृत्वादिलक्षणं प्रागुक्तं क्षेत्रज्ञं मुञ्जेषीकान्यायेन विविच्य सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं ब्रह्म स्वरूपेण ज्ञेयं योऽनुभवति तस्य मिथ्याज्ञानमपगच्छतीति संबन्धः। कथमस्य निर्विशेषत्वं क्षेत्रज्ञस्य सविशेषत्वहेतोः सत्त्वादित्याशङ्क्याह -- क्षेत्रं चेति। बहुदृष्टान्तोक्तेर्बहुविधत्वं क्षेत्रस्य द्योत्यते। उक्तज्ञानान्मिथ्याज्ञानापगमे हेतुमाह -- यथोक्तेति। तथापि कथं पुरुषार्थसिद्धिः कालान्तरे तुल्यजातीयमिथ्याज्ञानोदयसंभवादित्याशङ्क्याह -- तस्येति। सम्यग्ज्ञानादज्ञानतत्कार्यनिवृत्त्या मुक्तिरिति स्थिते फलितमाह -- य एवमिति।

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Sri Dhanpati

मन्दतरानाह। अन्येतु। तुशब्दः पूर्वेभ्यो वैलक्षण्यद्योतनार्थः। एषु विकल्पेषु अन्यतरेणाप्येवं यथोक्तमात्मानमजानन्तः श्रुतिपरायणाः श्रुतिः श्रवणं परमयनं मोक्षमार्गप्रवृत्तौ परं साधनं येषां केवलं परोपदेशप्रमाणाः स्वयं विवेकररिताः अन्येभ्य आचार्येभ्य इदमेव चिन्तयतेति वदद्य्भः श्रुत्वा श्रद्दधानाः सन्तस्तदेवोपासते चिन्तयन्ति तेऽपि च मृत्युयुक्तं संसारं अतितरन्त्येवातिक्रामन्त्येव। चकारः पूर्वोक्तसमुच्चयार्थः। तेप्यतितरन्ति पूरवोक्तास्त्रयः तरन्तीति किमु वक्तव्यमिति कैमुत्यन्यायबोधनार्थोऽपिशब्दः तेषामुक्तमादित्वाभावेऽपि संसारातितरणे संशयो नास्तीत्यवधारणार्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
anyeothers
tustill
evamthus
ajānantaḥthose who are unaware (of spiritual paths)
śhrutvāby hearing
anyebhyaḥfrom others
upāsatebegin to worship
tethey
apialso
chaand
atitaranticross over
evaeven
mṛityumdeath
śhrutiparāyaṇāḥ
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कई मनुष्य ध्यानयोगके द्वारा, कई सांख्ययोगके द्वारा और कई कर्मयोगके द्वारा अपने-आपसे अपने-आपमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं। — VaniSagar

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दूसरे मनुष्य इस प्रकार (ध्यानयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग, आदि साधनोंको) नहीं जानते, केवल (जीवन्मुक्त महापुरुषोंसे) सुनकर उपासना करते हैं, ऐसे वे सुननेके परायण मनुष्य भी मृत्युको तर जाते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ: "दूसरे मनुष्य इस प्रकार (ध्यानयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग, आदि साधनोंको) नहीं जानते, केवल (जीवन्मुक्त महापुरुषोंसे) सुनकर उपासना करते हैं, ऐसे वे सुननेके परायण मनुष्य भी मृत्युको तर जाते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 26?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 26 translates to: "Others, too, who do not know thus, worship, having heard of It from others; they, too, cross beyond death, regarding what they have heard as the supreme refuge. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते।तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपर" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 26 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। दूसरे मनुष्य इस प्रकार (ध्यानयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग, आदि साधनोंको) नहीं जानते, केवल (जीवन्मुक्त महापुरुषोंसे) सुनकर उपासना करते हैं, ऐसे वे सुननेके परायण मनुष्य भी मृत्युको तर जाते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "anye tv evam ajānantaḥ śhrutvānyebhya upāsate" mean in English?

"anye tv evam ajānantaḥ śhrutvānyebhya upāsate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 26. Others, too, who do not know thus, worship, having heard of It from others; they, too, cross beyond death, regarding what they have heard as the supreme refuge. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.