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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 16
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्

वे परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण हैं और चर-अचर प्राणियोंके रूपमें भी वे ही हैं एवं दूर-से-दूर तथा नजदीक-से-नजदीक भी वे ही हैं। वे अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे जाननेका विषय नहीं हैं। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

ఇది అన్ని జీవుల లోపల మరియు లేకుండా, కదలని మరియు కదిలే రెండూ; ఇది సూక్ష్మమైనది మరియు తెలియదు, మరియు ఇది సమీపంలో మరియు దూరంగా ఉంటుంది.

MarathiIND

ते सर्व प्राण्यांच्या आत आणि त्याशिवायही आहे, अचल आणि हलणारे दोन्ही; ते सूक्ष्म आणि अज्ञात आहे आणि ते जवळ आणि दूर आहे.

TamilIND

அது அனைத்து உயிரினங்களுக்கும் உள்ளேயும் இல்லாமல், அசையாதது மற்றும் நகரும்; இது நுட்பமானது மற்றும் அறிய முடியாதது, மேலும் அது அருகில் மற்றும் தொலைவில் உள்ளது.

GujaratiIND

તે બધા જીવોની અંદર અને તેના વિના છે, બંને અચલ અને ગતિશીલ છે; તે સૂક્ષ્મ અને અજાણ છે, અને તે નજીક અને દૂર છે.

KannadaIND

ಇದು ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳ ಒಳಗೆ ಮತ್ತು ಇಲ್ಲದೆ, ಚಲಿಸದ ಮತ್ತು ಚಲಿಸುವ ಎರಡೂ; ಇದು ಸೂಕ್ಷ್ಮ ಮತ್ತು ಅಜ್ಞಾತವಾಗಿದೆ, ಮತ್ತು ಇದು ಹತ್ತಿರದಲ್ಲಿದೆ ಮತ್ತು ದೂರದಲ್ಲಿದೆ.

PunjabiIND

ਇਹ ਸਾਰੇ ਜੀਵਾਂ ਦੇ ਅੰਦਰ ਅਤੇ ਬਿਨਾਂ ਹੈ, ਦੋਵੇਂ ਅਚੱਲ ਅਤੇ ਚਲਦੇ ਹਨ; ਇਹ ਸੂਖਮ ਅਤੇ ਅਣਜਾਣ ਹੈ, ਅਤੇ ਇਹ ਨੇੜੇ ਅਤੇ ਦੂਰ ਹੈ।

SindhiIND

اهو سڀني مخلوقن جي اندر ۽ بغير آهي، ٻئي متحرڪ ۽ متحرڪ؛ اهو لڪل ۽ اڻڄاڻ آهي، ۽ اهو ويجهو ۽ پري آهي.

BengaliIND

এটি সমস্ত প্রাণীর মধ্যে এবং ব্যতীত, অচল এবং চলমান উভয়ই; এটি সূক্ষ্ম এবং অজ্ঞাত, এবং এটি কাছাকাছি এবং দূরে।

NepaliIND

यो सबै प्राणीहरू भित्र र बाहिर छ, दुवै अचल र गतिशील; यो सूक्ष्म र अज्ञात छ, र यो नजिक र टाढा छ।

MalayalamIND

അത് ചലിക്കാത്തതും ചലിക്കുന്നതുമായ എല്ലാ ജീവികൾക്കും ഉള്ളിലും അല്ലാതെയും ഉണ്ട്; അത് സൂക്ഷ്മവും അജ്ഞാതവുമാണ്, അത് അടുത്തും അകലെയുമാണ്.

KonkaniIND

तो सगळ्या प्राण्यांभितर आनी ताचेभायर, अचल आनी हालचालींच्या दोनूय प्राण्यांभितर आसता; तो सूक्ष्म आनी अज्ञात आसून तो लागीं आनी पयस आसा.

OdiaIND

ଏହା ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କ ଭିତରେ ଏବଂ ବିନା, ଉଭୟ ଅଦୃଶ୍ୟ ଏବଂ ଗତିଶୀଳ; ଏହା ସୂକ୍ଷ୍ମ ଏବଂ ଅଜ୍ଞାତ, ଏବଂ ଏହା ନିକଟ ଏବଂ ବହୁ ଦୂରରେ |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- [ज्ञेय तत्त्वका वर्णन बारहवेंसे सत्रहवें श्लोकतक -- कुल छः श्लोकोंमें हुआ है। उनमेंसे यह पन्द्रहवाँ श्लोक चौथा है। इस श्लोकके अन्तर्गत पहलेके तीन श्लोकोंका और आगेके दो श्लोकोंका भाव भी आ गया है। अतः यह श्लोक इस प्रकरणका सार है।]बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च -- जैसे बर्फके बने हुए घड़ोंको समुद्रमें डाल दिया जाय तो उन घड़ोंके बाहर भी जल है? भीतर भी जल है और वे खुद भी (बर्फके बने होनेसे) जल ही हैं। ऐसे ही सम्पूर्ण चरअचर प्राणियोंके बाहर भी परमात्मा हैं? भीतर भी परमात्मा हैं और वे खुद भी परमात्मस्वरूप ही हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे घड़ोंमें जलके सिवाय दूसरा कुछ नहीं है अर्थात् सब कुछ जलहीजल है? ऐसे ही संसारमें परमात्माके सिवाय दूसरा कोई तत्त्व नहीं है अर्थात् सब कुछ परमात्माहीपरमात्मा हैं। इसी बातको भगवान्ने महात्माओंकी दृष्टिसे वासुदेवः सर्वम् (गीता 7। 19) और अपनी दृष्टिसे सदसच्चाहम् (गीता 9। 19) कहा है।दूरस्थं चान्तिके च तत् -- किसी वस्तुका दूर और नजदीक होना तीन दृष्टियोंसे कहा जाता है -- देशकृत? कालकृत और वस्तुकृत। परमात्मा तीनों ही दृष्टियोंसे दूरसेदूर और नजदीकसेनजदीक हैं जैसे -- दूरसेदूर देशमें भी वे ही परमात्मा हैं और नजदीकसेनजदीक देशमें भी वे ही परमात्मा हैं पहलेसेपहले भी वे ही परमात्मा थे? पीछेसेपीछे भी वे ही परमात्मा रहेंगे और अब भी वे ही परमात्मा हैं सम्पूर्ण वस्तुओंके पहले भी वे ही परमात्मा हैं? वस्तुओंके अन्तमें भी वे ही परमात्मा हैं और वस्तुओंके रूपमें भी वे ही परमात्मा हैं।उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंके संग्रह और सुखभोगकी इच्छा करनेवालेके लिये परमात्मा (तत्त्वतः समीप होनेपर भी) दूर हैं। परन्तु जो केवल परमात्माके ही सम्मुख है? उसके लिये परमात्मा नजदीक हैं। इसलिये साधकको सांसारिक भोग और संग्रहकी इच्छाका त्याग करके केवल परमात्मप्राप्तिकी अभिलाषा जाग्रत् करनी चाहिये। परमात्मप्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा होते ही परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् परमात्मासे नित्ययोगका अनुभव हो जाता है।सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयम् -- वे परमात्मा अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे इन्द्रियाँ और अन्तःकरणका विषय नहीं है अर्थात् वे परमात्मा इनकी पकड़में नहीं आते। अब प्रश्न उठता है कि जब जाननेमें नहीं आते? तो फिर उनका अभाव होगा उनका अभाव नहीं है। जैसे परमाणुरूप जल सूक्ष्म होनेसे नेत्रोंसे नहीं दीखता? पर न दीखनेपर भी,उसका अभाव नहीं है। वह जल परमाणुरूपसे आकाशमें रहता है और स्थूल होनेपर बूँदें? ओले आदिके रूपमें दीखने लग जाता है। ऐसे ही परमात्मा अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि आदिके द्वारा जाननेमें नहीं आते क्योंकि वे इनसे परे हैं? अतीत हैं।जीवोंके अज्ञानके कारण ही वे परमात्मा जाननेमें नहीं आते। जैसे? कहीं पर श्रीमद्भगवद्गीता शब्द लिखा हुआ है। जो पढ़ालिखा नहीं है? उसको तो केवल लकीरें ही दीखती हैं और जो पढ़ालिखा है? उसको श्रीमद्भगवद्गीता दीखती है। संस्कृत पढ़े हुएको यह शब्द किस धातुसे बना हुआ है? इसका क्या अर्थ होता है -- यह दीखने लग जाता है। गीताका मनन करनेवालेको गीताके गहरे भाव दीखने लग जाते हैं। ऐसे ही जिन मनुष्योंको परमात्मतत्त्वका ज्ञान नहीं है? उनको परमात्मा नहीं दीखते? उनके जाननेमें नहीं आते। परन्तु जिनको परमात्मतत्त्वका ज्ञान हो गया है? उनको तो सब कुछ परमात्माहीपरमात्मा दीखते हैं।उस परमात्मतत्त्वको ज्ञेय (13। 12? 17) भी कहा है और अविज्ञेय भी कहा है। इसका तात्पर्य यह है कि वह स्वयंके द्वारा ही जाना जा सकता है? इसलिये वह ज्ञेय है और वह इन्द्रियाँमनबुद्धिके द्वारा नहीं जाना जा सकता? इसलिये वह अविज्ञेय है।सर्वत्र परिपूर्ण परमात्माको जाननेके लिये यह आवश्यक है कि साधक परमात्माको सर्वत्र परिपूर्ण मान ले। ऐसा मानना भी जाननेकी तरह ही है। जैसे (बोध होनेपर) ज्ञान(जानने) को कोई मिटा नहीं सकता? ऐसे ही परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण हैं इस मान्यता(मानने) को कोई मिटा नहीं सकता। जब सांसारिक मान्यताओं -- मैं ब्राह्मण हूँ? मैं साधु हूँ आदिको (जो कि अवास्तविक हैं) कोई मिटा नहीं सकता? तब पारमार्थिक मान्यताओंको (जो कि वास्तविक हैं) कौन मिटा सकता है तात्पर्य यह है कि दृढ़तापूर्वक मानना भी एक साधन है। जाननेकी तरह माननेकी भी बहुत महिमा है। परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण हैं -- ऐसा दृढ़तापूर्वक मान लेनेपर यह मान्यता मान्यतारूपसे नहीं रहेगी? प्रत्युत इन्द्रियाँमनबुद्धिसे परे जो अत्यन्त सूक्ष्म परमात्मा हैं? उनका अनुभव हो जायगा।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तथा --, अविद्याद्वारा आत्मभावसे कल्पित शरीरको त्वचापर्यन्त अवधि मानकर उसीकी अपेक्षासे ज्ञेयको उसके बाहर बतलाते हैं। वैसे ही अन्तरात्माको लक्ष्य करके तथा शरीरको ही अवधि मानकर ज्ञेयको उसके भीतर ( व्याप्त ) बतलाया जाता है। बाहर और भीतर व्याप्त है -- ऐसा कहनेसे मध्यमें उसका अभाव प्राप्त हुआ? इसलिये कहते हैं -- चर और अचररूप भी वही है अर्थात् रज्जुमें सर्पकी भाँति प्रतीत होनेवाले जो चरअचररूप शरीरके आभास हैं? वह भी उस ज्ञेयका ही स्वरूप है। यदि चर और अचररूप समस्त व्यवहारका विषय वह ज्ञेय ( परमात्मा ) ही है? तो फिर वह यह है इस प्रकार सबसे क्यों नहीं जाना जा सकता इस पर कहते हैं -- ठीक है? सारा दृश्य उसीका स्वरूप है? तो भी वह ज्ञेय आकाशकी भाँति अति सूक्ष्म है। अतः यद्यपि वह आत्मरूपसे ज्ञेय है? तो भी सूक्ष्म होनेके कारण अज्ञानियोंके लिये अविज्ञेय ही है। ज्ञानी पुरुषोंके लिये तो? यह सब कुछ आत्मा ही है यह सब कुछ ब्रह्म ही है इत्यादि प्रमाणोंसे वह सदा ही प्रत्यक्ष रहता है। वह ज्ञेय अज्ञात होनेके कारण और हजारोंकरोड़ों वर्षोंतक भी प्राप्त न हो सकनेके कारण अज्ञानियोंके लिये बहुत दूर है? किंतु ज्ञानियोंका तो वह आत्मा ही है अतः उनके निकट ही है।

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Sri Anandgiri

ज्ञेयस्यास्तित्वे हेत्वन्तरमाह -- किञ्चेति। तद्धि प्रतिदेहं नभोवदेकं तद्भेदे मानाभावाद्भिन्नत्वे च घटवदनात्मत्वापातादतोऽद्वितीयं सर्वत्र प्रत्यग्भूतं ज्ञेयं नास्तीत्यतिसाहसमित्याह -- अविभक्तं चेति। कथं तर्हि देहादेर्भेदधीरित्याशङ्क्य कल्पनयेत्याह -- भूतेष्विति। तत्र हेतुः -- देहेष्विति। कार्याणां स्थितिहेतुत्वाच्च ज्ञेयमस्तीत्याह -- भूतेति। निमित्तोपादानतया तेषां प्रलये प्रभवे च कारणत्वाच्च तदस्तीत्याह -- प्रलयेति। तर्हि,कार्यकारणत्वस्य वस्तुत्वान्नाद्वैतमित्याशङ्क्याह -- यथेति।

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Sri Dhanpati

इतोऽपि ज्ञेयस्य ब्रह्मणोऽस्तित्वं ज्ञातव्यमित्याशयेनाह -- बहिरिति। त्वक्पर्यन्तं देहमात्मत्वेनाविद्याकल्पितमपेक्ष्य तमेवावाधिं कृत्वा बहिरुच्यते। तता प्रत्यगात्मानमपेक्ष्य देहमेवावधिं कृत्वान्तरुच्यते। तथाच भूतेभ्यो बहिर्बाह्यं विषयाद्यात्मकं भूतानां चराचराणामन्तर्मध्ये प्रत्यग्भूतं ज्ञेयमित्यर्थः। मध्ये प्राप्तमभावं वारयति। अचरं चरमेवच। यन्मध्ये भूतात्मकनानाविधदेहात्मना भासमानमपि तदेव ज्ञेयं यता रज्जौ भासमानः सर्पो रज्जुरेव तथासति ज्ञेये भासमानं ज्ञेयमेवेत्यर्थः। यद्येवं तर्हि सर्वैरिदमिति किमर्थं न विज्ञेयमिति चेत्तत्राह। शूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं। यथा आम्रादिगते रुपे चक्षुषा दृश्यमानेऽप्ययोग्यत्वात्तत्स्थिं रसादि तेन न दृश्यते तथा सर्वात्मकमपि ज्ञेयं सर्वस्मिञ्ज्ञातेप्याकाशवदतीन्द्रित्वात् तज्ज्ञेयमविज्ञेयम्। एतेन घटादिज्ञानेन ब्रह्मज्ञानमपि स्यात् घटाद्यात्मकत्वाद्ब्रह्मण इति शङ्कापि निरस्ता। अतएवाविदुषां तत्प्राप्तिसाधनशून्यानामविज्ञाततया दूरस्थं वर्षसहस्त्रकोट्याप्यप्राप्यत्वात्। अन्तिके च तत्। विदुषां तुआत्मैवेदं सर्वं ब्रह्मैवेदं सर्वम् इत्यादिप्रमाणतो नित्यविज्ञाततया स्वात्मभूतत्वाद्य्ववधानरहितमित्यर्थः। तथाच श्रुतिःतदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्विन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः। दूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् इत्याद्या।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
bahiḥoutside
antaḥinside
chaand
bhūtānāmall living beings
acharamnot moving
charammoving
evaindeed
chaand
sūkṣhmatvātdue to subtlety
tathe
avijñeyamincomprehensible
dūrastham
chaand
antikevery near
chaalso
tathe
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.15
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च

वे (परमात्मा) सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं; आसक्तिरहित हैं और सम्पूर्ण संसारका भरण-पोषण करनेवाले हैं; तथा गुणोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण गुणोंके भोक्ता हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.17
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च

वे परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियोंमें विभक्तकी तरह स्थित हैं। वे जाननेयोग्य परमात्मा ही सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले, उनका भरण-पोषण करनेवाले और संहार करनेवाले हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 16
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 16
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्

वे परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण हैं और चर-अचर प्राणियोंके रूपमें भी वे ही हैं एवं दूर-से-दूर तथा नजदीक-से-नजदीक भी वे ही हैं। वे अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे जाननेका विषय नहीं हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ: "वे परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण हैं और चर-अचर प्राणियोंके रूपमें भी वे ही हैं एवं दूर-से-दूर तथा नजदीक-से-नजदीक भी वे ही हैं। वे अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे जाननेका विषय नहीं हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 16?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 16 translates to: "It is within and without all beings, both the unmoving and the moving; It is subtle and unknowable, and It is near and far away. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 16 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। वे परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण हैं और चर-अचर प्राणियोंके रूपमें भी वे ही हैं एवं दूर-से-दूर तथा नजदीक-से-नजदीक भी वे ही हैं। वे अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे जाननेका विषय नहीं हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "bahir antaśh cha bhūtānām acharaṁ charam eva cha" mean in English?

"bahir antaśh cha bhūtānām acharaṁ charam eva cha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 16. It is within and without all beings, both the unmoving and the moving; It is subtle and unknowable, and It is near and far away. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.