Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 17
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च

वे परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियोंमें विभक्तकी तरह स्थित हैं। वे जाननेयोग्य परमात्मा ही सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले, उनका भरण-पोषण करनेवाले और संहार करनेवाले हैं। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

NepaliIND

अझै अविभाजित, यो अस्तित्वमा छ मानौं प्राणीहरूमा विभाजित; यो प्राणीहरूको समर्थकको रूपमा जान्नु पर्छ; यसले खान्छ र उत्पन्न गर्दछ।

GujaratiIND

હજુ સુધી અવિભાજિત, તે અસ્તિત્વમાં છે જાણે માણસોમાં વિભાજિત; તે જીવોના સમર્થક તરીકે ઓળખાય છે; તે ખાઈ જાય છે અને તે પેદા કરે છે.

KannadaIND

ಅವಿಭಜಿತ ಇನ್ನೂ, ಇದು ಜೀವಿಗಳಲ್ಲಿ ವಿಭಜಿಸಿದಂತೆ ಅಸ್ತಿತ್ವದಲ್ಲಿದೆ; ಇದು ಜೀವಿಗಳ ಬೆಂಬಲಿಗ ಎಂದು ತಿಳಿಯಬೇಕು; ಇದು ತಿನ್ನುತ್ತದೆ ಮತ್ತು ಉತ್ಪಾದಿಸುತ್ತದೆ.

MalayalamIND

ഇതുവരെ വിഭജിച്ചിട്ടില്ല, അത് ജീവികളായി വിഭജിക്കപ്പെട്ടതുപോലെ നിലനിൽക്കുന്നു; അത് അസ്തിത്വങ്ങളുടെ പിന്തുണക്കാരനായി അറിയപ്പെടേണ്ടതാണ്; അത് വിഴുങ്ങുകയും ഉത്പാദിപ്പിക്കുകയും ചെയ്യുന്നു.

MarathiIND

अद्याप अविभाजित, ते अस्तित्वात आहे जणू काही प्राण्यांमध्ये विभागलेले आहे; तो जीवांचा समर्थक म्हणून ओळखला जातो; ते खाऊन टाकते आणि उत्पन्न करते.

TamilIND

இன்னும் பிரிக்கப்படவில்லை, அது உயிரினங்களில் பிரிந்தது போல் உள்ளது; அது உயிரினங்களின் ஆதரவாளராக அறியப்பட வேண்டும்; அது விழுங்குகிறது மற்றும் உருவாக்குகிறது.

PunjabiIND

ਅਜੇ ਤੱਕ ਅਣਵੰਡਿਆ, ਇਹ ਮੌਜੂਦ ਹੈ ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਜੀਵਾਂ ਵਿੱਚ ਵੰਡਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ; ਜੀਵਾਂ ਦਾ ਸਮਰਥਕ ਜਾਣਿਆ ਜਾਣਾ ਹੈ; ਇਹ ਖਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਪੈਦਾ ਕਰਦਾ ਹੈ।

SindhiIND

اڻ ورهايل اڃا تائين، اهو موجود آهي ڄڻ ته مخلوق ۾ ورهايل؛ اهو ڄاڻڻ آهي ته مخلوق جو حامي؛ اهو کائي ٿو ۽ اهو پيدا ڪري ٿو.

BengaliIND

এখনও অবিভক্ত, এটি অস্তিত্বে বিভক্ত হয়ে আছে; এটি সত্তার সমর্থক হিসাবে পরিচিত; এটি গ্রাস করে এবং এটি উৎপন্ন করে।

TeluguIND

ఇంకా విభజించబడలేదు, ఇది జీవులలో విభజించబడినట్లుగా ఉంది; ఇది జీవుల మద్దతుదారుగా పిలువబడుతుంది; ఇది మ్రింగివేస్తుంది మరియు ఉత్పత్తి చేస్తుంది.

ManipuriIND

ꯑꯗꯨꯝ ꯑꯣꯏꯅꯃꯛ, ꯃꯁꯤ ꯖꯤꯕꯁꯤꯡꯗꯥ ꯈꯥꯌꯗꯣꯀꯄꯥ ꯃꯑꯣꯡꯗꯥ ꯂꯩꯔꯤ; ꯃꯁꯤ ꯖꯤꯕꯁꯤꯡꯒꯤ ꯁꯄꯣꯔꯇꯔ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯈꯉꯅꯒꯗꯕꯅꯤ; ꯃꯁꯤꯅꯥ ꯆꯥꯀꯏ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯁꯤꯅꯥ ꯖꯦꯅꯦꯔꯦꯠ ꯇꯧꯏ꯫

DogriIND

अविभाजित फिर भी, एह् इ'यां मौजूद ऐ जि'यां जीवें च बंड्डे दा ऐ; जीवां दे समर्थक दे तौर ते जानना है; एह् खांदा ऐ ते पैदा करदा ऐ।

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् -- इस त्रिलोकीमें देखने? सुनने और समझनेमें जितने भी स्थावरजङ्गम प्राणी आते हैं? उन सबमें परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी विभक्तकी तरह प्रतीत होते हैं। विभाग केवल प्रतीति है।जिस प्रकार आकाश घट? मठ आदिकी उपाधिसे घटाकाश? मठाकाश आदिके रूपमें अलगअलग दीखते हुए भी तत्त्वसे एक ही है? उसी प्रकार परमात्मा भिन्नभिन्न प्राणियोंके शरीरोंकी उपाधिसे अलगअलग दीखते हुए भी तत्त्वसे एक ही हैं।इसी अध्यायके सत्ताईसवें श्लोकमें समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् पदोंसे परमात्माको सम्पूर्ण प्राणियोंमें समभावसे स्थित देखनेके लिये कहा गया है। इसी तरह अठारहवें अध्यायके बीसवें श्लोकमें अविभक्तंविभक्तेषु पदोंसे सात्त्विक ज्ञानका वर्णन करते हुए भी परमात्माको अविभक्तरूपसे देखनेको ही सात्त्विक ज्ञान कहा गया है।भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च -- इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें विद्धि पदसे जिस परमात्माको जाननेकी बात कही गयी है और बारहवें श्लोकमें जिस ज्ञेय तत्त्वका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा की गयी है? उसीका यहाँ ब्रह्मा? विष्णु और शिवके रूपसे वर्णन हुआ है। वस्तुतः चेतन तत्त्व (परमात्मा) एक ही है। वे ही परमात्मा रजोगुणकी प्रधानता स्वीकार करनेसे ब्रह्मारूपसे सबको उत्पन्न करनेवाले सत्त्वगुणकी प्रधानता स्वीकार करनेसे विष्णुरूपसे सबका भरणपोषण करनेवाले और तमोगुणकी प्रधानता स्वीकार करनेसे रुद्ररूपसे सबका संहार करनेवाले हैं। तात्पर्य है कि एक ही परमात्मा सृष्टि? पालन और संहार करनेके कारण ब्रह्मा? विष्णु और शिव नाम धारण करते हैं । यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि परमात्मा सृष्टिरचनादि कार्योंके लिये भिन्नभिन्न गुणोंको स्वीकार करनेपर भी उन गुणोंके वशीभीत नहीं होते। गुणोंपर उनका पूर्ण आधिपत्य रहता है। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने ज्ञेय तत्त्वका आधाररूपसे वर्णन किया? अब आगेके श्लोकमें उसका प्रकाशकरूपसे वर्णन करते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तथा --, वह ज्ञेय प्रत्येक शरीरमें आकाशके समान अविभक्त और एक है। तो भी समस्त प्राणियोंमें विभक्त हुआसा स्थित है क्योंकि उसकी प्रतीति शरीरोंमें ही हो रही है। तथा वह ज्ञेय स्थितिकालमें भूतभर्तृ -- भूतोंका धारणपोषण करनेवाला? प्रलयकालमें ग्रसिष्णु -- सबका संहार करनेवाला और उत्पत्तिके समय प्रभविष्णु -- सबको उत्पन्न करनेवाला है? जैसे कि मिथ्याकल्पित सर्पादिके ( उत्पत्ति? स्थिति और नाशके कारण ) रज्जु आदि होते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

इतोऽपि ज्ञेयस्यास्तित्वमित्याह -- किञ्चेति। हेत्वन्तरमेव स्फोरयितुं शङ्कते -- सर्वत्रेति। न तत्तमो मन्तव्यमित्याह -- नेति। तर्हि किं तस्य रूपमिति पृच्छति -- किं तर्हीति। तत्रोत्तरं -- ज्योतिषामिति। सूर्यादीनां बुद्ध्यादीनां च प्रकाशकत्वादस्ति ज्ञेयं ब्रह्मेत्याह -- ज्योतिषामिति। तदेवोपपादयति -- आत्मेति। तत्र श्रुतिद्वयं प्रमाणयति -- येनेति। उक्तेऽर्थे वाक्यशेषमपि दर्शयति -- स्मृतेश्चेति। ज्ञेयस्यातमस्त्वेऽपि तमःस्पृष्टत्वमाशङ्क्योक्तं -- तमस इति। उत्तरार्धस्य तात्पर्यमाह -- ज्ञानादेरिति। उत्तम्भनमुद्दीपनं प्रकटीकरणमिति यावत्। ज्ञानममानित्वादि करणव्युत्पत्त्येति शेषः। ज्ञानगम्यं ज्ञेयमिति पुनरुक्तिं शङ्कित्वोक्तं -- ज्ञेयमिति। उक्तत्रयस्य बुद्धिस्थतया प्राकट्यं प्रकटयति -- तदेतदिति। तत्रानुभवमनुकूलयति -- तत्रैवेति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

किंचेतोऽपि ज्ञेयास्तित्वमित्याह। अविभक्तं विभागशून्यं प्रतिदेहं व्योमवदेकं तद्भेदे मानाभावाद्भिन्नत्वे च घटवदनात्मत्वापातात्। तथाच श्रुतिःएकमेवाद्वितीयं नेह नानास्ति किंचन। मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति इत्याद्या। तेन प्रतिदेहं भिन्न आत्मेति सांख्यादिमतं श्रुतिस्मृतिविरुद्धं नादर्तव्यम्। कथं तर्हि भेदबुद्धिरित्याशंक्य कल्पनयेत्याह। भूतेषु सर्वप्राणिषु विभक्तमिव च स्थितं मिथ्याभूतभेदवत्प्रतीतं जलमात्रेषु चन्द्रावद्देहेष्वेव विभाव्यमानत्वात्।एकएव तु भूतात्मा भूतेभूते व्यवस्थितः। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् इतिश्रुतेः। एव ज्ञेयस्य प्रत्यगात्मत्वेनास्तित्वमभिधाय परमेश्वरात्मनास्तित्वमाह। भूतभर्तृ च स्थितिकाले तज्ज्ञेयं। भूतानि बिभार्ति धारयति पालयति चेति तत्प्रलयकाले तदेव ग्रसिष्णु ग्रसनशीलं उत्पत्तिकाले प्रभविष्णु प्रभवनशीलं यथा कल्पितसर्पादीनां स्थितिकाले रज्जवादिरेव तान्बभर्ति। बाधकाले च ग्रसिष्णुरुत्पत्तिकाले च प्रभविष्णुरित्यर्थः। तेन कार्यकारणत्वस्य वस्तु त्वाद्द्वतमिति न शङ्कनीयम्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
avibhaktamindivisible
chaalthough
bhūteṣhuamongst living beings
vibhaktamdivided
ivaapparently
chayet
sthitamsituated
bhūtabhartṛi
chaalso
tatthat
jñeyamto be known
grasiṣhṇuthe annihilator
prabhaviṣhṇuthe creator
chaand
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.16
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्

वे परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण हैं और चर-अचर प्राणियोंके रूपमें भी वे ही हैं एवं दूर-से-दूर तथा नजदीक-से-नजदीक भी वे ही हैं। वे अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे जाननेका विषय नहीं हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.18
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्

वह परमात्मा सम्पूर्ण ज्योतियोंका भी ज्योति और अज्ञानसे अत्यन्त परे कहा गया है। वह ज्ञानस्वरूप, जाननेयोग्य, ज्ञान(साधन-समुदाय) से प्राप्त करनेयोग्य और सबके हृदयमें विराजमान है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 17
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 17
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च

वे परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियोंमें विभक्तकी तरह स्थित हैं। वे जाननेयोग्य परमात्मा ही सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले, उनका भरण-पोषण करनेवाले और संहार करनेवाले हैं। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 17 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 17 का हिंदी अर्थ: "वे परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियोंमें विभक्तकी तरह स्थित हैं। वे जाननेयोग्य परमात्मा ही सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले, उनका भरण-पोषण करनेवाले और संहार करनेवाले हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 17?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 17 translates to: "Undivided yet, It exists as if divided in beings; It is to be known as the supporter of beings; It devours and It generates. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु " — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 17 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। वे परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियोंमें विभक्तकी तरह स्थित हैं। वे जाननेयोग्य परमात्मा ही सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले, उनका भरण-पोषण करनेवाले और संहार करनेवाले हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "avibhaktaṁ cha bhūteṣhu vibhaktam iva cha sthitam" mean in English?

"avibhaktaṁ cha bhūteṣhu vibhaktam iva cha sthitam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 17. Undivided yet, It exists as if divided in beings; It is to be known as the supporter of beings; It devours and It generates. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.