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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 15
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च

वे (परमात्मा) सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं; आसक्तिरहित हैं और सम्पूर्ण संसारका भरण-पोषण करनेवाले हैं; तथा गुणोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण गुणोंके भोक्ता हैं। — VaniSagar

Global Translations

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SindhiIND

سڀني حواس جي ڪمن سان چمڪندڙ، اڃا تائين انهن سان ڳنڍيل نه آهي؛ غير منسلڪ، اڃا تائين سڀني جي حمايت؛ خاصيتن کان خالي، پر انهن جو تجربو ڪندڙ.

MarathiIND

सर्व इंद्रियांच्या कार्याने चमकणारे, तरीही त्यांना संलग्न न करता; संलग्न नसलेले, तरीही सर्वांना आधार देणारे; गुण नसलेले, तरीही त्यांचा अनुभव घेणारा.

DogriIND

सारे इंद्रियां दे कम्में कन्नै चमकदे होई, फिरी बी उंदे कन्नै जुड़े दे बगैर; असक्त, फिर भी सारें दा समर्थन करदे; गुणों से रहित, फिर भी उन्दे अनुभवी।

MizoIND

Hriatthiamna zawng zawng hnathawhna hmanga eng, mahse anmahni nena inzawm tlat lo; unattached, mahse mi zawng zawng thlawptu; mizia nei lo, chuti chung pawha chutiang thil tawn neitu.

KannadaIND

ಎಲ್ಲಾ ಇಂದ್ರಿಯಗಳ ಕಾರ್ಯಗಳಿಂದ ಹೊಳೆಯುತ್ತಿದೆ, ಆದರೂ ಅವುಗಳಿಗೆ ಅಂಟಿಕೊಳ್ಳದೆ; ಲಗತ್ತಿಸದ, ಇನ್ನೂ ಎಲ್ಲಾ ಬೆಂಬಲಿಸುವ; ಗುಣಗಳಿಲ್ಲದಿದ್ದರೂ, ಅವುಗಳನ್ನು ಅನುಭವಿಸುವವನು.

KonkaniIND

सगळ्या इंद्रियांच्या कार्यांनी चकचकीत, तरी तांकां आसक्त नासतना; असक्त, तरी सगळ्यांक आदार दिवपी; गुणहीन, तरी तांचे अणभव घेवपी.

AssameseIND

সকলো ইন্দ্ৰিয়ৰ কাৰ্য্যৰ দ্বাৰা জিলিকি থকা, তথাপিও সেইবোৰৰ লগত সংলগ্ন নোহোৱাকৈ; অসংলগ্ন, তথাপিও সকলোকে সমৰ্থন কৰা; গুণহীন, তথাপিও সেইবোৰৰ অভিজ্ঞতা।

TamilIND

அனைத்து புலன்களின் செயல்பாடுகளால் பிரகாசிக்கிறது, இன்னும் அவற்றுடன் இணைக்கப்படாமல்; இணைக்கப்படாத, இன்னும் அனைத்தையும் ஆதரிக்கும்; குணங்கள் அற்ற, ஆயினும் அவற்றை அனுபவிப்பவர்.

BhojpuriIND

सब इंद्रियन के कार्य से चमकत, फिर भी बिना ओह लोग से जुड़ल; असक्त, फिर भी सबके समर्थन करे वाला; गुण से रहित, तबो ओह लोग के अनुभवी।

GujaratiIND

બધી ઇન્દ્રિયોના કાર્યોથી ચમકતા, તેમ છતાં તેમની સાથે જોડાયેલા વિના; અસંબંધિત, છતાં બધાને ટેકો આપનાર; ગુણોથી રહિત, છતાં તેનો અનુભવ કરનાર.

PunjabiIND

ਸਾਰੀਆਂ ਇੰਦਰੀਆਂ ਦੇ ਕਾਰਜਾਂ ਦੁਆਰਾ ਚਮਕਦਾਰ, ਫਿਰ ਵੀ ਉਹਨਾਂ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਹੋਏ ਬਿਨਾਂ; ਨਿਰਲੇਪ, ਫਿਰ ਵੀ ਸਭ ਦਾ ਸਮਰਥਨ; ਗੁਣਾਂ ਤੋਂ ਰਹਿਤ, ਫਿਰ ਵੀ ਉਹਨਾਂ ਦਾ ਅਨੁਭਵ ਕਰਨ ਵਾਲਾ।

MalayalamIND

എല്ലാ ഇന്ദ്രിയങ്ങളുടെയും പ്രവർത്തനങ്ങളാൽ തിളങ്ങുന്നു, എന്നിട്ടും അവയോട് ചേർന്നുനിൽക്കാതെ; അറ്റാച്ച്ഡ്, എന്നിട്ടും എല്ലാവരെയും പിന്തുണയ്ക്കുന്നു; ഗുണങ്ങളില്ലാത്ത, എങ്കിലും അവ അനുഭവിക്കുന്നവൻ.

Sacred Commentaries

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Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् -- पहले परमात्मा हैं? फिर परमात्माकी शक्ति प्रकृति है। प्रकृतिका कार्य महत्तत्त्व? महत्तत्त्वका कार्य अहंकार? अहंकारका कार्य पञ्चमहाभूत? पञ्चमहाभूतोंका कार्य मन एवं दस इन्द्रियाँ और दस इन्द्रियोंका कार्य पाँच विषय -- ये सभी प्रकृतिके कार्य हैं। परमात्मा प्रकृति और उसके कार्यसे अतीत हैं। वे चाहे सगुण हों या निर्गुण? साकार हों या निराकार? सदा प्रकृतिसे अतीत ही रहते हैं। वे अवतार लेते हैं? तो भी प्रकृतिसे अतीत ही रहते हैं। अवतारके समय वे प्रकृतिको अपने वशमें करके प्रकट होते हैं।जो अपनेको गुणोंमें लिप्त? गुणोंसे बँधा हुआ मानकर जन्मतामरता था? वह बद्ध जीव भी जब परमात्माको प्राप्त होनेपर गुणातीत (गुणोंसे रहित) कहा जाता है? तो फिर परमात्मा गुणोंमें बद्ध कैसे हो सकते हैं वे तो सदा ही गुणोंसे अतीत (रहित) हैं। अतः वे प्राकृत इन्द्रियोंसे रहित हैं अर्थात् संसारी जीवोंकी तरह हाथ? पैर? नेत्र? सिर? मुख? कान आदि इन्द्रियोंसे युक्त नहीं हैं किन्तु उनउन इन्द्रियोंके विषयोंको ग्रहण करनेमें सर्वथा समर्थ है । जैसे -- वे कानोंसे रहित होनेपर भी भक्तोंकी पुकार सुन लेते हैं? त्वचासे रहित होनेपर भी भक्तोंका आलिङ्गन करते हैं? नेत्रोंसे रहित होनेपर भी प्राणिमात्रको निरन्तर देखते रहते हैं? रसनासे रहित होनेपर भी भक्तोंके द्वारा लगाये हुए भोगका आस्वादन करते हैं? आदिआदि। इस तरह ज्ञानेन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी परमात्मा शब्द? स्पर्श आदि विषयोंको ग्रहण करते हैं। ऐसे ही वे वाणीसे रहित होनेपर भी अपने प्यारे भक्तोंसे बातें करते हैं? चरणोंसे रहित होनेपर भी भक्तके पुकारनेपर दौड़कर चले आते हैं? हाथोंसे रहित होनेपर भी भक्तके दिये हुए उपहारको ग्रहण करते हैं? आदिआदि। इस तरह कर्मेन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी परमात्मा कर्मेन्द्रियोंका सब कार्य करते हैं। यही इन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी भगवान्का इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करना है।असक्तं सर्वभृच्चैव -- भगवान्का सभी प्राणियोंमें अपनापन? प्रेम है? पर किसी भी प्राणीमें आसक्ति नहीं है। आसक्ति न होनेपर भी वे ब्रह्मासे चींटीपर्यन्त सम्पूर्ण प्राणियोंका पालनपोषण करते हैं। जैसे मातापिता अपने बालकका पालनपोषण करते हैं? उससे कई गुना अधिक पालनपोषण भगवान् प्राणियोंका करते हैं। कौन प्राणी कहाँ है और किस प्राणीको कब किसी वस्तु आदिकी जरूरत पड़ती है? इसको पूरी तरह जानते हुए भगवान् उस वस्तुको आवश्यकतानुसार यथोचित रीतिसे पहुँचा देते हैं। प्राणी पृथ्वीपर हो? समुद्रमें हो? आकाशमें हो अथवा स्वर्गमें हो अर्थात् त्रिलोकीमें कहीं भी कोई छोटासेछोटा अथवा बड़ासेबड़ा प्राणी हो? उसका पालनपोषण भगवान् करते हैं। प्राणिमात्रके सुहृद् होनेसे वे अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितियोंके द्वारा पापपुण्योंका नाश करके प्राणिमात्रको शुद्ध? पवित्र करते रहते हैं।निर्गुणं गुणभोक्तृ च -- वे परमात्मा सम्पूर्ण गुणोंसे रहित होनेपर भी सम्पूर्ण गुणोंके भोक्त हैं। तात्पर्य है कि जैसे मातापिता बालककी मात्र क्रियाओंको देखकर प्रसन्न होते हैं? ऐसे ही परमात्मा भक्तके द्वारा की हुई मात्र क्रियाओंको देखकर प्रसन्न होते हैं? अर्थात् भक्तलोग जो भी क्रियाएँ करते हैं? उन सब क्रियाओंके भोक्ता भगवान् ही बनते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

उपाधिरूप हाथ? पैर आदि इन्द्रियोंके अध्यारोपसे किसीको ऐसी शङ्का न हो कि ज्ञेय उन उपाधियोंवाला है? इस अभिप्रायसे यह श्लोक कहते हैं --, वह ज्ञेय समस्त इन्द्रियोंके गुणोंसे अवभासित ( प्रतीत ) होनेवाला है। यहाँ श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ? वाक् आदि कर्मेन्द्रियाँ तथा मन और बुद्धि ये दोनों अन्तःकरण -- इन सबका सर्व इन्द्रियोंके नामसे ग्रहण है क्योंकि अन्तःकरण भी ज्ञेयकी उपाधिके रूपमें अन्य इन्द्रियोंके समान ही है? बल्कि श्रोत्रादिका भी उपाधित्व अन्तःकरणरूप उपाधिके द्वारा ही है। इसलिये यह अभिप्राय है कि उपाधिरूप अन्तःकरण और बाह्यकरण? इन सभी इन्द्रियोंके गुण जो निश्चय? संकल्प? श्रवण और भाषण आदि हैं? उनके द्वारा वह ज्ञेय प्रतिभासित होता है अर्थात् उन इन्द्रियोंकी क्रियासे वह क्रियावान्सा दिखलायी देता है। ध्यान करता हुआसा? चेष्टा करता हुआसा इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है। तो फिर उस ज्ञेयको स्वयं क्रिया करनेवाला ही क्यों नहीं मान लिया जाता इसपर कहते हैं -- वह ज्ञेय समस्त इन्द्रियोंसे रहित है अर्थात् सब करणोंसे रहित है। इसलिये वह इन्द्रियोंके व्यापारसे ( वास्तवमें ) व्यापारवाला नहीं होता। यह जो मन्त्र है कि वह ( ईश्वर ) बिना पैर और हाथके चलता और ग्रहण करता है? बिना चक्षुके देखता और बिना कानोंके सुनता है सो इस अभिप्रायको दिखानेके लिये है कि वह ज्ञेय समस्त इन्द्रियरूप उपाधियोंके गुणोंकी अनुरूपता प्राप्त करनेमें समर्थ है? उसे साक्षात् गमनादि क्रियाओँसे युक्त बतलानेके लिये यह मन्त्र नहीं है। अन्धेने मणि प्राप्त की इत्यादि मन्त्रोंके अर्थकी भाँति उस मन्त्रका अर्थ है वह ज्ञेय समस्त इन्द्रियोंसे रहित है? इसलिये संगरहित है अर्थात् सब प्रकारके सम्बन्धोंसे रहित है। यद्यपि यह बात है तो भी वह ज्ञेय सबको धारण करनेवाला है। सत्बुद्धि सर्वत्र व्याप्त है? अतः सत् ही,सबका अधिष्ठान है। मृगतृष्णिकादि मिथ्या पदार्थ भी बिना अधिष्ठानके नहीं होते? इसलिये वह ज्ञेय सबका धारण करनेवाला है। उस ज्ञेयकी सत्ताको बतलानेवाला यह दूसरा साधन भी है। वह ज्ञेय निर्गुण यानी सत्त्व? रज और तम इन तीनों गुणोंसे अतीत है तो भी गुणोंका भोक्ता है अर्थात् वह ज्ञेय सुखदुःख और मोहके रूपमें परिणत हुए तीनों गुणोंका शब्दादिद्वारा भोग करनेवाला -- उन्हें उपलब्ध करनेवाला है।

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Sri Anandgiri

इतोऽपि ज्ञेयं ब्रह्मास्तीत्याह -- किञ्चेति। बहिरिति व्याख्येयमादाय व्याचष्टे -- त्वगिति। भूतेभ्यो बहिर्बाह्यविषयाद्यात्मकमित्यर्थः। कथमनात्मन एवात्मत्वं कल्पनयेत्याह -- आत्मत्वेनेति। अन्तःशब्दार्थमाह -- तथेति। भूतानां चराचराणामन्तर्मध्ये प्रत्यग्भूतमित्यर्थः। द्वितीयं पादमवतार्य व्याचष्टे -- बहिरित्यादिना। यन्मध्ये भूतात्मकं नानाविधदेहात्मना भासमानं तदपि ज्ञेयान्तर्भूतं तत्त्वं सदित्यर्थः। कथं चराचरात्मनो भूतजातस्य ज्ञेयत्वं तत्राह -- यथेति। अधिष्ठाने रज्ज्वां कल्पितसर्पादेरन्तर्भाववद्देहाभासस्यापि ज्ञेयान्तर्भावान्नासत्त्वं मध्ये ज्ञेयस्य शङ्कितव्यमित्यर्थः। सर्वात्मकं चेज्ज्ञेयं सर्वैरिदमिति किमिति न गृह्येतेति शङ्कते -- यदीति। इदमिति ग्राह्यत्वयोग्यत्वाभावान्नेत्याह -- उच्यत इति। सर्ववस्त्वात्मना भासते तदयोग्यत्वं कथमित्याशङ्क्याह -- सत्यमिति। सूक्ष्मत्वेऽपि किं स्यादित्याशङ्क्याह -- अत इति। सूक्ष्मत्वमतीन्द्रियत्वम् तस्याविज्ञेयत्वे कुतस्तज्ज्ञानान्मुक्तिस्तत्राह -- अविदुषामिति। विशेषणफलमाह -- विदुषां त्विति। तेषामात्मत्वेन ज्ञातं चेत्कथं दूरस्थत्वमित्याशङ्क्याह -- अविज्ञाततयेति। कथं तर्हि तस्य प्रत्यक्त्वं तत्राह -- अन्तिके चेति। विद्वदविद्वद्भेदापेक्षयादूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च इति श्रुतिस्तदर्थोऽत्र प्रसङ्गादनूदित इत्यर्थः।

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Sri Dhanpati

अपाधिभूतपाण्यादीन्द्रियाध्यारोपणं विना ज्ञयस्य साक्षादेव तद्वत्ताभ्रमनिरासायाह -- सर्वेति। सर्वाणि च तानीन्द्रियाणि श्रोत्रवागादीनि बुद्धीन्द्रियकर्मेन्द्रियाणि ज्ञेयोपाधित्वस्य तुल्यत्वात् अन्तःकरणोपाधिद्वारेणैव श्रोत्रादीनामप्युपाधित्वाच्च सर्वेन्द्रिग्रहणेनान्तःकरणे बुद्धिमनसी अपि गृह्येते। तताजान्तःकरणबहिःकरणव्यापार उपलक्ष्यते इति श्रुत्यर्थः। व्यापृतमेव ब्रह्मेति भ्रमनिराकरणायाह। सर्वेन्द्रियविवर्जितं विशेषेण कालत्रयेऽपि सर्वकरणरहितमतो न करणव्यापारैः वस्तुतो व्यापृतं तज्ज्ञेयमित्यर्थः। ननुअपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेत्ति वेद्यं नच तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तरम् इत्यादिमन्त्रेण साक्षादेव ज्ञेयस्य वेगवद्विहरणादिक्रियावत्ताप्रतीत्या कुचोऽस्य करणव्यापारैः व्यापृतत्वमेव न व्याख्यायत इतिचेत्। ध्यायतीवेतिश्रुत्यनुसारेण मन्त्रस्यापि सर्वेन्द्रियोपाधिगुणानुगुण्यभजनशक्तिमत् ज्ञेयमत्येव प्रदर्शनार्थत्वेनान्धो मणिमविन्ददित्यादिमन्त्रार्थवादवदस्यार्थवादस्य श्रुतेः साक्षादेव चवादिक्रियावत्त्वरुपेऽर्थे तात्पर्याभावेन प्रकृतेः प्रतिकूलताया अभावात्। सर्वकरणविवर्जितत्वादक्तं सर्वसङ्गविनिर्मुक्तंअसङ्गो हीति श्रुतेः। वस्तुतः सर्वसङ्गविवर्जितमपि सर्वाधिष्टानमित्याह। सर्वभृच्चैव स्वसत्तामात्रेणाधिष्ठानतया सर्वं पुष्णातीत्यर्थः। तथाचायं प्रयोगः। विमतं सत्यध्यस्तं प्रत्येकं तदनुविद्धधीबोध्यत्वात् प्रत्येकं चन्द्रानुविद्धधीबोध्यचन्द्रभेदवदिति। तथाच सर्वस्यापि व्यावहारिकप्रातिभासिकपदार्थजातस्य निरास्पदत्वाभावात् विचार्यमाणँ तस्य सदास्पदत्वात् सर्वभृज्ज्ञेयमित्यर्थः। सर्वाधिष्ठानत्वेऽपि वस्तुतस्तस्य निर्गुणत्वमाह। निर्गुणं गुणऐः सत्त्वरजस्तमोभिः शून्यं तज्ज्ञेयम्। यद्यप्येवं तथापि मायाय गुणभोक्तृ च। गुणानां सत्त्वादीनां शब्दारिद्वारेण सुखदुःखमोहाकारेण परिणतानां भोक्तृ उपलब्धृ ज्ञेयं ब्रह्मेत्यन्वयः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sarvaall
indriyasenses
guṇasense
ābhāsamthe perciever
sarvaall
indriyasenses
vivarjitamdevoid of
asaktamunattached
sarvabhṛit
chayet
evaindeed
nirguṇambeyond the three modes of material nature
guṇabhoktṛi
chaalthough
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.14
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति

वे (परमात्मा) सब जगह हाथों और पैरोंवाले, सब जगह नेत्रों, सिरों और मुखोंवाले तथा सब जगह कानोंवाले हैं। वे संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.16
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्

वे परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण हैं और चर-अचर प्राणियोंके रूपमें भी वे ही हैं एवं दूर-से-दूर तथा नजदीक-से-नजदीक भी वे ही हैं। वे अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे जाननेका विषय नहीं हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 15
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 15
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च

वे (परमात्मा) सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं; आसक्तिरहित हैं और सम्पूर्ण संसारका भरण-पोषण करनेवाले हैं; तथा गुणोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण गुणोंके भोक्ता हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 15 का हिंदी अर्थ: "वे (परमात्मा) सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं; आसक्तिरहित हैं और सम्पूर्ण संसारका भरण-पोषण करनेवाले हैं; तथा गुणोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण गुणोंके भोक्ता हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 15?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 15 translates to: "Shining by the functions of all the senses, yet without being attached to them; unattached, yet supporting all; devoid of qualities, yet the experiencer of them. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्त" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 15 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। वे (परमात्मा) सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं; आसक्तिरहित हैं और सम्पूर्ण संसारका भरण-पोषण करनेवाले हैं; तथा गुणोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण गुणोंके भोक्ता हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sarvendriya-guṇābhāsaṁ sarvendriya-vivarjitam" mean in English?

"sarvendriya-guṇābhāsaṁ sarvendriya-vivarjitam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 15. Shining by the functions of all the senses, yet without being attached to them; unattached, yet supporting all; devoid of qualities, yet the experiencer of them. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.