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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 14
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति

वे (परमात्मा) सब जगह हाथों और पैरोंवाले, सब जगह नेत्रों, सिरों और मुखोंवाले तथा सब जगह कानोंवाले हैं। वे संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

BengaliIND

হাত-পা সর্বত্র, চক্ষু, মস্তক, মুখ সর্বত্র, কান সহ সর্বত্র, তিনি বিশ্বজগতে বিরাজমান, সকলকে আবৃত করে আছেন।

NepaliIND

जताततै हात-खुट्टाले, आँखा, शिर, मुख, जताततै, कान, जताततै, सबैलाई ढाकेर संसारमा विराजमान हुनुहुन्छ।

MarathiIND

सर्वत्र हात-पाय, डोळे, डोके, तोंड सर्वत्र, कानांनी सर्वत्र, तो सर्वत्र व्यापून जगामध्ये अस्तित्वात आहे.

TeluguIND

ప్రతిచోటా చేతులు మరియు కాళ్ళు, కళ్ళు, తలలు మరియు నోరు ప్రతిచోటా, ప్రతిచోటా చెవులతో, అతను ప్రపంచాలలో ఉన్నాడు, అందరినీ ఆవరించి ఉన్నాడు.

PunjabiIND

ਹਰ ਥਾਂ ਹੱਥ ਪੈਰ, ਅੱਖਾਂ, ਸਿਰ ਅਤੇ ਮੂੰਹ ਹਰ ਥਾਂ, ਕੰਨਾਂ ਸਮੇਤ, ਉਹ ਜਗਤ ਵਿਚ ਮੌਜੂਦ ਹੈ, ਸਭ ਨੂੰ ਘੇਰਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ।

SindhiIND

هر هنڌ هٿ پير، اکيون، مٿو ۽ وات هر هنڌ، ڪنن سان هر هنڌ، هو عالمن ۾ موجود آهي، سڀني کي ڍڪيل آهي.

DogriIND

हर जगह हत्थ-पैर, हर जगह अक्खीं, सिर, मुंह, हर जगह कान, सारे गी लपेटदे होई लोकें च मौजूद ऐ।

MaithiliIND

सब ठाम हाथ-पैर, सब ठाम आँखि, माथ, मुँह, सब ठाम कान, सब केँ आच्छादित लोक मे विद्यमान छथि।

AssameseIND

সকলোতে হাত-ভৰি, সকলোতে চকু, মূৰ, মুখ, সকলোতে কাণ লৈ, তেওঁ সকলোকে আৱৰি ধৰি জগতবোৰত বিদ্যমান।

BhojpuriIND

हर जगह हाथ गोड़, हर जगह आँख, सिर, मुँह, हर जगह कान, ऊ लोकन में मौजूद बाड़े, सब के लपेट के।

TamilIND

எங்கும் கைகளாலும், கால்களாலும், எங்கும் கண்களாலும், தலைகளாலும், வாய்களாலும், எங்கும் காதுகளுடனும், அனைத்தையும் சூழ்ந்து கொண்டு உலகங்களில் இருக்கிறார்.

MalayalamIND

എല്ലായിടത്തും കൈകളും കാലുകളും, എല്ലായിടത്തും കണ്ണുകളും, തലകളും, വായകളും, എല്ലായിടത്തും ചെവികൾ, എല്ലായിടത്തും അവൻ ലോകങ്ങളിൽ നിലനിൽക്കുന്നു.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- सर्वतः पाणिपादं तत् -- जैसे स्याहीमें सब जगह सब तरहकी लिपियाँ विद्यमान हैं अतः लेखक स्याहीसे सब तरहकी लिपियाँ लिख सकता है। सोनेमें सब जगह सब तरहके गहने विद्यमान हैं अतः सुनार सोनेमें किसी भी जगहसे जो गहना बनाना चाहे? बना सकता है। ऐसे ही भगवान्के सब जगह ही हाथ और पैर हैं अतः भक्त भक्तिसे जहाँकहीं जो कुछ भी भगवान्के हाथोंमें देना चाहता है? अर्पण करना चाहता है? उसको ग्रहण करनेके लिये उसी जगह भगवान्के हाथ मौजूद हैं। भक्त बाहरसे अर्पण करना चाहे अथवा मनसे? पूर्वमें देना चाहे अथवा पश्चिममें? उत्तरमें देना चाहे अथवा दक्षिणमें? उसे ग्रहण करनेके लिये वहीं भगवान्के हाथ मौजूद हैं। ऐसे ही भक्त जलमें? स्थलमें? अग्निमें? जहाँकहीं जिस किसी भी संकटमें पड़नेपर भगवान्को पुकारता है? उसकी रक्षा करनेके लिये वहाँ ही भगवान्के हाथ तैयार हैं अर्थात् भगवान् वहाँ ही अपने हाथोंसे उसकी रक्षा करते हैं।भक्त जहाँकहीं भगवान्के चरणोंमें चन्दन लगाना चाहता है? पुष्प चढ़ाना चाहता है? नमस्कार करना चाहता है? उसी जगह भगवान्के चरण मौजूद हैं। हजारोंलाखों भक्त एक ही समयमें भगवान्के चरणोंकी अलगअलग पूजा करना चाहें? तो उनके भावके अनुसार वहाँ ही भगवान्के चरण मौजूद हैं।सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् -- भक्त भगवान्को जहाँ दीपक दिखाता है? आरती करता है? वहाँ ही भगवान्के नेत्र हैं। भक्त जहाँ शरीरसे अथवा मनसे नृत्य करता है? वहाँ ही भगवान् उसके नृत्यको देख लेते हैं। तात्पर्य है कि जो भगवान्को सब जगह देखता है? भगवान् भी उसकी दृष्टिसे कभी ओझल नहीं होते (गीता 6। 30)।भक्त जहाँ भगवान्के मस्तकपर चन्दन लगाना चाहे? पुष्प चढ़ाने चाहे? वहाँ ही भगवान्का मस्तक है।भक्त जहाँ भगवान्को भोग लगाना चाहे? वहाँ ही भगवान्का मुख है अर्थात् भक्तद्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए पदार्थको भगवान् वहाँ ही खा लेते हैं (गीता 9। 26)।सर्वतःश्रुतिमत् -- भक्त जहाँकहीं जोरसे बोलकर प्रार्थना करे? धीरेसे बोलकर प्रार्थना करे अथवा मनसे प्रार्थना करे? वहाँ ही भगवान् अपने कानोंसे सुन लेते हैं।मनुष्योंके सब अवयव (अङ्ग) सब जगह नहीं होते अर्थात् जहाँ नेत्र हैं? वहाँ कान नहीं होते और जहाँ कान,हैं? वहाँ नेत्र नहीं होते जहाँ हाथ हैं? वहाँ पैर नहीं होते और जहाँ पैर हैं? वहाँ हाथ नहीं होते इत्यादि। परन्तु भगवान्की इन्द्रियाँ? उनके अवयव सब जगह हैं। अतः भगवान् नेत्रोंसे सुन भी सकते हैं? बोल भी सकते हैं? ग्रहण भी कर सकते हैं इत्यादि। तात्पर्य है कि वे सभी अवयवोंसे सभी क्रियाएँ कर सकते हैं क्योंकि उनके सभी अवयवोंमें सभी अवयव मौजूद हैं। उनके छोटेसेछोटे अंशमें भी सबकीसब इन्द्रियाँ हैं।भगवान्के सब जगह हाथ? पैर? नेत्र? सिर? मुख और कान कहनेका तात्पर्य है कि भगवान् किसी भी प्राणीसे दूर नहीं हैं। कारण कि भगवान् सम्पूर्ण देश? काल? वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति आदिमें परिपूर्णरूपसे विद्यमान हैं। संतोंने कहा है -- चहुँ दिसि आरति चहुँ दिसि पूजा। चहुँ दिसि राम और नहिं दूजा।।संसारी आदमीको जैसे बाहरभीतर? ऊपरनीचे सब जगह संसारहीसंसार दीखता है? संसारके सिवाय दूसरा कुछ दीखता ही नहीं? ऐसे ही परमात्माको तत्त्वसे जाननेवाले पुरुषको सब जगह परमात्माहीपरमात्मा दीखते हैं।लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति -- अनन्त सृष्टियाँ हैं? अनन्त ब्रह्माण्ड हैं? अनन्त ऐश्वर्य हैं और उन सबमें देश? काल? वस्तु? व्यक्ति आदि भी अनन्त हैं? वे सभी परमात्माके अन्तर्गत हैं। परमात्मा उन सबको व्याप्त करके स्थित हैं। दसवें अध्यायके बयालीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने कहा है कि मैं सारे संसारको एक अंशसे व्याप्त करके स्थित हूँ। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें सगुणनिराकारका वर्णन करके अब आगेके तीन श्लोकोंमें उसकी विलक्षणता? सर्वव्यापकता और सर्वसमर्थताका वर्णन करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

वह ज्ञेय सत् शब्दद्वारा होनेवाली प्रतीतिका विषय नहीं है? इससे उसके न होनेकी आशङ्का होनेपर उस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये? समस्त प्राणियोंकी इन्द्रियादि उपाधियोंद्वारा उस ज्ञेयके अस्तित्वका प्रतिपादन करते हुए कहते हैं --, वह ज्ञेय सब ओर हाथपैरवाला है अर्थात् उसके हाथपैर सर्वत्र फैले हुए हैं। सब प्राणियोंकी इन्द्रियरूप उपाधियोंद्वारा क्षेत्रज्ञका अस्तित्व प्रकट होता है। क्षेत्ररूप उपाधिके कारण ही वह ज्ञेय क्षेत्रज्ञ कहा जाता है। क्षेत्ररूप उपाधि हाथ? पैर आदि भेदसे अनेक प्रकार विभक्त है। वास्तवमें? क्षेत्रकी उपाधियोंके भेदसे किये हुए समस्त भेद क्षेत्रज्ञमें मिथ्या ही हैं? अतः उनको हटाकर ज्ञेयका स्वरूप वह न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है ऐसे बतलाया गया है। तथा ज्ञेयका अस्तित्व समझानेके लिये उपाधिकृत मिथ्यारूपको भी उसके धर्मकी भाँति कल्पना करके उसको सब ओरसे हाथपैरवाला है? इत्यादि प्रकारसे बतलाया जाता है। सम्प्रदायपरम्पराको जाननेवालोंका भी यही कहना है कि अध्यारोप और अपवादद्वारा प्रपञ्चरहित परमात्माकी व्याख्या की जाती है। सर्वत्र अर्थात् सब शरीरोंके अंगरूपसे स्थित हाथ? पैर आदि इन्द्रियाँ? ज्ञेय शक्तिकी सत्तासे ही स्वकार्यमें समर्थ हो रही हैं? अतः ये सब ज्ञेयकी सत्ताके चिह्न होनेके कारण उपचारसे ज्ञेयके ( धर्म ) कहे जाते हैं। ऐसे ही और सबकी भी व्याख्या कर लेनी चाहिये। वह ज्ञेय सब ओर हाथपैरवाला है? तथा सब ओर नेत्र? शिर और मुखवाला है -- जिसके आँख? शिर और मुख सर्वत्र हों? वह सर्वतोऽक्षिशिरोमुख कहलाता है तथा वह सब ओर कानवाला है -- जिसके श्रुति अर्थात् श्रवणेन्द्रिय हो वह श्रुतिमत् ( कानवाला ) कहा जाता है। इस लोकमें -- समस्त प्राणिसमुदायमें वह सबको व्याप्त करके स्थित है।

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Sri Anandgiri

आरोपादृते साक्षादेव ज्ञेयस्य पाण्यादिमत्त्वमाशङ्क्याह -- उपाधीति। इन्द्रियविशेषणीभूतसर्वशब्दाज्ज्ञेयोपाधित्वन्यायाविशेषाच्चात्र बुद्ध्यादेरपि ग्रहणमित्याह -- अन्तःकरणे चेति। श्रोत्रादीनां ज्ञेयोपाधित्वस्य मनोबुद्धिद्वारत्वादपि तयोरिह ग्रहणमित्याह -- अपिचेति। तयोरपीहोपादाने फलितमाह -- इत्यत इति। अक्षरार्थमुक्त्वा वाक्यार्थमाह -- सर्वेति। उपाधिद्वारा कल्पितव्यापारवत्त्वे मानमाह -- ध्यायतीति। कल्पितमेवास्य व्यापारवत्त्वं न वास्तवमित्यत्र भगवतोऽपि संमतिमाकाङ्क्षाद्वारा दर्शयति -- कस्मादित्यादिना। सर्वकरणराहित्ये फलमाह -- अत इति। साक्षादेव ज्ञेयस्य वेगवद्विहरणादिक्रियावत्ताया मान्त्रवर्णिकत्वात्कुतोऽस्य करणव्यापारैरव्यापृतत्वमित्याशङ्क्यानुवादपूर्वकं मन्त्रस्य प्रकृतानुगुणत्वमाह -- यस्त्विति। करणगुणानुगुण्यभजनमन्तरेण साक्षादेव जवनादिक्रियावत्त्वप्रदर्शनपरत्वे मन्त्रस्य मुख्यार्थत्वं स्यादित्याशङ्क्य तदसंभवान्नैवमित्याह -- अन्ध इति। अर्थवादस्य श्रुतेऽर्थे तात्पर्याभावान्न प्रकृतप्रतिकूलतेत्यर्थः। सर्वकरणराहित्यं तद्व्यापारराहित्यस्योपलक्षणमित्यङ्गीकृत्योक्तमेव हेतुं कृत्वा वस्तुतः सर्वसङ्गवर्जितत्वमाह -- यस्मादिति। वस्तुतः सर्वसङ्गाभावेऽपि सर्वाधिष्ठानत्वमाह -- यद्यपीति। स्वसत्तामात्रेणाधिष्ठानतया सर्वं पुष्णातीत्येतदुपपादयति -- सदिति। विमतं सति कल्पितं प्रत्येकं सदनुविद्धधीबोध्यत्वात्प्रत्येकं चन्द्रभेदानुविद्धधीबोध्यचन्द्रभेदवदित्यर्थः। सर्वं सदास्पदमित्ययुक्तं मृगतृष्णिकादीनां तदभावादित्याशङ्क्याह -- नहीति। तेषामपि कल्पितत्वे निरधिष्ठानत्वायोगान्निरूप्यमाणे तदधिष्ठानं सदेवेति सर्वस्य सति कल्पितत्त्वमविरुद्धमित्यर्थः। सर्वाधिष्ठानत्वेन ज्ञेयस्य ब्रह्मणोऽस्तित्वमुक्तमुपसंहरति -- अत इति। इतश्च ज्ञेयं ब्रह्मास्तीत्याह -- स्यादिदं चेति। नहि तस्योपलब्धृत्वमसत्त्वे सिध्यतीत्यर्थः।

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Sri Dhanpati

ननु सर्व विशेषरहितस्य वागाद्यगोचरस्य सच्छब्दाविषयत्वादसत्त्वाशङ्कायां न सदित्यनेन संक्षेपतः समाहितायामपि प्रत्यक्त्वेनेन्द्रियप्रवृत्त्यादिहेतुत्वेन कल्पितद्वैतसत्तास्फूर्तिप्रदत्वेन च ज्ञेयस्यास्तित्वं प्रतिपादयन्नादौ यथाऽचेतनानां रथादीनां चेतनाधीना प्रवृत्तिस्तथा सर्वप्राणिकरणानामचेतनानां तच्च प्रत्यक्चैतन्यं ब्रह्मैवेति विस्तरेण तदाशङ्कानिवृत्त्यर्थमाह। सर्वतः सर्वत्र पाणयो हस्ताः पादाश्च यस्य तत् ज्ञेयं तथा तद्यपि पाण्यदीनां देहस्थत्वेनात्मधर्मत्वं तथापि करणप्रवृत्तिश्चेतनाधिष्ठानपूर्विका प्रेक्षापूर्वकप्रवृत्तित्वात् रथादिप्रवृत्तिवदिति सर्वप्राणिकरणोपाधिभिः क्षेत्रज्ञास्तित्वं विभाव्यते। ननूक्तरीत्या चेतनास्तित्वमिद्धावपि कथं क्षेत्रज्ञास्तित्वमितिचेत् चेतन एव क्षेत्रोपाधितः क्षेत्रज्ञ इत्युच्यते इत्यतस्तदस्तित्वं क्षेत्रज्ञास्तित्वमेव। ननु क्षेत्रोपाधितश्चैतन्यस्य क्षेत्रज्ञत्वेऽपिपाण्यादिमत्त्वं कथमितिचेत्। क्षेत्रस्य पाण्यादिभिरनेकधाभिन्नत्वेन तदुपाधितः क्षेत्रज्ञस्यापि पाण्यादिमत्तायाः सुवचत्वात्। न सत्तन्नासदुच्यत इति निर्विशेषत्वेन ज्ञेयत्वोक्तिस्तु क्षेत्रोपाधिकृतस्य विशेषजातस्य मिथ्यात्वात्। क्षेत्रज्ञस्य तदपनयेन सुवचा। ननु पाण्यादिमत्त्वस्यैवोपाधिकृतस्य मिथ्यात्वात् ज्ञेयप्रवचनाधिकारे तदुक्तिरपार्थेति चेन्न। ज्ञेयास्तित्वबोधनाय ज्ञेयधर्मवत्परिकल्प्यतथाभूतपाण्याद्युक्तेः सार्थकत्वात्। तदुक्तं संप्रदायविद्भिःअध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्ररञ्चं प्रपञ्चयते इति। सर्वतोक्षीणि शिरांसि मुखानि च यस्य तत्। सर्वतः,श्रुतिः श्रवणेन्द्रियमस्त्यस्य तत् पाणिपादमुखवत्त्वमवशिष्टकर्मेन्द्रियवत्त्वस्याक्षिश्रुतिमत्त्वं चावशिष्टज्ञानेन्द्रियत्त्वस्य मनोबुद्य्धादिमत्त्वस्य चोपलक्षणम्। सर्वत्र सर्वदेहावयवत्वेन गम्यमानाः पाणिपादातयो ज्ञेयस्य परमात्मनः सन्निधिमात्रेण प्रवर्तनसमर्थस्य सत्त्वं निमीत्तीकृत्य स्वकार्यवन्तो भवन्तीत्यतो ज्ञेयसद्भावलिङ्गानि ज्ञेयस्येत्युपचारत उच्यते। लोके सर्वप्राणिसमुदाये सर्वं चराचरं सत्तादिनाध्यासिकसंबन्धेनावृत्य संव्याप्य तिष्ठति निर्विशेषामेव स्थितिं लभते नतु चलति। अध्यारोपितसविशेषप्रपञ्चने स विशेषत्वं नैव लभत इत्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sarvataḥeverywhere
pāṇihands
pādamfeet
tatthat
sarvataḥeverywhere
akṣhieyes
śhiraḥheads
mukhamfaces
sarvataḥeverywhere
śhrutimat
lokein the universe
sarvameverything
āvṛityapervades
tiṣhṭhatiexists
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.13
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते

जो ज्ञेय है, उस-(परमात्मतत्त्व-) को मैं अच्छी तरहसे कहूँगा, जिसको जानकर मनुष्य अमरताका अनुभव कर लेता है। वह (ज्ञेय-तत्त्व) अनादि और परम ब्रह्म है। उसको न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.15
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च

वे (परमात्मा) सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं; आसक्तिरहित हैं और सम्पूर्ण संसारका भरण-पोषण करनेवाले हैं; तथा गुणोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण गुणोंके भोक्ता हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 14
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 14
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति

वे (परमात्मा) सब जगह हाथों और पैरोंवाले, सब जगह नेत्रों, सिरों और मुखोंवाले तथा सब जगह कानोंवाले हैं। वे संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 14 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 14 का हिंदी अर्थ: "वे (परमात्मा) सब जगह हाथों और पैरोंवाले, सब जगह नेत्रों, सिरों और मुखोंवाले तथा सब जगह कानोंवाले हैं। वे संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 14?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 14 translates to: "With hands and feet everywhere, with eyes, heads, and mouths everywhere, with ears everywhere, He exists in the worlds, enveloping all. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 14 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। वे (परमात्मा) सब जगह हाथों और पैरोंवाले, सब जगह नेत्रों, सिरों और मुखोंवाले तथा सब जगह कानोंवाले हैं। वे संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sarvataḥ pāṇi-pādaṁ tat sarvato ’kṣhi-śhiro-mukham" mean in English?

"sarvataḥ pāṇi-pādaṁ tat sarvato ’kṣhi-śhiro-mukham" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 14. With hands and feet everywhere, with eyes, heads, and mouths everywhere, with ears everywhere, He exists in the worlds, enveloping all. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.