
“जो ज्ञेय है, उस-(परमात्मतत्त्व-) को मैं अच्छी तरहसे कहूँगा, जिसको जानकर मनुष्य अमरताका अनुभव कर लेता है। वह (ज्ञेय-तत्त्व) अनादि और परम ब्रह्म है। उसको न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है। — VaniSagar”
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म त्यो घोषणा गर्नेछु जुन थाहा छ, जसले अमरत्व प्राप्त गर्दछ। अनादि परम ब्रह्म, जो न त अस्तित्व नै हो, न हो ।
مان اعلان ڪندس ته جيڪو ڄاڻڻو آهي، اهو ڄاڻڻ سان جيڪو امر حاصل ڪري ٿو. بي مثال سپريم برهمڻ، جيڪو نه آهي ۽ نه غير آهي.
അമർത്യത പ്രാപിക്കുന്നവനെ അറിഞ്ഞുകൊണ്ട് അറിയാനുള്ളത് ഞാൻ പ്രഖ്യാപിക്കും; അസ്തിത്വമോ അസ്തിത്വമോ അല്ലാത്ത, ആരംഭമില്ലാത്ത പരമ ബ്രഹ്മം.
আমি যা জানার কথা ঘোষণা করব, যা জেনে অমরত্ব লাভ করে; অনাদি পরম ব্রহ্ম, যা সত্তাও নয় এবং অ-সত্তাও নয়।
જે જાણવું છે તે હું જાહેર કરીશ, જેને જાણીને અમરત્વ પ્રાપ્ત થાય છે; અનાદિ પરમ બ્રહ્મ, જે ન તો છે અને ન તો નથી.
ਮੈਂ ਉਸ ਨੂੰ ਘੋਸ਼ਿਤ ਕਰਾਂਗਾ ਜੋ ਜਾਣਿਆ ਜਾਣਾ ਹੈ, ਇਹ ਜਾਣ ਕੇ ਕਿ ਕਿਸ ਨੂੰ ਅਮਰਤਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ; ਬੇਅੰਤ ਪਰਮ ਬ੍ਰਾਹਮਣ, ਜੋ ਨਾ ਹੋਂਦ ਹੈ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਗੈਰ-ਹੋਣ ਵਾਲਾ ਹੈ।
அறிய வேண்டியதை நான் அறிவிப்பேன், எது அழியாமை அடைகிறது என்பதை அறிந்து; ஆரம்பமில்லாத பரம பிரம்மம், அது இருப்பதும் அல்லாததும் அல்ல.
जे ज्ञात आहे ते मी घोषित करीन, ज्याला अमरत्व प्राप्त होते ते जाणून घेईन; अनादि परम ब्रह्म, जो अस्तित्वात नाही आणि नसतो.
ಯಾವನು ಅಮರತ್ವವನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆಂದು ತಿಳಿದು ತಿಳಿಯಬೇಕಾದುದನ್ನು ನಾನು ಘೋಷಿಸುತ್ತೇನೆ; ಆದಿಯಿಲ್ಲದ ಪರಮ ಬ್ರಹ್ಮನ್, ಅದು ಅಸ್ತಿತ್ವವೂ ಅಲ್ಲ, ಇಲ್ಲದಿರುವುದು.
ఏది అమరత్వాన్ని పొందుతుందో తెలుసుకుని, తెలుసుకోవలసినది నేను ప్రకటిస్తాను; ప్రారంభం లేని సర్వోన్నత బ్రహ్మం, ఇది ఉనికి లేదా లేనిది కాదు.
ꯑꯩꯅꯥ ꯈꯉꯒꯗꯕꯥ ꯑꯗꯨ ꯂꯥꯎꯊꯣꯛꯀꯅꯤ, ꯀꯅꯥꯅꯥ ꯑꯁꯤꯕꯥ ꯐꯪꯂꯤꯕꯅꯣ ꯍꯥꯌꯕꯥ ꯈꯉꯂꯗꯨꯅꯥ; ꯍꯧꯔꯀꯐꯝ ꯂꯩꯇꯕꯥ ꯁꯨꯞꯔꯤꯝ ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯝ, ꯃꯗꯨ ꯖꯤꯕ ꯅꯠꯔꯒꯥ ꯅꯟ-ꯕꯤꯠꯁꯅꯤ |
मैं जेड़ा जानने आला ऐ, उसी दस्सना, ए जानदे होई के कुस गी अमरता मिलदा ऐ; अनादम परम ब्रह्म, जो न जीव है ना अभूत।
Sacred Commentaries
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Swami Ramsukhdas
व्याख्या -- ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि -- भगवान् यहाँ ज्ञेय तत्त्वके वर्णनका उपक्रम करते हुए प्रतिज्ञा करते हैं कि जिसकी प्राप्तिके लिये ही मनुष्यशरीर मिला है? जिसका वर्णन उपनिषदों? शास्त्रों और ग्रन्थोंमें किया गया है? उस प्रापणीय ज्ञेय तत्त्वका मैं अच्छी तरहसे वर्णन करूँगा।ज्ञेयम् (अवश्य जाननेयोग्य) कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें जितने भी विषय? पदार्थ? विद्याएँ? कलाएँ आदि हैं? वे सभी अवश्य जाननेयोग्य नहीं हैं। अवश्य जाननेयोग्य तो एक परमात्मा ही है। कारण कि सांसारिक विषयोंको कितना ही जान लें? तो भी जानना बाकी ही रहेगा। सांसारिक विषयोंकी जानकारीसे जन्ममरण भी नहीं मिटेगा। परन्तु परमात्माको तत्त्वसे ठीक जान लेनेपर जानना बाकी नहीं रहेगा। सांसारिक विषयोंकी जानकारीसे जन्ममरण भी नहीं मिटेगा। परन्तु परमात्माको तत्त्वसे ठीक जान लेनेपर जानना बाकी नहीं रहेगा और जन्ममरण भी मिट जायगा। अतः संसारमें परमात्माके सिवाय जाननेयोग्य दूसरा कोई है ही नहीं।यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते -- उस ज्ञेय तत्त्वको जाननेपर अमरताका अनुभव हो जाता है अर्थात् स्वतःसिद्ध तत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है? जिसकी प्राप्ति होनेपर जानना? करना? पाना आदि कुछ भी बाकी नहीं रहता।वास्तवमें स्वयं पहलेसे ही अमर है? पर उसने मरणशील शरीरादिके साथ एकता करके अपनेको जन्मनेमरनेवाला मान लिया है। परमात्मतत्त्वको जाननेसे यह भूल मिट जाती है और वह अपने वास्तविक स्वरूपको पहचान लेता है अर्थात् अमरताका अनुभव कर लेता है।अनादिमत् -- उससे यावन्मात्र संसार उत्पन्न होता है? उसीमें रहता है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता है। परन्तु वह आदि? मध्य और अन्तमें ज्योंकात्यों विद्यमान रहता है। अतः वह अनादि कहा जाता है।परं ब्रह्म -- ब्रह्म प्रकृतिको भी कहते हैं? वेदको भी कहते हैं? पर परम ब्रह्म तो एक परमात्मा ही है। जिससे बढ़कर दूसरा कोई व्यापक? निर्विकार? सदा रहनेवाला तत्त्व नहीं है? वह परम ब्रह्म कहा जाता है।न सत्तन्नासदुच्यते -- उस तत्त्वको सत् भी नहीं कह सकते और असत् भी नहीं कह सकते। कारण कि असत्की भावना(सत्ता) के बिना उस परमात्मतत्त्वमें सत् शब्दका प्रयोग नहीं होता? इसलिये उसको सत् नहीं कह सकते और उस परमात्मतत्त्वका कभी अभाव नहीं होता? इसलिये उसको असत् भी नहीं कह सकते। तात्पर्य है कि उस परमात्मतत्त्वमें सत्असत् शब्दोंकी अर्थात् वाणीकी प्रवृत्ति होती ही नहीं -- ऐसा वह करणनिरपेक्ष तत्त्व है।जैसे पृथ्वीपर रात और दिन -- ये दो होते हैं। इनमें भी दिनके अभावको रात और रातके अभावको,दिन कह देते हैं। परन्तु सूर्यमें रात और दिन -- ये दो भेद नहीं होते। कारण कि रात तो सूर्यमें है ही नहीं और रातका अत्यन्त अभाव होनेसे सूर्यमें दिन भी नहीं कह सकते क्योंकि दिन शब्दका प्रयोग,रातकी अपेक्षासे किया जाता है। यदि रातकी सत्ता न रहे तो न दिन कह सकते हैं? न रात। ऐसे ही सत्की अपेक्षासे असत् शब्दका प्रयोग होता है और असत्की अपेक्षासे सत् शब्दका प्रयोग होता है। जहाँ परमात्माको सत् कहा जाता है? वहाँ असत्की अपेक्षासे ही कहा जाता है। परन्तु जहाँ असत्का अत्यन्त अभाव है? वहाँ परमात्माको सत् नहीं कह सकते और जो परमात्मा निरन्तर सत् है? उसको असत् नहीं कह सकते। अतः परमात्मामें सत् और असत् -- इन दोनों शब्दोंका प्रयोग नहीं होता। जैसे सूर्य दिनरात दोनोंसे विलक्षण केवल प्रकाशरूप है? ऐसे ही वह ज्ञेय तत्त्व सत्असत् दोनोंसे विलक्षण है ।दूसरी बात? सत्असत्का निर्णय बुद्धि करती है और ऐसा कहना भी वहीं होता है? जहाँ वह मन? वाणी और बुद्धिका विषय होता है। परन्तु ज्ञेय तत्त्व मन? वाणी और बुद्धिसे सर्वथा अतीत है अतः उसकी सत्असत् संज्ञा नहीं हो सकती। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें वह तत्त्व न सत् कहा जा सकता है? न असत् -- ऐसा कहकर ज्ञेय तत्त्वका निर्गुणनिराकाररूपसे वर्णन किया। अब आगेके श्लोकमें उसी ज्ञेय तत्त्वका सगुणनिराकाररूपसे वर्णन करते हैं।
Sri Harikrishnadas Goenka
उ0 -- यह दोष नहीं है। क्योंकि हम पहले ही कह चुके हैं कि यह अमानित्वादि सद्गुण ज्ञानके साधन होनेसे और उसके सहकारी कारण होनेसे ज्ञान नामसे कहे गये हैं --, जो जाननेयोग्य है उसको भली प्रकार यथार्थ रूपसे कहूँगा। वह ज्ञेय कैसे फलवाला है यह बात? श्रोतामें रुचि उत्पन्न करके उसे सम्मुख करनेके लिये कहते हैं -- जिस जाननेयोग्य ( परमात्माके स्वरूप ) को जानकर ( मनुष्य ) अमृतको अर्थात् अमरभावको लाभ कर लेता है? फिर नहीं मरता। वह ज्ञेय अनादिमत् है। जिसकी आदि हो वह आदिमत् और जो आदिमत् न हो वह अनादिमत् कहलाता है। वह कौन है वही परम -- निरतिशय ब्रह्म जो कि इस प्रकरणमें ज्ञेयरूपसे वर्णित है। यहाँ कई एक टीकाकार अनादि मत्परम् इस प्रकार पदच्छेद करते हैं। ( कारण यह बतलाते हैं कि ) बहुव्रीहि समासद्वारा बतलाये हुए अर्थमें मतुप् प्रत्ययके प्रयोगकी निरर्थकता है? अतः वह अनिष्ट है। वे ( टीकाकार ऐसा पदच्छेद करके ) अलग अर्थ भी दिखाते हैं कि मैं वासुदेव कृष्ण ही जिसकी परम शक्ति हूँ वह ज्ञेय मत्पर है। ठीक है? यदि उपर्युक्त अर्थ सम्भव होता तो ऐसा पदच्छेद करनेसे पुनरुक्तिके दोषका निवारण हो सकता था? परंतु यह अर्थ ही सम्भव नहीं है क्योंकि यहाँ ब्रह्मका स्वरूप न सत्तन्नासदुच्यते आदि वचनोंसे सर्व विशेषणोंके प्रतिषेधद्वारा ही बतलाना इष्ट है। ज्ञेयको किसी विशेष शक्तिवाला बतलाना और विशेषणोंका प्रतिषेध भी करते जाना यह परस्परविरुद्ध है। सुतरां ( यही समझना चाहिये कि ) मतुप् प्रत्ययका और बहुव्रीहि समासका समान अर्थ होनेपर भी यहाँ श्लोकपूर्तिके लिये यह प्रयोग किया गया है। जिसका फल अमृतत्व है ऐसा ज्ञेय मेरेद्वारा कहा जाता है इस कथनसे रुचि उत्पन्न कर ( अर्जुनको ) सम्मुख करके कहते हैं -- उस ज्ञेयको न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है। पू0 -- कटिबद्ध होकर बड़े गम्भीर स्वरसे यह घोषणा करके कि मैं ज्ञेय वस्तुको भली प्रकार बतलाऊँगा फिर यह कहना कि वह न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही उस घोषणाके अनुरूप नहीं है। उ0 -- यह नहीं? भगवान्का कहना तो प्रतिज्ञाके अनुरूप ही है क्योंकि वाणीका विषय न होनेके कारण सब उपनिषदोंमें भी ज्ञेय ब्रह्म ऐसा नहीं? ऐसा नहीं स्थूल नहीं? सूक्ष्म नहीं इस प्रकार विशेषोंके प्रतिषेधद्वारा ही लक्ष्य कराया गया है? ऐसा नहीं कहा गया कि वह ज्ञेय अमुक है। पू0 -- जो वस्तु अस्ति शब्दसे नहीं कही जा सकती? वह है भी नहीं। यदि ज्ञेय अस्ति शब्दसे नहीं कहा जा सकता तो वह भी वास्तवमें नहीं है। फिर यह कहना अति विरुद्ध है कि वह ज्ञेय है और अस्ति शब्दसे नहीं कहा जा सकता। उ0 -- वह ( ब्रह्म ) नहीं है? सो नहीं क्योंकि वह नहीं है इस ज्ञानका भी विषय नहीं है। पू0 -- सभी ज्ञान अस्ति या नास्ति इन बुद्धियोंमेंसे ही किसी एकके अनुगत होते हैं। इसलिये ज्ञेय भी या तो अस्ति ज्ञानसे अनुगत प्रतीतिका विषय होगा या नास्ति ज्ञानसे अनुगत प्रतीतिका विषय होगा। उ0 -- यह बात नहीं है। क्योंकि वह ब्रह्म इन्द्रियोंसे अगोचर होनेके कारण दोनों प्रकारके ही ज्ञानयसे अनुगत प्रतीतिका विषय नहीं है। इन्द्रियोंद्वारा जाननेमें आनेवाले जो कोई घट आदि पदार्थ होते हैं? वे ही या तो अस्ति इस ज्ञानसे अनुगत प्रतीतिके या अस्ति इस ज्ञानसे अनुगत प्रतीतिके विषय होते हैं। परंतु यह ज्ञेय ( ब्रह्म ) इन्द्रियातीत होनेके कारण? केवल एक शब्दप्रमाणसे ही प्रमाणित हो सकता है?,इसलिये घट आदि पदार्थोंकी भाँति यह है नहीं है इन दोनों प्रकारके ही ज्ञानोंके अनुगत प्रतीतिका विषय नहीं है? सुतरां वह न तो सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है। तथा तुमने जो यह कहा कि ज्ञेय है किंतु वह न सत् कहा जाता है और न असत् कहा जाता है? यह कहना विरुद्ध है? सो विरुद्ध नहीं है क्योंकि वह ब्रह्म जाने हुएसे और न जाने हुएसे भी अन्य है इस श्रुतिप्रमाणसे यह बात सिद्ध है। पू0 -- यदि यह श्रुति भी विरुद्ध अर्थवाली हो तो अर्थात् जैसे यज्ञके लिये यज्ञशाला बनानेका विधान करके वहाँ कहा है कि उस बातको कौन जानता है कि परलोकमें यह सब है या नहीं इस श्रुतिके समान यह श्रुति भी विरुद्धार्थयुक्त हो तो उ0 -- यह बात नहीं है क्योंकि यह जाने हुएसे और न जाने हुएसे विलक्षणत्व प्रतिपादन करनेवाली श्रुति निस्सन्देह अवश्य ही ज्ञेय पदार्थका होना प्रतिपादन करनेवाली है और यह सब परलोकमें है या नहीं इत्यादि श्रुतिवाक्य विधिके अन्तका अर्थवाद है ( अतः उसके साथ इसकी समानता नहीं हो सकती )। युक्तिसे भी यह बात सिद्ध है कि ब्रह्म सत्असत् आदि शब्दोंद्वारा नहीं कहा जा सकता क्योंकि अर्थका प्रकाश करनेके लिये वक्ताद्वारा बोले जानेवाले और श्रोताद्वारा सुने जानेवाले सभी शब्द जाति? क्रिया? गुण और सम्बन्धद्वारा संकेत ग्रहण करवाकर ही अर्थकी प्रतीति कराते हैं? अन्य प्रकारसे नहीं। कारण? अन्य प्रकारसे प्रतीति होती नहीं देखी जाती। जैसे गौ या घोड़ा यह जातिसे? पकाना या पढ़ना यह क्रियासे? सफेद या काला यह गुणसे और धनवान् या गौओंवाला यह सम्बन्धसे ( जाने जाते हैं। इसी तरह सबका ज्ञान होता है )। परंतु ब्रह्म जातिवाला नहीं है? इसलिये सत् आदि शब्दोंद्वारा नहीं कहा जा सकता निर्गुण होनेके कारण वह गुणवान् भी नहीं है? जिससे कि गुणवाचक शब्दोंसे कहा जा सके और क्रियारहित होनेके कारण क्रियावाचक शब्दोंसे भी नहीं कहा जा सकता। ब्रह्म कलारहित? क्रियारहित और शान्त है इस श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है। तथा एक? अद्वितीय? इन्द्रियोंका अविषय और आत्मरूप होनेके कारण ( वह ब्रह्म ) किसीका सम्बन्धी भी नहीं है। अतः यह कहना उचित ही है कि ब्रह्म किसी भी शब्दसे नहीं कहा जा सकता। जहाँसे वाणी निवृत्त हो जाती है इत्यादि श्रुतिप्रमाणोंसे भी यही बात सिद्ध होती है।
Sri Anandgiri
सर्वविशेषरहितस्यावाङ्मनसगोचरस्यादृष्टेर्दृष्टेश्च विपरीतस्य प्राप्ते ब्रह्मणः शून्यत्वे प्रत्यक्त्वेनेन्द्रियप्रवृत्त्यादिहेतुत्वेन कल्पितद्वैतसत्तास्फूर्तिप्रदत्वेनेश्वरत्वेन च सत्त्वं दर्शयन्नादौ देहादीनां प्रवृत्तिमतां रथादिवदचेतनानां प्रेक्षापूर्वकप्रवृत्तिमत्त्वाच्चेतनाधिष्ठितत्त्वमनुमिमानस्तत्प्रत्यक्चेतनं ब्रह्मेत्याह -- सच्छब्देति। तदस्तित्वमिति तच्छब्दो ज्ञेयब्रह्मार्थः। तदाशङ्केति तच्छब्देनासत्त्वमुच्यते। ननु सर्वदेहेषु पाणिपादमस्येति कथं पाणीनां च पादानां च देहस्थत्वेनात्मधर्मत्वं तत्राह -- सर्वेति। करणप्रवृत्ती रथादिप्रवृत्तितत्प्रेक्षापूर्वकप्रवृत्तिमत्त्वाच्चेतनाधिष्ठातृपूर्विकेत्यर्थः। उक्तप्रवृत्त्या चेतनास्तित्वसिद्धावपि कथं क्षेत्रज्ञास्तित्वमित्याशङ्क्य चेतनस्यैव क्षेत्रोपाधिना क्षेत्रज्ञत्वाच्चेतनास्तित्वं तदस्तित्वमेवेत्याह -- क्षेत्रज्ञश्चेति।,तस्य क्षेत्रोपाधित्वेऽपि कथं पाणिपादाक्षिशिरोमुखादिमत्त्वमित्याशङ्क्याह -- क्षेत्रं चेति। अतश्चोपाधितस्तस्मिन्विशेषोक्तिरिति शेषः। कथं तर्हि न सत्तन्नासदिति निर्विशेषत्वोक्तिरित्याशङ्क्याह -- क्षेत्रेति। पाणिपादादिमत्त्वमौपाधिकं मिथ्या चेज्ज्ञेयप्रवचनाधिकारे कथं तदुक्तिरित्याशङ्क्याह -- उपाधीति। मिथ्यारूपमपि ज्ञेयवस्तुज्ञानोपयोगीत्यत्र वृद्धसंमतिमाह -- तथाहीति। पाणिपादादीनामन्यगतानामात्मधर्मत्वेनारोप्य व्यपदेशे को हेतुरिति चेत्तत्राह -- सर्वत्रेति। ज्ञेयस्य ब्रह्मणः शक्तिः संनिधिमात्रेण प्रवर्तनसामर्थ्यं तत्सत्त्वं निमित्तीकृत्य स्वकार्यवन्तो भवन्ति पाण्यादय इति कृत्वेति योजना। सर्वतोऽक्षीत्यादावुक्तमतिदिशति -- तथेति। तज्ज्ञेयं यथा सर्वतःपाणिपादमिति व्याख्यातं तथेत्युक्तमेव स्फुटयति -- सर्वत इति। सर्वतोऽक्षीत्यादेरक्षरार्थमाह -- सर्वतोऽक्षीति। अक्षिश्रवणवत्त्वमवशिष्टज्ञानेन्द्रियवत्त्वस्य पाणिपादमुखवत्त्वं चावशिष्टकर्मेन्द्रियवत्त्वस्य मनोबुद्ध्यादिमत्त्वस्य चोपलक्षणम्। एकस्य सर्वत्र पाण्यादिमत्त्वं साधयति -- सर्वमिति।
Sri Dhanpati
यथोक्तज्ञानसाधनेन ज्ञानशब्दितेन ज्ञेयं किमित्याकाङ्क्षायामाह -- ज्ञेयमिति। उक्तज्ञानसाधनपरिपाकलब्धसाक्षात्कारवृत्तिविषयं ज्ञेयं। नचैवमन्तःकरणवृत्तिविषयत्वेन ब्रह्मणो दृश्यत्वं तस्य वृत्तिविषयत्वेन ज्ञेयत्वेऽपि फलविषयत्वाभावेन दृश्यत्वाभावात्। तथाच श्रुतिःस वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता? विज्ञातारमरे केन विजानीयात् इत्याद्या। ज्ञेयं यत्तत्प्रकर्षेण यथावत् वक्ष्यामि। फलप्रदर्शनेन श्रोतारं रोजयन्नभिमुखीकरोति। यज्ज्ञेयं ज्ञात्वाऽमृतमपुनरावृत्तिलक्षणं मोक्षमश्रुते। मुक्तो भवतीत्यर्थः। किं तदित्यत आह। अनादिमत् आदिरस्यास्तीत्यादिमत् नादिमदनादिमत् परं निरतिशयं ब्रह्म ज्ञेयमित्यर्थः। यत्तु अनादिमदिति च्छेदे बहुव्रीहिणोक्तेऽर्थे मतुप,आनर्थक्यप्रसङ्गादुक्तार्थानामप्रयोगीदितिन्यायात् मत्परमिति च्छेदः। अहं वासुदेवाख्या परा शक्तिर्यस्य तस्मत्परमित्यर्थ इति तन्न। न सत्तन्नासदुच्यत इति सर्वविशेषप्रतिषेधेन विजिज्ञापयितत्वेन विशिष्टशक्तिमत्त्वप्रदर्शनस्य विप्रतिषिद्धत्वेनोक्तार्थासंभवात्। तस्मान्मतुपो बहुब्रीहिसमानार्थत्वेऽप्यतिशायने नित्ययोगे वा श्लोकपूरणार्थः प्रयोगः। ननु मम विष्णोः परं निर्विशेषं रुपं मत्तः सगुणात् ब्रह्मणः परमिति वा। यद्वा आदिमच्च ततः परं चादिमत्परे कार्यकारणे ताभ्यामन्यदनादिमत्परिमित्येवं मतुपः सार्थकत्वसंभवे किमित्याचार्यैरेवमुक्तमिति वा। यद्वा आदिमच्च ततः परं चादिमत्परे कार्यकारणे ताभ्यामन्यदनादिमत्परामित्येवं मतुपः सार्थकत्वसंभवे किमित्याचार्यैरेवमुक्तमिति चेत् परमिति विशेषणादेव सगुणात्परस्य निर्विशेषस्य लाभेन मत्पदवैयर्थ्यं मत्तः सगुणात् ब्रह्मणः परमिति वा। यद्वा आदिमच्च ततः परं चादिमत्परे कार्यकारणे ताभ्यामन्यदनादिमत्परमित्येवं मतुपः सार्थकत्वसंभवे किमित्याचार्यैरेवमुक्तमिति चेत् परमिति विशेषणादेव सगुणात्परस्य निर्विशेषस्य लाभेन मत्पदवैय्त्यं मत्तः परतरं नान्यदित्यादिना विरोधं परपदस्य पूर्वनिपातापत्तिं कार्यकारणान्यत्वस्य न सदित्यादिविशेषणेऽन्तर्भावं चाभिप्रेत्येति गृहाण। एतेनानादिमत्परिमित्येकं पदम्। अनादिर्माया तद्वतो मायावच्छिन्नादनाद्यज्ञानवतो जीवात्परं निर्मायज्ञानकृतजीवत्वोपाधिरहितं चेत्येवमादि यत्किंचित्कल्पमस्मदादिभिः क्रियमाणमपि हेयं परमिति विशेषणैवोक्तार्थस्य लाभेनानादिमत्पदस्य वैयर्थ्यात्। अनादिमत्परं ब्रह्म ज्ञेयमृतत्वफलं मयोच्यत इति प्ररोजनेनाभिमुखीकृत्याह। सत् कार्यमभिव्यक्तनामरुपत्वात् असत् कारणं तद्विपर्ययात्। तथा च तज्ज्ञेयं सन्नोच्यते नाप्यसदुच्यते। ननु ज्ञेयं वक्ष्यामिति महता कण्ठवेणोद्धुष्य न सत्तन्नासदुच्यत इत्यननुरुपमुक्तमितिचेन्न। स्वयंज्योतीरुपस्य परब्रह्मणः विधिमुखेनोपदेशायोगादध्यस्तातद्धर्मनिवृत्तये निषेधद्वारोपदेशस्य श्रुतिषु प्रसिद्धेरारेपितविशेषनिषेधरुपस्य प्रवचनस्य प्रतिज्ञानुरुपत्वात्। तथाच श्रुतयःअथात आदेशो नेतिनेति? अस्थूलमनणु? अपूर्वमनपरम् इत्यादयः। एवंच ज्ञेयस्य ब्रह्मणो वाचो गोचरत्वात् श्रुत्यादौ निषेधमुखेनैवोपदेशो नत्विदं तदिति विधिमुखेनेति भावः। ननु ब्रह्मणोऽस्तिशब्दावाच्यत्वे नास्तिशब्दवाच्यशशविषाणवन्नास्तित्वप्रसङ्ग इति चेन्न। शशश्रृङ्गवद्ब्रह्मणो नास्तिधीविषयत्वाभावात्। ननु सर्वासां बुद्धीनामस्तिनास्तिनास्तित्वानुगतत्वेन ब्रह्मणोऽन्यतरबुद्य्धविषयत्वेनानिर्वाच्यत्वं दुर्वारमितिचेन्न। इन्द्रियग्राह्यघटादेरुभयबुद्धिविषयाद्विलक्षणस्यातीन्द्रियस्य ब्रह्मणस्तदविषत्वेति शब्दैकप्रमाणगम्यत्वेन ज्ञेयत्वानपायात्। किंच गौरश्व इति वा जातितः? पचति पठतीति वाक्रियातः? शुक्लः कृष्ण इति वा गुणतो? धनी गोमानिति वा संबन्धतः सर्वो गवादिशब्दोऽर्थ प्रत्याययति। ननु ब्रह्म जात्यादिमदतो न सदादिशब्दावाच्य। तथाच श्रुतःअगोत्रमवर्णं? निष्क्रियं शान्तं? केवलो निर्गुणश्च? एकमेवाद्वितीयम् इत्याद्याः। तथाचाविषत्वादात्मत्वात्केनापि शब्देन मुख्यया वृत्त्या ब्रह्म नोच्यत इति युक्तम्।यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह इत्यादिश्रुतिभ्यश्च।तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि इत्यत्र तु निषेधमुखोपदेशेनोपनिषत्प्रतिपाद्यमित्यर्थ इत्यविरोधः। यत्तु पूरणार्थात्पृ़ इत्यस्माद्धातो परशब्दव्युत्पत्तेः परं पूर्णं त्रिविधपरिच्छेदशून्यं। ननु देशकालवस्तूनामद्वैतमतेऽसत्त्वात्कुतस्तत्कृतच्छेद इत्याशङ्क्याविद्याविलासत्वं देषां वक्तुं ब्रह्म विशिनष्टि -- अनादिमदिति। अनादि अज्ञानं तद्वत्तसंबन्धीत्यर्थः। तेन देशादीनां संभव इति भावः। नन्वयं शान्तिकर्मणि वेदालोदयः यदज्ञानमेवानादिदितीयमङ्गीक्रियत इत्याशङ्क्याज्ञानं विशिनष्टि -- न सदिति। तदज्ञानं न सदुच्यते बाध्यतया सत्त्वेनानिरुपणात्। तथा नासदुच्यते अपरोक्षतया प्रतीतेरस्तस्यानर्वचनात्। भुजंगेनेव रज्जुर्नाज्ञानेन ब्रह्म सद्वितीयमिति भावः। यद्वास्मिन्व्याख्याने द्वितीयनकारवैयर्थ्याद्ब्रह्मैव विशेषणीयं तद्ब्रह्म न सन्नासदिति नोच्यतेऽनिर्वचनीयं न भवति। सत्त्वेन निरुपणादतोऽर्थादनाद्यज्ञानमेवानिर्वचनीयमित्यर्थ इति तच्चिन्त्यम्। ज्ञेयप्रवचनं प्रतिज्ञायाज्ञाननिरुपणस्यानौचित्यात्। अज्ञानवतो जीवस्य ज्ञातत्वेन ज्ञेयत्वाभावात् ब्रह्म विशेषणीयमिति पक्षे तत्सदुच्यते इत्येतावतैव निर्वाहेऽवशिष्टस्य वैयर्थ्यापत्तेःनासदासीन्नो सदासीत् इत्यादिश्रुत्या विरोधापत्तेश्चेति दिक्।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| jñeyam | ought to be known |
| yat | which |
| tat | that |
| pravakṣhyāmi | I shall now reveal |
| yat | which |
| jñātvā | knowing |
| amṛitam | immortality |
| aśhnute | one achieves |
| anādi | beginningless |
| mat | param |
| brahma | Brahman |
| na | not |
| sat | existent |
| tat | that |
| na | not |
| asat | non |
| uchyate | is called |
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अध्यात्मज्ञानमें नित्य-निरन्तर रहना, तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको सब जगह देखना -- यह (पूर्वोक्त साधन-समुदाय) तो ज्ञान है; और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान है -- ऐसा कहा गया है। — VaniSagar
वे (परमात्मा) सब जगह हाथों और पैरोंवाले, सब जगह नेत्रों, सिरों और मुखोंवाले तथा सब जगह कानोंवाले हैं। वे संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं। — VaniSagar
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“जो ज्ञेय है, उस-(परमात्मतत्त्व-) को मैं अच्छी तरहसे कहूँगा, जिसको जानकर मनुष्य अमरताका अनुभव कर लेता है। वह (ज्ञेय-तत्त्व) अनादि और परम ब्रह्म है। उसको न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है। — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 13 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 13 का हिंदी अर्थ: "जो ज्ञेय है, उस-(परमात्मतत्त्व-) को मैं अच्छी तरहसे कहूँगा, जिसको जानकर मनुष्य अमरताका अनुभव कर लेता है। वह (ज्ञेय-तत्त्व) अनादि और परम ब्रह्म है। उसको न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 13?
Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 13 translates to: "I will declare that which is to be known, knowing which one attains immortality; the beginningless Supreme Brahman, which is neither being nor non-being. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नास" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 13 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। जो ज्ञेय है, उस-(परमात्मतत्त्व-) को मैं अच्छी तरहसे कहूँगा, जिसको जानकर मनुष्य अमरताका अनुभव कर लेता है। वह (ज्ञेय-तत्त्व) अनादि और परम ब्रह्म है। उसको न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "jñeyaṁ yat tat pravakṣhyāmi yaj jñātvāmṛitam aśhnute" mean in English?
"jñeyaṁ yat tat pravakṣhyāmi yaj jñātvāmṛitam aśhnute" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 13. I will declare that which is to be known, knowing which one attains immortality; the beginningless Supreme Brahman, which is neither being nor non-being. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.