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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 12
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा

अध्यात्मज्ञानमें नित्य-निरन्तर रहना, तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको सब जगह देखना -- यह (पूर्वोक्त साधन-समुदाय) तो ज्ञान है; और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान है -- ऐसा कहा गया है। — VaniSagar

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MalayalamIND

ആത്മജ്ഞാനത്തിലെ സ്ഥിരത, യഥാർത്ഥ അറിവിൻ്റെ അവസാനത്തെക്കുറിച്ചുള്ള ധാരണ - ഇത് അറിവായി പ്രഖ്യാപിക്കപ്പെടുന്നു, അതിന് എതിരായത് അജ്ഞതയാണ്.

BhojpuriIND

आत्मज्ञान में स्थिरता, सच्चा ज्ञान के अंत के धारणा-एह के ज्ञान घोषित कइल जाला आ एकर विरोध जवन बा ऊ अज्ञानता हवे।

DogriIND

आत्म-ज्ञान च स्थिरता, सच्चे ज्ञान दे अंत दी धारणा-इसगी ज्ञान घोशित कीता जंदा ऐ, ते जेह्ड़ा इसदा विरोध ऐ ओह् अज्ञानता ऐ।

AssameseIND

আত্মজ্ঞানত স্থিৰতা, সত্য জ্ঞানৰ অন্ত পৰাৰ উপলব্ধি—এইটোৱেই জ্ঞান বুলি ঘোষণা কৰা হয় আৰু ইয়াৰ বিৰোধীতা হৈছে অজ্ঞানতা।

MarathiIND

आत्मज्ञानातील स्थिरता, खऱ्या ज्ञानाच्या अंताची जाणीव - हे ज्ञान आहे असे घोषित केले जाते आणि याच्या विरोधात जे आहे ते अज्ञान आहे.

MaithiliIND

आत्मज्ञान मे स्थिरता, सत्य ज्ञानक अंतक बोध—एहि केँ ज्ञान घोषित कयल गेल अछि, आ जे एकर विरोधी अछि से अज्ञानता थिक |

KonkaniIND

आत्मज्ञानांतली स्थिरताय, खऱ्या गिन्यानाच्या शेवटाक बोध-हें गिन्यान जाहीर करतात आनी ताका विरोध करपी तें अज्ञान.

ManipuriIND

ꯁꯦꯜꯐ-ꯅꯣꯂꯦꯖꯗꯥ ꯀꯟꯁꯇꯦꯟꯁꯤ, ꯑꯆꯨꯝꯕꯥ ꯂꯧꯁꯤꯡꯒꯤ ꯑꯔꯣꯏꯕꯒꯤ ꯋꯥꯈꯜꯂꯣꯟ—ꯃꯁꯤꯕꯨ ꯂꯧꯁꯤꯡꯅꯤ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯂꯥꯑꯣꯊꯣꯀꯏ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯁꯤꯒꯤ ꯃꯥꯌꯣꯛꯇꯥ ꯂꯩꯔꯤꯕꯥ ꯑꯁꯤ ꯑꯖ꯭ꯅꯥꯅꯅꯤ꯫

OdiaIND

ଆତ୍ମ-ଜ୍ଞାନରେ ସ୍ଥିରତା, ପ୍ରକୃତ ଜ୍ଞାନର ସମାପ୍ତିର ଧାରଣା - ଏହା ଜ୍ଞାନ ବୋଲି ଘୋଷିତ ହୁଏ, ଏବଂ ଏହାକୁ ବିରୋଧ କରୁଥିବା ବିଷୟ ହେଉଛି ଅଜ୍ଞତା |

GujaratiIND

સ્વ-જ્ઞાનમાં સ્થિરતા, સાચા જ્ઞાનના અંતની અનુભૂતિ - આને જ્ઞાન તરીકે જાહેર કરવામાં આવે છે, અને જે તેનો વિરોધ કરે છે તે અજ્ઞાન છે.

PunjabiIND

ਸਵੈ-ਗਿਆਨ ਵਿੱਚ ਸਥਿਰਤਾ, ਸੱਚੇ ਗਿਆਨ ਦੇ ਅੰਤ ਦੀ ਧਾਰਨਾ - ਇਸ ਨੂੰ ਗਿਆਨ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਜੋ ਇਸਦਾ ਵਿਰੋਧ ਕਰਦਾ ਹੈ ਉਹ ਅਗਿਆਨਤਾ ਹੈ।

KannadaIND

ಸ್ವಯಂ ಜ್ಞಾನದಲ್ಲಿ ಸ್ಥಿರತೆ, ನಿಜವಾದ ಜ್ಞಾನದ ಅಂತ್ಯದ ಗ್ರಹಿಕೆ - ಇದು ಜ್ಞಾನ ಎಂದು ಘೋಷಿಸಲ್ಪಟ್ಟಿದೆ ಮತ್ತು ಇದಕ್ಕೆ ವಿರುದ್ಧವಾದದ್ದು ಅಜ್ಞಾನ.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम् -- सम्पूर्ण शास्त्रोंका तात्पर्य मनुष्यको परमात्माकी तरफ लगानेमें? परमात्मप्राप्ति करानेमें है -- ऐसा निश्चय करनेके बाद परमात्मतत्त्व जितना समझमें आया है? उसका मनन करे। युक्तिप्रयुक्तिसे देखा जाय तो परमात्मतत्त्व भावरूपसे पहले भी था? अभी भी है और आगे भी रहेगा। परन्तु संसार पहले भी नहीं था और आगे भी नहीं रहेगा तथा अभी भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है। संसारकी तो उत्पत्ति और विनाश होता है? पर उसका जो आधार? प्रकाशक है? वह परमात्मतत्त्व नित्यनिरन्तर रहता है। उस परमात्मतत्त्वके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। परमात्माकी सत्तासे ही संसार सत्तावाला दीखता है। इस प्रकार संसारकी स्वतन्त्र सत्ताके अभावका और परमात्माकी सत्ताका नित्यनिरन्तर मनन करते रहना अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम् है।उपाय -- आध्यात्मिक ग्रन्थोंका पठनपाठन? तत्त्वज्ञ महापुरुषोंसे तत्त्वज्ञानविषयक श्रवण और प्रश्नोत्तर करना।तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् -- तत्त्वज्ञानका अर्थ है -- परमात्मा। उस परमात्माका ही सब जगह दर्शन करना? उसका ही सब जगह अनुभव करना तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् है। वह परमात्मा सब देश? काल? वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति आदिमें ज्योंकात्यों परिपूर्ण है। एकान्तमें अथवा व्यवहारमें? सब समय साधककी दृष्टि? उसका लक्ष्य केवल उस परमात्मापर ही रहे। एक परमात्माके सिवाय उसको दूसरी कोई सत्ता दीखे ही नहीं। सब जगह? सब समय समभावसे परिपूर्ण परमात्माको ही देखनेका उसका स्वभाव बन जाय -- यही,तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् है। इसके सिद्ध होनेपर साधकको परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा -- अमानित्वम् से लेकर तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् तक ये जो बीस साधन कहे गये हैं? ये सभी साधन देहाभिमान मिटानेवाले होनेसे और परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें सहायक होनेसे ज्ञान नामसे कहे गये हैं। इन साधनोंसे विपरीत मानित्व? दम्भित्व? हिंसा आदि जितने भी दोष हैं? वे सभी देहाभिमान बढ़ानेवाले होनेसे और परमात्मतत्त्वसे विमुख करनेवाले होनेसे अज्ञान नामसे कहे गये हैं।विशेष बातयदि साधकमें इतना तीव्र विवेक जाग्रत् हो जाय कि वह शरीरसे माने हुए सम्बन्धका त्याग कर सके? तो उसमें यह साधनसमुदाय स्वतः प्रकट हो जाता है। फिर उसको इन साधनोंका अलगअलग अनुष्ठान करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। विनाशी शरीरको अपने अविनाशी स्वरूपसे अलग देखना मूल साधन है। अतः सभी साधकोंको चाहिये कि वे शरीरको अपनेसे अलग अनुभव करें? जो कि वास्तवमें अलग ही हैपूर्वोक्त किसी भी साधनका अनुष्ठान करनेके लिये मुख्यतः दो बातोंकी आवश्यकता है -- (1) साधकका उद्देश्य केवल परमात्माको प्राप्त करना हो और (2) शास्त्रोंको पढ़तेसुनते समय यदि विवेकद्वारा शरीरको अपनेसे अलग समझ ले? तो फिर दूसरे समयमें भी उसी विवेकपर स्थिर रहे। इन दो बातोंके दृढ़ होनेसे साधनसमुदायके सभी साधन सुगम हो जाते हैं।शरीर तो बदल गया? पर मैं वही हूँ? जो कि बचपनमें था -- यह सबके अनुभवकी बात है। अतः शरीरके साथ अपना सम्बन्ध वास्तविक न होकर केवल माना हुआ है -- ऐसा निश्चय होनेपर ही वास्तविक साधन आरम्भ होता है। साधककी बुद्धि जितने अंशमें परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको धारण करती है? उतने ही अंशमें उसमें विवेककी जागृति तथा संसारसे वैराग्य हो जाता है। भगवान्ने विवेक और वैराग्यको पुष्ट करनेके लिये ज्ञानके आवश्यक साधनोंका वर्णन किया है।जब मनुष्यका उद्देश्य परमात्मप्राप्ति करना ही हो जाता है? तब दुर्गुणों एवं दुराचारोंकी जड़ कट जाती है? चाहे साधकको इसका अनुभव हो या न हो जैसे वृक्षकी जड़ कटनेपर भी बड़ी टहनीपर लगे हुए पत्ते कुछ दिनतक हरे दीखते हैं किन्तु वास्तवमें उन पत्तोंके हरेपनकी भी जड़ कट चुकी है। इसलिये कुछ दिनोंके बाद कटी हुई टहनीके पत्तोंका हरापन मिट जाता है। ऐसे ही परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका दृढ़ उद्देश्य होते ही दुर्गुणदुराचार मिट जाते हैं। यद्यपि साधकको आरम्भमें ऐसा अनुभव नहीं होता और उसको अपनेमें अवगुण दीखते हैं? तथापि कुछ समयके बाद उनका सर्वथा अभाव दीखने लग जाता है।साधन करते समय कभीकभी साधकको अपनेमें दुर्गुण दिखायी दे सकते हैं। परन्तु वास्तवमें साधनमें लगनेसे पहले उसमें जो दुर्गुण रहे थे? वे ही जाते हुए दिखायी देते हैं। यह नियम है कि दरवाजेसे आनेवाले,और जानेवाले -- दोनों ही दिखायी देते हैं। यदि साधन करते समय अपनेमें दुर्गुण बढ़ते हुए दीखते हों? तो समझना चाहिये कि दुर्गुण आ रहे हैं। परन्तु यदि अपनेमें दुर्गुण कम होते हुए दीखते हों? तो समझना चाहिये कि दुर्गुण जा रहे हैं। ऐसी अवस्थामें साधकको निराश नहीं होना चाहिये? प्रत्युत अपने उद्देश्यपर दृढ़ रहकर तत्परतापूर्वक साधनमें लगे रहना चाहिये। इस प्रकार साधनमें लगे रहनेसे दुर्गुणदुराचारोंका सर्वथा अभाव हो जाता है। सम्बन्ध -- पूर्वोक्त ज्ञान(साधनसमुदाय) के द्वारा जिसको जाना जाता है? उस साध्यतत्त्वका अब ज्ञेय नामसे वर्णन आरम्भ करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तथा --, अध्यात्मज्ञाननित्यत्व आत्मादिविषयक ज्ञानका नाम अध्यात्मज्ञान है? उसमें नित्यस्थिति। तत्त्वज्ञानके अर्थकी आलोचना अर्थात् अमानित्वादि ज्ञानसाधनोंकी परिपक्व भावनासे उत्पन्न होनेवाला जो तत्त्वज्ञान है उसका अर्थ जो संसारकी उपरतिरूप मोक्ष है? उसकी आलोचना। क्योंकि तत्त्वज्ञानके फलकी आलोचना करनेसे ही उसके साधनोंमें प्रवृत्ति होगी। अमानित्व से लेकर तत्त्वज्ञानके अर्थकी आलोचनापर्यन्त कहा हुआ समस्त साधनसमुदाय ज्ञानका साधन होनेके कारण ज्ञान इस नामसे कहा गया है। इससे अर्थात् उपर्युक्त ज्ञानसाधनोंके समुदायसे विपरीत जो मानित्व? दम्भित्व? हिंसा? क्षमाका अभाव? कुटिलता इत्यादि अवगुणसमुदाय है वह संसारमें प्रवृत्त करनेका हेतु होनेसे उसे त्याग करनेके लिये अज्ञान समझना चाहिये। उपर्युक्त ज्ञानद्वारा जाननेयोग्य क्या है इस आकाङ्क्षापर ज्ञेयं यत्तत् इत्यादि श्लोक कहते हैं -- पू0 -- अमानित्व आदि गुण तो यम और नियम हैं? उनसे ज्ञेय वस्तु नहीं जानी जा सकती क्योंकि अमानित्वादि सद्गुण किसी वस्तुके ज्ञापक नहीं देखे गये हैं। सभी जगह यह देखा जाता है कि जो ज्ञान जिस वस्तुको विषय करनेवाला होता है वही उसका ज्ञापक होता है? अन्य वस्तुविषयक ज्ञानसे अन्य वस्तु नहीं जानी जाती। जैसे घटविषयक ज्ञानसे अग्नि नहीं जाना जाता।

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Sri Anandgiri

उत्तरग्रन्थमवतारयति -- यथोक्तेति। अमानित्वादीनां ज्ञानत्वमाक्षिपति -- नन्विति। वस्तुपरिच्छेदकत्वाज्ज्ञानत्वमाशङ्क्याह -- नहीति। परिच्छेदकत्वाज्ज्ञानत्वं ज्ञानत्वात्परिच्छेदकत्वमित्यन्योन्याश्रयादित्यभिप्रेत्याह -- सर्वत्रेति। स्वार्थस्यैव ज्ञानं परिच्छेदकमित्येतद्व्यतिरेकद्वारा विशदयति -- नहीति। व्यतिरेकदृष्टान्तमाह -- यथेति। अमानित्वादीनां ज्ञानत्वमाक्षिप्तं प्रतिक्षिपति -- नैष दोष इति। तत्र हेतुत्वेनोक्तं स्मारयति -- ज्ञानेति। तेषु ज्ञानशब्दे हेत्वन्तरमाह -- ज्ञानेति। अमानित्वादीनां ज्ञानत्वमुक्त्वा ज्ञातव्यमवतारयति -- ज्ञेयमिति। प्रश्नद्वारा ज्ञेयप्रवचनस्य फलमुक्त्वा प्ररोचनं कृत्वा तेन श्रोतुराभिमुख्यमापादयितुं प्ररोचनफलोक्तिपरमनन्तरवाक्यमित्याह -- किमित्यादिना। तदेव विशिनष्टि -- अनादिमदिति। आदिमत्त्वराहित्यमव्याकृतस्याप्यस्त्यतो विशेषं दर्शयति -- किं तदिति। भोक्तुरपि,भोग्यात्परत्वमित्यतो विशिनष्टि -- ब्रह्मेति। अनादीत्येकं पदं मत्परमिति चापरमिति पदच्छेदान्न पुनरुक्तिरिति मतान्तरमुत्थापयति -- अत्रेति। एकपदत्वसंभवे किमिति पदद्वयमित्याशङ्क्याह -- बहुव्रीहिणेति। आदिरस्य नास्तीति यो बहुव्रीहिणोक्तोऽर्थस्तस्मिन्नादिमत्त्वनिषेधे नास्ति मतुपोऽर्थवत्त्वमिति मतुबानर्थक्यमनिष्टं स्यादिति मत्त्वा पदं छिन्दन्तीति पूर्वेण संबन्धः। आदिरस्य नास्तीत्यनादीत्युक्त्वा मत्परमित्युच्यमाने कोऽर्थः स्यादित्याशङ्क्याह -- अर्थेति। उक्तव्याख्यानस्यायुक्तत्वान्नायं पुनरुक्तिसमाधिरित्याह -- सत्यमिति। अर्थासंभवं समर्थयते -- ब्रह्मण इति। तथापि विशिष्टशक्तिमत्त्वं किं न स्यादित्याशङ्क्याह -- विशिष्टेति। तथापि मतुपो बहुव्रीहिणा तुल्यस्यार्थस्य कथं नानर्थक्यं तत्राह -- तस्मादिति। अनादिमत्परं ब्रह्मेत्यत्र पक्षान्तरं प्रतिक्षिप्य स्वपक्षः समर्थितः? संप्रति ब्रह्मणो ब्रह्मत्वादेव कार्यकारणात्मकत्वप्राप्तावुक्तानुवादद्वारा न सदित्याद्यवतारयति -- अमृतत्वेति। सत्कार्यमभिव्यक्तनामरूपत्वात्? असत्कारणं तद्विपर्ययादिति विभागः। ज्ञेयप्रवचनमनिर्वाच्यविषयत्वात्प्रक्रमप्रतिकूलमित्याक्षिपति -- नन्विति। निर्विशेषस्य वस्तुनो ज्ञेयत्वात्तद्विषयं प्रवचनं प्रक्रमानुकूलमित्युत्तरमाह -- नेत्यादिना। अनिर्वाच्यत्वे न सत्तन्नासदित्युच्यमाने कथमिदमनुरूपमिति पृच्छति -- कथमिति। ब्रह्मात्मप्रकाशस्य सिद्धत्वात्तदर्थं विधिमुखेनोपदेशायोगादध्यस्ततद्धर्मनिवृत्तये निषेधद्वारोपदेशस्य वेदान्तेषु प्रसिद्धेरारोपितविशेषनिषेधरूपमिदं प्रवचनमुचितमिति परिहरति -- सर्वास्विति। ज्ञेयस्य ब्रह्मणो विधिमुखोपदेशायोगे हेतुमाह -- वाच इति। ब्रह्मणोऽस्तिशब्दावाच्यत्वे नरविषाणवन्नास्तित्वमित्यनिष्टमाशङ्कते -- नन्विति। एवमुत्सर्गेऽपि ब्रह्मणि किमायातमित्याशङ्क्याह -- अथेति। ज्ञेयस्यास्तिशब्दावाच्यत्वे व्याघातश्चेत्याह -- विप्रतिषिद्धं चेति। अस्तिशब्दावाच्यत्वादवस्तु ब्रह्मेत्यत्राप्रयोजकत्वमाह -- न तावदिति। नास्तिबुद्धिविषयत्वमेवावस्तुत्वे निमित्तमतस्तदभावाद्ब्रह्मणो नावस्तुतेत्येतदेव व्यक्तीकर्तुं चोदयति -- नन्विति। सर्वासां धियामस्तिधीत्वेन नास्तिधीत्वेन वानुगतत्वेऽन्यतरधीगोचरत्वाभावे ब्रह्मणोऽनिर्वाच्यत्वं दुर्वारमिति फलितमाह -- तत्रेति। ब्रह्मणो घटादिवैलक्षण्यादुभयबुद्ध्यविषयत्वेऽपि नानिर्वाच्यतेत्याह -- नेत्यादिना। घटादेरिन्द्रियग्राह्यस्योभयबुद्धिविषयत्वेऽपि ब्रह्मणस्तदग्राह्यस्य नोभयधीविषयत्वं तथापि नानिर्वाच्यत्वं सच्चिदेकतानस्य शब्दप्रमाणादविषयत्वेन दृष्टत्वादित्युक्तमेव प्रपञ्चयति -- यद्धीति। परोक्तं विरोधमनुवदति -- यत्त्विति। श्रुत्यवष्टम्भेन निराचष्टे -- न विरुद्धमिति। सापि विरुद्धार्थत्वानुमानं बोधकस्याविरोधापेक्षत्वादिति शङ्कते -- श्रुतिरिति। तस्या विरुद्धार्थत्वेनाप्रामाण्ये दृष्टान्तमाह -- यथेति। प्राचीनवंशं करोतीति पारलौकिकफलयज्ञानुष्ठानार्थं शालानिर्माणं प्रस्तुत्य को हि तद्वेदेत्याद्या परलोकसत्त्वे संदिहाना यथा विरुद्धार्था श्रुतिरप्रमाणमेवं विदिताविदितान्यत्वश्रुतिरपीत्यर्थः। नेयं श्रुतिर्विरुद्धत्वेनामानतया हातव्या ब्रह्मण्यद्वितीये प्रत्यक्ताप्रतिपादनेन मानत्वादित्युत्तरमाह -- न विदितेति। यत्तु विरुद्धार्थत्वे को हीत्युदाहृतं तदसदर्थवादस्य विधिशेषस्य स्वार्थेतात्पर्यादित्याह -- यदीति। यत्र जात्यादिमत्त्वं तत्र वाच्यत्वं यथा गवादौ न ब्रह्मणि जात्यादिमत्त्वमतस्तस्यावाच्यत्वान्निषेधेनैव बोध्यत्वमित्याह -- उपपत्तेश्चेति। नोच्यत इति निषेधेनैव तस्योपदेश इति शेषः। जात्यादिमतोऽर्थस्यैव वाच्यत्वं तत्रैव संगतिग्रहादिति प्रपञ्चयति -- सर्वो हीति। अश्रुतस्य जात्यादिद्वारेणाज्ञातसङ्गतेर्वा शब्दस्य न बोधकत्वमदृष्टेरित्याह -- नान्यथेति। जात्यादेः सच्छब्दविषयत्वमुदाहरति -- तद्यथेत्यादिना। ब्रह्मणस्त्वगोत्रत्वमवर्णत्वमित्यादिश्रुतेर्जात्यादिमत्त्वाभावान्न शब्दवाच्यतेत्याह -- नत्विति। केवलो निर्गुणश्चेति श्रुतेर्गुणद्वारा ब्रह्मणो न वाच्यतेत्याह -- नापीति। निष्क्रियत्वे मानमाह -- निष्कलमिति। ब्रह्मणोऽद्वितीयत्वस्याशेषोपनिषत्सु सिद्धत्वाद्विशिष्टस्य संबन्धस्य तस्मिन्नसिद्धेर्न तद्द्वारापि तस्य वाच्यतेत्याह -- नचेति। ब्रह्मण्यभिधावृत्याशब्दाप्रवृत्तौ हेत्वन्तराण्याह -- अद्वयत्वादिति। ब्रह्मणोऽवाच्यत्वे श्रुतमपि संवादयति -- यत इति।

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Sri Dhanpati

किंचात्मानधिकृत्य प्रवृत्तमात्मानात्मविवेकज्ञानमध्यात्मज्ञानं तस्मिन्नित्यभावो नित्यत्वं सततं तत्रैव निष्ठावत्त्वमध्यात्मज्ञाननित्यत्वम्। अमानित्वादिसाधनानां यत्नेन साधितानां प्रकर्षपर्यन्तत्वमिमित्तं तत्त्वज्ञानम्। तदिति सर्वनाम। सर्वं च ब्रह्म तस्य नाम तदिति तस्य ब्रह्मणो भावो याथात्म्यं तस्य ज्ञानं तत्त्वज्ञानंसत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म? एकमेवाद्वितीयं? नेह नानास्ति किंचन? वाचारम्भणं विकारो नामधेयम् इति श्रुत्युक्तस्य ब्रह्मजगतो याथात्म्यस्य ज्ञानं तत्त्वज्ञानमिति वा तस्यार्थः प्रयोजनं सर्वानर्थनिवृत्तिपरमानन्दप्राप्तिस्वरुपो मोक्षस्तस्य दर्शनम्।न स पुनरावर्तते? इति श्रुत्यायद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम इति स्मृत्या च तस्यैव नित्यत्वबोधनात्।तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पिण्यचितो लोकः क्षीयते इत्यादिश्रुत्या प्रत्यक्षादिना च धर्मार्थकामानामनित्यत्वागममाच्च मोक्षएव सर्वोत्कृष्टत्वात्परमपुरुषार्थः स च तत्त्वज्ञानस्य फलं नान्यस्य।तरति शोकमात्मवित्तमेव विदित्वादिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय इत्यादिश्रुतेतरित्येवं तत्त्वज्ञानार्तालोचने हि तत्साधनानुष्ठाने प्रवृत्तिर्भवति। एतदमानित्वादितत्त्वज्ञानार्थदर्शनान्तं विंशतिसंख्याकं ज्ञानसाधनत्वाज्ज्ञानमिति प्रोक्तं श्रुतिस्मृतीहासपुराणादिषु प्रकर्षेणोक्तं कथितम्। अतोऽस्माद्यथोक्तादन्यथा च। जन्ममृत्युराव्याधिदुःखदोषाप्रदर्शनम्। तथासक्तिरभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु। नित्यं चासमचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु। मयि नानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। विकीर्णदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि। नाध्यात्मज्ञानित्यत्वं ज्ञानार्थादर्शनं तथा। इत्येतज्ज्ञेयज्ञानं हेयं संसारकारणम्। तथा चैतत्परित्यागेन संसारोपरमायामानित्वादिकमुपेयमिति भावः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
adhyātmaspiritual
jñānaknowledge
nityatvamconstancy
tattvajñāna
arthafor
darśhanamphilosophy
etatall this
jñānamknowledge
itithus
proktamdeclared
ajñānamignorance
yatwhat
ataḥto this
anyathācontrary
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.11
मयि चानन्ययोगेन भक्ितरव्यभिचारिणी।विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि

मेरेमें अनन्ययोगके द्वारा अव्यभिचारिणी भक्तिका होना, एकान्त स्थानमें रहनेका स्वभाव होना और जन-समुदायमें प्रीतिका न होना। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.13
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते

जो ज्ञेय है, उस-(परमात्मतत्त्व-) को मैं अच्छी तरहसे कहूँगा, जिसको जानकर मनुष्य अमरताका अनुभव कर लेता है। वह (ज्ञेय-तत्त्व) अनादि और परम ब्रह्म है। उसको न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है। — VaniSagar

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Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 12
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा

अध्यात्मज्ञानमें नित्य-निरन्तर रहना, तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको सब जगह देखना -- यह (पूर्वोक्त साधन-समुदाय) तो ज्ञान है; और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान है -- ऐसा कहा गया है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ: "अध्यात्मज्ञानमें नित्य-निरन्तर रहना, तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको सब जगह देखना -- यह (पूर्वोक्त साधन-समुदाय) तो ज्ञान है; और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान है -- ऐसा कहा गया है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 12?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 12 translates to: "Constancy in Self-knowledge, the perception of the end of true knowledge—this is declared to be knowledge, and what is opposed to it is ignorance. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 12 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। अध्यात्मज्ञानमें नित्य-निरन्तर रहना, तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको सब जगह देखना -- यह (पूर्वोक्त साधन-समुदाय) तो ज्ञान है; और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान है -- ऐसा कहा गया है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "adhyātma-jñāna-nityatvaṁ tattva-jñānārtha-darśhanam" mean in English?

"adhyātma-jñāna-nityatvaṁ tattva-jñānārtha-darśhanam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 12. Constancy in Self-knowledge, the perception of the end of true knowledge—this is declared to be knowledge, and what is opposed to it is ignorance. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.