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Sudarshana Chakra
Adhyay 12, Shlok 4
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः

जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

সমস্ত ইন্দ্রিয়কে সংযত করে, সর্বত্র সমমনা হয়ে এবং সমস্ত প্রাণীর মঙ্গল কামনা করে, তারা অবশ্যই আমার কাছে আসে।

KannadaIND

ಎಲ್ಲಾ ಇಂದ್ರಿಯಗಳನ್ನು ನಿಗ್ರಹಿಸಿ, ಎಲ್ಲೆಡೆ ಸಮಚಿತ್ತದಿಂದ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳ ಕಲ್ಯಾಣವನ್ನು ಉದ್ದೇಶಿಸಿ, ಅವರು ನಿಜವಾಗಿಯೂ ನನ್ನ ಬಳಿಗೆ ಬರುತ್ತಾರೆ.

ManipuriIND

ꯏꯟꯗ꯭ꯔꯤ ꯄꯨꯝꯅꯃꯀꯄꯨ ꯊꯤꯡꯖꯤꯟꯗꯨꯅꯥ, ꯃꯐꯝ ꯈꯨꯗꯤꯡꯗꯥ ꯋꯥꯈꯜ ꯈꯟꯗꯨꯅꯥ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯖꯤꯕ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛꯀꯤ ꯌꯥꯏꯐꯅꯕꯥ ꯋꯥꯈꯜ ꯈꯅꯗꯨꯅꯥ, ꯃꯈꯣꯌꯅꯥ ꯇꯁꯦꯡꯅꯥ ꯑꯩꯉꯣꯟꯗꯥ ꯂꯥꯀꯏ |

BhojpuriIND

सब इंद्रियन के संयमित क के, हर जगह समबुद्धि होके, आ सब जीव के कल्याण के इरादा रख के, उ लोग सचमुच हमरा लगे आवेले।

AssameseIND

সকলো ইন্দ্ৰিয়ক সংযত কৰি, সকলোতে সমমনা হৈ, আৰু সকলো সত্তাৰ কল্যাণৰ উদ্দেশ্যেৰে, সঁচাকৈয়ে মোৰ ওচৰলৈ আহে।

TamilIND

எல்லா புலன்களையும் அடக்கி, எல்லா இடங்களிலும் ஒரே மனதுடன், எல்லா உயிர்களின் நலனையும் நோக்கமாகக் கொண்டு, அவை மெய்யாகவே என்னிடம் வருகின்றன.

MarathiIND

सर्व इंद्रियांना संयमित करून, सर्वत्र समविचारी होऊन, सर्व प्राणिमात्रांच्या कल्याणाचा हेतू ठेवून ते निश्चितच माझ्याकडे येतात.

GujaratiIND

સર્વ ઈન્દ્રિયોને સંયમિત કરીને, સર્વત્ર સમ-ચિત્ત થઈને, અને સર્વ જીવોના કલ્યાણનો આશય રાખીને, તેઓ ખરેખર મારી પાસે આવે છે.

NepaliIND

सबै इन्द्रियहरूलाई संयम राखेर, सर्वत्र सम-चित्त भएर, सबै प्राणीहरूको कल्याणको अभिप्राय राखेर, निश्चय नै मेरो समक्ष आउँछन्।

SindhiIND

سڀني حواس کي روڪي، هر هنڌ هڪجهڙائي رکي، سڀني جاندارن جي ڀلائي جو ارادو رکي، يقيناً مون وٽ ايندا آهن.

TeluguIND

సమస్త ఇంద్రియాలను నిగ్రహించి, అన్ని చోట్లా సమబుద్ధి కలిగి ఉండి, సమస్త ప్రాణుల క్షేమాన్ని ఉద్దేశించి, అవి నిజముగా నా వద్దకు వస్తాయి.

PunjabiIND

ਸਾਰੀਆਂ ਇੰਦਰੀਆਂ ਨੂੰ ਰੋਕ ਕੇ, ਹਰ ਥਾਂ ਇੱਕ-ਰਸ ਹੋ ਕੇ, ਅਤੇ ਸਭ ਜੀਵਾਂ ਦੀ ਭਲਾਈ ਦਾ ਇਰਾਦਾ ਰੱਖਦੇ ਹੋਏ, ਉਹ ਸੱਚਮੁੱਚ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਆਉਂਦੇ ਹਨ।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या --'तु'--यहाँ 'तु' पद साकार-उपासकोंसे निराकार-उपासकोंकी भिन्नता दिखानेके लिये आया है। 'संनियम्येन्द्रियग्रामम्' -- 'सम्' और 'नि' -- दो उपसर्गोंसे युक्त 'संनियम्य' पद देकर भगवान्ने यह बताया है कि सभी इन्द्रियोंको सम्यक् प्रकारसे एवं पूर्णतः वशमें करे? जिससे वे किसी अन्य विषयमें न जायँ। इन्द्रियाँ अच्छी प्रकारसे पूर्णतः वशमें न होनेपर निर्गुणतत्त्वकी उपासनामें कठिनता होती है। सगुण-उपासनामें तो ध्यानका विषय सगुण भगवान् होनेसे इन्द्रियाँ भगवान्में लग सकती हैं; क्योंकि भगवान्के सगुण स्वरूपमें इन्द्रियोंको अपने विषय प्राप्त हो जाते हैं। अतः सगुण-उपासनामें इन्द्रिय-संयमकी आवश्यकता होते हुए भी इसकी उतनी अधिक आवश्यकता नहीं है, जितनी निर्गुण-उपासनामें है। निर्गुण-उपासनामें चिन्तनका कोई आधार न रहनेसे इन्द्रियोंका सम्यक् संयम हुए बिना (आसक्ति रहनेपर) विषयोंमें मन जा सकता है और विषयोंका चिन्तन होनेसे पतन होनेकी अधिक सम्भावना रहती है (गीता 2। 62 -- 63)। अतः निर्गुणोपासकके लिये सभी इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाते हुए सम्यक् प्रकारसे पूर्णतः वशमें करना आवश्यक है। इन्द्रियोंको केवल बाहरसे ही वशमें नहीं करना है, प्रत्युत विषयोंके प्रति साधकके अन्तःकरणमें भी राग नहीं रहना चाहिये; क्योंकि जबतक विषयोंमें राग है, तबतक ब्रह्मकी प्राप्ति कठिन है (गीता 15। 11)।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तथा जो इन्द्रियोंके समुदायको भली प्रकार संयम करके -- उन्हें विषयोंसे रोककर? सर्वत्र -- सब समय समबुद्धिवाले होते हैं अर्थात् इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिमें जिनकी बुद्धि समान रहती है? ऐसे वे समस्त भूतोंके हितमें तत्पर अक्षरोपासक मुझे ही प्राप्त करते हैं। उन अक्षरउपासकोंके सम्बन्धमें वे मुझे प्राप्त होते हैं इस विषयमें तो कहना ही क्या है क्योंकि ज्ञानीको तो मैं अपना आत्मा ही समझता हूँ यह पहले ही कहा जा चुका है। जो भगवत्स्वरूप ही हैं उन संतजनोंके विषयमें युक्ततम या अयुक्ततम कुछ भी कहना नहीं बन सकता।,

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Sri Anandgiri

कथमक्षरमुपासते तदुपासने वा किं स्यादिति तदाह -- संनियम्येति। तुल्या हर्षविषादरागद्वेषादिरहिता सम्यग्ज्ञानेनाज्ञानस्यापनीतत्वात्। क्रमपरम्परापेक्षयोरसंभवं विवक्षित्वाह -- ते य इति। सर्वेभ्यो भूतेभ्यो हिते रताः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो हितमेव चिन्तयन्तस्तदेवाचरन्ति। ज्ञानवतां यथाज्ञानं भगवत्प्राप्तेरर्थसिद्धत्वादनुवादमात्रमित्याह -- नत्विति। ज्ञानिनो भगवत्प्राप्तिः सिद्धैवेत्यत्र प्रमाणमाह -- ज्ञानी,त्विति। ज्ञानवतां भगवत्प्राप्तौ त एव युक्ततमा वक्तव्याः कथं सगुणब्रह्मोपासकान्युक्ततमानुक्तवानसीत्याशङ्क्याह -- नहीति।

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Sri Dhanpati

उपासनस्य प्रकारं फलं चाह। इन्द्रियग्राममिन्द्रियसमूहं संनियम्य स्वविषयेभ्य उपसंहृत्य सर्वत्र समबुद्धयः सर्वस्मिन्काले इष्टानिष्टप्राप्तौ सभा रागद्वेषरहिता बुद्धिर्येषां ते? अतएव सर्वेषां भूतानां हिते रताः प्रीतिमन्तः ये एवंप्रकारेणाक्षरमुपासते ते मां परमात्मानं प्राप्नुवन्ति। एवकारेणैषामेव साक्षान्मोक्षप्राप्तियोग्यतां बोधयति। प्राप्तिप्यत्र विस्मृतग्रैवकस्य प्राप्तस्य प्राप्तिरेव बोध्या नत्वप्राप्तस्य ग्रामादेः प्राप्तिरिव।विमुक्तश्च विमुच्यते इति श्रुतेः।ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् इति स्मृतेश्च।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sanniyamyacontrolling
indriyagrāmam
sarvatraeverywhere
samabuddayaḥ
tethey
prāpnuvantiachieve
māmunto Me
evacertainly
sarvabhūtahite
ratāḥengaged.
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 12.3
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्

जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 12.5
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्। अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते

अव्यक्तमें आसक्त चित्तवाले उन साधकोंको (अपने साधनमें) कष्ट अधिक होता है; क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्त-विषयक गति कठिनतासे प्राप्त की जाती है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 12Shlok 4
Bhagavad Gita · Adhyay 12, Shlok 4
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः

जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 12 श्लोक 4 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 12 श्लोक 4 का हिंदी अर्थ: "जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Bhakti Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 4?

Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 4 translates to: "Having restrained all the senses, being even-minded everywhere, and intent on the welfare of all beings, they verily come unto Me. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 12, श्लोक 4 है जो Bhagavad Gita के Bhakti Yoga में संकलित है। जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sanniyamyendriya-grāmaṁ sarvatra sama-buddhayaḥ te prāpnuvan" mean in English?

"sanniyamyendriya-grāmaṁ sarvatra sama-buddhayaḥ te prāpnuvan" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 4. Having restrained all the senses, being even-minded everywhere, and intent on the welfare of all beings, they verily come unto Me. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.