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Sudarshana Chakra
Adhyay 12, Shlok 3
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्

जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

যারা অবিনশ্বর, অব্যক্ত, অব্যক্ত, সর্বব্যাপী, অকল্পনীয়, স্থাবর এবং চিরন্তনের উপাসনা করে।

KannadaIND

ಅವಿನಾಶಿ, ಅನಿರ್ವಚನೀಯ, ಅವ್ಯಕ್ತ, ಸರ್ವವ್ಯಾಪಿ, ಅಚಿಂತ್ಯ, ಚಲನರಹಿತ ಮತ್ತು ಶಾಶ್ವತವಾದುದನ್ನು ಪೂಜಿಸುವವರು.

MarathiIND

जे अविनाशी, अव्यक्त, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अकल्पनीय, अचल आणि शाश्वत यांची उपासना करतात.

NepaliIND

जो अविनाशी, अपरिवर्तनीय, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अकल्पनीय, अचल र शाश्वतको पूजा गर्छन्।

GujaratiIND

જેઓ અવિનાશી, અનિર્વચનીય, અવ્યક્ત, સર્વવ્યાપી, અકલ્પ્ય, અચલ અને શાશ્વતની ઉપાસના કરે છે.

TeluguIND

అవినాశిని, అనిర్వచనీయమైన, అవ్యక్తమైన, సర్వవ్యాపకమైన, అనూహ్యమైన, స్థిరమైన, శాశ్వతమైన వాటిని ఆరాధించే వారు.

MalayalamIND

നശ്വരവും, അനിർവചനീയവും, അവ്യക്തവും, സർവ്വവ്യാപിയും, അചിന്തനീയവും, അചഞ്ചലവും, ശാശ്വതവുമായവയെ ആരാധിക്കുന്നവർ.

TamilIND

அழிவில்லாதவை, வரையறுக்க முடியாதவை, வெளிப்படாதவை, எங்கும் நிறைந்தவை, சிந்திக்க முடியாதவை, அசையாதவை, நித்தியமானவைகளை வணங்குபவர்கள்.

MizoIND

Boral thei lo, sawifiah theih loh, lang thei lo, hmun tina awm, ngaihtuah theih loh, che thei lo leh chatuan chibai buktute.

MaithiliIND

अविनाशी, अनिर्धारित, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, अचल, शाश्वत के पूजा करय वाला |

BhojpuriIND

अविनाशी, अनिर्धारित, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अकल्पनीय, अचल आ शाश्वत के पूजा करे वाला लोग।

AssameseIND

যিসকলে অক্ষয়, অনিৰ্ধাৰণ, অপ্ৰকাশ, সৰ্বব্যাপী, অচিন্তনীয়, স্থাৱৰ আৰু চিৰন্তনক পূজা কৰে।

Sacred Commentaries

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Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'तु'--यहाँ 'तु' पद साकार-उपासकोंसे निराकार-उपासकोंकी भिन्नता दिखानेके लिये आया है। 'संनियम्येन्द्रियग्रामम्'--'सम्' और 'नि'-- दो उपसर्गोंसे युक्त 'संनियम्य' पद देकर भगवान्ने यह बताया है कि सभी इन्द्रियोंको सम्यक् प्रकारसे एवं पूर्णतः वशमें करे, जिससे वे किसी अन्य विषयमें न जायँ। इन्द्रियाँ अच्छी प्रकारसे पूर्णतः वशमें न होनेपर निर्गुण-तत्त्वकी उपासनामें कठिनता होती है। सगुण-उपासनामें तो ध्यानका विषय सगुण भगवान् होनेसे इन्द्रियाँ भगवान्में लग सकती हैं; क्योंकि भगवान्के सगुण स्वरूपमें इन्द्रियोंको अपने विषय प्राप्त हो जाते हैं। अतः सगुण-उपासनामें इन्द्रिय-संयमकी आवश्यकता होते हुए भी इसकी उतनी अधिक आवश्यकता नहीं है, जितनी निर्गुण-उपासनामें है। निर्गुण-उपासनामें चिन्तनका कोई आधार न रहनेसे इन्द्रियोंका सम्यक् संयम हुए बिना (आसक्ति रहनेपर) विषयोंमें मन जा सकता है और विषयोंका चिन्तन होनेसे पतन होनेकी अधिक सम्भावना रहती है (गीता 2। 62 -- 63)। अतः निर्गुणोपासकके लिये सभी इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाते हुए सम्यक् प्रकारसे पूर्णतः वशमें करना आवश्यक है। इन्द्रियोंको केवल बाहरसे ही वशमें नहीं करना है? प्रत्युत विषयोंके प्रति साधकके अन्तःकरणमें भी राग नहीं रहना चाहिये; क्योंकि जबतक विषयोंमें राग है, तबतक ब्रह्मकी प्राप्ति कठिन है (गीता 15। 11)।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तो क्या दूसरे युक्ततम नहीं हैं यह बात नहीं? किंतु उनके विषयमें जो कुछ कहना है सो सुन --, परंतु जो पुरुष उस अक्षरकीजो कि अव्यक्त होनेके कारण शब्दका विषय न होनेसे किसी प्रकार भी बतलाया नहीं जा सकता इसलिये अनिर्देश्य है और किसी भी प्रमाणसे प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता इसलिये अव्यक्त है -- सब प्रकारसे उपासना करते हैं। उपास्य वस्तुको शास्त्रोक्त विधिसे बुद्धिका विषय बनाकर उसके समीप पहुँचकर तैलधाराके तुल्य समान वृत्तियोंके प्रवाहसे जो दीर्घकालतक उसमें स्थित रहना है? उसको उपासना कहते हैं -- उस अक्षरके विशेषण बतलाते हैं -- वह आकाशके समान सर्वव्यापक है और अव्यक्त होनेसे अचिन्त्य है क्योंकि जो वस्तु इन्द्रियादि करणोंसे जाननेमें आती है उसीका मनसे भी चिन्तन किया जा सकता है। परंतु अक्षर उससे विपरीत होनेके कारण अचिन्त्य और कूटस्थ है। जो वस्तु ऊपरसे गुणयुक्त प्रतीत होती हो और भीतर दोषोंसे भरी हो उसका नाम कूट है। संसारमें भी कूटरूप कूटसाक्ष्य इत्यादि प्रयोगोंमें कूट शब्द ( इसी अर्थमें ) प्रसिद्ध है। वैसे ही जो अविद्यादि अनेक संसारोंकी बीजभूत अन्तर्दोषोंसे युक्त प्रकृति मायाअव्याकृत आदि शब्दोंद्वारा कही जाती है एवं प्रकृतिको तो माया और महेश्वरको मायापति समझना चाहिये मेरी माया दुस्तर है इत्यादि श्रुतिस्मृतिके वचनोंमें जो माया नामसे प्रसिद्ध है? उसका नाम कूट है। उस कूट ( नामक माया ) में जो उसका अधिष्ठातारूपसे स्थित हो रहा हो उसका नाम कूटस्थ है। अथवा राशि -- ढेरकी भाँति जो ( कुछ भी क्रिया न करता हुआ ) स्थित हो उसका नाम कूटस्थ है। इस प्रकार कूटस्थ होनेके कारण जो अचल है और अचल होनेके कारण ही जो ध्रुव अर्थात् नित्य है ( उस ब्रह्मकी जो लोग उपासना करते हैं )।

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Sri Anandgiri

वक्ष्यामस्तदुपरिष्टादित्युक्तं प्रश्नपूर्वकं प्रकटयति -- किमित्यादिना। पूर्वेभ्यः फलतो विशेषार्थस्तुशब्दः। अव्यक्तत्वमनिर्देश्यत्वे हेतुरित्याह -- अव्यक्तत्वादिति। यतोऽव्यक्तमतोऽनिर्देश्यमिति योजना। निरुपाधिकेऽक्षरे कथमुपासनेति पृच्छति -- उपासनमिति। शास्त्रतोऽक्षरं ज्ञात्वा तदुपेत्यात्मत्वेनोपगम्योपासते तथैव तिष्ठन्ति पूर्णचिदेकतानमक्षरमात्मानमेव सदा भावयन्तीत्येतदिह विवक्षितमित्याह -- यथेति। अव्यक्तत्वमेवाचिन्त्यत्वेऽपि हेतुरित्याह -- यद्धीति। कूटस्थशब्दस्योक्तार्थत्वं वृद्धप्रयोगतः साधयति -- कूटरूपमिति। आदिपदमनृतार्थम्। प्रकृते किं तदनृतं कूटशब्दितमित्याशङ्क्याह -- तथाचेति। उक्तरीत्या कूटशब्दस्यानृतार्थत्वे सिद्धे यदनेकस्य संसारस्य बीजं निरूप्यमाणं नानाविधदोषोपेतंतद्धेदं तर्ह्यव्याकृतं?मायां तुं प्रकृतिंमम माया इत्यादौ मायाशब्दिततया प्रसिद्धमविद्यादि तदिह कूटशब्दितमित्यर्थः। तत्रावस्थानं केन रूपेणेत्याशङ्कायामाह -- तदध्यक्षतयेति। कूटस्थशब्दस्य निष्क्रियत्वमर्थान्तरमाह -- अथवेति। पूर्वमुपजीव्यानन्तरविशेषणद्वयप्रवृत्तिमाह -- अतएवेति।

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Sri Dhanpati

निर्गुणोपासनस्य साक्षान्मोक्षहेतुत्वेनातिश्रैष्ठ्यं बोधयन् सुशकत्वेन सगुणोपासनस्य श्रेष्ठतां बोधयति -- येत्विति। तुशब्दो निर्विशेषोपासनस्य सविशेषोपासनफलत्वात्पूर्वेभ्यः श्रैष्ठ्यद्योतनार्थः। ये तु अक्षरं न क्षरत्यश्रुते वेत्यक्षरंएतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्नस्वमदीर्घमपूर्वमनपरम इत्यादिश्रुत्या सर्वधर्मशून्येत्वेन बोधितं ब्रह्मणो निर्विशेषं स्वरुपं लक्षयति। निर्देष्टुं न शक्यते। शब्दाप्रतिपाद्यमित्यर्थः। यतोऽव्यक्तं प्रत्यक्षादिप्रमाणैर्न व्यज्यत इत्यवक्तं रुपादिभिः शब्दप्रवृत्तिनिमित्तैः संज्ञाजातिगुणक्रियासंबन्धैश्च रहितत्वादित्यर्थः। यतोऽनिर्देश्यमतोऽव्यक्तं रुपादिहीनमिति वा। अस्मिन्पक्षे हेतुहेतुमद्भावासामञ्जस्यमभिप्रेत्यायं पक्ष आचार्यैरुपेक्षिः। अव्यक्तत्वं कुत इत्य आह। सर्वत्रगं सर्वाधिष्ठानत्वात्सर्वस्मिन्नाकाशवद्य्वापकमतः केनापि प्रमाणेन परिच्छेत्तुमशक्यमव्यक्तमित्यर्थः। यद्वा ननु एं तर्हि शून्यत्वमेव ब्रह्मण आगतमिति तत्राह। सर्वत्रगं सर्वेषु व्यभिचरत्सु घटपटादिष्वव्यभिचरितसद्रूपेण व्यापकं सर्वस्य सत्तास्फूर्तिप्रदातुः शून्यत्वासंभवादिति भावः। अव्यक्तत्वादचिन्त्यं करणागोचरस्य मनसा चिन्तयितुमशक्यत्वात्। तथाच श्रुतिःयतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा मह इति। एतेन सर्वत्रगं चेत्यसर्वैः कुतो नावगम्यत इति शङ्का निरस्ता। सर्वप्रमाणापरिच्छेद्यस्यातिकुशलेनापि चिन्तयुतुमप्यशक्यस्य सर्वावगतिविषयताया दुरनिरस्तत्वात्। नन्वेवं चेत्तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि?दृश्यते त्वग्र्यया बुद्य्धा सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः?मनसैवानुद्रष्टव्यं?आत्मा वारे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यःअनन्याश्चिन्तयन्तो मां?शास्त्रयोनित्वात् इत्यादिश्रुतिस्मृतिसूत्राणां का गतिरितिचेत्तत्राह। कूटस्थं दृश्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्योःअनन्याश्चिन्तयन्तो मां?शास्त्रयोनित्वात् इत्यादिश्रुतिस्मृतिसूत्राणां का गतिरितिचेत्तत्राह। कूटस्थं दृश्यमानगुणकमन्तर्दोषं वस्तु कूटशब्दप्रतिपाद्यम्। कूटरुपकं कोटसाक्ष्यं कूटकार्षापण इत्यादौ तथाभूते कूटशब्दस्य प्रयोगदर्शनात्।तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्?मायाचावित्या च स्वयमेव भवति?मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरं?तैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया इत्यादौ मायादिशब्दिततया प्रसिद्धमविद्यादि तदिहानेकसंसारबीजमन्तर्दोषं कूटशब्देन ग्राह्यम्। तस्मिन्कूटेऽध्यक्षतयाधिष्ठानतया तिष्ठतीति कूटस्थम्। भाष्येऽविद्यादीति आदिपदात् अहंकारदिकं ग्राह्यम्। तथाच ब्रह्मण्यारोपितस्याविद्यादेर्निवृत्तये उपचारेण निर्विशेषस्य शास्त्रविषयत्वमिति भावः। यद्वा अतएव राशिरिव स्थितं कुटस्थं निर्विकारण्। एतएवाचलं अध्यस्तस्याविद्यादेर्गुणदोषाभ्यां गुणदोषवत्त्वेन स्वस्वरुपान्न चलतीत्यचलमित्यर्थः। अतएव ध्रुवं नित्यम्। सदैकरसमिति यावत्। एतादृशं अक्षरं ये पर्युपासते परि समन्तादुपासते श्रवणमननाभ्यां उपास्यस्यार्थस्य विषयीकरणेन सामीप्यमुपगम्यानवच्छिन्नतैलधारावत्समानप्रत्ययप्रवाहेण दीर्घकालमासनं निदिध्यासनं कुर्वन्तीत्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yewho
tubut
akṣharamthe imperishable
anirdeśhyamthe indefinable
avyaktamthe unmanifest
paryupāsateworship
sarvatragam
achintyamthe unthinkable
chaand
kūṭastham
achalamthe immovable
dhruvamthe eternal
sanniyamyarestraining
indriyagrāmam
sarvatraeverywhere
samabuddhayaḥ
tethey
prāpnuvantiattain
māmme
evaalso
sarvabhūta
ratāḥengaged
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 12.2
श्री भगवानुवाचमय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः

मेरेमें मनको लगाकर नित्य-निरन्तर मेरेमें लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धासे युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 12.4
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः

जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 12Shlok 3
Bhagavad Gita · Adhyay 12, Shlok 3
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्

जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 12 श्लोक 3 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 12 श्लोक 3 का हिंदी अर्थ: "जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Bhakti Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 3?

Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 3 translates to: "Those who worship the imperishable, the indefinable, the unmanifest, the omnipresent, the unthinkable, the immovable, and the eternal. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 12, श्लोक 3 है जो Bhagavad Gita के Bhakti Yoga में संकलित है। जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "ye tv akṣharam anirdeśhyam avyaktaṁ paryupāsate" mean in English?

"ye tv akṣharam anirdeśhyam avyaktaṁ paryupāsate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 3. Those who worship the imperishable, the indefinable, the unmanifest, the omnipresent, the unthinkable, the immovable, and the eternal. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.