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Sudarshana Chakra
Adhyay 12, Shlok 2
श्री भगवानुवाचमय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः

मेरेमें मनको लगाकर नित्य-निरन्तर मेरेमें लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धासे युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी हैं। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

, "నా అభిప్రాయం ప్రకారం, ఎవరైతే తమ మనస్సులను నాపై స్థిరంగా ఉంచుకుంటారో, నన్ను ఎప్పుడూ స్థిరంగా ఆరాధిస్తారో, మరియు అత్యున్నత విశ్వాసాన్ని కలిగి ఉన్నవారే యోగాలో ఉత్తములు.

OdiaIND

"

ManipuriIND

, "ꯑꯩꯒꯤ ꯋꯥꯈꯜꯂꯣꯅꯗꯥ, ꯃꯈꯣꯌꯒꯤ ꯋꯥꯈꯜ ꯑꯗꯨ ꯑꯩꯉꯣꯟꯗꯥ ꯂꯦꯞꯇꯨꯅꯥ ꯂꯩꯕꯥ, ꯃꯇꯝ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛꯇꯥ ꯑꯩꯕꯨ ꯅꯤꯡꯖꯔꯤꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯊꯣꯏꯕꯥ ꯊꯥꯖꯕꯒꯥ ꯂꯣꯌꯅꯅꯥ ꯊꯋꯥꯌ ꯌꯥꯑꯣꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏꯁꯤꯡ ꯑꯁꯤ ꯌꯣꯒꯗꯥ ꯈ꯭ꯕꯥꯏꯗꯒꯤ ꯐꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏꯁꯤꯡꯅꯤ꯫"

MizoIND

, "Ka ngaihdanah chuan, keimahah an rilru nghat tlat, nghet taka min chibai, rinna sang ber pekte hi Yoga-ah chuan an tha ber a ni."

AssameseIND

, "মোৰ মতে যিসকলে মোৰ ওপৰত মন স্থিৰ কৰে, মোক সদায় অটলভাৱে পূজা কৰে আৰু পৰম বিশ্বাসেৰে সমৃদ্ধ, তেওঁলোক যোগত শ্ৰেষ্ঠ।"

KannadaIND

, "ನನ್ನ ಅಭಿಪ್ರಾಯದಲ್ಲಿ, ಯಾರು ನನ್ನ ಮೇಲೆ ತಮ್ಮ ಮನಸ್ಸನ್ನು ಹೊಂದುತ್ತಾರೆ, ನನ್ನನ್ನು ಯಾವಾಗಲೂ ದೃಢವಾಗಿ ಪೂಜಿಸುತ್ತಾರೆ ಮತ್ತು ಪರಮ ನಂಬಿಕೆಯನ್ನು ಹೊಂದಿದ್ದಾರೆ, ಅವರು ಯೋಗದಲ್ಲಿ ಅತ್ಯುತ್ತಮರು.

TamilIND

, "என் கருத்துப்படி, யார் தங்கள் மனதை என் மீது நிலைநிறுத்தி, என்னை எப்போதும் நிலையாக வணங்குகிறார்களோ, உயர்ந்த நம்பிக்கையுடன் இருப்பவர்களே யோகத்தில் சிறந்தவர்கள்.

MalayalamIND

, "എൻ്റെ അഭിപ്രായത്തിൽ, എന്നിൽ മനസ്സ് ഉറപ്പിക്കുകയും, എന്നെ എപ്പോഴും ദൃഢമായി ആരാധിക്കുകയും, പരമമായ വിശ്വാസത്തിന് അർഹത നേടുകയും ചെയ്യുന്നവരാണ് യോഗയിൽ ഏറ്റവും മികച്ചത്.

KonkaniIND

, "म्हज्या मतान जे आपलें मन म्हजेर थिरावतात, सदांच थिरावन पूजतात आनी परम श्रद्धेन युक्त आसतात, ते योगांत सगळ्यांत बरे आसतात."

NepaliIND

"मेरो विचारमा, जसले ममा आफ्नो मन लगाउछ, मेरो नित्य भक्ति गर्छ, र परम विश्वासले सम्पन्न हुन्छ, त्यो नै योगमा सर्वश्रेष्ठ हो।

DogriIND

, "मेरे मताबक जेह्ड़े मन मेरे उप्पर गै टिकदे न, मेरी सदा अडिग होई जंदे न, ते परम श्रद्धा कन्नै संपन्न होंदे न, ओह् योग च सर्वश्रेष्ठ न।"

PunjabiIND

, "ਮੇਰੇ ਵਿਚਾਰ ਵਿੱਚ, ਜੋ ਮੇਰੇ ਉੱਤੇ ਆਪਣਾ ਮਨ ਟਿਕਾਉਂਦੇ ਹਨ, ਮੇਰੀ ਸਦਾ ਅਡੋਲ ਭਗਤੀ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਅਤੇ ਪਰਮ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਨਾਲ ਸੰਪੰਨ ਹੁੰਦੇ ਹਨ, ਉਹ ਯੋਗ ਵਿੱਚ ਉੱਤਮ ਹਨ।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--[भगवान्ने ठीक यही निर्णय अर्जुनके बिना पूछे ही छठे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें दे दिया था। परन्तु उस विषयमें अपना प्रश्न न होनेके कारण अर्जुन उस निर्णयको पकड़ नहीं पाये। कारण कि स्वयंका प्रश्न न होनेसे सुनी हुई बात भी प्रायः लक्ष्यमें नहीं आती। इसलिये उन्होंने इस अध्यायके पहले श्लोकमें ऐसा प्रश्न किया।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

श्रीभगवान् बोले -- जो कामनाओंसे रहित पूर्णज्ञानी अक्षरब्रह्मके उपासक हैं उनको अभी रहने दो? उनके प्रति जो कुछ कहना है वह आगे कहेंगे? परंतु जो दूसरे हैं -- जो भक्त मुझ विश्वरूप परमेश्वरमें मनको समाधिस्थ करके सर्व योगेश्वरोंके अधीश्वर रागादि पञ्चक्लेशरूप अज्ञानदृष्टिसे रहित मुझ सर्वज्ञ परमेश्वरकी पिछले ( एकादश ) अध्यायके अन्तिम श्लोकके अर्थानुसार निरन्तर तत्पर हुए उत्तम श्रद्धासे युक्त होकर उपासना करते हैं? वे श्रेष्ठतम योगी हैं? यह मैं मानता हूँ। क्योंकि वे लगातार मुझमें ही चित्त लगाकर रातदिन व्यतीत करते हैं? अतः उनको युक्ततम कहना उचित ही है। ,

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

किमनयोर्योगयोर्मध्ये सुशक्यो योगो वा पृच्छ्यते किं वा साक्षान्मोक्षहेतुरिति विकल्प्य क्रमेणोत्तरं भगवानुक्तवानित्याह -- श्रीभगवानिति। यदि द्वितीयस्तथाविधयोगस्य वक्ष्यमाणत्वान्न प्रष्टव्यतेत्याह -- ये त्वक्षरेति। यद्याद्यस्तत्राह -- ये त्विति। सर्वयोगेश्वराणां सर्वेषां योगमधितिष्ठतां योगिनामित्यर्थः। विमुक्ता त्यक्ता रागाद्याख्या क्लेशनिमित्तभूता तिमिरशब्दितानाद्यज्ञानकृता दृष्टिरविद्या मिथ्या धीर्यस्य तमिति विशिनष्टि -- विमुक्तेति। नित्ययुक्तत्वं साधयति -- अतीतेति। तत्रोक्तो योऽर्थो मत्कर्मकृदित्यादि,तस्मिन्निश्चयेनायनमायो गमनं तस्य नियमेनानुष्ठानं तेनेत्यर्थः। उपासते मयि स्मृतिं सदा कुर्वन्तीत्यर्थः। उक्तोपासकानां युक्ततमत्वं व्यनक्ति -- नैरन्तर्येणेति। तदेव स्फुटयति -- अहोरात्रमिति। अह्नि च रात्रौ चातिमात्रमतिशयेन मामेव विषयान्तरविमुक्ताश्चिन्तयन्तीत्यर्थः।

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Sri Dhanpati

सविशेषानिर्विशेषोपासनयोः सुशकत्वगुणेन किमुपासनं श्रष्ठमिति पृच्छते किंवा साक्षान्मोक्षहेतुत्वेन गुणेनेति विकल्प्य? साक्षान्मोक्षहेतुत्वेन श्रैष्ठ्यं निर्विशेषोपासनस्योक्तं वक्ष्यमाणं च सुशकत्वेन तु प्रथमस्य श्रृण्वित्याशयवान् श्रीभगवानुवाच। मयि विश्वरुपे परमेश्वरं त्रिगुणमायानदीनर्तके सर्वात्मनि परमप्रमास्पदे ये मन आवेश्य समाधाय भक्तः सन्तो मां समस्तयोगादीश्वराधीश्वरं सर्वज्ञं त्यक्तरागादिरुपक्लेशनिमित्तभूतानाद्यज्ञानाविद्यालक्षणमिध्यादृष्टिं नित्ययुक्ताःमत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः। निर्वैरः सर्वभूतेषु यः सस मामेति पाण्डव इत्येवं सततयुक्ताः श्रद्धया परया प्रकृष्टया ईश्वरभजनादेवोद्धार इति निश्चयापन्ना उपासते ते मम युक्ततमाः श्रेष्ठतमा मता अभिप्रेताः यतो विषान्तरविमुखा नैरन्तर्येण मयि मन आवेश्य मामेवाहर्निशं चिन्तयन्तीत्यत इति भावः। येतु मे मतमिति ज्ञानिनमात्मत्वेनैव पश्यतो मर्खेष्वपि,कारुण्यात्पक्षपातवतः सर्वज्ञस्य युक्ततमा मता इति वदन्ति तेषां पक्षेऽस्मिन्प्रकरणे एतदुक्ते सामञ्जस्यं चिन्त्यम्। भगवता कारुण्यात्पक्षापातेन युक्ततमत्वेनाभिमतानां भगवद्भक्तानां सुशकोपासने प्रवृत्ता अतो युक्तातमा इति वस्तुवृत्त्याऽभिप्रेतस्य श्रेष्ठतमत्वस्यासिद्धेः स्पष्टत्वात्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhrībhagavān uvācha
mayion me
āveśhyafix
manaḥthe mind
yethose
māmme
nitya yuktāḥalways engaged
upāsateworship
śhraddhayāwith faith
parayābest
upetāḥendowed
tethey
meby me
yuktatamāḥ
matāḥI consider
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 12.1
अर्जुन उवाचएवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।येचाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः

जो भक्त इस प्रकार निरन्तर आपमें लगे रहकर आप-(सगुण भगवान्-) की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निराकारकी ही उपासना करते हैं, उनमेंसे उत्तम योगवेत्ता कौन हैं? — VaniSagar

Bhagavad Gita · 12.3
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्

जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 12Shlok 2
Bhagavad Gita · Adhyay 12, Shlok 2
श्री भगवानुवाचमय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः

मेरेमें मनको लगाकर नित्य-निरन्तर मेरेमें लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धासे युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 12 श्लोक 2 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 12 श्लोक 2 का हिंदी अर्थ: "मेरेमें मनको लगाकर नित्य-निरन्तर मेरेमें लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धासे युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Bhakti Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 2?

Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 2 translates to: ", "In My opinion, those who fix their minds on Me, worship Me ever steadfastly, and are endowed with supreme faith, are the best in Yoga. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"श्री भगवानुवाचमय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।श्रद्धया परयोपेतास्ते मे " — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 12, श्लोक 2 है जो Bhagavad Gita के Bhakti Yoga में संकलित है। मेरेमें मनको लगाकर नित्य-निरन्तर मेरेमें लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धासे युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhrī-bhagavān uvācha" mean in English?

"śhrī-bhagavān uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 2. , "In My opinion, those who fix their minds on Me, worship Me ever steadfastly, and are endowed with supreme faith, are the best in Yoga. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.