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Sudarshana Chakra
Adhyay 12, Shlok 5
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्। अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते

अव्यक्तमें आसक्त चित्तवाले उन साधकोंको (अपने साधनमें) कष्ट अधिक होता है; क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्त-विषयक गति कठिनतासे प्राप्त की जाती है। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

বৃহত্তর তাদের কষ্ট যাদের মন অপ্রকাশিত, কারণ অপ্রকাশিত লক্ষ্যে পৌঁছানো মূর্ত মানুষের পক্ষে খুব কঠিন।

GujaratiIND

જેઓનું મન અવ્યક્ત પર કેન્દ્રિત હોય છે તે તેમની મુશ્કેલી વધારે છે, કારણ કે અપ્રગટના લક્ષ્ય સુધી પહોંચવું મૂર્ત લોકો માટે ખૂબ મુશ્કેલ છે.

TeluguIND

అవ్యక్తమైన వాటిపై మనస్సు పెట్టుకున్న వారి కష్టాలు చాలా ఎక్కువ, ఎందుకంటే వ్యక్తీకరించని లక్ష్యాన్ని చేరుకోవడం చాలా కష్టం.

SindhiIND

سڀ کان وڏي مصيبت آهي انهن جي جن جا ذهن غير ظاهر تي لڳل آهن، ڇاڪاڻ ته غير ظاهر جي مقصد تائين پهچڻ مجسمن لاءِ تمام ڏکيو آهي.

KannadaIND

ಅವ್ಯಕ್ತದ ಮೇಲೆ ಮನಸ್ಸು ಮಾಡುವ ಅವರ ತೊಂದರೆ ಹೆಚ್ಚು, ಏಕೆಂದರೆ ಅವ್ಯಕ್ತವಾದ ಗುರಿಯನ್ನು ಸಾಕಾರಗೊಂಡವರಿಗೆ ತಲುಪುವುದು ತುಂಬಾ ಕಷ್ಟ.

MalayalamIND

പ്രകടമാകാത്തതിൽ മനസ്സ് പതിഞ്ഞിരിക്കുന്ന അവരുടെ പ്രശ്‌നങ്ങൾ വലുതാണ്, കാരണം വെളിപ്പെടുത്താത്തതിൻ്റെ ലക്ഷ്യം മൂർത്തീഭാവമുള്ളവർക്ക് എത്തിച്ചേരാൻ വളരെ പ്രയാസമാണ്.

OdiaIND

ସେମାନଙ୍କର ଅସୁବିଧା ଅଧିକ, ଯାହାର ମନ ଅଜ୍ଞାତ ଉପରେ ସ୍ଥିର ହୋଇଛି, କାରଣ ଅଜ୍ଞାତର ଲକ୍ଷ୍ୟ ସନ୍ନିବେଶକାରୀଙ୍କ ନିକଟରେ ପହଞ୍ଚିବା ଅତ୍ୟନ୍ତ କଷ୍ଟକର |

MarathiIND

ज्यांची मने अव्यक्तावर केंद्रित असतात त्यांचा त्रास जास्त असतो, कारण अव्यक्ताचे ध्येय गाठणे मूर्त स्वरूपाला फार कठीण असते.

TamilIND

வெளிப்படுத்தப்படாதவற்றின் மீது மனதைக் கொண்டுள்ள அவர்களின் கஷ்டம் பெரியது, ஏனென்றால் வெளிப்படுத்தப்படாதவர்களின் இலக்கை அடைவது மிகவும் கடினம்.

PunjabiIND

ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਮੁਸੀਬਤ ਵੱਡੀ ਹੈ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਮਨ ਅਪ੍ਰਗਟ 'ਤੇ ਟਿਕਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਅਪ੍ਰਗਟ ਦੇ ਟੀਚੇ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚਣਾ ਸਰੂਪ ਵਾਲੇ ਲਈ ਬਹੁਤ ਔਖਾ ਹੈ।

MaithiliIND

हुनका लोकनिक क्लेश पैघ होइत छनि जिनकर मोन अप्रकट पर रहैत छनि, कारण अप्रकट केर लक्ष्य धरि पहुँचब मूर्त लोकक लेल बहुत कठिन अछि ।

KonkaniIND

ज्याचें मन अप्रकट्याचेर आसता तांचो त्रास व्हडलो, कारण अप्रकट्याचें ध्येय मूर्तांक पावप खूब कठीण.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्'--अव्यक्तमें आसक्त चित्तवाले-- इस विशेषणसे यहाँ उन साधकोंकी बात कही गयी है, जो निर्गुण-उपासनाको श्रेष्ठ तो मानते हैं, पर जिनका चित्त निर्गुणतत्त्वमें आविष्ट नहीं हुआ है। तत्त्वमें आविष्ट होनेके लिये साधकमें तीन बातोंकी आवश्यकता होती है -- रुचि, विश्वास और योग्यता। शास्त्रों और गुरुजनोंके द्वारा निर्गुण-तत्त्वकी महिमा सुननेसे जिनकी (निराकारमें आसक्त चित्तवाला होने और निर्गुण-उपासनाको श्रेष्ठ माननेके कारण) उसमें कुछ रुचि तौ पैदा हो जाती है और वे विश्वासपूर्वक साधन आरम्भ भी कर देते हैं; परन्तु वैराग्यकी कमी और देहाभिमानके कारण जिनका चित्त तत्त्वमें प्रविष्ट नहीं होता-- ऐसे साधकोंके लिये यहाँ 'अव्यक्तासक्तचेतसाम्' पदका प्रयोग हुआ है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

किंतु --, ( उनको ) क्लेश अधिकतर होता है। यद्यपि मेरे ही लिये कर्मादि करनेमें लगे हुए साधकोंको भी बहुत क्लेश होता है? परंतु जिनका चित्त अव्यक्तमें आसक्त है? उन अक्षरचिन्तक परमार्थदर्शियोंको तो देहाभिमानका परित्याग करना पड़ता है? इसलिये उन्हें और भी अधिक क्लेश उठाना पड़ता है। क्योंकि जो अक्षरात्मिका अव्यक्तगति है वह देहाभिमानयुक्त पुरुषोंको बड़े कष्टसे प्राप्त होती है? अतः उनको अधिकतर क्लेश होता है। उन अक्षरोपासकोंका जैसा आचारविचारव्यवहार होता है वह आगे ( अद्वेष्टाइत्यादि श्लोकोंसे बतलायेंगे।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

सगुणोपासकेष्वपि कथमित्याह -- किंत्विति। अक्षरोपासनस्य दुष्करत्वादुपासनान्तरस्य सुकरत्वादित्यभिप्रेत्याह -- क्लेश इति। अधिक एवेतरेभ्यो द्वैतदर्शिभ्यः कामिभ्य इति शेषः। तेषां क्लेशस्याधिकतरत्वे हेतुं मत्वा विशिनष्टि -- देहेति। अव्यक्तमत्यन्तसूक्ष्मं निर्विशेषमक्षरं तस्मिन्नासक्तमभिनिविष्टं चेतो येषां तेषामिति यावत्। अक्षरोपासकानां क्लेशस्याधिकतरत्वे भगवानेव हेतुमाह -- अव्यक्तेति। दुःखं दुःखेन कृच्छ्रेणेति यावत्? अतो देहाभिमानत्यागादित्यर्थः। ते कथं वर्तन्ते तत्राह -- अक्षरेति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

एवं चेत्तर्हि एतेषां सत्तमतां कुतो न ब्रूषे कुतश्च सगुणोपासकान् सत्तमानुक्तवानसीत्याशङ्क्य स्वस्वरुपाणां सतां युक्ततमत्वस्यायुक्ततमव्वस्य वा वक्तव्यत्वात्सगुणोपासने क्लेशाधिकतराभावच्चेत्याशयेनाह -- क्लेश इति। यद्यपि सगुणोपासकानां मत्कर्मपरायणतादौ क्लेशोऽधिकोऽस्त्येव तथाप्यक्षरोपासकानां देहाभिमानपरित्यागनिबन्धोऽधिकतरः क्लेशः अव्यक्ते करणागोचरे तत्प्राप्त्यर्थमासक्तं चेतश्चित्तं येषां तेषामव्यक्तासक्तचेतसां हि यस्मादव्यक्ताक्षरात्मिका गतिर्देहवद्भिर्देहाभिमानवद्भिर्दुःखं यथा स्यात्तथा। अतिकष्टेनेति यावत्। अवाप्यतेऽतः क्लेशोऽधिकतर इत्युक्तम्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
kleśhaḥtribulations
adhikataraḥ
teṣhāmof those
avyaktato the unmanifest
āsaktaattached
chetasāmwhose minds
avyaktāthe unmanifest
hiindeed
gatiḥpath
duḥkhamexceeding difficulty
dehavadbhiḥ
avāpyateis reached
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 12.4
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः

जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 12.6
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते

परन्तु जो कर्मोंको मेरे अर्पण करके और मेरे परायण होकर अनन्ययोगसे मेरा ही ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 12Shlok 5
Bhagavad Gita · Adhyay 12, Shlok 5
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्। अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते

अव्यक्तमें आसक्त चित्तवाले उन साधकोंको (अपने साधनमें) कष्ट अधिक होता है; क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्त-विषयक गति कठिनतासे प्राप्त की जाती है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 12 श्लोक 5 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 12 श्लोक 5 का हिंदी अर्थ: "अव्यक्तमें आसक्त चित्तवाले उन साधकोंको (अपने साधनमें) कष्ट अधिक होता है; क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्त-विषयक गति कठिनतासे प्राप्त की जाती है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Bhakti Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 5?

Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 5 translates to: "Greater is their trouble whose minds are set on the unmanifested, for the goal of the unmanifested is very hard for the embodied to reach. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्। अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 12, श्लोक 5 है जो Bhagavad Gita के Bhakti Yoga में संकलित है। अव्यक्तमें आसक्त चित्तवाले उन साधकोंको (अपने साधनमें) कष्ट अधिक होता है; क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्त-विषयक गति कठिनतासे प्राप्त की जाती है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "kleśho ’dhikataras teṣhām avyaktāsakta-chetasām" mean in English?

"kleśho ’dhikataras teṣhām avyaktāsakta-chetasām" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 5. Greater is their trouble whose minds are set on the unmanifested, for the goal of the unmanifested is very hard for the embodied to reach. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.