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Sudarshana Chakra
Adhyay 11, Shlok 52
श्री भगवानुवाच सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम। देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः

श्रीभगवान् बोले -- मेरा यह जो रूप तुमने देखा है, इसके दर्शन अत्यन्त ही दुर्लभ हैं। इस रूपको देखनेके लिये देवता भी नित्य लालायित रहते हैं। — VaniSagar

Global Translations

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AssameseIND

, "তুমি দেখা মোৰ এই ৰূপটো চাবলৈ সঁচাকৈয়ে অতি কঠিন; আনকি দেৱতাসকলেও ইয়াক চাবলৈ সদায় আকাংক্ষা কৰে।"

KonkaniIND

, "तुवें पळयल्लें म्हजें हें रूप पळोवंक खरेंच खूब कठीण; देवांक लेगीत तें पळोवपाची सदांच आकांक्षा आसता."

BhojpuriIND

, "हमार ई रूप देखल वाकई में बहुत कठिन बा जवन तू देखले बाड़ू; देवता लोग भी एकरा के देखे खातिर हमेशा तरसतारे।"

ManipuriIND

, "ꯅꯍꯥꯛꯅꯥ ꯎꯔꯤꯕꯥ ꯑꯩꯒꯤ ꯃꯑꯣꯡ ꯑꯁꯤ ꯇꯁꯦꯡꯅꯥ ꯎꯕꯥ ꯐꯪꯕꯗꯥ ꯌꯥꯝꯅꯥ ꯂꯨꯏ; ꯏꯁ꯭ꯕꯔꯁꯤꯡꯅꯁꯨ ꯃꯁꯤꯕꯨ ꯃꯇꯝ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛꯇꯥ ꯌꯦꯡꯅꯤꯡꯏ꯫"

TamilIND

, "நீ கண்ட என்னுடைய இந்த வடிவத்தைப் பார்ப்பது உண்மையில் மிகவும் கடினம்; தேவர்களும் கூட அதைக் காண ஏங்குகிறார்கள்.

MalayalamIND

, "നീ കണ്ട എൻ്റെ ഈ രൂപം കാണാൻ വളരെ പ്രയാസമാണ്; ദേവന്മാർ പോലും അത് കാണാൻ കൊതിക്കുന്നു.

TeluguIND

, "నువ్వు చూసిన ఈ నా రూపాన్ని చూడటం చాలా కష్టం, దేవతలు కూడా దానిని చూడాలని తహతహలాడుతూ ఉంటారు.

DogriIND

, "मेरे इस रूप गी दिखना सच्चें गै बड़ा मुश्कल ऐ जेह्ड़ा तुसें दिक्खेआ ऐ; देवता बी इसगी दिक्खने आस्तै सदा तरसदे न।"

GujaratiIND

, "તેં જોયેલું મારું આ સ્વરૂપ જોવું ખરેખર ખૂબ જ અઘરું છે; દેવતાઓ પણ તેને નિહાળવા તત્પર રહે છે.

SindhiIND

”منهنجو هي روپ ڏسڻ ڏاڍو ڏکيو آهي، جيڪو تو ڏٺو آهي، ان کي ڏسڻ لاءِ ديوتائن کي به توتي آهي.

BengaliIND

, "আমার এই রূপ যা তুমি দেখেছ তা দেখা সত্যিই খুব কঠিন; এমনকি দেবতারাও তা দেখতে চায়।

PunjabiIND

, “ਮੇਰਾ ਇਹ ਰੂਪ ਜੋ ਤੂੰ ਦੇਖਿਆ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ ਵੇਖਣਾ ਸੱਚਮੁੱਚ ਬਹੁਤ ਔਖਾ ਹੈ, ਦੇਵਤੇ ਵੀ ਇਸ ਨੂੰ ਵੇਖਣ ਲਈ ਤਰਸਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम'--यहाँ 'सुदुर्दर्शम्' पद चतुर्भुजरूपके लिये ही आया है, विराट्रूप या द्विभुजरूपके लिये नहीं। कारण कि विराट्रूपकी तो देवता भी कल्पना क्यों करने लगे ! और मनुष्यरूप जब मनुष्योंके लिये सुलभ था, तब देवताओंके ल,ये वह दुर्लभ कैसे होता ! इसलिये 'सुदुर्दर्शम्' पदसे भगवान् विष्णुका चतुर्भुजरूप ही लेना चाहिये, जिसके लिये 'देवरूपम्' (11। 45) और स्वकं रूपम् (11। 50) पद आये हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

श्रीभगवान् बोले -- मेरे जिस रूपको तूने देखा है? वह बड़ा दुर्दर्श है अर्थात् जिसका दर्शन बड़ी कठिनतासे हो? ऐसा है। देवता लोग भी मेरे इस रूपका दर्शन करनेकी सदा इच्छा करते हैं। अभिप्राय यह है कि दर्शनकी इच्छा करते हुए भी उन्होंने तेरी भाँति ( मेरा रूप ) देखा नहीं है और देखेंगे भी नहीं।,

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

उपास्यत्वाय विश्वरूपं स्तोतुं भगवदुक्तिमुत्थापयति -- भगवानिति। त्वद्व्यतिरिक्तानामिदं रूपं द्रष्टुमशक्यमित्येतद्विशदयति -- देवादय इति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

एवं श्रुत्वा स्वकृतस्यातिदर्लभस्यानुग्रहस्य वैयर्थ्यपरिहाराय श्रीभगवानुवाच। यन्मम रुपं मदनुग्रहेण त्वं दृष्टवानसि तदिदमन्येषां सुष्ठु दुःखेनात्यन्तकष्टेन दर्शनमस्येति सुदुर्द्सं यतोत्युत्तमाः सात्विकास्तिद्दर्शनार्थिनश्च देवा इन्द्रादयोऽपि न तत्त्वमिव दृष्टवन्तो न च द्रक्ष्यन्तीत्याशयेनाह -- देवा इति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhrībhagavān uvācha
sudurdarśham
idamthis
rūpamform
dṛiṣhṭavān asithat you are seeing
yatwhich
mamaof mine
devāḥthe celestial gods
apieven
asyathis
rūpasyaform
nityameternally
darśhanakāṅkṣhiṇaḥ
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 11.51
अर्जुन उवाच दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तवसौम्यं जनार्दन। इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः

हे जनार्दन ! आपके इस सौम्य मनुष्यरूपको देखकर मैं इस समय स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 11.53
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा

जिस प्रकार तुमने मुझे देखा है, इस प्रकारका (चतुर्भुजरूपवाला) मैं न तो वेदोंसे, न तपसे, न दानसे और न यज्ञसे ही देखा जा सकता हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 11Shlok 52
Bhagavad Gita · Adhyay 11, Shlok 52
श्री भगवानुवाच सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम। देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः

श्रीभगवान् बोले -- मेरा यह जो रूप तुमने देखा है, इसके दर्शन अत्यन्त ही दुर्लभ हैं। इस रूपको देखनेके लिये देवता भी नित्य लालायित रहते हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 11 श्लोक 52 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 11 श्लोक 52 का हिंदी अर्थ: "श्रीभगवान् बोले -- मेरा यह जो रूप तुमने देखा है, इसके दर्शन अत्यन्त ही दुर्लभ हैं। इस रूपको देखनेके लिये देवता भी नित्य लालायित रहते हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Vishvarupa-Darsana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 11 Verse 52?

Bhagavad Gita Chapter 11 Verse 52 translates to: ", "It is very hard indeed to see this form of Mine which thou hast seen; even the gods are ever longing to behold it. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"श्री भगवानुवाच सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम। देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं " — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 11, श्लोक 52 है जो Bhagavad Gita के Vishvarupa-Darsana Yoga में संकलित है। श्रीभगवान् बोले -- मेरा यह जो रूप तुमने देखा है, इसके दर्शन अत्यन्त ही दुर्लभ हैं। इस रूपको देखनेके लिये देवता भी नित्य लालायित रहते हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhrī-bhagavān uvācha" mean in English?

"śhrī-bhagavān uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 11 Verse 52. , "It is very hard indeed to see this form of Mine which thou hast seen; even the gods are ever longing to behold it. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.